सरिता विशेष

भ्रष्टाचार के जिन मुद्दों को ले कर कांग्रेस बैकफुट पर दिख रही थी, कर्नाटक चुनाव के बाद वे मुद्दे गौण होते दिखे. वहीं, जीत का दावा ठोंकने वाले भाजपा के स्टार प्रचारक और पीएम पद के प्रबल दावेदार नरेंद्र मोदी बुरी तरह से फ्लौप हो गए हैं. ऐसे में भाजपा का राजनीतिक भविष्य कैसा होगा

राजनीति लड़ाई के किसी मैदान से कम नहीं होती है. एक भी गलत कदम जीती बाजी को पलटने की क्षमता रखता है. भाजपाइयों का नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद की दौड़ में आगे बढ़ाने का कदम कुछ ऐसा ही है. इस से भाजपा की अगुआई वाले एनडीए गठबंधन में दरार पैदा हो गई है. खुद भाजपा में प्रधानमंत्री पद के दावेदारों की लिस्ट लंबी हो गई है. नरेंद्र मोदी के अलावा लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह आदि के नाम समर्थकों द्वारा सुझाए जा रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में राजनाथ सिंह के समर्थक मानते हैं कि राजनाथ सिंह ने जिस तरह से उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी के बीच दूरियां पैदा कर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की कुरसी हासिल कर ली थी, उसी तरह से केंद्र में वे लालकृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी के बीच दूरियां पैदा कर के प्रधानमंत्री की कुरसी हासिल कर लेंगे.

जिस दिन से भाजपा में प्रधानमंत्री पद की दौड़ शुरू हुई है, एक के बाद एक 3 प्रदेशों से सत्ता उस के हाथों से निकल चुकी है. शह और मात के इस खेल में भाजपा के 3 मुख्यमंत्री उत्तराखंड के भुवन चंद्र खंडूरी, हिमाचल प्रदेश के प्रेम कुमार धूमल और कर्नाटक के जगदीश शेट्टार चुनावी युद्ध में परास्त हो गए हैं.

भाजपा की इस नाकामी से कांगे्रस को अपने ऊपर लगे आरोपों को धोने का मौका मिल गया कि देश में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं रह गया है.

कर्नाटक चुनाव के पहले भाजपा यह दावा कर रही थी कि इस चुनाव में कांगे्रस की सचाई सामने आ जाएगी. भाजपा ने कर्नाटक चुनाव में भ्रष्टाचार को भुनाने के लिए येदियुरप्पा को हटाया. इस के बाद ताश के पत्तों की तरह पहले सदानंद गौड़ा, फिर जगदीश शेट्टार को मुख्यमंत्री बनाया.

इतने उलटफेर के बाद भी भाजपा को जब अपनी नाव डूबती नजर आई तो उस ने गुजरात के योद्धा और प्रधानमंत्री पद के प्रबल उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को चुनाव प्रचार के लिए बुलाया.

नरेंद्र मोदी का जादू यहां नहीं चला. इस से एक बात यह साबित हो गई कि नरेंद्र मोदी का असर गुजरात के बाहर नहीं है. नरेंद्र मोदी को पता था कि कर्नाटक चुनाव से उन के वजन को तौला जाएगा इसलिए उन्होंने अपनी रणनीति के तहत प्रचार के लिए 3 शहरों बेंगलुरु, मंगलौर और बेलगाम को चुना. ये कर्नाटक के वे हिस्से थे जहां भाजपा की पकड़ मजबूत थी.

बेंगलुरु शहर की पहले 28 सीटें भाजपा के पास थीं. नरेंद्र मोदी के प्रचार के बावजूद भाजपा को महज 12 सीटें ही मिलीं. इसी तरह से मंगलौर और बेलगाम में भाजपा को पहले के मुकाबले कम सीटें ही हासिल हो सकीं.

नरेंद्र मोदी कर्नाटक चुनावों से अपने कद को बढ़ाना तो चाहते थे, पर उन्होंने इस चुनाव से जुड़ी किसी जिम्मेदारी को पूरा नहीं किया. नरेंद्र मोदी भाजपा की केंद्रीय संसदीय बोर्ड के सदस्य थे. इस के बावजूद कर्नाटक में उम्मीदवार तय करने की पार्टी की किसी मीटिंग में वे शामिल नहीं हुए. नरेंद्र मोदी ने जो प्रचार किया, वह नाममात्र के लिए था.

मुश्किलें अभी और भी हैं

वर्ष 2013 में भाजपा के लिए मुश्किलों का दौर यहीं खत्म होता नहीं दिख रहा है. लोकसभा चुनाव के पहले इस साल के अंत तक मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और दिल्ली में विधानसभा के चुनाव होने हैं. मोटे तौर पर देखें तो इन 4 राज्यों में कांगे्रस और भाजपा के बीच सीधी लड़ाई है.

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा के मुख्यमंत्री हैं. राजस्थान और दिल्ली में कांगे्रस की सरकार है. इन चुनावों का असर लोकसभा चुनाव पर पड़ेगा. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी तीसरी पारी खेल रहे हैं. गुजरात चुनाव के पहले भाजपा में नरेंद्र मोदी के बराबर उन का वजन तौला जा रहा था. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के करीबी नेताओं में शिवराज सिंह चौहान का नाम लिया जाता था. इस के बाद भी भाजपा की केंद्रीय संसदीय बोर्ड में नरेंद्र मोदी को शामिल किया गया, शिवराज चौहान को किनारे कर दिया गया. भाजपा जिस तरह से नरेंद्र मोदी की ब्रांडिंग कर रही है उस में शिवराज सिंह चौहान की उपेक्षा हो रही है.

एक तरह से देखें तो शिवराज सिंह चौहान भी नरेंद्र मोदी की तरह 3 बार चुनाव जीत कर सरकार बना चुके हैं. चौथी बार भी वे अच्छा प्रदर्शन कर सकते थे. जिस तरह से उन की उपेक्षा पार्टी में की गई उस से उन का मनोबल टूटा है. ऐसे में मध्य प्रदेश के चुनाव परिणाम प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकेंगे.

छत्तीसगढ़ में रमन सिंह की सरकार भी अच्छा काम कर रही है. वे भी लंबे समय से प्रदेश में सरकार चला रहे हैं. शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह दोनों ही बिना किसी दाग के सरकार चला रहे हैं. उन पर नरेंद्र मोदी जैसा दाग नहीं लगा है. इस के बावजूद भाजपा में इन 2 नेताओं को हाशिए पर डाल दिया गया है. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा अपना जादू चलाने में सफल होगी, यह बात सवालों के घेरे में है.

दिल्ली में शीला सरकार के खिलाफ आम आदमी पार्टी के प्रचार से ऐसा लग रहा है जैसे वहां विपक्ष के रूप में भाजपा नहीं केवल आम आदमी पार्टी ही रह गई है. ऐसे में वोटों का गणित कहीं एक बार फिर शीला दीक्षित के लिए निर्णायक न बन जाए. इस से भाजपा की मुश्किलें बढ़ जाएंगी.

राजस्थान में कांगे्रस के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ कोई ऐसा बड़ा मामला नहीं है जिस से भाजपा अपने लिए कोई बड़ी उम्मीद देख सके. कुल मिला कर देखें तो इन चारों राज्यों में भाजपा को बहुत बढ़त हासिल होती नजर नहीं आ रही है. कांगे्रस इस का लाभ उठाने की पूरी कोशिश करेगी.

कर्नाटक में भाजपा की हार के 3 प्रमुख कारण थे. नेताओं में तालमेल का अभाव, केंद्रीय नेताओं का हस्तक्षेप और येदियुरप्पा विवाद. इन में से पहले 2 कारण मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और दिल्ली में भी कायम हैं. कांगे्रस ने इसी कमी को मुद्दा बनाया और चुनाव जीत लिया.

उत्साह में कांगे्रस

कर्नाटक में कांगे्रस की जीत के साथ ही पार्टी के चेहरे पर गायब मुसकान वापस आ गई. उस के नेताओं ने नारा लगाना शुरू कर दिया कि ‘कर्नाटक तो ?ांकी है पूरा देश अभी बाकी है.’

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांगे्रस अभी तक बैकफुट पर थी. कर्नाटक चुनाव के बाद पार्टी में उत्साह बढ़ गया है. अब वह नरेंद्र मोदी के मसले पर भी नए सिरे से हमले तेज करेगी.

वरिष्ठ पत्रकार योगेश श्रीवास्तव कहते हैं, ‘‘उत्तर प्रदेश और बिहार चुनाव की हार का ठीकरा जिस तरह से राहुल गांधी के सिर पर फोड़ा गया था, उस से उबरने का मौका उन को मिल गया है. अब मोदी और राहुल की तुलना में राहुल कमजोर नहीं दिखेंगे.’’

कांगे्रस नरेंद्र मोदी पर निशाना साध कर यह साबित करने की कोशिश करेगी कि स्थायी सरकार देने के लिए कांगे्रस को वोट दें. नरेंद्र मोदी के नाम पर जिस तरह से भाजपा के अंदर और उस के सहयोगियों में एकमत नहीं है उस से कांगे्रस को लाभ होता दिख रहा है.

भाजपा और कांगे्रस के बिना तीसरा मोरचा भी चुनाव के पहले कोई शक्ल लेता नहीं दिखेगा. ऐसे में यह साफ लग रहा है कि स्थायी सरकार के नाम पर जनता कांगे्रस को प्राथमिकता दे सकती है.

योगेश श्रीवास्तव कहते हैं, ‘‘कांगे्रस सरकार पर भ्रष्टाचार के जो आरोप लग रहे हैं उन से गांधी परिवार पूरी तरह से खुद को अलग रखने में सफल रहा है. गांधी परिवार पर आरोप लगाने के जो काम हुए वे सफल नहीं हुए. ऐसे में हो सकता है कि कांगे्रस मनमोहन सिंह को दांव पर लगा कर नई चाल चल दे. कांगे्रस पार्टी भ्रष्टाचार का ठीकरा मनमोहन सिंह की सरकार पर डाल दे और खुद को पाकसाफ साबित करने की कोशिश करे.’’

राहुल गांधी के लिए अच्छी बात यह है कि कर्नाटक में स्टार प्रचारक के रूप में उन्होंने 9 जिलों में प्रचार किया. इन जगहों पर राहुल गांधी ने 60 से ज्यादा उम्मीदवारों के लिए वोट मांगा. यहां के काफी उम्मीदवार चुनाव जीत भी गए.

उत्तर प्रदेश कांगे्रस की पूर्व अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी कहती हैं, ‘‘भाजपा जिस मोदी फैक्टर की दुहाई पूरे देश में दे रही थी, कर्नाटक में वह ध्वस्त हो गया है. राहुल गांधी के उपाध्यक्ष बनने के बाद हुए पहले चुनाव में पार्टी को बड़ी जीत मिली है.’’

कर्नाटक चुनाव से कांगे्रस और भाजपा की ही तरह उत्तर प्रदेश की 2 पार्टियों बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी को भी सबक मिला है. समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार सीपी योगेश्वर चन्नापटना सीट से विजयी हुए हैं.

सपा के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी कहते हैं, ‘‘कर्नाटक में सपा को सीट मिलने का यह मतलब है कि लोकसभा चुनावों में तीसरे मोरचे को वोटर पसंद करने लगे हैं.’’ बसपा सुप्रीमो मायावती के प्रचार के बाद भी बसपा कोई सीट जीतने में सफल नहीं हो पाई. कर्नाटक की कई सीटों पर दलित बड़ी संख्या में हैं. इस के बाद भी मायावती वहां पर अपना प्रभाव नहीं बना पाईं.

दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से हो कर गुजरता है, ऐसा इस राज्य में लोकसभा की सब से ज्यादा सीटें होने के चलते कहा जाता है. भाजपा के लिए दिक्कत यह है कि उस की वहां के वोटरों पर पकड़ ढीली है. इसी प्रदेश के राजनाथ सिंह भाजपा के अध्यक्ष हैं, यदि उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया जाए तो पार्टी को कुछ फायदा जरूर मिलेगा.

पार्टी का कट्टर तबका चाहता है कि हिंदुत्व के चैंपियन नरेंद्र मोदी को प्रदेश की राजधानी लखनऊ से लोकसभा का उम्मीदवार बनाया जाए और उन की कट्टर छवि को पूरे राज्य में भुनाया जाए.

प्रदेश की मौजूदा सपा सरकार के दौर में भाजपा भावनाओं को भड़काने में सफल होगी, इस में संशय है. गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में संप्रदायवाद पर जातिवाद हावी है और सपा व बसपा इस के शातिर खिलाड़ी वहां मौजूद हैं, जबकि कांगे्र्रस सभी तबकों को साथ ले कर राजनीति करती है.

नारी शक्ति की बात करने वाली भाजपा ने सुषमा स्वराज को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष तब बनाया जब कांगे्रस ने राष्ट्रपति और लोकसभा अध्यक्ष के रूप में महिलाओं को आगे कर दिया था. जब प्रधानमंत्री पद की बात आई तो लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज का नाम कहीं पर भी आगे नहीं किया गया. शिवसेना और खुद लालकृष्ण आडवाणी द्वारा तारीफ किए जाने के बाद भी सुषमा स्वराज को प्रधानमंत्री पद का दावेदार नहीं बनाया गया. नरेंद्र मोदी जैसे विवादास्पद नेता का नाम आगे कर के भाजपा चौतरफा मुश्किलों में घिर गई है. खुद नरेंद्र मोदी की चमक गुजरात के बाहर फीकी पड़ गई है.

कर्नाटक चुनाव ने इस पर अपनी मोहर लगा दी है. ऐसे में कब तक भाजपा प्रधानमंत्री पद की दौड़ में अपने मुख्यमंत्रियों को चुनावी समर में खेत करती रहेगी, यह लाख टके का सवाल है. प्रधानमंत्री बनाने से पहले भाजपा को ज्यादा से ज्यादा लोकसभा सीटें जीतनी होंगी, इस के लिए मुख्यमंत्रियों का सहयोग जरूरी होगा. जिस तरह से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का गुणगान कर के दूसरे मुख्यमंत्रियों की उपेक्षा की जा रही है, उस से साफ है कि भाजपा ने सबक नहीं सीखा है. भाजपा में एक नेता का न होना उस के लिए मुश्किलें खड़ी करने वाला है.

आम जनता की जीत

लोकसभा का क्वार्टर फाइनल माने जाने वाले कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जाहिर तौर पर भले ही सत्तारूढ़ भाजपा हारी और कांगे्रस पार्टी जीती लेकिन वास्तव में यह जीत राज्य के आमजन की है.

कर्नाटकवासियों का मानना है कि लोकतंत्र जीता है और भ्रष्टतंत्र हारा है. भाजपा ने अपने शासन के दौरान घोटाले पर घोटाले किए और उन पर परदा डालने के लिए वह मुख्यमंत्री बदलती रही. सरकार चलाने की उस की नीति दोषपूर्ण रही है. वह संपन्न वर्ग को बढ़ावा देती रही जबकि पिछड़े, गरीब व अल्पसंख्यकों को उस ने उचित तवज्जुह नहीं दी.

कोई और विकल्प न होने के चलते पिछड़े, गरीब व अल्पसंख्यकों ने भारी तादाद में कांगे्रस के पक्ष में मतदान किया. नतीजतन, वह बहुमत से विजयी हुई.

लोकसभा के क्वार्टर फाइनल के बाद इसी वर्ष सेमी फाइनल होना है यानी 4 राज्यों की विधानसभाओं के लिए चुनाव होने हैं. इन चुनावी राज्यों में दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ शामिल हैं. पहले 2 राज्यों में कांगे्रस की तो दूसरे 2 राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं और उन चुनावों के बाद अगले वर्ष लोकसभा का फाइनल होगा यानी देशभर में आम चुनाव होंगे. कर्नाटक की यह हारजीत शायद फाइनल पर अपना असर छोड़े और तब प्रदेश से चुने जाने वाले ज्यादातर सांसद कांगे्रस के ही हों.

-साथ में अशोक कुमार