नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल में स्मृति ईरानी के विभाग को बदले जाने को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हुए मई 2014 के बाद के घटनाक्रम से जोड़ा जा रहा है. इस में कितना सच है, यह तो अमित शाह और नरेंद्र मोदी ही जानते हैं पर स्मृति ईरानी ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और कन्हैया कुमार का नाम विश्वभर में फैला कर उन्हें विवादास्पद कर दिया था.

दिल्ली के दक्षिणपश्चिम कोने में स्थित, देशदुनिया में विख्यात जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से बदलाव की आवाजें सब से अधिक उठती हैं. राजनीतिक, सामाजिक विसंगतियां, विद्रूपता के सवाल यहां सुलगते रहते हैं सरकार चाहे कांग्रेस की हो, मिलीजुली या एनडीए की. व्यवस्था के खिलाफ क्रांति, आंदोलन और विद्रोह की चिंगारियां यहां से उठती रही हैं पर हार्वर्ड, औक्सफोर्ड विश्वविद्यालयों जैसी खूबसूरत इमारतें, चारों तरफ हरियाली, फलफूल, पेड़पौधों से युक्त माहौल यहां नहीं दिखता. जेएनयू में तो दिल्ली विश्वविद्यालय कैंपस जैसा पौश, साफस्वच्छ, कालेजों के आगे खड़ी शिक्षकों, छात्रछात्राओं की चमचमाती कारों जैसा वातावरण भी नहीं है.

आप गूगल खोल कर हार्वर्ड, औक्सफोर्ड विश्वविद्यालयों की इमेज पर क्लिक करेंगे तो उन के परिसर में शानदार खूबसूरत इमारतें, चारों और हराभरा मनमोहक वातावरण और खासतौर से शांत, प्रसन्नचित्त, चमकते चेहरे वाले छात्रछात्राएं दिखाई देते हैं. वहीं जेएनयू की इमेज क्लिक करने पर परिसर में

दूरदूर फासले पर खड़े पुराने, कुछ जर्जर भवन, पत्थर, चट्टानें, सूखी जंगली घास, कंटीले झाड़झंखार और हवा में मुट्ठियां ताने, झंडे, बैनर थामे आक्रोशित छात्रछात्राओं की तसवीरों की भरमार देखने को मिलेगी.

मुनीरिका इलाके की ओर से जेएनयू के बड़े से मुख्यद्वार में प्रवेश करते हैं तो सामने बैरिकेड लगे हैं. 4-5 सुरक्षा गार्ड गाडि़यों को इंट्री करा के आगे बढ़ने देते हैं. पैदल जाने वालों को कोई रोकटोक नहीं है. लगभग 300 मीटर चल कर एक और बैरिकेड है. यहां 2 गार्ड बैठे हैं जो किसी को नहीं रोकते. आगे बढ़ेंगे तो लगेगा आप किसी जंगल में बसी बस्ती में प्रवेश कर गए हैं. बाईं ओर साधारण किस्म के क्वार्टर टाइप मकान बने हैं. दाईं तरफ जंगल, सूखे पेड़पौधे, बड़े पहाड़ी पत्थर, सड़क से हट कर स्टूडैंट यूनियन का कार्यालय, सड़क के किनारे होस्टलों का मार्ग दर्शाते बोर्ड, दूरदूर फासलों पर भवन बने नजर आते हैं.

झेलम छात्रावास, साबरमती, सतलज होस्टल, चंद्रभागा, नालंदा, नागार्जुन, नरेंद्र होस्टल, पेरियार होस्टल अलगअलग जगहों पर दिखते हैं. छात्रछात्राएं निकर, कुर्तापायजामा, टीशर्ट, बरमूडा, बनियान, में घूमते दिखाई देते हैं. परिसर में कई ढाबे भी हैं जो छप्पर, टिन के बने हैं. बाहर टूटीफूटी कुरसियां, बैंच लगी हैं. बड़े पत्थरों को भी सीट बना कर छात्रछात्राएं चायनाश्ता व खाना खाते दिख जाएंगे.

दिनरात गुलजार रहने वाले जेएनयू परिसर के इन ढाबों पर देश, समाज को ले कर चिंतन, विमर्श चलता रहता है.

जेएनयू परिसर दिखने में भले ही झाड़झंखार, जंगल, सूखे पेड़पौधों से युक्त किसी चरवाहा विश्वविद्यालय जैसा लगता हो पर सामाजिक, राजनीतिक सवाल यहीं सब से अधिक मथे जाते हैं. यहां का गंगा ढाबा कभी सोता नहीं. यह ढाबा एयरकंडीशंड नहीं, साजसज्जा युक्त नहीं, टिनटप्पर वाला है. सब से अधिक विमर्श विभिन्न मुद्दों पर यहीं चलता है. ऊंचनीच भेदभाव, छुआछूत के शिकार रहे किसानों, दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, वंचितों के छात्रछात्राएं जब उच्चशिक्षा के लिए यहां आते हैं तो वे सब सवाल मथते हैं जो उन की दशा के जिम्मेदार रहे. वे यहां आ कर हर तरह के, हर रंग के सामाजिक, राजनीतिक और सत्ता प्रतिष्ठानों से जवाब मांगते हैं, व्यवस्था में बदलाव की मांग उठाते हैं पर उन के सवालों से वे घबराते हैं और जवाब देने के बजाय उन की आवाजें दबाने की कोशिशें होती हैं या तरहतरह के झूठे आरोप लगा कर उन्हें प्रताडि़त किया जाता है और विश्वविद्यालय से बेदखल कर देने की धमकियां दी जाती हैं.

जेएनयू वर्षों से सुधार, क्रांति और बदलाव का वाहक रहा है. यहां फाइव, फोर या थ्री स्टार सुविधाएं तो दूर, बुनियादी साधनसुविधाओं के लिए भी विद्यार्थी मुहताज रहे हैं. होस्टलों की पुरानी इमारतों में पुराने पंखे लगे हैं. एसी या कूलर नहीं हैं. प्रोफैसरों, हैड औफ डिपार्टमैंट के कमरे भी अति साधारण, कुरसी, टेबल, पुस्तकों की रैक और ऊपर धीमी गति से चलता पुराना पंखा. प्रोफैसर डा. तुलसीराम का कमरा ऐसा ही था जब यह प्रतिनिधि उन से मिलने गया.

इन्हीं अभावों, गरम हवाओं, तपती लू और थपेड़ों के बीच यहां क्रांति, सुधार के साथसाथ छात्रछात्राओं के बीच प्रेम भी पनपता रहा है. यहां विचारों में उदारता है, दकियानूसीपन नहीं. प्रेम के साथ यहां निश्चित ही सैक्स को ले कर भी दकियानूसी सोच की दीवारें नहीं हैं.

यही सब देखते, सोचते हुए कोई  2 किलोमीटर अंदर ब्रह्मपुत्र होस्टल की इमारत के दरवाजे पर पहुंच कर बाहर बैठे गार्ड से जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार के बारे में पूछते हैं.

गार्ड फोन पर बात कराने को कहता है. फोन मिला कर गार्ड को दे दिया जाता है. गार्ड अंदर दाईं तरफ बने विजिटररूम में बैठ कर इंतजार करने के लिए कहता है.

4 मंजिले होस्टल के ग्राउंडफ्लोर पर कैंटीन के सामने विजिटररूम में एक पुराना सोफा लगा है. अंदर एक और छोटा कमरा है जहां 2 सोफे, एक सैंटर टेबल रखी है. छत पर पुराना सा पंखा गरमी से बस थोड़ी राहत देता है. कुछ ऐसा लगा जैसे गांव के किसी पक्के मकान में मेहमानों के लिए जैसेतैसे पुराने सोफे, टेबल, पंखा जुटा कर बैठने का इंतजाम कर दिया गया हो.

विजिटररूम के बाहर निकल कर होस्टल का माहौल देखने लगा. छात्रछात्राएं आजा रहे थे. होस्टल की बालकनी में बंधी रस्सियों पर कहीं टौवेल लटक रहे हैं, कहीं दूसरे कपड़े. फिर भी सरकार चाहती है कि सवाल करने वालों को जेएनयू से बाहर करो. सवाल यह है कि सरकार ऐसी कौन सी विशेष साधनसुविधाएं शिक्षकों व विद्यार्थियों को मुहैया करा रही है जो उन से छीन लेना चाहती है?

विजिटररूम के दाहिनी ओर से सीढि़यां उतर कर 3 साथियों के साथ कन्हैया आते हैं पर वे खाना खाने के लिए सामने कैंटीन में चले जाते हैं. निशांत, सुमित हमारे साथ आ कर बैठते हैं. निशांत अकसर कन्हैया के साथ ही रहते हैं. कन्हैया के फोन निशांत ही रिसीव करते हैं और फिर कन्हैया को सूचित करते हैं. कन्हैया स्वयं मोबाइल नहीं रखते. उन के लिए मीडिया कोऔर्डिनेटिंग का काम जयंत जिज्ञासु देखते हैं.

करीब 10 मिनट बाद कन्हैया आते हैं. बहुत सामान्य कदकाठी, बढ़ी हुई दाढ़ी, लालकाली लाइनदार टीशर्ट पैंट से बाहर निकली हुई. बिलकुल गांवदेहाती जैसा विद्यार्थी. कन्हैया और उन के साथियों में शहरीपन दिखाई नहीं देता. 2 दिन पहले केरल से लौटे कन्हैया वहां यूनिवर्सिटी में दिए अपने व्याख्यान और दौरे के बारे में बताते हैं. इस के बाद कन्हैया से विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक मुद्दों पर बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ.

मई 2014 के बाद ऐसा क्या हुआ कि देश के कुछ केंद्रीय विश्वविद्यालय गुस्से से उबलने लगे. खासतौर से यहां पढ़ने वाले दलित, पिछड़े और गरीब तबके के छात्र आक्रोशित हो रहे हैं. आप लोगों की क्या समस्याएं हैं?

देखिए, 2014 के बाद से ऐसा नहीं हो रहा है. इस से पहले भी विश्वविद्यालयों में आंदोलन था. मैं 2011 में जेएनयू का स्टूडैंट बना. सैंट्रल यूनिवर्सिटी में पहली बार. यहां हमेशा से सोशल जस्टिस को ले कर एक स्ट्रौंग डिस्कोर्स इमर्ज कर रहा था. इस की खास वजह यह थी कि दलित, आदिवासी के लिए पहले से रिजर्वेशन था, ओबीसी 2007 के बाद लागू हुआ. इस का असर 3 साल बाद दिखना शुरू हुआ. 2014 में सवाल बना कि कोई पिछड़ा प्रधानमंत्री बना है. बाकायदा लोगों ने इस की घोषणा की. लेकिन इन्होंने आ कर क्या किया. विश्वविद्यालयों में इन का हस्तक्षेप बढ़ गया. दलित, पिछड़े छात्रों की स्कौलरशिप बंद की जाने लगी तो स्वाभाविक रूप से छात्रों को रिऐक्ट करने का मौका मिला.

डा. भीमराव अंबेडकर ने बहुत ठीक बात कही थी कि लोकतंत्र हमेशा दलित, पिछड़ा और शोषितों के पक्ष में जाता है. इन्होंने चुनावों में घोषणाएं कुछ और की थीं क्योंकि मसला वोट का था. शासक वर्ग की आदत होती है कि वह दिखावा करे. लेकिन वह कब तक दिखावा करेगा, किसी न किसी दिन असलियत सामने आएगी ही.

हरिशंकर परसाई की एक बहुत अच्छी कहानी है जिस में भेडि़या चुनाव लड़ता है. उस की मंत्री लोमड़ी कहती है, भेडि़या अब शाकाहारी हो गया है. अब डरने की जरूरत नहीं है. भेडि़या मुंह में घास रखता है. वह चुनाव जीत जाता है. आते ही कहता है, एक मेमना रोज नाश्ते में, फिर पूरा डाइट चार्ट बनाता है.

दरअसल, इस देश के अंदर 1990 के बाद एकसाथ 2 चीजें हुईं. पहले मंडल आया और फिर कमंडल. कमंडल आंदोलन के पीछे कब नवउदारवाद आ गया, लोगों को पता ही नहीं चला. जिन शक्तियों को एकजुट हो कर ब्राह्मणवाद, नवउदारवाद का विरोध करना चाहिए था वे बाबासाहेब अंबेडकर का नाम लेने लगीं.

ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद दोनों का एक मजबूत गठजोड़ बन गया. एक तरफ इस देश में हजारों साल से शोषण सहने वाली शोषित जातियां और दूसरी तरफ पूंजीवादी बाजार में नई शक्तियां थीं, जिन्होंने बहुत चालाकी से निजीकरण की शुरुआत की. एकएक कर पब्लिक सैक्टर की कंपनियों को निजी क्षेत्र में बेचा जाने लगा. एक तरफ आरक्षण को ले कर आंदोलन तेज हो रहा था, दूसरी ओर जहां आरक्षण किया जाता, वह जगह ही खत्म की जा रही थी.

हायर एजुकेशन में ओबीसी आरक्षण आया, नवउदारवाद का असर 10-15 सालों में दिखने लगा. स्टेट यूनिवर्सिटीज में आरक्षण ठीक से दिया नहीं जा रहा

था, सैंट्रल में खत्म करने की बात होने लगी. जब आप आरक्षण बंद करेंगे, फैलोशिप बंद करेंगे तो विश्वविद्यालयों में विरोध बढ़ेगा. निजीकरण का विरोध विश्वविद्यालयों में ही नहीं, बाहर भी दिखने लगा.

खुदरा क्षेत्र में एफडीआई आया तो उस का सीधा असर फुटपाथ पर काम करने वालों पर पड़ा. जो मुख्यधारा की राजनीति करते हैं उन को अब भी समझ में नहीं आता कि विश्वविद्यालय पर हमला सोशल जस्टिस पर हमला है. चेहरा रखेंगे किसी पिछड़े का, नीतियां जो होंगी अपर क्लास के पक्ष में. आप देखिए, एससी, एसटी का प्रमोशन में रिजर्वेशन खत्म किया गया. ओबीसी के आरक्षण में परिवर्तन कर दिया गया. जेएनयू जैसे संस्थान बंद होंगे तो सब से बड़ा असर महिलाओं पर पड़ेगा जिन को 15 साल के बाद शादी के लिए मजबूर किया जाता है. मेरी मां 3 हजार रुपए कमाती हैं. क्या मैं प्राइवेट यूनिवर्सिटी में 5 लाख रुपए दे कर पढ़ सकता हूं. यह अपनेआप में एक सवाल है.

फौरेन यूनिवर्सिटी बिल का विरोध हुआ. कांग्रेस और भाजपा में कोई फर्क नहीं है. त्रिलोकपुरी का दंगा देखिए, जहां दलितों और मुसलमानों को लड़ा दिया गया. उत्तर प्रदेश को देखिए, पिछड़ों और मुसलमानों को लड़ाया गया. हर बार ये नौन इश्यूज को छोड़ कर दूसरे इश्यूज खड़ा करते रहते हैं. हिंसा, झूठ, प्रोपेगंडा इन के पावरफुल हथियार हैं. इसलिए हम को लगता है कि ये देश के लिए ज्यादा खतरनाक हैं. इन का इतिहास भी यही रहा है.

भाजपा नवउदारवाद और ब्राह्मणवाद के साथ है. यह दलित विरोधी है, पिछड़ा विरोधी है, महिला विरोधी है. अल्पसंख्यक विरोधी है, आदिवासी, किसान, गरीब विरोधी है. जब इन सब को जोड़ेंगे तो दरअसल ये अल्पसंख्यकों के खिलाफ ही नहीं, बहुसंख्यक विरोधी भी हैं, लोकतंत्र और संविधान के खिलाफ हैं.   बीच में देशद्रोह और देशभक्ति कहां से आ गई, इस के पीछे क्या वजह मानते हैं?

इस में बहुत पुरानी साजिश है और यह बात मैं आप को फैक्ट ऐंड फिगर के साथ बताता हूं. जब यूनिवर्सिटी में दलित, पिछड़े आएंगे, पढ़ेंगे, शिक्षित होंगे तो वे सवाल उठाएंगे कि हमारा इतिहास कहां है, तब सब अल्टर्न हिस्ट्री की बात होगी. स्त्री विमर्श की बात होगी, दलित साहित्य की बात होगी, शूद्र की बात उठेगी. वे सब बातें आएंगी जो ब्राह्मणवादी इतिहास में लिखी हैं, अपर कास्ट के नजरिए से जो बातें लिखी गई हैं, उन का सच सामने आएगा.

तब कहा जाएगा कि सावित्री बाई फूले ने पहला महिला स्कूल खोला तो महिला दिवस उन के नाम से क्यों न मनाया जाए. बिरसा मुंडा, आदिवासी जिन्हें ‘भगवान’ मानते हैं, जिन्होंने साम्राज्यवाद के खिलाफ इतनी बड़ी लड़ाई लड़ी, उन का जन्मदिन

किसी राष्ट्रीय दिवस के नाम पर क्यों न मनाया जाए. जो धार्मिक व्यवस्था है छुआछूत पर आधारित, उस पर सवाल खड़ा किया जाएगा. महिसासुर कौन था, होलिका कौन थी, पूतना कौन थी, ये तमाम सवाल आते हैं. ये विमर्श के सवाल हैं, किसी खास धर्म के पक्ष की बात नहीं है.

हमारे यहां लोकतांत्रिक स्पेस है और फिर यूनिवर्सिटी होती ही है मानवता को आगे बढ़ाने के लिए, हमारी तर्कशक्ति विकसित करने के लिए लेकिन उन्हें एकता में अनेकता की बात पचती नहीं, गंगाजमुनी संस्कृति नहीं सुहाती. एक दल, एक राष्ट्र, एक नेता, इन को हिटरोजिनियस सोसायटी रास नहीं आएगी. एकएक कर ये उन संस्थाओं पर हमला कर रहे हैं.

हैदराबाद यूनिवर्सिटी को नक्सली कहा गया, आईआईएफटी को कास्टिस्ट कहा गया. जेएनयू को दरार का गढ़ बताया गया. एफटीआईआई में, जहां संभावना है, ‘अछूत कन्या’ जो आजादी के बाद बनी थी, का रिवाइवल किया जाए. उस की संभावना खत्म की जा रही है. गजेंद्र चौहान को ला कर थोपा गया. इफ्टा, जिस ने गांवगांव जा कर चेतना जगाई थी, पर हमला हुआ. पेरियार स्टडी सैंटर, रोहित वेमुला और साथियों को एंटीनैशनल कहा गया. यह बात 9 फरवरी से पहले कही गई थी. इस में प्रोफैसर एस एन मालाकर को टारगेट किया गया जो अति पिछड़ा वर्ग समाज से आते हैं, जो बारबार अपने भाषणों में कहते हैं कि हम तो मछली पकड़ते थे, फूल तोड़ते थे और उन्हें बड़े लोगों के घर में पहुंचाते थे. सत्तू ले कर जेएनयू में आ गए.

इस तरह की यूनिवर्सिटी सत्ता की नजर में हमेशा चुभती है. कांग्रेस यूनिवर्सिटी पर इस तरह के अटैक नहीं करती थी. वह पौलिसी लैवल पर बदलाव करती थी. हम वास्तविकता बता रहे हैं. जस्टिस फौर रोहित के लिए सब से ज्यादा आवाज ही जेएनयू से उठती है. इन्हें लगा कि जेएनयू को टारगेट किया जाए, एक तीर से दो शिकार हों. उधर रोहित मामला दब जाएगा और जेएनयू को बदनाम कर देंगे जहां से संगठित आवाज आने की संभावना है.

9 फरवरी के बवाल में आप शामिल नहीं थे?

9 फरवरी को ले कर एक बात आप जान लीजिए, यूनिवर्सिटी में किसी भी विषय को ले कर विचार हो सकता है. अफजल गुरु की फांसी पर लोग सवाल खड़ा कर रहे थे. हम अफजल गुरु को आइडियल नहीं मानते. जहां तक मैं जेएनयू को जानता हूं, व्यक्तिगत तौर पर मेरी बात कहें तो मैं न उस प्रोग्राम का आयोजक था, न मैं उस दौरान मौजूद था, जहां तथाकथित देशविरोधी नारे लगाए गए.

हम पर लगाए गए झूठे आरोपों में कहा गया है कि आप ने रोका क्यों नहीं. हम कहते हैं कि देश के अंदर ला ऐंड और्डर का काम पुलिसप्रशासन का है, गृहमंत्रालय का है. पर गृह मंत्री का  बचकाना बयान आता है, वे सीधेसीधे विद्यार्थियों को हाफिज सईद से जोड़ देते हैं.

कुल मिला कर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि चुनाव आना है. सरकार को 2 साल हो चुके हैं. सरकार के पास रिपोर्ट कार्ड में दिखाने को कुछ नहीं है. कभी कैराना ट्राई करेंगे, कभी मुजफ्फरनगर, कभी दादरी तो कभी जेएनयू. इस तरह की हरकतें कर के ये नफरत के आधार पर राजनीति करना चाहते हैं. ये एक कम्युनल पोलराइजेशन चाहते हैं. इन का राष्ट्रवाद झूठा है. अगर सच में ये राष्ट्रवादी होते तो ये विदेश क्यों जाते. यह बड़ा सवाल है और ये जिन मुद्दों पर विदेश जाते हैं, क्या वे देश के बुनियादी सवाल हैं?

क्या परमाणु बम से लोगों की भूख खत्म हो जाएगी, क्या परमाणु बम से सामाजिक न्याय आ जाएगा? ये हमारे वास्तविकता से भरे सवाल हैं.

तो क्या इन की राष्ट्रभक्ति हिंदू धर्मभक्ति है. जो भी हिंदू धर्मग्रंथों, परंपराओं, रीतिरिवाजों, हिंदू नायकों पर सवाल खड़े करे वह देशद्रोही है?

हम यही कह रहे हैं. सरकार धर्म की व्यवस्था को बनाए रखना चाहती है. इस व्यवस्था पर सवाल उठाने वालों को निशाना बना रही है. हम ब्राह्मणवाद, सामंतवाद, ऊंचनीच, गरीबी, असमानता पर आवाज उठा रहे हैं, इसलिए हम पर देशद्रोह के आरोप मढ़े जा रहे हैं. हम इन के खात्मे की बात कर रहे हैं. ये हमारे वास्तविक सवाल हैं.

विश्वविद्यालयों में केंद्र हस्तक्षेप कर रहा है, क्या यहां राजनीति हावी है?

सैंटर हस्तक्षेप कर रहा है और इस हस्तक्षेप के खिलाफ यूनिवर्सिटीज के अंदर जो दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक आदिवासी, गरीब लोग हैं, उन का व गरीब मजदूरों का, गरीब किसानों का बच्चा विद्रोह कर रहा है कि आप हम पर हमला करेंगे तो हम बरदाश्त नहीं करेंगे. इस देश के जो वास्तविक सवाल हैं, हम आंख में आंख डाल कर पूछेंगे. आप कुछ भी करिए, जेल में डालिए.

रोहित के साथ क्या हुआ, जांच कमेटी ने उस को निर्दोष पाया तो केंद्र की सत्ता का मन नहीं भरा. दूसरी जांच कमेटी बनाई. उस को पनिश किया. और जिस ने उसे पनिश किया उस को एचसीयू का वाइस चांसलर बना दिया और जो शिक्षक विरोध कर रहे थे, पिछड़े वर्ग से आते हैं, उन को हटा दिया गया. यह सरकार साफसाफ दिखा रही है कि वह दलित, पिछड़ी, आदिवासी, अल्पसंख्यक विरोधी है. विद्यार्थी राजनीति नहीं करते. केंद्र की राजनीति विद्यार्थी विरोधी है.

विश्वविद्यालयों में ये जो तमाम सवाल उठाए जा रहे हैं, जो एक तरह से आक्रोश है, जागरूकता है, क्या इस से बदलाव आ पाएगा?

सामाजिक आंदोलनों के इतिहास को जहां तक मैं देख पाता हूं, समझ पाता हूं, इस देश की एक समस्या रही है, खासकर आजादी के कुछ दशकों के बाद, सामाजिक आंदोलन एक तरफ और चुनावी राजनीति दूसरी तरफ. इन के बीच कोई संवाद नहीं है. 

किसी भी समाज में हम देखते हैं कि शिक्षा एक महत्त्वपूर्ण साधन है. नेल्सन मंडेला ने कहा था कि ‘एजुकेशन इज द मोस्ट पावरफुल टूल टू ट्रांसफौर्म द सोसायटी’. अगर विद्यार्थियों के बीच शिक्षा समानता आधारित हो, डैमोक्रेटिक ट्रांजेशन, पीसफुल ट्रांजेशन के माध्यम से हो, सोशल ट्रांसफौर्म निश्चित है.

जब शिक्षा, आरक्षण और नौकरियों की बात आती है, तो सवाल आता है कि सरकारी नौकरियां बची कितनी हैं? आरक्षण लेने वाली जातियां बढ़ रही हैं, नौकरियां घटाई जा रही हैं?

यही एक विमर्श है जिसे बहुत मजबूती से लोगों के बीच ले जाने की जरूरत है. आप को निजीकरण के सवाल को सामाजिक न्याय के साथ जोड़ना पड़ेगा. हम चाहते हैं आप जो नीति बनाते हैं, जिन नीतियों से विकास का दावा करते हैं उन में हमारी कितनी भागीदारी है. तब सवाल उठता है कि जिस की जितनी आबादी, उस की उतनी हिस्सेदारी. तब सवाल अपनेआप आएगा कि निजीकरण, बुनियादी तौर पर, आरक्षण के खिलाफ है.

अंबेडकर ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद को एकसा मानते थे. आज के समय में पूंजीवाद का चरित्र क्या है. एलपीयू यानी लिबरलाइजेशन प्राइवेटाइजेशन और ग्लोबलाइजेशन पर चलता है. यह मुख्य नीति है. इस में हम कहां हैं. हम यही सवाल उठा रहे हैं. जनता के खजाने में पैसा नहीं है. खजाना खाली है पर 9 हजार करोड़ रुपए ले कर कोई भाग जाता है. अगर उस का हिसाब लगाएं तो कितने स्कूल, कितने अस्पताल, कितनी सड़कें बनाई जा सकती हैं. अभी सरकार के 2 साल पूरे हुए. जश्न में 200 करोड़ रुपया फूंक दिया गया.

99 करोड़ रुपए में तमाम पीएचडी स्कौलर्स को स्कौलरशिप दी जा सकती है. 6 हजार करोड़ रुपए आप टैंक खरीदने पर खर्च कर सकते हैं. इस में कितने जेएनयू, कितने डीयू खोले जा सकते हैं.

शिक्षा के लिए अगर आप के पास पैसा नहीं है तो स्कूलों को बराबर करो या तो सारे स्टूडैंट को बढि़या शीशे वाले स्कूलों में ले जाओ या सब शीशे वाले स्कूलों को बंद कराओ या सब को सरकारी स्कूलों में ले आओ और फिर बराबर कंपीटिशन करो. आप शिक्षा बराबर नहीं दोगे और फिर आरक्षण को कोसोगे.

हम कहते हैं एक तो आप ने सरकारी स्कूलों को बरबाद कर दिया. सैंट्रल यूनिवर्सिटी बची है, उसे बरबाद कर रहे हैं. आप उस पर भी हमला कर रहे हैं. जहां जो शिक्षक बनते हैं वहां आरक्षण खत्म कर रहे हैं. शिक्षक एडहौक बन रहे हैं.

आप ने आजादी की बात की, किस तरह की आजादी की बात कर रहे हैं? क्या इस में जाति, धर्म और इन से जुड़े तमाम पाखंडों से आजादी की बात भी उठाएंगे?

इस पर तो कहना ही क्या है. यह तो स्पष्ट है. कई बार बोला गया है. ब्राह्मणवाद, जातिवाद, ऊंचनीच, छुआछूत, गरीबी, कौर्पोरेट लूट, सामंतवाद, पितृसत्ता से आजादी, यही तो स्लोगन लगते हैं. इसी आजादी को तो उन्होंने जनता के सामने गलत तरीके से प्रस्तुत किया. हम ने कहा देश से नहीं, देश में आजादी मांग रहे हैं. बुनियादी तौर पर इन्हीं से आजादी चाहते हैं.

यह तो सीधेसीधे हिंदू धर्म की व्यवस्था पर हमला है और सरकार चाहती है यह व्यवस्था बनी रहे?

मसला सिर्फ सरकार का नहीं है. हमारे समाज का एक तबका है, एक हिस्सा है जो चाहता है यह व्यवस्था खत्म न हो, जाति खत्म न हो. इस के आधार पर ही उन की पूरी राजनीति टिकी हुई है. बिना कास्ट रिलेट किए इंडिया में रिवोल्यूशन नहीं आ सकती.

कास्ट, रिलीजन बहुत इंफ्लुऐंस करता है सोसायटी को. जुडीशियरी, ब्यूरोक्रेसी, राजनीति, एजुकेशन में जो प्रभावी कास्ट हैं, नहीं चाहते कि कास्ट खत्म हो, उस की व्यवस्था खत्म हो. इन में वे लोग भी हैं जो दलित, पिछड़े हैं और वे आगे बढ़ गए हैं. जाति खत्म किए बिना समतामूलक समाज की स्थापना नहीं हो सकती.

दलित, पिछड़ी जातियों की दशा के लिए धर्म को कितना जिम्मेदार मानते हैं आप?

धर्म को ले कर मैं एक बात समझता हूं कि यह सामाजिक आंदोलन के लिए एक नौन रियल इश्यू है, इसलिए है कि जिन से आप लड़ना चाहते हैं वे धर्म की पीठ पर सवार हैं. राजनीतिक तौर पर हम अगर धर्म से लड़ने लगेंगे तो वे बहुत आसानी से हमें हरा देंगे.

अभी कुंभ का मेला लगा. मेरा एक दोस्त सर्वे कर के लाया है. कुंभ में घाट बनाए गए दलितों के लिए. टैंटों में भीमराव अंबेडकर की बड़ीबड़ी तसवीरें लगाई गईं. अंबेडकर जाति से मुक्त होने की बात करते थे. वे उसी की बात कर के उसी दलदल में

फंस रहे हैं. धर्म का नाम लेने के बजाय आज छुआछूत, गैरबराबरी, गरीबी, अंधविश्वास, भुखमरी के सवालों पर आंदोलन खड़ा करने की जरूरत है. सीधेसीधे हम धर्म के खिलाफ कुछ बोलेंगे तो जनता आहत होने की बात उठाएगी.

भारत में आप तय नहीं कर पाएंगे कि धर्म जाति बनाता है या जाति धर्म. बहुत सारे ऐसे धर्म हैं जिन में जातियां नहीं हैं पर वे हिंदुस्तान में आए तो जातियां पैदा हो गईं. इसलिए हम को लगता है आज जाति के खात्मे का सवाल ज्यादा मुख्य है. धर्म को इस से एक सुरक्षा कवच मिलता है. इसलिए अंधविश्वास के खिलाफ हमला होना चाहिए. धर्म में इतने सैक्ट कैसे पैदा हो गए और ज्यादा मजबूती से. जहां धर्म के खात्मे को ले कर कोई आंदोलन नहीं हुआ और शिक्षा को बुनियादी तौर पर फैलाया गया. अपनेआप में वहां के 40 प्रतिशत लोगों ने धर्म कैसे छोड़ दिया. मैं यूरोप की बात कर रहा हूं. वहां 40 प्रतिशत लोग एथिस्ट हैं. वहां कोई धार्मिक आंदोलन नहीं हुआ. भारत में इतने भक्ति आंदोलन हुए, धार्मिक सुधार आंदोलन हुए फिर भी धर्म बढ़ता ही गया, और मजबूत होता चला गया.

अकर्मण्यता हमें विरासत में मिली है, धर्म ने दी है, लेनिन, मार्क्स, माओ ने भी शायद ही इस पर बात की है, क्या मानते हैं?

मार्क्स और लेनिन को तो नहीं पढ़ा पर एक मार्क्सवादी शिक्षक हैं उन से हमारा संवाद होता है. इंगलिश के ये प्रोफैसर संयोगवश पिछड़े वर्ग से आते हैं. वे एक बात कहते हैं कि आरक्षण खत्म करने या देने की बात आज हो रही है जातियों को, लेकिन इस देश में काम का आरक्षण हमेशा से रहा है. सफाई का काम ब्राह्मण नहीं करेगा, पूजापाठ का काम दलित नहीं करेगा. जौब का यह जो बंटवारा है, इस के बारे में लेनिन लिखते हैं कि जो क्लासडिवीजन है वो तो लेबर डिवीजन से ही पैदा होता है.

यह ऐसा नहीं है कि सिर्फ भारत में है. ये हरेक समाज में, दुनियाभर में रहा है. अकर्मण्यता पूरी दुनिया की विशेषता है. खेतों में काम दलित करेगा और अनाज पैदा कर के मालिक के घर जमा करेगा. पूरी की पूरी फ्यूडल सोसाइटी अकर्मण्य ही है.

हम से ज्यादा क्रूर स्ट्रक्चर यूरोप और अमेरिका में रहा है. कितना बड़ा सिविल वार हुआ. अमेरिका में राष्ट्रपति को मार दिया गया. भारत में इसे आरक्षित कर दिया गया. धर्म की आड़ में इसे फिक्स कर दिया गया.

आप नास्तिक कैसे बने?

क्या कहेंगे, नास्तिक कहेंगे या इग्नोस्टिक. मैं इस तरह के कैटेगराइजेशन में जाता नहीं हूं. पर सिंपली मैं एक बात कह सकता हूं कि मैं मंदिर, मसजिद, गुरुद्वारा कभी नहीं जाता. इन का मेरे जीवन में कोई रोल नहीं है. काम करना है, जिंदगी जीना है. समाज में जो गलत है, गलत कहता हूं, सही को सही.

एक नागरिक के तौर पर अपनी भूमिका निभाने की कोशिश करता हूं कि समाज को कैसे ट्रांसफौर्म किया जाए. शिक्षित कर के ही समाज को बदला जा सकता है. सब को शिक्षा, रोजगार मिलना चाहिए. बराबरी होनी चाहिए.

आरोप है कि आप अपने कम्युनिस्ट नेताओं से कम जबकि राहुल गांधी, केजरीवाल, नीतीश कुमार व लालू यादव से अधिक मिल रहे हैं?

इस का सोर्स क्या है. इस का सोर्स उन्हीं लोगों का है जो चाहते हैं कि जो सवाल विद्यार्थी लोग उठा रहे हैं, उन पर विमर्श न हो. कन्हैया कहां जा रहा है, किस से मिल रहा है, दरअसल, वे अपने पक्ष में परसैप्शन बना रहे हैं.

मैं आप को बता दूं, मैं सब से मिला हूं. इन लोगों से सब से बाद में मिला हूं. मैं सब से पहले रोहित की मां से मिलने गया. उन के पैर छुए. यह खबर अखबार में नहीं है पर लालू यादव के पैर छुए, यह अखबार में है. ये जो सोर्स हैं वे ही बेईमान हैं. लोग जेल से छूट कर घर जाते हैं, मैं सीधा हैदराबाद गया क्योंकि मैं जिस आंदोलन को छोड़ कर गया था, उसी में शामिल होना चाहता था.

इस तरह के आंदोलनों की शुरुआत कई बार होती है और परिणाम तक पहुंचे बिना खत्म हो जाते हैं. आप का आंदोलन कहां तक चलेगा?

अंतर्विरोध तो समाज का सच है. हमेशा नैगेटिव और पौजिटिव चलता रहता है. बात यह है कि हम एक आंदोलन को दूसरे आंदोलन से जोड़ सकते हैं तब तो आगे बढ़ेंगे. अगर इस को हम आइसोलेशन में रखते हैं कि विद्यार्थी का सवाल है, इसे किसानों से नहीं जोड़ेंगे, किसानों का सवाल मजदूरों से नहीं जोड़ेंगे, मजदूरों का आदिवासियों से, आदिवासियों का अल्पसंख्यकों से तो यह संकीर्णता है.

ऐसे में आंदोलन के नेता को लगता है कि उन का कंट्रोल नहीं रह गया है. संकीर्णता आंदोलनों को खत्म करती है. हम विद्यार्थियों के सवाल दलितों से, दलितों के महिलाओं से, आदिवासियों के अल्पसंख्यकों से, इन तमाम सवालों को गैरबराबरी के खिलाफ समतामूलक संघर्ष से जोड़ना चाहते हैं. अगर हम इस को जमीन पर उतार पाए, जो विश्वविद्यालय में उतरा हुआ है, अगर यह समग्रता से आगे बढ़ पाए, एक मास मूवमैंट की शक्ल ले पाए तो ठीक है वरना बाकी आंदोलनों का जो हश्र हुआ, इस का भी होगा.

केंद्र सरकार कन्हैया से क्यों डरती है?

कन्हैया से नहीं डरती. एक व्यक्ति से नहीं डरती. कन्हैया के सवालों से डरती है?

कन्हैया के सवाल एक कन्हैया के नहीं हैं. सारे समाज के सवाल हैं. ज्यादा घबराहट इस बात से है कि एक नौन दलित भी दलितों का सवाल उठाता है.

तमाम तरह के अंतर्विरोधों के बावजूद मैं बहुत सारे राजनेताओं से मिलता हूं पर मैं उन की राजनीति से सहमत नहीं हूं. मैं उन से क्यों मिलता हूं, इसलिए कि हम देश के, समाज के तमाम सवालों पर एकसाथ आएं ताकि लोकतंत्र बचा रहे. लोकतंत्र जब खत्म हो जाएगा तो सामाजिक न्याय की संभावना खत्म हो जाएगी.

आज एक व्यक्ति बनाम एक वोट, यही वह चीज है जहां भेडि़या भेड़ होने का नाटक करता है. चुनावी भाषणों में आप ने क्या कहा था, जब सत्ता में आ गए तो क्या कर रहे हैं.

एक निजी सवाल. क्या आप ने प्रेम किया है, कोई गर्लफ्रैंड है?

प्रेम करने का समय ही नहीं है. किसी से प्रेम किया नहीं.

कन्हैया : बेगूसराय से जेएनयू तक

जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार बिहार के बेगूसराय जिले के बरौनी थाने के बीहट प्रखंड के मसलनपुर टोला गांव के रहने वाले हैं. जेएनयू के स्कूल औफ इंटरनैशनल स्टडीज से सोशल ट्रांसफौर्मेशन इन साउथ एशिया (1994-2015) विषय पर पीएचडी कर रहे कन्हैया ने गांव के ही स्कूल से शुरुआती पढ़ाई की. इस के बाद बरौनी के आरकेसी स्कूल से मैट्रिक पास किया. आगे की पढ़ाईर् के लिए पटना के कालेज औफ कौमर्स (मगध विश्वविद्यालय) में दाखिला लिया. स्नातक की पढ़ाई के दौरान ही वे औल इंडिया स्टूडैंट फैडरेशन के अध्यक्ष बने थे. उस के बाद उन्होंने नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी से डिस्टैंस? एजुकेशन के जरिए एमए की डिगरी हासिल की. उस के बाद वे पीएचडी करने के लिए जेएनयू आ गए.

9 फरवरी का सच

9 फरवरी, 2016 को जेएनयू में कुछ ऐसा घटित हुआ जिस ने आम जनता में कई तरह की भ्रांतियां पैदा कर दीं. किसी ने इसे देशभक्ति बनाम देशद्रोह का जामा पहनाया तो कोई इस से राजनीतिक रोटियां सेंकता दिखा. जबकि सच इस से इतर था.

दरअसल, 9 फरवरी को जेएनयू में संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु की तीसरी बरसी पर वामपंथी छात्र संगठनों ने एक कार्यक्रम या कहें सभा आयोजित की. कार्यक्रम में, जैसा कि जेएनयू में सामान्य मत है, काफी छात्र जमा हुए. गौरतलब है कि कार्यक्रम में न तो कोई तोड़फोड़ हुई और न ही देश के विरुद्ध किसी भी तरह के विद्रोह की कौंसपिरैसी रची गई. फिर भी कई न्यूज चैनलों ने ऐसी फुटेज दिखाई जिस में दावा किया गया कि कार्यक्रम में बाहर से आए कुछ लोगों ने पाकिस्तान जिंदाबाद और कश्मीर की आजादी के नारे लगाए.

जैसे ही मामले का सियासीकरण हुआ और भाजपा की छात्र इकाई एबीवीपी ने इस कार्यक्रम के विरोध में वाइस चांसलर का घेराव किया और दिल्ली के भाजपा सांसद महेश गिरी ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, पुलिस प्रशासन ने बिना पुख्ता सुबूत और जांच के सिर्फ शिकायत के आधार पर औल इंडिया स्टूडैंट फैडरेशन यानी एआईएसएफ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को गिरफ्तार कर लिया. उन पर देशद्रोह का मामला बनाया गया.

इस मसले पर खूब राजनीति हुई. जेएनयू के विवादित कार्यक्रम के अलावा सोशल मीडिया पर दूसरे वीडियो कन्फ्यूजन पैदा करते रहे और सच की आवाज दबा दी गई. सब से चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे मामले में कन्हैया को दोषी बनाया गया जबकि वे इस में संलिप्त न थे.

जब आज कन्हैया खुद कहते हैं कि उस कार्यक्रम में न तो एआईएसएफ का कोई योगदान था, न उन का सहयोग. वे खुद इस कार्यक्रम में मौजूद नहीं थे, तो अंदाजा हो जाता है कि सत्ता प्रतिष्ठान अपनी सत्ताशक्ति के नशे में चूर हो कर किस तरह कानून और सिस्टम का बेजा इस्तेमाल करता है.

विश्वविद्यालयों में घुसपैठ करती सत्ताधारी शक्तियां

सिर्फ जेएनयू ही नहीं, देश के कई अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालय भी केंद्र सरकार, भाजपा और संघ के निशाने पर हैं. वहां सरकार का हस्तक्षेप बढ़ रहा है या एबीवीपी का दबदबा कायम करने की कोशिश की जा रही है. भाजपा, आरएसएस व भाजपा की छात्र शाखा एबीवीपी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अपनी धाक जमा व विचारधारा थोप कर पिछड़े व दलित मुद्दों पर आवाज उठाते छात्रों को खामोश करना चाहते हैं.

जेएनयू की तर्ज पर जाधवपुर विश्वविद्यालय, हैदराबाद यूनिवर्सिटी, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से ले कर जामिया मिल्लिया इसलामिया, एएमयू और आईआईटी दिल्ली सरीखे संस्थान भी केंद्र सरकार की दखलंदाजी और सियासी हस्तक्षेप के शिकार हैं. जिस तरह जेएनयू में कन्हैया कुमार और कई छात्रों की शिक्षा सुधार, दलितपिछड़ों के अधिकार व विश्वविद्यालय प्रशासन की मनमानियों व ज्यादतियों के खिलाफ उठती

आवाजों को देशद्रोह का जामा पहना कर चुप कराने की कोशिश की गई, उसे देशद्रोही बता कर जेल भेज दिया गया, वैसे ही पश्चिम बंगाल के जाधवपुर विश्वविद्यालय में जब छात्र संगठन कन्हैया की गिरफ्तारी के विरोध में एकजुट हुए तो सोशल मीडिया व तमाम न्यूज चैनल असल मुद्दों को दरकिनार कर यह बात फैलाने लगे कि यहां छात्र ‘फ्रीडम फ्रौम आरएसएस’, ‘फ्रीडम फ्रौम मोदी’, ‘मणिपुर की आजादी’, ‘अफजल गुरु के समर्थन में रैलियां कर रहे हैं. छात्रों की असल बात सामने नहीं लाई गई और केंद्र सरकार इन्हें देशभक्ति बनाम अंधभक्ति की बहस से दूर करने के लिए तमाम हथकंडे अपनाती रही.

इसी तरह लखनऊ के बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय बीबीयू में भी कभी आरक्षण विवाद, कभी प्रोफैसर कांचा एलैया का बीफ पर बयान, नौनवेज पर रोक और सोशल मीडिया पर पाबंदी समेत कई मुद्दों की आड़ में केंद्र सरकार, भाजपा और संघ का हस्तक्षेप देखा गया. शैक्षिक संस्थानों में सोशल मीडिया पर अंकुश लगाना दर्शाता है कि छात्र संगठनों की देश, समाज, अन्याय, पिछड़ेदलित के हक की खातिर आवाज उठाने व उसे प्रचारित करने से रोकने के लिए सत्ता समर्थक तत्त्व व विश्वविद्यालय प्रशासन एकजुट हैं. इसी यूनिवर्सिटी में एमए समाजशास्त्र के छात्र अनिल कुमार के मुताबिक, ‘‘यह तानाशाही रवैया यूनिवर्सिटी मैनेजमैंट का है. पहले नौनवेज पर रोक, अब सोशल मीडिया को ले कर फरमान, दलितों को तो खासतौर से परेशानी झेलनी पड़ ही रही है.’’

भाजपा की पश्चिम बंगाल इकाई के अध्यक्ष दिलीप घोष पर जब जाधवपुर यूनिवर्सिटी की छात्राओं ने छेड़खानी के आरोप लगाए तो नेताजी जांच की बात के बजाय विश्वविद्यालय की लड़कियों को स्तरहीन व बेशर्म करार देने लगे.

इस के अलावा आईआईटी दिल्ली में छात्रों को धर्मपुराणों का महिमामंडन व वैदिक व्यवस्था की सड़ीगली विचारधारा से लैस करने के लिए तब की मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने जब यहां संस्कृत पढ़ाने को ले कर लोकसभा में बोला तो साफ हो गया कि केंद्र सरकार शैक्षिक संस्थानों का भगवाकरण करने पर उतारू है. विचारधारा व तानाशाही थोपने का सिलसिला हैदराबाद यूनिवर्सिटी में वेमुला प्रकरण में भी जाहिर हो गया.

ऐसे ही अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया इसलामिया जैसे शैक्षिक संस्थानों को निशाना बनाया जा रहा है. अल्पसंख्यकों से उन की आवाज छीन कर केंद्र सरकार भाजपा समर्थित छात्रों, संगठनों के जरिए हस्तक्षेप को प्रतिपालित करती है. बीएचयू व इलाहाबाद यूनिवर्सिटी तो काफी हद तक इन के रंग में रंग चुके हैं लेकिन जिन यूनिवर्सिटी में दलित, पिछड़े व वंचित तबके के छात्रों की बहुलता है और वे एकजुट हो कर धर्म के नशे में सदियों से गुलाम हाशिए पर पड़े समाज को जगाने के लिए लामबंद हो रहे हैं उन से सत्तासीनों को डर लगने लगता है कि कहीं हिंदू धर्म की पोल न खुल जाए और पिछड़ेदलित उन के नीचे दबे न रहें, ऊंचनीच का भेद न मिट जाए, पंडेपुरोहितों का पाखंड और झूठी श्रेष्ठता खत्म न हो जाए.

हर यूनिवर्सिटी में शैक्षिक जागरूकता पुरानी धार्मिक रूढि़यों व पाखंड के खिलाफ छात्रों को बदलाव के लिए आंदोलित कर रही है और धार्मिक कट्टरता से लैस सरकार वंचितों के शैक्षिक व वैचारिक गढ़ में हस्तक्षेप कर अपना वर्चस्व बनाए रखने के साम दाम दंड भेद की नीति अपनाने से बाज नहीं आ रही.

– साथ में राजेश कुमार