सरिता विशेष

बेटी के जीवन पर पिता का बहुत प्रभाव पडता है. शादी के बाद अगर पति के साथ सामंजस्य बन जाये तो कोई भी पीछे नहीं रहता. दिल्ली की पलीबढी मालविका हरिओम के पिता सत्यपाल मांगिया को कवितायें लिखने का शौक था. उनकी बेटी मालविका को भी कविता और गजल लिखने का शौक हो गया. जेएनयू में पढ़ाई के दौरान मालविका की लिखी कविताओं की प्रशंसा सभी ने की. मालविका की शादी डाक्टर हरिओम से हुई तो वह भी बहुत अच्छा गाते थे. शादी के बाद पति हरिओम ने पत्नी को आगे बढ़ने के लिये प्रोत्साहित किया. इस प्रोत्साहन के बाद मालविका ने कवितायें और गजल लिखना शुरू किया.

अपनी मेहनत से कुछ ही समय में मालविका आकाशवाणी लखनऊ में ग्रेड आर्टिस्ट हो गई. आकाशवाणी और दूरदर्शन में उनकी गजल और कविताओं का प्रसारण होने लगा. उनकी आवाज में एक नया सुर था. जिसे सुनने और देखने वालों ने बेहद पंसद किया. आमतौर पर गजल के लाइव शो कम होते हैं. मालविका ने जिस सरलता और सहजता के साथ गजल को सुनने वालों के बीच पेश किया, लोग उसके दीवाने होने लगे. उत्तर प्रदेश के अलग अलग शहरों में लगने वाले महोत्सव में मालविका के गजल शो रखने की मांग होने लगी. लखनऊ दूरदर्शन के कार्यक्रम ‘बोले यूपी’ में मालविका के सुर के साथ उनके गजल पेश करने के अंदाज को भी लोगों ने बेहद पंसद किया.

मालविका दूसरे लेखकों की गजलों के साथ ही साथ अपनी लिखी गजलें भी पेश करने लगी हैं. इसके साथ ही साथ मुशायरों में अपनी पेशकश देने लगी हैं. अपने इस हुनर के साथ मालविका अपनी दोनो बेटियों और परिवार का पूरा ख्याल रखते हुये काम कर रही हैं. वह कहती है ‘मैं कभी गजल की रियाज करना नहीं भूलती. दिन में 1 से 2 घंटे रियाज करती हूं. इसके साथ मैं अपने गुरू से गजल गायिकी की पूरी शिक्षा ले रही हूं. मेरा मानना है कि इस तरह की विधाओं में आप तभी सफल हो सकती हैं जब आप को अच्छा गुरू मिला हो.’

मालविका अब हारमोनियम बजाते हुये गजल पेश करने लगी हैं. वह कहती है गजल के साथ हारमोनियम पर सुर लगाना मुझे अच्छा लगता है. इससे लाइव शो में बहुत अच्छा अंदाज बनता है. इसके अलावा मैंने अपनी गजलों की एक किताब भी तैयार की है. जिसे जल्द प्रिंट कराना चाहती हूं. अब मैं उस दिशा में आगे बढ रही हूं. इसके साथ ही साथ मेरी कोशिश है कि गजल को आमलोगों तक पहुंचाया जाये. जिससे यह और लोकप्रिय हो सकेगी. मैं घर परिवार के साथ अपने इस शौक को परवान चढ़ते देखना चाहती हूं. जहां मुझे आम श्रोता सुन सके और पंसद करें. मैं लोकगीत भी गाती हूं पर मेरी पसंद गजल ही है.