समाजवादी पार्टी की लड़ाई में ऊंट किस करवट बैठेगा, यह आने वाले समय में देखने को मिलेगा. यह लड़ाई किसी टीवी सीरियल डेली सोप की कहानी जैसी हो गई है. जहां पिता, पुत्र और सजिश जैसी घटनायें दिख रही हैं. समाजवाद की कहानी में जिस तरह से यू टर्न दिख रहे हैं वह सीरियलों को भी मात देते नजर आ रहे हैं. शुरुआत में सपा का यह विवाद लोगों में सहानुभूति का भाव जगा रहा था अब यह पूरी तरह से नाटक की शक्ल लेता जा रहा है. पार्टी और सरकार पर कब्जा करने के बाद मुख्यमंत्री और सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने नरेश उत्तम को उत्तर प्रदेश अध्यक्ष बनाकर यह संकेत जरूर दे दिया है कि वह परिवारवाद पर यकीन नहीं करते. प्रदेश अध्यक्ष के रूप में मुलायम परिवार के धर्मेन्द्र यादव का नाम आगे चल रहा था. वह सपा के लोकसभा में सांसद भी है.

अखिलेश यादव के लिये आने वाले दिन सबसे अहम होंगे. पिता मुलायम सिंह यादव उनके खिलाफ हैं. जिनको अखिलेश यादव ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाकर सलाहकार मंडल में रख दिया है. सपा परिवार में जानकारी रखने वाले लोगों का कहना है कि पिता मुलायम पूरी तरह से अखिलेश के साथ हैं. वह तब खिलाफ हो जाते हैं जब उनको कुछ समझा दिया जाता है. अगर मुलायम ने 31 दिसम्बर को अखिलेश और रामगोपाल का पार्टी से निलंबन वापस न लिया होता तो 1 जनवरी को आयोजित पार्टी का सम्मेलन अवैध हो जाता. पार्टी कार्यकर्ता भी असमंजस में नहीं रहते. 1 जनवरी को मुलायम ने रामगोपाल सहित अखिलेश का सहयोग करने वाले कुछ लोगों को तो पार्टी से निकाल दिया पर अखिलेश को पार्टी में बनाये रखा.

मुलायम सिंह की परेशानी एक तरफ बेटा और एक तरफ भाई है. असल में भाई शिवपाल के साथ मुलायम की दूसरी पत्नी साधना, बेटा प्रतीक और बहू अपर्णा भी हैं. परिवार की इस लड़ाई में खुद मुलायम दो नांव की सवारी में फंसे हुये हैं. अखिलेश खेमा इस लड़ाई में अमर सिंह को बीच में लाकर परिवार के इस पेंच को बाहर रखना चाह रहा है. जिससे अखिलेश और मुलायम आमने सामने न दिखें. अखिलेश को इस बात का भय है कि अगर बात मुलायम बनाम अखिलेश की आई तो सपा का बड़ा वर्ग मुलायम के साथ खड़ा हो सकता है. दो माह पहले इस लड़ाई में अमर सिह को सामने कर दिया गया था. उसके बाद अमर सिंह और शिवपाल दोनों ही हाशिये पर चले गये थे.

सरकार के बाद संगठन पर कब्जे की जदोजहद में अमर सिंह कहीं दूरदूर तक दिखाई नहीं दे रहे और शिवपाल महज मोहरा भर बन कर रह गये हैं. अब सीधा सामना पिता और पुत्र के बीच है. पिता का असमंजस अपनी जगह है. वह दूसरे परिवार को छोड़ नहीं सकता और पुत्र के साथ रह नहीं सकता. सपा के विशेष अधिवेशन में अगर अखिलेश अपने पक्ष में मुलायम को वहां पर खड़ा कर लेते तो बात दूसरी होती. विरोधियों को यह कहने का मौका नहीं मिलता कि अखिलेश ने पार्टी पर कब्जा कर लिया है. आने वाले दिनों में यह शह और मात का खेल चलेगा. इससे यह पूरी लड़ाई किसी नाटक में बदल कर रह गई है. समर्थक और विरोधी अपनी अपनी तरह से इसका विश्लेषण करते रहेंगे.