नरेंद्र मोदी की सरकार मे तेजतर्रार फायर ब्रांड कही जाने बाली साध्वी उमा भारती लीं नहीं गईं थी, बल्कि आरएसएस के दबाब के चलते एक तयशुदा फार्मूले के तहत बतौर मंत्री एडजेस्ट की गईं थी, जिसकी अघोषित शर्त यह थी कि वे अपनी आदत के मुताबिक बेवजह बोलेंगी नहीं, जिससे पार्टी और सरकार की साख पर बट्टा लगे.

ढाई साल उमा ने एक धार्मिक व्रत की तरह इस करार का ईमानदारी से पालन किया पर अब लग रहा है कि वे फिर आपा खो रही हैं, जिसकी मूल वजह हमेशा की तरह उनके चिर परिचित प्रतिद्वंदी कांग्रेसी दिग्गज दिग्विजय सिंह और शुरू से ही उनकी आंख की किरकिरी रहे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान हैं. इस दिलचस्प विवाद के बीज अब से कोई 13 साल पहले बोये गए थे जब मध्यप्रदेश की सत्ता पर अंगद के पांव की तरह जमे दिग्विजय को उखाड़ फेकने का बीड़ा उमा ने उठाया था और एक साल ताबड़तोड़ तूफानी दौरे करते हुए आम लोगों को कांग्रेसी शासन के भ्रष्टाचार के बारे में बताया था. इसी अभियान के दौरान उमा ने दिग्विजय सिंह पर 1500 हजार करोड़ के घोटाले का आरोप भी लगाया था, तब उनकी हां में हां मिलाने बालों में 2 दिग्गज भाजपाई नेता सुंदर लाल पटवा और विक्रम वर्मा भी शामिल थे.

कांग्रेस सत्ता से बेदखल हुई और भाजपा उमा की अगुवाई मे सत्ता पर काबिज हुई, लेकिन हुबली वारंट के चलते उमा को कुर्सी छोड़नी पड़ी, तो पार्टी ने बाबूलाल गौर को सीएम बना दिया और उमा को आश्वश्त किया कि हुबली मुकदमा निबटते ही उन्हें दोबारा सीएम बना दिया जाएगा, लेकिन ऐसा किया नहीं गया और शिवराज सिंह को सीएम बना दिया गया, तो उमा तिलमिला उठीं और सीधे अयोध्या का रुख कर लिया और बाद में नई पार्टी भाजश बना ली.

इधर घोटाले के आरोप को दिग्विजय अदालत ले गए और उमा सहित पटवा और विक्रम वर्मा पर मानहानि का दावा ठोक दिया. इस एपिसोड का पार्ट 2 पिछली 29 सितंबर से शुरू हुआ, जब इस वक्त बर्बाद करते मुकदमे पर अदालत ने उमा के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिये, जिसे हल्के में लेने की चूक वे नहीं कर सकती थीं, क्योकि इसके पहले पटवा और वर्मा ने दिग्विजय से एक तरह से माफी मांगते उन्हे ईमानदारी का सर्टिफिकेट दे दिया था, चूंकि अब इन दोनों की कोई हैसियत सत्ता और संगठन में नहीं रह गई है, इसलिए लोगों ने इसे सियासी शिगूफ़ा मानते नजरंदाज कर दिया, पर केंद्रीय मंत्री रहते उमा भी राजीनामे के लिए ऐसी माफी मांगतीं, तो खुद कटघरे में खड़ी होतीं.

इधर दिग्विजय अपनी जिद पर अड़े थे और अभी भी अड़े हैं कि या तो उमा भी माफी मांगे या फिर लगाए गए आरोप साबित करें. भोपाल में 17 अक्तूबर को उमा जब एसीजेएम अजय सिंह ठाकुर की अदालत में पेश हुईं, तो अदालत ने वारंट रद्द कर दिया. इस दिन मीडिया से चर्चा करते उन्होने वही कहा जो मुद्दत से कहती आ रहीं हैं कि कुछ भी हो जाए पर देश, तिरंगा, गंगा, गाय और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर कोई समझौता नहीं करूंगी, पर दिग्विजय के मुकदमे पर क्या करेंगी, इस पर उनका कहना था कि वे मेरे भाई हैं, मामला वापस ले लें तो अच्छा है और उन पर मैंने आरोप पार्टी द्वारा चुनाव के दौरान प्रकाशित पुस्तक के आधार पर लगाए थे.

आज मामूली सी दिख रही उमा की यह सफाई भाजपा को भारी भी पड़ सकती है और कानूनी पेचीदगियों का भी शिकार हो सकती है, क्योंकि वे दिग्विजय पर लगाए आरोपों के बाबत पूरी को पार्टी को जिम्मेदार ठहरा रहीं है, यानि अब या तो आरोप भाजपा साबित करे और अगर न कर पाये जिसकी उम्मीद ज्यादा है तो पूरी पार्टी दिग्विजय से माफी मांगे. उमा भोपाल में यह भी कहती रहीं हैं कि सत्ता उन्होंने दिलाई और उसका मजा दूसरे जाहिर है शिवराज सिंह उठा रहे हैं. कलह के इस यज्ञ में एक आहुती भोपाल आए केंद्रीय मंत्री वैंकैया नायडू ने यह कहते डाल दी कि कुछ लोग नहीं चाहते थे कि शिवराज सीएम बनें.

अब तय है कि जो होगा वो शिवराज और प्रदेश भाजपा के लिहाज से ठीक नहीं होगा. शिवराज के दुश्मनों की तादाद पार्टी के भीतर बढ़ती जा रही है, इनमे उजागर नाम बाबूलाल और कैलाश विजयवर्गीय सहित कई छुटभैयों के भी हैं. हैरानी नहीं होनी चाहिए अगर तिलमिलाई उमा भारती शिवराज विरोधी गुट की अगुवाई उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद करती नजर आयें.