भारतीय जनता पार्टी राजनीतिक सुचिता की पक्षधर रही है. 2014 के लोकसभा चुनाव के समय उस के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने कहा कि लोकसभा मंदिर की तरह है. जब हमारी सरकार आएगी तो लोकसभा के दागी सदस्यों को संसद से बाहर किया जाएगा. नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के समय इस बात को खुल कर कहा कि केवल दूसरे दलों के लोगों को ही नहीं, भाजपा के भी ऐसे सदस्यों को संसद से बाहर कर दिया जाएगा.

मोदी ने देश को अपराधमुक्त राजनीति का सपना दिखाया था. सत्ता में आने के बाद पहली बार जब नरेंद्र मोदी संसद में प्रवेश करने लगे तो संसद की सीढि़यों से पहले रुक कर उन्होंने संसद की सीढि़यों को छू कर सिर झुकाया और नमन किया. उस समय भी नरेंद्र मोदी ने संसद को अपराधियों से मुक्त करने की अपनी बात को दोहराया. राजनीतिक सुचिता की बात करने वाली भाजपा ने संसद में बैठे अपराधी नेताओं के संबंध में तो कोई नया बदलाव नहीं किया, उलटे भाजपा में जो दागी नेता चुनाव जीत कर आए उन को पार्टी में ऊंचा ओहदा दे कर उन का सम्मान और बढ़ा दिया. इन में सब से बड़ा उदाहरण उत्तर प्रदेश में भाजपा के नए प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्या हैं. केशव प्रसाद मौर्या 2014 के लोकसभा चुनाव में फूलपुर संसदीय सीट से चुनाव जीत कर लोकसभा सदस्य बने.

केशव प्रसाद मौर्या पर हत्या, लूट, दंगा फैलाने और ऐसे ही तमाम आरोपों के 11 आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं. केशव प्रसाद पर पहला मुकदमा 1996 में कौशांबी जिले के पश्चिम शरीरा थाने में दंगा, सरकारी काम में बाधा, पुलिस पर हमला और बलवा फैलाने का दर्ज हुआ. 1998 में दूसरा मुकदमा थाने पर बलवा, धमकी, पुलिस पर हमला और सरकारी काम में बाधा डालने की धाराओं में इलाहाबाद जिले के कर्नलगंज थाने में दर्ज हुआ. 2008 में कौशांबी जिले के मोहम्मदपुर रईसा थाने में धोखाधड़ी, जालसाजी समेत कई दूसरी धाराओं के तहत तीसरा मुकदमा दर्ज हुआ. इसी थाने में धार्मिक स्थल तोड़ने, बलवा और दंगा भड़काने का मुकदमा भी लिखा गया. 2011 में 3 मुकदमे दर्ज हुए. पहला मंझनपुर थाने में बलवा, दंगा भड़काने, मारपीट और धमकी देने का. कोखराज थाने में अल्पसंख्यक युवक की हत्या और साजिश का मुकदमा लिखा गया और कोखराज थाने में ही दंगा भड़काने का मुकदमा भी लिखा गया.

साल 2013 में कौशांबी जिले के मंझनपुर थाने में बलवा, लूट, मारपीट का मुकदमा लिखा गया. इसी साल सिविल लाइन थाने में भीड़ एकत्र कर पुलिस टीम पर हमला करने का मुकदमा लिखा गया. इस में उन को पकड़ा भी गया. 2014 में लोकसेवा आयोग अध्यक्ष के खिलाफ आंदोलन में वे कूद पड़े. तब उन पर बलवा करने, पुलिस पर हमला करने और सरकारी संपत्ति को तोड़ने के आरोप लगे.2012 में कौशांबी जिले की सिराथू विधानसभा सीट से विधायक चुने गए. इस के बाद उन्होंने 2014 में फूलपुर लोकसभा सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ा और चुनाव जीत कर सांसद बन गए. 47 साल के केशव प्रसाद 18 साल तक विश्व हिंदू परिषद के प्रचारक रहे. अयोध्या आंदोलन के दौरान विश्व हिंदू परिषद से वे जुड़े थे और बाद में कौशांबी व इलाहाबाद को अपनी राजनीति का केंद्र बना कर पहचान बनानी शुरू कर दी. अपनी चाय की दुकान पर काम करने वाले केशव कम समय में करोड़पति बन गए. कई कंपनियों में मालिक तो कई कंपनियों में वे साझेदार हैं.

सांसद से प्रदेश अध्यक्ष

भाजपा के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष के रूप में पार्टी के कई बड़े नेता दौड़ में थे. जिन लोगों के नाम बाहर चल रहे थे उन में केशव प्रसाद का नाम शामिल नहीं था. भाजपा के ही कई नेता कहते हैं कि भाजपा के संगठन से जुड़े कुछ प्रमुख नेताओं को पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डा. लक्ष्मीकांत वाजपेई की सरल कार्यशैली पसंद नहीं आ रही थी. इन नेताओं को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का करीबी माना जाता है. डा. लक्ष्मीकांत वाजपेई के फेसबुक पेज पर भाजपा के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं ने अपने मन की भड़ास को निकाला भी है. इस में तमाम तरह के आरोप लगाए गए हैं. केवल भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं में ही केशव का यह विरोध नहीं दिखाई देता, विरोधी दल भी केशव पर हमलावर हैं. इलाहाबाद और कानपुर में कांगे्रस के कार्यकर्ताओं ने भी केशव प्रसाद पर सवाल उठाए हैं. कांगे्रस के कार्यकर्ताओं ने पोस्टर लगा कर पूछा, ‘चाय बेचने वाले केशव भैया, रहस्य पर से परदा हटाओ. करोड़पति बनने का राज तो बताओ.’ कानपुर में कार्यकर्ताओं ने ‘चाल, चरित्र और चेहरा’ नाम से पोस्टर लगा कर केशव को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास किया.

भाजपा में केशव को कृष्ण का अवतार बता कर उन का प्रचार करने वाले पोस्टर भी लगाए गए. भाजपा के हाईकमान ने केशव को प्रदेश अध्यक्ष तो बना दिया पर वह विधानसभा चुनाव में उन की भूमिका को कम करने की जुगाड़ में भी नई योजनाएं बना रहा है. भाजपा को प्रदेश में ऐसा नेता चाहिए था जो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का मुखौटा बन कर काम कर सके.

जातीय समीकरण

उत्तर प्रदेश में पिछड़ी और दलित जातियों के बीच अतिपिछड़ी जातियां भी हैं. इन की संख्या पिछड़ी जातियों से कम नहीं है. भाजपा बहुत समय पहले से अतिपिछड़ी जातियों के बीच अपना जनाधार बढ़ाना चाहती है. केशव प्रसाद अतिपिछड़ी जातियों में से ही आते हैं. पिछड़ी जातियों में अतिपिछड़ी जातियों की हिस्सेदारी करीब 55 फीसदी है. इन के पास पैसा नहीं है और पिछड़ी जातियों के ही दबंगों से डरे रहते हैं इसलिए इन को सवर्ण जातियों के करीब माना जाता है. मौर्या जाति से सवर्णों को कोई खतरा महसूस नहीं होता. यह जाति हिंदूवादी विचार, पूजापाठ में यकीन रखती है. खुद केशव प्रसाद की छवि हिंदूवादी नेता की है. भाजपा उन की छवि का लाभ लेना चाहती है. भाजपा विधानसभा चुनावों में जातीय समीकरण का पूरी तरह से ध्यान रख रही है. पिछड़ी जातियों में कुछ जातियां समाजवादी पार्टी का प्रमुख वोटबैंक हैं. जिन से अतिपिछड़ी जातियों को परेशानी महसूस होती है.

उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में मौर्या बिरादरी की 2 लड़कियों की हत्या कर उन के शवों को पेड़ पर लटकाने की जो घटना हुई थी उस में पिछड़ी जाति के बीच आपसी भेदभाव को सामने रख दिया गया था. जातीय आधार पर पिछड़ी जातियों में जो दूरियां हैं, भाजपा उन का लाभ उठा कर विधानसभा चुनावों में अतिपिछड़ी जातियों का नया वोटबैंक बनाना चाहती है. उधर, समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव 17 अतिपिछड़ी जातियों को दलित वर्ग में शामिल कराने के प्रयास में लगे हैं. मुलायम सिंह यादव का कहना है कि ये 17 जातियां आर्थिक और सामाजिक रूप से बेहद कमजोर और दलितों जैसी हालत में हैं. उन को दलित वर्ग में शामिल कर लिया जाएगा तो उन को भी दलितों वाली सरकारी सुविधाओं का लाभ मिल सकेगा. इस राजनीतिक दांवपेंच से अतिपिछड़ी जातियों के महत्त्व को समझा जा सकता है. केशव प्रसाद मौर्या की छवि जातीय नेता के बजाय हिंदूवादी नेता की है. ऐसे में अतिपिछड़ी सभी जातियां उन के साथ खड़ी होंगी, इस बात को ले कर भाजपा भी पूरी तरह से विश्वस्त नहीं है.