गठबंधन की राजनीति ने भारतीय विदेशी नीति को दिशाहीन व पंगु बना दिया है. नतीजतन राष्ट्रहित से जुड़े कुछ अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे व अहम फैसले नकारात्मक तौर पर प्रभावित होते हैं. गठबंधन नेताओं के क्षेत्रीय व संकुचित दृष्टिकोण व भारतीय विदेश नीति से जुड़ी समस्याओं का विश्लेषण कर रहे हैं ब्रिगेडियर अरुण बाजपेयी (से.नि.).

यह सही है कि विभिन्नताओं वाले भारत में आम राय कायम करना आसान नहीं है और क्षेत्रीय आकांक्षाओं की पूर्ति भी एक आवश्यकता है. पर भारतीय विदेश नीति, जोकि भारतीय राष्ट्रहित की प्रतीक है, के साथ गठबंधन की राजनीति को ले कर छेड़छाड़ करना देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ करना है जिस को देश की जनता बरदाश्त नहीं कर सकती है.

तमिलों के लिए पृथक देश की मांग उठा कर आतंकी संगठन ‘लिट्टे’ यानी लिबरेशन टाइगर औफ तमिल ईलम ने श्रीलंका में गृहयुद्ध छेड़ रखा था. पाबंदी के बाद भी लिट्टे को तमिलनाडु से गुपचुप समर्थन प्राप्त था. श्रीलंका सरकार ने लिट्टे को सख्ती से कुचला जिस में परोक्ष रूप से भारत ने भी उस का साथ दिया. यह सही है कि इस अभियान में मानव अधिकारों का उल्लंघन भी हुआ है.

हाल में अमेरिका की अगुआई में संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रस्ताव पेश किया गया है कि श्रीलंका में हुए मानव अधिकार उल्लंघन की अंतर्राष्ट्रीय जांच की जाए व दोषियों को सख्त दंड दिया जाए. भारत में कश्मीर, पूर्वोत्तर राज्यों में और नक्सलियों के खिलाफ सैनिक कार्यवाही चल रही है और अगर अंतर्राष्ट्रीय जांच का ऐसा प्रस्ताव श्रीलंका के खिलाफ पारित हो गया तो कल को वह भारत के खिलाफ भी हो सकता है. इसलिए भारत ने अमेरिका पर दबाव बनाया कि वह इस प्रस्ताव को हलका करे. अमेरिका मान गया और बजाय अंतर्राष्ट्रीय जांच के यह जांच अब श्रीलंका ही करेगा.

तमिलनाडु में अपनी खोई साख को वापस पाने के लिए आजकल द्रमुक यानी द्रविड़ मुनेत्र कषगम राजनीति पार्टी श्रीलंका के तमिलों की सब से बड़ी हमदर्द बनी हुई है. यह केंद्र सरकार पर भड़क गई और दबाव डाला कि वह श्रीलंका के खिलाफ प्रस्ताव को सख्त कराए. इस से डरी केंद्र सरकार ने वापस अमेरिका पर दबाव बनाया लेकिन अमेरिका नहीं माना और यह हलका प्रस्ताव 22 मार्च को पारित हो गया.

उधर, बाकी राजनीतिक दल भारतीय संसद में श्रीलंका के खिलाफ प्रस्ताव के लिए नहीं राजी हुए, इसलिए अब द्रमुक ने केंद्र सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया है.

भारत सरकार के लिए द्रमुक की बात का समर्थन और विरोध दोनों खतरनाक हैं. अगर सरकार समर्थन करती है तो न केवल श्रीलंका सरकार नाराज होगी, भारत में अलग तमिल ईलम यानी तमिल देश की मांग उठ खड़ी हो सकती है जिस में तमिलनाडु और उधर श्रीलंका शामिल हों, यह केंद्र सरकार हरगिज न चाहेगी. विरोध करने पर कांग्रेस तमिलनाडु में वोटरों को नाराज कर देगी. फिलहाल कांग्रेस ने पहला पर्याय ही अपनाया है.

15 फरवरी, 2012 को इटली के पोत ‘एनरिका लेक्सी’ पर सवार इटली नौसेना के 2 सैनिकों ने केरल राज्य के समुद्री तट के पास 2 भारतीय मछुआरों को यह सम?ा कर मार दिया कि वे सोमाली के समुद्री डकैत हैं. बजाय इस के कि पहले यह पता किया जाए कि यह घटना भारतीय वर्चस्व के समुद्री इलाके में घटी या अंतर्राष्ट्रीय समुद्र में, चूंकि केरल में 2 बड़े उपचुनाव होने थे इसलिए केरल सरकार ने इस को राष्ट्रीय मुद्दा बनाते हुए इन दोनों इटली के नौसैनिकों को हिरासत में ले लिया.

जब इटली की पहल पर यह घटना भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के सामने रखी गई तब 18 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को आदेश दिया कि एक फास्ट ट्रैक अदालत तुरंत गठित की जाए जो पहले यह निर्णय लेगी कि यह घटना भारत के या अंतर्राष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में घटी है. अगर भारतीय समुद्री क्षेत्र में घटी है तभी भारतीय अदालत में आगे कार्यवाही होगी अंतर्राष्ट्रीय अदालत में होगी.

उधर, भारत के इस ढुलमुल रवैए के चलते इटली ने भारत को ?ांसा दे कर अपने नौसैनिक वापस बुला लिए और भारत से कह दिया कि अब वे वापस नहीं आएंगे. इस से भारत की सारे विश्व में जगहंसाई हुई. अब ये सैनिक भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के दबाव में वापस तो आ गए हैं पर भारत सरकार द्वारा कई औपचारिक गारंटियां देने के बाद.

बंगलादेश में भारत की ओर रु?ान रखने वाली शेख हसीना की आवामी लीग की सरकार है. अगले वर्ष के शुरू में बंगलादेश में चुनाव होने हैं. वहां पर भारत विरोधी बेगम खालिदा जिया की बीएनपी सत्ता में न आ जाए, इस के लिए भारत के पास सुनहरा मौका था कि वह शेख हसीना सरकार से ‘तीस्ता नदी’ के पानी का बंटवारा और बंगलादेश व भारत के एकदूसरे के इलाकों में उपनिवेशों की समस्या को सुल?ा ले.

पूरा होमवर्क हो चुका था व इस संधि पर दोनों देशों के हस्ताक्षर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बंगलादेश यात्रा के दौरान होने थे. आखिरी मौके पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, जोकि उस समय यूपीए गठबंधन में थीं, मुकर गईं और यह संधि नहीं हो सकी.

हाल में पाकिस्तानी संसद ने एक प्रस्ताव पारित कर के भारत को भारतीय संसद पर हमले के मास्टरमाइंड अफजल गुरू को 9 फरवरी को फांसी देने को ले कर आड़े हाथों लिया है. यह पाकिस्तान का भारत के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप तो है ही साथ ही पाकिस्तान खुल्लमखुल्ला ऐलान कर रहा है कि वह भारत में आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है.

21 फरवरी को हैदराबाद का आतंकी हमला, 13 मार्च का श्रीनगर का आतंकी हमला और अभी हाल में पाकिस्तान की साजिश का परदाफाश कि होली के मौके पर दिल्ली को दहलाने की तैयारी की जा रही थी, इन सब में पाकिस्तान का हाथ होने की पुष्टि हो चुकी है. इस के बाद भी हमारी यह कैसी विदेश नीति है कि हमारे प्रधानमंत्री कहते घूमते हैं कि पाकिस्तान हमारा पड़ोसी देश है और चूंकि वह परमाणु संपन्न देश है इसलिए युद्ध विकल्प नहीं है सिर्फ बातचीत ही एक विकल्प है.

प्रधानमंत्रीजी, आप अपनी सेना और खुफिया तंत्रों से सलाह तो लीजिए. युद्ध और बातचीत के बीच पाकिस्तान को सही रास्ते पर लाने के कम से कम 100 और विकल्प हैं. जाहिर है कि भारत की विदेश नीति गठबंधन की मजबूरी के चलते पंगु बन गई है.

गठबंधनों के नेता आमतौर पर राज्यों तक ही की सोच रखते हैं और उन्हें अखिल भारतीय या यों कहिए कि विश्वव्यापी नीति की सम?ा ही नहीं होती. वे केंद्र में जब मंत्री बनते हैं तो संकुचित दृष्टि वाले बने रहते हैं. कर्नाटक के एच डी देवगौड़ा जब प्रधानमंत्री थे तो उन्हें भारत का मुख्यमंत्री कहा जाने लगा था क्योंकि वे भारत की समस्याएं कर्नाटक के चश्मे से देखते थे.

यही ममता बनर्जी व एम करुणानिधि के साथ हुआ और अगर नरेंद्र मोदी जैसा राज्य स्तर का नेता कभी प्रधानमंत्री बना तो वह पूरे देश को गुजरात की दृष्टि से देखेगा. उस के लिए विदेश नीति और विश्व नीतियां कोई माने नहीं रखेंगी.