जैन धर्म में आचार्य विध्यासागर की वही पूछपरख और हैसियत है, जो सनातन धर्म में शंकराचार्य, इस्लाम में पैगम्बर, क्रिश्चियन में पोप, सिक्खों में गुरुनानक और दलितों में रविदास की है. विध्यासागर इन दिनो भोपाल के हबीबगंज जैन मंदिर में चातुर्मास कर रहे हैं, उन्हे सुनने और देखने देश भर से श्रद्धालु उमड़ रहे हैं. इनमे आम लोगों के अलावा नेताओं की तादाद भी ख़ासी है, जिनका एक अहम मकसद जैन समुदाय के लोगों को खुश करना भी है, क्योंकि अपनी व्यापारिक बुद्धि के लिए पहचाने जाने वाले जैनी चुनावों में दिल खोलकर चंदा देते हैं और हवा का रुख पलटने में भी माहिर हैं.

कोई भी दल सत्ता में आए, इस समुदाय के विधायकों की संख्या दहाई में ही रहती है जबकि वोटों के लिहाज से इनकी संख्या 20 लाख भी नहीं है. विध्यासागर के भोपाल आते ही मध्यप्रदेश विधानसभा अध्यक्ष सीता शरण शर्मा भी उन प्रमुख नेताओं में शामिल थे, जो सबसे पहले आचार्य के दर्शन करने पहुंचे थे. उन्हे आशीर्वाद मिला, तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने भी आगे की सोचते विध्यासागर को विधानसभा आकर प्रवचन करने का आग्रह कर डाला और जल्द ही घोषणा भी हो गई कि 28 जुलाई को दोपहर 3 बजे से इन आचार्य के प्रवचन विधानसभा में होंगे.

क्यों होंगे और विधानसभा में धर्मगुरुओं के आने का औचित्य क्या, यह न किसी ने बताया, न कोई पूछने की जरूरत समझ रहा कि विधानसभा आखिरकर एक संवैधानिक स्थल है. यहां धर्म कर्म पूजा पाठ यज्ञ हवन और प्रवचन क्यों, क्या ये मुनि गुरु और संत प्रवचन देकर आम जनता की समस्याओं का गारंटेड समाधान धर्म के जरिये करने का दावा करते हैं. अगर हाँ तो विधानसभा की जरूरत ही क्या विधायक क्यों चुने जाते हैं और अगर नहीं कर सकते तो धर्मगुरुओं को यहाँ बुलाकर क्यों जनता का पैसा फूंका जाकर विधानसभा को धर्म प्रचार का अड्डा बनाया जा रहा है.

विधानसभा और धर्मशाला में कोई फर्क मध्य प्रदेश में रह गया है, ऐसा लगता नहीं बल्कि लगता ऐसा है कि जमाना लोकतन्त्र का न होकर राजे रजबाड़ों का है, जिसमे सीएम राजा की तरह बैठते हैं और प्रजा के कल्याण के नाम पर धर्मगुरुओं के श्रीमुख से उपदेश सुनकर अपने कर्तव्यों की इति श्री हुई मान लेते हैं. शिवराज सिंह धर्मभीरुता के मामले में दिग्विजय सिंह को भी पटखनी देने पर उतारू हो आए हैं, जो अपने मुख्यमंत्रित्व काल के आखिरी चरण में इसी तरह जैन मुनियों के चरणों में लोट लगाया करते थे, लेकिन जब नतीजे सामने आए तो जैन बाहुल्य इलाकों से कांग्रेस का सूपड़ा साफ था. इतिहास अपने आप को दोहराए या न दोहराए, यह और बात है पर अब चुनाव आयोग को चाहिए कि वह बजाय पेड न्यूज़ पर हल्ला मचाने के धर्म और चुनाव का संबंध और सीमाएं तय करे जिनसे बड़े पैमाने पर वोट प्रभावित होते हैं और विधानसभा की मर्यादा अगर कोई है तो भंग होती है.