सरिता विशेष

बहुत ज्यादा नहीं अभी कुछ दिन पहले ही द्वारकापीठ के शंकराचार्य जगद्गुरू स्वामी स्वरूपानन्द ने धर्म ग्रन्थों के हवाले से कहा था कि शनि कोई देवता नहीं, बल्कि एक ग्रह है, जिसके पूजा पाठ से कोई नफा नुकसान नहीं है और शनि पूजा सनातन धर्म में निषिद्ध है. अब वही शंकराचार्य पूरी बेशर्मी से कह रहा है कि अगर महिलाएं शनि पूजा करेंगी, तो उनके साथ बलात्कार की घटनाएं बढ़ेंगी. औरतों को बेइज्जत और भयभीत करने बाले बयान पर एन सी पी  की यह प्रतिक्रिया अपनी जगह ठीक है  कि शंकराचार्य बौरा गया  हैं और उसे जेल भेज देना चाहिए, पर इस कथन के और भी माने हैं.

दो टूक कहें तो झगड़ा पैसे और चढ़ावे का है जिसकी एक जिम्मेदार भूमाता ब्रिगेड की नायिका तृप्ति देसाई भी हैं, जिन्होने महज सुर्खियां बटोरने शिगनापुर शनि मंदिर मे प्रवेश करने और शनि मूर्ति पर तेल चढ़ाने एक निरर्थक लड़ाई लड़ी जिसका  नतीजा सामने है कि इससे पुण्य या पुरुषों की बराबरी का दर्जा नहीं, बल्कि बलात्कारी मिलेंगे. तृप्ति जैसे अतिरेक उत्साही महिलाएं यह नहीं सोच पातीं कि मंदिरों मे औरतों के प्रवेश से उन्हे कुछ हासिल नहीं होने वाला, उल्टे वे धर्म के विशाल कारोबार की नई ग्राहक बन कर रह जाएंगी, यानि पूजा पाठ के एवज मे उनका काम पंडे पुजारियों को दक्षिणा चढ़ाना रह जाएगा.

इधर स्वरूपानन्द की तकलीफ और तिलमिलाहट यह है कि यह पैसा उनके खीसे में नहीं आना, लिहाजा उन्होने नवरात्रि के दिनों में जब देश मे जगह जगह कन्याएँ पूजी जा रहीं हैं, तब सनातन या कथित हिन्दू धर्म का मूलभूत सिद्धान्त बता दिया कि अब यह पूजा किस घृणित और वीभत्स तरीके से होगी. शंकरचार्य गलत कुछ नहीं कह रहा है, बल्कि धर्म की असलियत बता रहा है कि द्वापर और त्रेता युग में बलात्कार जितने आम थे, उतने आज इस लिहाज से नहीं हैं कि अब बलात्कारियों को सजा भी होती है. पौराणिक काल में नहीं होती थी, क्योंकि तब बलात्कार ऋषि मुनि ज्यादा अपना हक समझते करते थे और तब का शासक इस बाबत उन्हे प्रणाम करता था पर अब लोकतन्त्र के चलते ऐसा नहीं होता.

इधर देश भर की महिलाएं इस बयान पर तिलमिलाइ हुई हैं पर कर कुछ नहीं कर पा रहीं सिवाय इस बहस के कि औरत अब समर्थ है, अपने पावों पर खड़ी है. आज की औरत स्वभिमानी है, वह इस या किसी भी तरह की ज्यादती को बर्दाश्त नहीं करेगी, जबकि दुर्भाग्य की बात है कि वह आज भी अहिल्या द्रोपदी और मत्स्यगंधा की तरह एक कलयुगी धर्माचार्य की कुत्सित मानसिकता को सुनते उसे शह ही दे रही है. जिस अपमान पर चंद घंटों में हाहाकार मच जाना चाहिए था वह चीरहरण की तरह शांति से सम्पन्न हो रहा है.

पुरुष खुश हैं कि बात बात पर नारी अधिकारों की धोंस देने बाली कथित जागरूक महिलाओं को स्वरूपानन्द ने उन्हें उनकी हैसियत और औकात बता दी है कि पाँव की जूती पाँव में ही रहे तो ही सुरक्षित रह पाएगी. रही बात स्वरूपानन्द की तो उसका कुछ नहीं बिगड़ने वाला, वह इस तरह  पागलपन की बात भी करे, तो धर्म भीरु लोग श्र्द्धा भक्ति से सर झुकाते उसकी बातों को धार्मिक निर्देश यानि प्रवचन समझते जय जय कार ही करते रहेंगे और अब कहीं भी बलात्कार होगा, तो कहेंगे कि महाराज ने कितनी सटीक भविष्यवाणी की थी. वे त्रिकालदर्शी हैं इसलिए अपनी हिफाजत के मद्देनजर महिलाओं को वर्जित शनि पूजन और दूसरे निषिद्ध कर्म नहीं करने चाहिए.