सरिता विशेष
कहीं मैडम हैं तो कहीं बहूबेटी. देश के आम चुनाव की सियासी शतरंज में इस बार परिवार के मोहरे पूरी बिसात पर बिखरे हुए हैं. बहैसियत कार्यकर्ता न तो इन्होंने कुरसियां उठाईं, न झंडे उठाए, न धूप में नारे लगाए और न ही कोई जनप्रतिनिधित्व का कारनामा किया. बावजूद इस के देश की कई लोकसभा सीटों पर नेताजी के नवाबजादे और नवाबजादियां किस तरह चुनावी दंगल में टूट पड़े हैं, बता रहे हैं भारत भूषण श्रीवास्तव.
 
अब न तो बहुएं घूंघट या परदे में हैं और न ही बेटियों पर पहले सी बंदिशें हैं. महिलाओं को मिल रही इस आजादी को राजनीति के जरिए सहजता से समझा जा सकता है. तमाम बड़े दलों और नेताओं ने बहुओं, पत्नियों और बेटियों पर चुनावी दांव आजमाने में कंजूसी नहीं की है. इस दरियादिली के पीछे छिपी मजबूरी या स्वार्थ है लोकप्रियता भुनाना और अपनी एक सीट बढ़ाना.
चुनाव लड़ रही राजनीतिक परिवारों की महिलाओं ने राजनीति बेहद नजदीक से देखी है. हालांकि उन्हें जगह बनाने के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ा है लेकिन जीतने के लिए जरूर पसीना बहाना पड़ा है. उन पर दोहरा भार और तनाव है. उन्हें मालूम है कि उन की हार सिर्फ उन की ही नहीं, बल्कि रसूखदार पति, पिता और ससुर की भी होगी. लिहाजा, चेहरे पर पेशेवर नेताओं की तरह हावभाव और मुसकराहट लिए वे मैदान में पूरी शिद्दत से हैं. वे कहीं भाभी हैं तो कहीं दीदी तो कहीं मैडम हैं.
चुनाव प्रचार का उन का कार्यक्रम पार्टी के वरिष्ठ कार्यकर्ता तय करते हैं, क्षेत्र के जातिगत और दूसरे समीकरण भी धीमी आवाज में बताते चलते हैं और पार्टी के भीतर व बाहर अपनों व परायों की पहचान भी कराते हैं.
चिट भी अपनी पट भी अपनी
हर एक का अपना एक अलग स्टाइल है, मतदाता से बात करने का अंदाज है. उन्हें एहसास है कि वोटर उन्हें एक अलग खास निगाह से देखता है. परिवार की, पिता, पति या ससुर की प्रतिष्ठा का भार उन्हें जरूरत से ज्यादा नम्र बना रहा है. यह भी उन्हें मालूम है कि हारीं तो व्यक्तिगत तौर पर कुछ नहीं बिगड़ना लेकिन खासा नुकसान घर के मुखिया और पार्टी का होना तय है. और जीतीं तो कद देशभर में बढ़ना तय है क्योंकि उन की सीट सुर्खियों में है, विरोधियों और मीडिया की निगाह उन पर है. 
ऐसे में बेहद सधे कदमों से इन उम्मीदवारों को चलना पड़ रहा है. भाषणबाजी से ज्यादा वे व्यक्तिगत संपर्कों में भरोसा करती हैं. ऐसे में छोटी सभाओं को संबोधित करने जैसी कई दुश्वारियों से वे बच भी जाती हैं.
सपा का परिवारवाद
उत्तर प्रदेश की कन्नौज लोकसभा सीट से लड़ रही डिंपल यादव का सादगीभरा सौंदर्य उन की समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव की बहू और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी होने की पहचान पर अकसर भारी पड़ता दिखता है. 35 वर्षीय डिंपल के चेहरे का आकर्षण और फिटनैस देख सहज नहीं कहा जा सकता कि वे 3 बच्चों की मां हैं. हमेशा साड़ी में लिपटी रहने वाली डिंपल के माथे पर बिंदिया और हाथों में चूडि़यां देख हर कोई कहता है कि बहू हो तो ऐसी.
पर जानने वाले ही जानते हैं कि जब अखिलेश ने उन से लव मैरिज की थी तो मुलायम सिंह अपनी नाराजगी भले ही छिपा गए थे पर नाखुशी पर परदा नहीं डाल पाए थे. अब यही डिंपल ससुर की इतनी चहेती हैं कि यादव परिवार और सपा का प्रतिनिधित्व करने लगी हैं. लखनऊ यूनिवर्सिटी से कौमर्स ग्रेजुएट डिंपल ने कभी सपने में भी राजनीति में जाने की बात नहीं सोची थी लेकिन अखिलेश से दोस्ती प्यार में बदली तो सबकुछ बदल गया और एक मिलिट्री अधिकारी की यह अनुशासित बेटी जल्द ही ससुर की मंशा के मुताबिक सियासी रंगढंग में ढल गई.
मुलायम सिंह सरीखे सख्त और परंपरावादी ससुर का दिल जीत लेने वाली डिंपल एक अच्छी पत्नी भी साबित हुई हैं. अखिलेश को उन का राजनीति में आना पसंद नहीं था पर हालात के चलते उन्होंने ससुर की इच्छा पूरी की तो जल्द ही पति भी मान गए. लेटेस्ट गैजेट्स के इस्तेमाल में माहिर डिंपल पति का फेसबुक अकाउंट देखती हैं और ट्वीट भी करती हैं.
पूरे उत्तर प्रदेश की तरह कन्नौज में भी सपा कार्यकर्ताओं की भरमार है जो अपनी भाभी को जिताने के लिए जीजान लगाए हुए हैं. राजनीति में डिंपल को दोनों तरह के अनुभव हो चुके हैं. 2009 के लोकसभा चुनाव में वे फिरोजाबाद सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार और अभिनेता राजबब्बर के हाथों शिकस्त खा चुकी हैं जो कभी मुलायम सिंह के खास शिष्य हुआ करते थे लेकिन बाद में कांग्रेस में चले गए थे और अभी तक मुलायम सिंह के लिए सिरदर्द बने हुए हैं.
पहली बार की हार के झटके से डिंपल शानदार तरीके से बाहर आईं जब वे 2012 में कन्नौज लोकसभा का उपचुनाव निर्विरोध यानी बगैर लड़े जीतीं. इस तरह डिंपल पहली महिला सांसद बनीं जो निर्विरोध चुनी गईं. यह रिकौर्ड शायद ही कभी कोई तोड़ पाए.
कन्नौज में डिंपल का मुख्य मुकाबला भाजपा के सुब्रत पाठक और बसपा के निर्मल तिवारी से है. यह सीट शुरू से ही समाजवादियों का गढ़ रही है. अखिलेश यादव यहां से 3 बार जीते हैं. 2009 के चुनाव में उन्होंने बसपा के महेंद्र वर्मा को 1 लाख से भी ज्यादा वोटों से हराया था. इस के पहले 2004 और 2000 का उपचुनाव भी वे जीते थे. 1995 में मुलायम सिंह इस सीट से जीते थे. 1967 में प्रख्यात समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया भी कन्नौज का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. 1984 में शीला दीक्षित यहां आ कर चुनाव लड़ी थीं और कांग्रेस लहर में जीती थीं पर 1989 के चुनाव में वे हार गई थीं.
इस लिहाज से 3 अप्रैल को नामांकन दाखिल करते हुए डिंपल का यह कहना ठीक ही था कि कन्नौज उन के लिए घर जैसी सीट है. सियासी गलियारों में फैली यह चर्चा भी निराधार नहीं है कि कांग्रेस यहां से एक सौदेबाजी के तहत उम्मीदवार खड़ा नहीं कर रही और दबाव अगर पड़ा तो ऐसा उम्मीदवार उतारेगी जो बजाय नुकसान के डिंपल को फायदा ही देगा, एवज में सपा अमेठी और रायबरेली से प्रत्याशी नहीं उतारेगी.
फैमिली ड्रामा लालू का
जो हालत उत्तर प्रदेश में मुलायम परिवार की है लगभग वही बिहार में लालू प्रसाद यादव के कुनबे की है जिन की पत्नी राबड़ी देवी और बेटी मीसा भारती यादव दोनों राजद से मैदान में हैं. राबड़ी सारण से तो मीसा पाटलीपुत्र सीट से चुनावी मैदान में हैं.
मुलायम के मुकाबले लालू यादव परिवार की राह कुछ मुश्किल भरी है. वजह, राबड़ी देवी को उन के ही सगे भाई साधु यादव ने चुनौती दी थी पर 4 अप्रैल को नामांकन वापस ले लिया. साधु कभी बहन और बहनोई के दाएं हाथ थे और उन्हें लालू का सब से भरोसमंद माना जाता था. एक वक्त में पटना में साधु यादव का राज चलता था पर अब हालात उलट हैं.
लालू की बड़ी बेटी मीसा का नाम दिलचस्पी भरा है. आपातकाल के दौरान जब वे जेल में थे तब मेंटिनेंस  औफ इंटरनल सिक्यूरिटी ऐक्ट यानी मीसा के नाम पर ही उन्होंने बेटी का नाम रख दिया था. देखने में बेहद सीधी मीसा मातापिता की ही तरह बेबाक और मुंहफट हैं. वे पेशे से डाक्टर हैं पर प्रैक्टिस नहीं करती हैं. उन्होंने एमजीएम मैडिकल कालेज, जमशेदपुर से एमबीबीएस की डिगरी बहैसियत टौपर हासिल की थी. बीते कई सालों से वे पति व बेटियों सहित राबड़ी देवी के सरकारी बंगले में ही रह रही हैं.
मीसा की शादी पेशे से कंप्यूटर इंजीनियर शैलेष यादव के साथ 1999 में धूमधाम से हुई थी. यह शादी लालू यादव के मुख्यमंत्री रहते हुई थी, लिहाजा सुर्खियों में रही थी. मीडिया तो इस के कवरेज के लिए टूट पड़ा था. पटना के नजदीक विहटा निवासी शैलेष ने लखनऊ से एमबीए किया है. उस से पहले उन्होंने बड़ौदा से इंजीनियरिंग की डिगरी ली थी.  एक प्राइवेट बैंक में नौकरी करने के बाद वे इंफोसिस जैसी नामी कंपनी में नौकरी करने लगे थे. मीसा 2 बेटियों की मां हैं.
मौजूदा चुनाव में कई दुश्मनों और तमाम दिक्कतों से घिरे लालू यादव ने आखिरकार कांग्रेस से गठबंधन कर लिया और जैसे ही मीसा को पाटलीपुत्र से टिकट दिया तो उन के खासमखास राजद के धाकड़ नेता रामकृपाल यादव नाराज हो कर भाजपा में चले गए. रामकृपाल का एतराज यह था कि इस सीट से उन्हें उम्मीदवार बनाया जाना चाहिए था. मीसा ने दिल्ली जा कर अपनी तरफ से रिश्ते के इस चाचा को मनाने के लिए सीट छोड़ने की पेशकश भी की थी पर तब तक रामकृपाल को भाजपा फोड़ चुकी थी.
अब मीसा के सामने चुनौती सीट निकालने की है. कांग्रेस का साथ और पिता का नाम कितनी मदद कर पाएंगे, यह तो नतीजा बताएगा पर मीसा का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा. एक खास तरीके से चुनरी ओढ़े रहने वाली मीसा अब चाचा और मामा को सबक सिखाने की बात भी कर रही हैं.
जाहिर है लालू की चिंता मीसा के साथसाथ पार्टी के भविष्य की भी है. वे अपनी बढ़ती उम्र और घटते जादू के चलते पार्टी की बागडोर बेटी के हाथ में दे देना चाहते हैं. इस में शैलेष की भूमिका अहम रहेगी जो हालफिलहाल तटस्थ हैं.
सारण और पाटलीपुत्र दोनों सीटों पर लालू की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है. पत्नी और बेटी उन की प्रतिष्ठा कायम रख पाएंगी या नहीं यह देखना दिलचस्प होगा. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पूरी कोशिश लालू का खेल बिगाड़ने की है तो भाजपा भी पूरे दमखम से लालू का वजूद व हैसियत मिटाने पर तुली हुई हैं. लालू मीसा को बेहद चाहते हैं और उन्हें जिताने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ने वाले लेकिन अब पहले की तरह सबकुछ उन की मुट्ठी में नहीं है.
इसी तरह बिहार के ही सिवान जिले के दबंग सांसद रहे शहाबुद्दीन पिछले कई सालों से जेल में बंद हैं और इस बार सिवान सीट से उन की बीबी हिना शहाब मैदान में हैं. वहीं बाहुबली नेता पप्पू यादव खुद राजद के टिकट से मधेपुरा से चुनाव लड़ रहे हैं और उन की बीबी रंजीता रंजन सुपौल लोकसभा सीट से कांग्रेस के टिकट से चुनावी मैदान में हैं. वैशाली के बाहुबली नेता मुन्ना शुक्ला की बीबी फिलहाल लालगंज विधानसभा सीट से जदयू की विधायक हैं और वे जदयू के टिकट पर वैशाली लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने के मूड में थीं. जब पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो वे कमर कस कर निर्दलीय ही चुनावी अखाड़े में कूद पड़ीं.
प्रिया की पकड़
राजनीतिक परिवारों से ताल्लुक रखती महिलाओं का सब से दिलचस्प मुकाबला उत्तरमध्य मुंबई सीट पर है, जहां से अपने जमाने के 2 दिग्गजों कांग्रेस के सुनील दत्त की बेटी प्रिया दत्त और भाजपा के प्रमोद महाजन की बेटी पूनम महाजन आमनेसामने हैं. पिछले चुनाव में भाजपाई महेश जेठमलानी को तकरीबन पौने 2 लाख वोटों से धूल चटा देने वाली प्रिया अब राजनीति में माहिर हो गई हैं और राहुल गांधी के बेहद नजदीकियों में उन का नाम लिया जाने लगा है. 1984 में इस सीट से सुनील दत्त ने भाजपा के धाकड़ नेता राम जेठमलानी को हराया था. उस हार का बदला लेने के लिए अपने बेटे महेश जेठमलानी को टिकट तो राम जेठमलानी दिला लाए पर जिता नहीं पाए.
उत्तरमध्य मुंबई सीट कांग्रेस का उसी तरह गढ़ बन गई है जिस तरह अमेठी, रायबरेली हैं. इस सीट से ताल्लुक रखती दिलचस्प बात यह है कि जबजब सुनील दत्त लड़े तबतब जीते लेकिन 1996 और 1999 में नहीं लड़े तो कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा. इस लिहाज से उत्तर भारतीय वोटों के सहारे प्रिया मजबूत हैं लेकिन उन की दिक्कत कई स्थानीय दिग्गज

कांग्रेसियों का प्रचार से मुंह मोड़ लेना है जिन में 2 विधायक कृपाशंकर सिंह और आरिफ नसीम प्रमुख हैं.
सुनील दत्त के साथ प्रिया साए की तरह रहीं और इसी दौरान राजनीति सीखी और जल्द उन्हें समझ आ गया कि सफल होने के लिए जरूरी है कि जनता से सीधे संवाद रखा जाए और समाजसेवा के काम भी किए जाते रहें. प्रतिबद्ध कांग्रेसी सुनील दत्त के खेल एवं युवा मामलों के मंत्री रहते उन्होंने 1,800 किलोमीटर की पदयात्रा भी की थी और पिता का खयाल भी खूब रखा था. हालांकि वे फिल्मों से सीधे नहीं जुड़ी हैं पर उन की लोकप्रियता का आलम यह है कि दबंग अभिनेता सलमान खान ने भाजपा से प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी के सामने साफसाफ कहा था कि वे प्रिया दत्त को वोट देंगे. अपने जमाने की मशहूर और कामयाब अभिनेत्री नरगिस दत्त की छवि भी प्रिया में दिखती है.
यह भी सुनील दत्त के लिहाज के साथसाथ प्रिया की लोकप्रियता का डर ही था कि नाना पाटेकर जैसे अक्खड़ अभिनेता ने आम आदमी पार्टी का उन के खिलाफ लड़ने का प्रस्ताव अभिनेत्री प्रिटी जिंटा की तरह ठुकरा दिया था. हर कोई मानता है कि प्रिया अपने पिता का नाम और काम बखूबी संभालने में कामयाब रही हैं. 2 साल पहले प्रिया ने वेश्यावृत्ति को कानूनी अधिकार देने की मांग की थी तो बुद्धिजीवी समुदाय में खासी बहस छिड़ गई थी और अधिकांश लोग उन से सहमत थे.
महाजन की विरासत
पूनम महाजन के हक में भी सबकुछ नहीं है. प्रमोद महाजन की मौत के बाद महाजन परिवार टूट गया था. नतीजतन, पूनम ज्यादा नहीं पढ़ पाईं. भाजपा ने प्रमोद की लोकप्रियता को भुनाने के लिए उन्हें 2009 के विधानसभा चुनाव में घाटकोपर सीट से चुनाव लड़ाया लेकिन वे हार गई थीं. इस हार का दाग बहुत गहरा है. उम्मीदवारी के एलान के साथ ही सब से पहले पूनम, उद्धव ठाकरे को ‘प्रणाम’ करने गई थीं. वजह, शिवसेना का भी इस क्षेत्र में खासा असर है, हालांकि भाजपा की तरफ से वोटदिलाऊ नेताओं का यहां टोटा है.
इन दोनों प्रतिद्वंद्वियों में एक विकट की समानता भाइयों का आपराधिक मामलों में लिप्त होना और उन की उद्दंडता भी है. प्रिया के भाई संजय दत्त प्रतिभाशाली अभिनेता हैं पर मुंबई बम कांड के आरोपी होने के चलते इन दिनों जेल में हैं. पूनम के भाई राहुल कभी ड्रग्स के मामले में फंसे थे. आजकल टीवी कार्यक्रमों में भोंडापन और फूहड़ता बिखेरते नजर आ रहे हैं.
अच्छी बात यह है कि दोनों का दांपत्य जीवन खुशहाल और सुखद है. प्रिया के पति ओवेन रेवकान एक मार्केटिंग कंपनी के डायरैक्टर हैं और पूनम के पति आनंद राव मुंबई के जानेमाने उद्योगपति हैं. इन दोनों के ही पति चुनाव प्रचार में आमतौर पर नहीं दिखते सिर्फ पार्टियों में कभीकभार नजर आते हैं.
भाइयों की बेजा हरकतों से परेशान प्रिया और पूनम दोनों को राजनीति में पिता के नाम का फायदा और बड़ा सहारा मिला हुआ है. भाइयों की जगह विरासत संभाल रही ये दोनों इस बार मुश्किल में हैं. मुंबई उत्तरमध्य सीट के मुकाबले को सपा और आम आदमी पार्टी ने दिलचस्प बना दिया है. ‘आप’ के फिरोज पालखीवाला मशहूर वकील नानी पालखीवाला के बेटे हैं. अंदाजा है कि दोनों का ही खेल बराबरी से बिगाड़ेंगे जबकि सपा के फरहान आजमी प्रिया दत्त को थोड़ा नुकसान पहुंचा सकते हैं.
अनुप्रिया की चुनौती
पिता की छोड़ी बादशाहत को उत्तर प्रदेश की मिर्जापुर लोकसभा सीट से 32 वर्षीय अनुप्रिया पटेल संभालती नजर आ रही हैं. दूसरी नेत्रियों के मुकाबले अनु के नाम से मशहूर अनुप्रिया को राजनीति की गहरी समझ है. इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वाराणसी सीट से नरेंद्र मोदी की जीत सुनिश्चित करने के लिए भाजपा को उन की मनुहार करनी पड़ी थी.
अपना दल के संस्थापक सोनेलाल पटेल की इस बेटी से भाजपा हाथ मिलाने को मजबूर हुई और 2 सीटें छोड़ीं जिन में से मिर्जापुर से वे मैदान में हैं. अभी अनुप्रिया वाराणसी की रोहनिया सीट से विधायक हैं. पिछड़ों के आरक्षण की हिमायती इस आकर्षक नेत्री ने उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में गहरी पैठ बना रखी है. यह क्षेत्र पटेल और कुर्मी वोटों की बहुलता के लिए जाना जाता है.
अनुप्रिया ने 12वीं तक की पढ़ाई कानपुर से की थी. इस के बाद दिल्ली के लेडी श्रीराम कालेज से स्नातक होने के बाद उन्होंने नोएडा की एमिटी यूनिवर्सिटी से मनोविज्ञान में एमए किया और एमबीए करने की इच्छा को भी पूरा किया. अपना दल की महासचिव अनुप्रिया जीत के प्रति आश्वस्त हैं. उन के मुकाबले में बसपा से समुदा बिंद और कांग्रेस से ललितेशपति त्रिपाठी हैं.
अनुप्रिया का व्यक्तित्व पूर्वांचल में लोगों को लुभाता है. वे फर्राटे से अंगरेजी भी बोलती हैं और आएदिन आंदोलन, धरने वगैरह भी करती रहती हैं. अपने सिविल इंजीनियर पति आशीष कुमार का सहयोग उन्हें शुरू से ही मिला हुआ है. पिता सोनेलाल पटेल की मौत और अनुप्रिया की शादी में महज 15 दिन का अंतर था पर आशीष ने अनुप्रिया को टूटने नहीं दिया और राजनीति करने दी.
भतीजा नहीं बेटी
महाराष्ट्र और देशभर की राजनीति के एक और दिग्गज शरद पवार अब 84 साल के हो चुके हैं और इस बार चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. उन्होंने अपनी बेटी सुप्रिया सुले को अपनी पार्टी एनसीपी की कमान दे दी है और अपनी सीट बारामती से दोबारा जीतने का जिम्मा भी. कद्दावर मराठा नेता शरद पवार राजीव गांधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री होते अगर तब के उन के सियासी दुश्मन अर्जुन सिंह और एनडी तिवारी ने टंगड़ी न अड़ाई होती. ये दोनों ही नरसिम्हाराव को प्रधानमंत्री बनाने के लिए लामबंद हो गए थे.
अपनेपराए की पहचान में धोखा खा चुके शरद पवार अब हर कदम फूंक कर रखते हैं. इसीलिए अपनी विरासत उन्होंने भतीजे अजीत पवार के बजाय बेटी सुप्रिया को दी जो राज्यसभा में सांसद रह चुकी हैं.
42 वर्षीय, 2 बच्चों की मां सुप्रिया को देख कोई नहीं कह सकता कि वे एक विशिष्ट महिला हैं. वजह, उन का साधारण गृहिणी की तरह रहना और दिखना है. कभी राजनीति से परहेज करने वाली तेजतर्रार सुप्रिया की शादी नामी उद्योगपति सदानंद सुले से हुई और वे विदेश चली गई थीं. पिता की एक गंभीर बीमारी उन की देश में वापसी की वजह बनी. वे वापस आईं और राजनीति के साथसाथ समाजसेवा में भी दिलचस्पी लेने लगीं. 
राजनीतिक परिवारों की दूसरी बहू, बेटियों और पत्नियों की तरह सुप्रिया को भी कभी बहैसियत कार्यकर्ता न कुरसियां बिछानी पड़ीं और न ही फर्श उठाने पड़े. उन्हें सबकुछ परोसा हुआ मिला लेकिन वे इस की उपभोक्ता भर नहीं रहीं. इसलिए अपनी जमीन और पहचान बनाने में भी कामयाब रहीं. जमीनी कार्यकर्ता की अहमियत व उपयोगिता सुप्रिया बेहतर समझने लगी हैं कि जीत महज लोकप्रियता से नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं की मेहनत से मिलती है.
वैभव सुप्रिया ने बचपन से ही देखा है. वे चाहतीं तो एक गृहिणी की तरह भी गुजर कर सकती थीं पर विरासत में मिली राजनीति का मोह वह नहीं छोड़ पाईं और बेटे का फर्ज अदा करते पिता का साम्राज्य संभालने को तैयार हैं. सुप्रिया ने शुरुआत धमाकेदार ढंग से की थी. महिला हितों से जुड़े मुद्दों, भू्रणहत्या और दहेज के मुद्दों को उन्होंने ज्यादा उठाया. दोहरी विदेशी नागरिकता के आरोप और मुकदमे भी झेले, आईपीएल विवाद में भी उन का नाम जुड़ा लेकिन वे जानती हैं कि देश ही नहीं, पूरी दुनिया में राजनीति का एक ही उसूल होता है कि अपनी बचा कर रखो और विरोधी की टांग खींचते रहो.
अगर महाराष्ट्र में कांग्रेसएनसीपी गठबंधन संतोषजनक प्रदर्शन कर पाया तो तय है सुप्रिया सुले भविष्य की एक अहम नेता होंगी. चचेरे भाई अजीत पवार उन का रास्ता छोड़ चुके हैं, जिन्होंने शरद पवार के साथ काफी मेहनत की थी. एक दूसरे नजरिए से देखें तो सुप्रिया ने अजीत का हक ही मारा है पर सियासत के कोई उसूल नहीं होते और इस में सब जायज होता है. यह सुप्रिया की सक्रियता से साबित भी होता है.
आमनेसामने परिवार
एक तरफ जहां ये महिलाएं उत्तराधिकार संभालने के लिए मैदान में हैं तो दूसरी तरफ भारत में एक खूबसूरत चेहरा ऐसा भी है जो पारिवारिक प्रतिष्ठा और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के चलते राजनीति में आया. पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की बहू और सुखवीर सिंह बादल की पत्नी 47 वर्षीय हरसिमरन कौर बादल शिरोमणि अकाली दल के टिकट से पंजाब की भटिंडा सीट से मैदान में हैं. 2009 के चुनाव में उन्होंने धुरंधर कांग्रेसी अमरिंदर सिंह के बेटे रणइंदर सिंह को हरा कर सनसनी फैला दी थी. 
दरअसल, कभी अमरिंदर ने प्रकाश सिंह बादल पर यह ताना कसा था कि उन में अपने परिवार के किसी सदस्य को चुनाव में उतारने की हिम्मत नहीं है तो जवाब में प्रकाश सिंह बादल ने हिम्मत दिखा दी, जरिया बनीं बहू हरसिमरन.
इस दफा भी हरसिमरन कौर मैदान में हैं. उन के सामने अपने ही देवर मनप्रीत बादल हैं. दूसरी चुनौती आप के उम्मीदवार गायक जस्सी जसपाल से भी मिल रही है. बादल परिवार और प्रकाश सिंह बादल की असल प्रतिष्ठा बहू से है या बेटे से, यह अब मतदाता तय करेंगे लेकिन इस धर्मयुद्ध में फंसी हरसिमरन के चेहरे पर शिकन नहीं है. वे जीत के प्रति आश्वस्त हैं. वे अपने प्रचार में एक बात कह रही हैं कि मनप्रीत कभी किसी का सगा नहीं हो सकता.
सियासी हाशिए पर महिलाएं
घर की महिलाओं के भरोसे कई बड़े नेता हैं पर वे एकदम बेफिक्र नहीं हैं. देश की कोई 50 लोकसभा सीटों से इस बार बेटे, भतीजे, भांजे और साले, दामाद भी चुनाव लड़ रहे हैं. इस लिहाज से राजनीतिक उत्तराधिकारी महिलाओं की संख्या दहाई में न होना बताता है कि सबकुछ ठीकठाक नहीं है. स्त्री जागरूकता, स्वतंत्रता और उत्तराधिकार महज झुनझुने हैं. फलतेफूलते वंशवाद पर अब कोई खास एतराज नहीं जताता. इस का सीधा सा मतलब है कि राजनीति एक व्यवसाय के रूप में स्वीकार ली गई है. हैरानी यह है कि इस में महिलाएं अभी भी कम हैं जिन पर होहल्ला ऐसा मचाया जाता है मानो नेताओं ने सबकुछ उन्हें सौंप दिया हो.
संसद जा कर भी पिता, पति या ससुर के इशारे पर नाचना पड़े तो लगता है राजनीति में भी स्त्री की हैसियत कठपुतली सरीखी है. जवाहरलाल नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी एक उदाहरण भर बन कर रह गई हैं. अब उन की विरासत बहू सोनिया गांधी संभाले हुए हैं पर साफ दिख रहा है कि आखिरकार चलती तो राहुल गांधी की ही है. मौजूदा हालात देख प्रियंका की कांग्रेस में मांग लोकप्रियता की वजह से नहीं थी, न ही महिला होने की वजह से. हकीकत में प्रियंका वाड्रा राहुल से कहीं ज्यादा मेहनती, गंभीर और काबिल हैं पर वे रायबरेली और अमेठी में सिमट कर ही रह जाती हैं तो राजनीति से परे यह एक भारतीय महिला की बेबसी और परतंत्रता ही दिखती है.