लोकसभा चुनाव के मद्देनजर हर सियासी दल प्रचार के रथ पर सवार हो कर झूठे विकास और खोखले वादों का ढोल पीटने में मसरूफ है. प्रचार में जाति, धर्म, क्षेत्र, धनबल और बाहुबल के घिसेपिटे मुद्दे हैं जबकि जनता से जुड़े सामाजिक मसले गायब हैं. मौकापरस्ती, विकास के फर्जी आंकड़ों और धर्म व क्षेत्र की बिसात पर बिछे चुनाव प्रचार की असलियत से परदा उठा रहे हैं जगदीश पंवार.
16वीं लोकसभा के लिए आम चुनाव की रणभेरी बजते ही मजेदार राजनीतिक मजमेबाजी शुरू हो गई है. कमाल की कलाबाजियां देखी जा रही हैं. राजनीतिबाजों के बचकाने, मूर्खाने और जोकराने अंदाज खूब लुभा रहे हैं. तमाम चोर ईमानदारी पर प्रवचन दे रहे हैं. बेईमान बेईमानी के खिलाफ जबकि  झूठे, काहिल और भ्रष्टाचारी सचाई व नैतिकता के भाषण देते घूम रहे हैं. ठग परोपकारी ईमानदार की मुद्रा में दिखाई दे रहे हैं. एकता, भाईचारे के नारे हैं तो दूसरी ओर जातीयता, सांप्रदायिकता के मंत्र पढे़ जा रहे हैं, एकदूसरे के अंतर्विरोध और टांगखिंचाई के नजारे हैं.
भारतीय राजनीति में जीत के लिए सब से असरदार तत्त्व जाति, धर्म, क्षेत्र, धनबल, बाहुबल जैसे पुराने हथियार मौजूद हैं. पुराने सियासी ठग फिर से ताल ठोंक रहे हैं. परस्पर विरोधी जबानी जंग जारी है. गालियों का शोर है. देश में बड़ा ही विचित्र दृश्य उपस्थित है.
चारों ओर मौकापरस्ती है. दलबदल का खेल खुल कर खेला जा रहा है. महज सत्ता के लिए नेता इधर से उधर हो रहे हैं. नीतियां, सिद्धांत ताक पर हैं.
खोखले वादे
चुनावों की इस आपाधापी में अगर गायब हैं तो वे हैं इस देश, समाज और जनता की असली तरक्की से जुड़े सामाजिक मुद्दे. लगता है राजनीतिक दलों को सामाजिक मुद्दों से सरोकार नहीं है. तरक्की के नाम पर एअरपोर्ट, चमचमाती सड़कें, पुल, मैट्रो, कंप्यूटर, इंटरनैट, मौल्स, ऊंची इमारतों के निर्माण जैसी उपलब्धियां गिनाई जा रही हैं. दशकों से शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पानी, भोजन, रोजगार की हालत ज्यों की त्यों है. जमीनी हकीकत सरकारों के विकास के  झूठे कागजी आंकड़ों की पोल खोल रही है.
राजनीतिक दलों के प्रचार में वही पुराने खोखले वादे हैं, थोथे नारे हैं.  झूठी लहर पैदा करने के तमाम प्रपंच रचे जा रहे हैं. गलतियों पर घडि़याली आंसू बहाए जा रहे हैं. मतदाताओं के सामने भ्रमजाल के पासे फेंके जा रहे हैं.  झूठे सब्जबाग में जनता फंसती भी दिखाई दे रही है.
भाजपा का दावा
चुनावी प्रचार में देश की 2 सब से बड़ी पार्टियों में से भारतीय जनता पार्र्टी आगे दिख रही है. वह खुद को सत्ता की सब से प्रबल दावेदार मान रही है. पार्र्टी नेताओं का दावा है कि उन के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की हवा बह रही है और चुनाव नजदीक आतेआते यह बहाव सुनामी में बदल जाएगा. लेकिन पार्टी के शीर्ष नेताओं में अंदरूनी कलह भी जारी है.
भाजपा धार्मिक प्रतीकों, भावनाओं के जरिए वोट पाना चाहती है. धर्म को भुनाने में माहिर भाजपा ने उत्तर प्रदेश में दर्जनों रथनुमा वाहनों को जनता के बीच उतारा है ताकि धर्मभीरु लोग रथों को देख कर पार्टी को वोट दें.
संप्रग सरकार से पहले केंद्र में भाजपा राज कर चुकी है. तब पार्टी अयोध्या में राममंदिर का वादा कर के सत्ता में आई थी. 28 दलों का कुनबा जोड़ कर भाजपा की अगुआई में एनडीए की गठबंधन सरकार बनी. यह बात अलग है कि बीचबीच में कुछ दल छोड़ कर जाते रहे पर जोड़तोड़ कर के इस गठबंधन ने सत्ता में करीब 6 साल पूरे कर लिए. उस दौरान 2004 के आम चुनावों से पहले उसे लगा कि उस की सरकार ने देश में बहुत विकास करा दिया है. भाजपा ने खुद ही ‘फील गुड’ और ‘इंडिया शाइनिंग’ का नारा दिया पर विकास का गुब्बारा हवा से भरा हुआ निकला. उस कार्यकाल में कोई सामाजिक मुद्दा नहीं उठाया गया.
भाजपा द्वारा मोदी की  झूठी लहर उत्पन्न करने की कोशिशें की जा रही हैं. इस के लिए संघ का पूरा अमला और पार्टी के गोएबल्स यानी आईटी विभाग से जुड़े महारथी सोशल मीडिया से ले कर टैलीविजन चैनलों और प्रिंट मीडिया तक में पैठ बनाने, डरानेधमकाने व विरोधी पार्टी के भारी पड़ते प्रचार को ले कर हल्ला मचाने के लिए तैनात हैं. मोदी के प्रचार का कोई भी हथकंडा हाथ से जाने नहीं दिया जा रहा है. देशभर में चाय पार्टियों का दौर चला. चाय पिला कर वोट पाना मतदाताओं को घूस देने की श्रेणी में आ गया और चुनाव आयोग ने डंडा दिखाया तो अब नए तरीके खोजे जा रहे हैं.
भाजपा या कांग्रेस बनारस जैसे धार्मिक अंधविश्वास के गढ़ों को तोड़ने की कोई बात नहीं कर रहीं. बनारस को बेंगलुरु बनाने की योजना नहीं है. उन के अनुसार तो बस मंदिरों का विकास हो.
केजरी के सवाल
मोदी पर दंगों के अलावा कौर्पोरेट घरानों से सांठगांठ करने के आरोप भी लग रहे हैं. आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल भाजपा के मोदी और कांग्रेस के राहुल गांधी पर बारबार आरोप लगा रहे हैं कि उन का अंबानी से क्या रिश्ता है? उन के हवाई जहाज, हैलिकौप्टर दौरों का खर्र्च कौन उठा रहा है? केजरीवाल कहते हैं कि उन के हवाई दौरों का खर्च अंबानी और अडानी उठा रहे हैं लेकिन उन के इस आरोप का न तो राहुल गांधी से जबाव देते बनता है न मोदी से.
भाजपा के बाद कांग्रेस चुनाव प्रचार में खूब धन  झोंक रही है. देशभर में कैंपेन के लिए पार्टी ने अपने उपाध्यक्ष राहुल गांधी को उतारा है लेकिन देश की सब से पुरानी पार्टी के पास से भी तरक्की के वास्तविक मुद्दे गायब हैं.
भ्रष्टाचार के लिए कांग्रेस के पास कहने को कुछ नहीं है. इसी वजह से उस के प्रति देश में गुस्से का माहौल है. राहुल गांधी अपने परिवार के बलिदान की कहानियों के साथ सरकार के विकास कार्यों का बखान भी करते हैं पर महंगाई, भ्रष्टाचार से ले कर उन सामाजिक मसलों पर मौन हैं जिन में असली विकास छिपा हुआ है.
राहुल गांधी कुलियों, रेहड़ीपटरी वालों, महिलाओं, आटो वालों, नमक मजदूरों से मिल रहे हैं पर उन के लिए क्या करेंगे, कुछ पता नहीं. वे बदलाव की बातें तो करते हैं पर कैसे करेंगे, इस का जवाब उन के पास नहीं है. राहुल उन लोगों से यह नहीं पूछ रहे हैं कि वे लोग बीड़ी, तंबाकू, शराब का सेवन करते हैं तो उस में कितना धन खर्च कर देते हैं, उसे बंद करना चाहिए.
राहुल गांधी अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की तर्ज पर प्राइमरी के जरिए लोकसभा उम्मीदवारों का चयन कर रहे हैं पर इस से घूमफिर कर वही पुराने ठग सामने आ रहे हैं. पार्टी नए, योग्य उम्मीदवारों को सामने नहीं ला पाई. नए विचारों, नए लोगों को चुनावों में नहीं लाया जा रहा, पुरानों से ही काम चलाया जा रहा है.
चुनावों से ऐन पहले देश की एक बहुत बड़ी जाट बिरादरी को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल कर लिया गया है. महज जाटों का वोट पाने की खातिर.
कांग्रेस के बहुप्रचारित नारों पर गौर करें, ‘तोड़ें नहीं, जोड़ें’, ‘मैं नहीं, हम’ और ‘कट्टर सोच नहीं, युवा जोश’ आदि. चुनावी सभाओं, रैलियों में इन नारों के साथ सामाजिक सुधार कैसे करेंगे, इस पर कांग्रेस के नेता विस्तार से खुलासा नहीं करते. सिर्फ थोथे नारे ही नारे हैं.
तीसरा मोरचा
तीसरे मोरचे की बात करें तो हर 5 साल बाद यह सर्कस जुटता है. बीचबीच में टूटता जाता है. मोरचे की बात करने वाले नेताओं के पास सिर्फ एक एजेंडा है, सत्ता पाना. इस में सब के सब प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं. इस बार 11 दलों को मिला कर बने मोरचे से जयललिता निकल गईं. वामदलों की अगुआई में बने मोरचे की हवा निकल गई. इन क्षत्रपों में से कोई भी 30 से 35 सीटें जीतता हुआ नहीं दिखता. अब तो यह कहा जाने लगा है कि मोरचा चुनाव के बाद बनेगा.
देश में विकास के पुल भ्रष्टाचार के खंभों पर टिके हुए हैं. दागी जनप्रतिनिधियों पर कांग्रेस और भाजपा मौन हैं. एडीआर की मौजूदा रिपोर्ट के अनुसार, इस समय कांग्रेस के 48, भाजपा के 46, शिवसेना के 8, जद-यू के 7, बसपा के 6, सपा के 6, डीएमके के 4, अन्नाद्रमुक के 4, तृणमूल के 3, कांग्रेस के 3, सीपीआई के 3 व अन्य 21 सांसद दागी हैं. इसी तरह विधानसभाओं में 1 हजार से अधिक विधायक अपराधी हैं.
मुद्दे
कोई भी पार्टी यह नहीं कहती कि धर्म के नाम पर अरबों रुपए की जो सब्सिडी दी जा रही है वह बंद कर के शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे जरूरी कामों में खर्च की जानी चाहिए.
एक भी दल लोकतांत्रिक तौरतरीके से संचालित नहीं है. भाजपा की नीतियां और नेतृत्व संघ द्वारा थोपा जाता है. कांग्रेस एक परिवार की छतरी के नीचे खड़ी है. क्षेत्रीय दलों में व्यक्तियों और परिवारों की तानाशाही कायम है. समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, द्रमुक, अन्नाद्रमुक, बीजू जनता दल, राजद, शिवसेना, एनसीपी, तृणमूल कांग्रेस, अकाली दल जैसे दलों में भी कुछ ऐसी ही स्थिति है.
राजनीतिक दलों ने विकास का अर्थ सिर्फ ऊपरी दिखावा मान लिया है. गरीबी, पिछड़ापन, शिक्षा, स्वास्थ्य, छुआछूत, धार्मिक व जातीय भेदभाव, धार्मिक अंधविश्वास, भ्रष्टाचार, नशाखोरी, जुआ, सट्टेबाजी, अकर्मण्यता, धार्मिक कट्टरता, महिलाओं के प्रति पुरातन सोच, पर्यावरण जैसे मुद्दों को ले कर राजनीतिक दलों के पास कोई नीति नहीं है. चुनावों में इन मसलों पर कोई चर्चा ही नहीं होती. राजनीतिक दलों के एजेंडे में ये विषय होते ही नहीं हैं क्योंकि इन्हें अनावश्यक मान लिया गया है.
चुनावों में कोई भी दल संसद में अंधविश्वास उन्मूलन बिल लाने की बात नहीं कर रहा है. धार्मिक व्यापार, धंधेबाजी, ठगी,  झूठी भविष्यवाणियों के प्रचार, कार्यक्रमों पर रोक की मांग नहीं की जा रही. शिक्षा में असमानता, क्वालिटी में सुधार का एजेंडा नहीं है. नशाखोरी रोकने की बातें जनता के बीच चुनावी प्रचार में नहीं कही जा रहीं. स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार नहीं, कन्याभ्रूण हत्या, लैंगिक भेदभाव, समलैंगिक संबंधों में आजादी, सामाजिक अपराधों के पीछे के कारण, धर्म के नाम पर बढ़ती अकर्मण्यता रोकने, पर्यावरण, लाटरी, सट्टा, जुआ जैसे मुद्दों पर हर राजनीतिक दल चुप है.
बुराइयों को बढ़ावा
राजनीतिक दल और सरकारें देश में व्याप्त सामाजिक बुराइयों में कमी लाने की कोशिशें करने के बजाय उन्हें बढ़ावा दे रहे हैं. देश में शराब व अन्य नशों को बंद करने के वादों के बजाय चुनावों में मतदाताओं को शराब बांटी जाती है.
राजनीतिक दलों के पास कोई ठोस और सही शिक्षा नीति नहीं है. शिक्षा के मानदंड आज भी वही हैं जो वर्णव्यवस्था में आधारित थे. गरीबों, दलितों, पिछड़ों के लिए स्कूलों में भेदभाव व्याप्त है. पैसे वालों के लिए शिक्षा है पर केवल बिकाऊ डिगरियां हैं. आंकड़े बताते हैं कि विश्व के टौप शिक्षण संस्थानों की सूची में विश्वगुरु भारत का एक भी विश्वविद्यालय नहीं है. होंगे भी कैसे? हमारी शिक्षा की ऊंची दुकानें केवल लूट कारोबार की स्थली हैं जो अधपढे़, परचूनी व्यापारियों द्वारा चलाई जा रही हैं.
यह ठीक है कि सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आंदोलन चलाना सरकारों का नहीं, सामाजिक संगठनों का काम है पर सामाजिक संगठनों द्वारा उठाए जा रहे मुद्दों पर सरकारें कानून बना कर रोकथाम तो कर सकती हैं. महाराष्ट्र में जादूटोना जैसे अंधविश्वास पर अंधश्रद्धा निर्मूलन संस्था द्वारा वर्षों से आंदोलन चलाया जा रहा है. वहां मांग की जाती रही कि इसे रोकने के लिए कानून बनाया जाए पर हर दल की सरकार ने इस पर अड़ंगेबाजी लगाई. पिछले साल इस संस्था के प्रमुख डा. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या किए जाने के बाद महाराष्ट्र विधानसभा में बिल लाया गया पर अभी तक हत्या करने वालों को पकड़ा नहीं जा सका.
सामाजिक मुद्दों की अनदेखी कर के कोई भी पार्टी तरक्की का दावा नहीं कर सकती. यह काम राजनीतिक दल नहीं कर सकते. ये सामाजिक मुद्दे तो जनता को वोट मांगने के लिए आने वालों के सामने उठाने चाहिए. जो इन पर काम करने को राजी हो, उसे ही चुनना चाहिए.