प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 8 नवंबर, 2016 को नोटबंदी के ऐलान के बाद 16  नवंबर को शुरू हुआ लोकसभा का शीतकालीन सत्र विपक्ष के हंगामे की भेंट चढ़ गया. यानि हर दिन जनता से टैक्स में वसूला गया करोड़ों रुपया व्यर्थ में खर्च होता रहा. कुल मिला कर 114 घंटे चले इस सत्र में महज 20.8 घंटे काम हो पाया. नरेंद्र मोदी इस सत्र में केवल 3 दिन मौजूद रहे, लेकिन बोले आखिरी दिन यानी 16 दिसंबर को.

उन्होंने अपने अंतिम दिन के भाषण में यह कह कर खुद को इंदिरा गांधी से भी मजबूत और दृढ़ इच्छाशक्ति वाला प्रधानमंत्री बताने की कोशिश की कि 1971 में इंदिरा गांधी को नोटबंदी की सलाह दी गई थी. इस के जवाब में उन्होंने कहा था कि क्या कांग्रेस को चुनाव नहीं लड़ना? उन के लिए देश नहीं, पार्टी बड़ी है.

नरेंद्र मोदी शायद यह कहना चाहते थे कि उन के लिए देश बड़ा है, पार्टी नहीं. इसलिए उन्होंने 5 राज्यों पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर के चुनावों से पहले नोटबंदी का फैसला ले कर अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति का परिचय दिया है. यानी उन के लिए पार्टी से बड़ा देश है और उन का नोट बंदी का फैसला देश हित में है. इस से पार्टी को नुकसान होता है तो हो. लेकिन इस बात को भाजपाई और देश ही नहीं पूरी दुनिया जानती है कि स्वर्गीय इंदिरा गांधी में जो दृढ़ इच्छाशक्ति थी, वह नरेंद्र मोदी तो क्या, किसी भी नेता में नहीं हो सकती. इसी दृढ़ इच्छाशक्ति की वजह से उन्होंने 1971 के युद्ध में पाकिस्तान का धूल चटा कर उसे दो हिस्सों में बांट दिया था. इसी इच्छाशक्ति की बदौलत उन्होंने 1975 में इमरजेंसी लगाई और इसी इच्छाशक्ति से उन्होंने आपरेशन ब्लूस्टार जैसा कड़ा फैसला लिया, भले ही उन्हें काफी आलोचना भी झेलनी पड़ी और जान भी देनी पड़ी.

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