मिनी लोकसभा चुनाव कहे जा रहे 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में 2 सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को भाजपा ने अपने कब्जे में ले लिया है. उत्तर प्रदेश को ‘राम का प्रदेश’ और उत्तराखंड को ‘देवभूमि’ कहा जाता है. दोनों ही प्रदेशों में चुनाव के आधार अलग अलग थे. उत्तराखंड में मुख्यमंत्री हरीश रावत पूरी भाजपा से अकेले चुनाव लड़ रहे थे. भाजपा ने कांग्रेस के बड़े नेताओं को तोड़ कर हरीश रावत को बेबस कर दिया. अब भाजपा के लिये मुश्किल भरा दौर शुरू होगा, क्योंकि भाजपा और कांग्रेस के दलबदल करने वाले नेता एक साथ कैसे चलेंगे?

उत्तर प्रदेश में चुनाव के हालात पूरी तरह से अलग थे. चुनाव के कुछ समय पहले तक अखिलेश के मुकाबले सबसे बड़ी प्रतिद्वंदी बसपा नेता मायावती को माना जा रहा था. इस बीच मुलायम का परिवार विवाद शुरू हुआ. इसके बाद राहुल और अखिलेश का गठबंधन शुरू हुआ. मायावती ने इसको हाशिये पर ढकेलने के लिये ‘मुस्लिम कार्ड’ खेला, जिसके तहत बसपा ने सबसे अधिक विधानसभा के टिकट मुस्लिम प्रत्याशियों को दिये. यही वह प्वाइंट था जिसमें चुनाव में मतों का ध्रुवीकरण शुरू हो गया. उत्तर प्रदेश की जनता के सामने एक तरफ बसपा थी जो मुसिलम गठजोड़ को आगे करके चुनाव जीतना चाहती थी. दूसरी तरफ भाजपा थी जिसने एक भी मुसलिम प्रत्याशी को टिकट नहीं दिया था.

बसपा को जिस दलित वर्ग पर भरोसा था वह धार्मिक धुव्रीकरण के समय भाजपा के पक्ष में खड़ा हो गया. केवल दलित ही नहीं पिछड़े वर्ग में भी यह भावना काम आई. भाजपा ने खुद ध्रुवीकरण की शुरुआत नहीं की पर उसको यह हवा रास आई और उसने धीरे धीरे अपने जुमलों के सहारे धार्मिक भावना को आगे किया. इसके तहत दीवाली और ईद, श्मशान और कब्रिस्तान जैसे मुद्दे उपर आये. नोटबंदी और दूसरे कारणों से दुखी लोगों के सामने कोई रास्ता नहीं था. ज्यादातर लोगों ने वोट नहीं दिया जिसने दिया वह सबकुछ भूल कर धार्मिक ध्रुवीकरण के साथ खड़ा हो गया.

उत्तर प्रदेश में 2007 में बसपा, 2012 में सपा और अब 2017 में भाजपा को बहुमत से सरकार बनाने का मौका दिया है. सामाजिक स्तर पर 2017 में भाजपा की जीत का कुछ वैसा ही असर होगा जैसे दलित और पिछडों को पहले के 2 चुनावों में हुआ था. भाजपा के लिये इस जीत के बाद प्रदेश का विकास सबसे बड़ा मुद्दा होगा. उत्तर प्रदेश से भाजपा के पास 73 सांसद और भारी बहुमत से प्रदेश में सरकार बना चुकी है. अब भाजपा को प्रदेश के लिये अपने समर्थकों के लिये बहुत कुछ करना होगा. बसपा की हार से दलित वर्ग की आवाज का क्या होगा? यह सोचने वाली बात है.