सरिता विशेष

मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान इन दिनों अपनों से बुरी तरह त्रस्त हैं. सूबे में कोई गैर, यानि कांग्रेस तो कहने भर को रह गई है इसलिए झख मारकर विपक्ष की भूमिका भी भाजपा को ही एक हिस्से को निभाना पड़ रहा है जिसके घोषित नेता पूर्व मुख्य मंत्री बाबूलाल गौर और अघोषित नेता कैलाश विजयवर्गीय हैं .

इन दोनों की अनर्गल बयानबाजी और उल्टी सीधी हरकतों का बुरा असर शिवराज सिंह की सेहत पर पड़ने लगा है. कटनी जिले के कस्बे विजयराघवगढ़ की एक सभा में उन्होंने अपना दर्द यह कहते हुए बयां किया कि वे तो अपनों के फूलों के प्रहार से घायल हैं और सी एम बनने के 11 साल गुजर जाने के बाद भी न तो उनके गाल लाल हुए और न ही पेट निकला. किसी कानून या संविधान में नहीं लिखा है कि मुख्य मंत्री बनने के बाद गाल लाल होना और तोंद निकलना कोई अनिवार्यता है.

इसके बाद भी सच यही है कि ऐसा अक्सर होता है जो उनके साथ नहीं हुआ. तो उन्होंने अपने पिचके गाल और पेट का वास्ता जनता को दे डाला और कभी जरूरत पड़ी तो हनुमान की तरह ह्रदय भी चीर कर दिखा देंगे जिस पर लिखा होगा जनता का सेवक. शिवराज सिंह को हमेशा प्रदेश के विकास की चिंता लगी रहती है और इस बाबत वे हमेशा ही दौड़ते रहते हैं, जाहिर है इसकी कीमत उनके गाल और पेट पिचक कर चुका रहे हैं इसके बाद भी अपने ही उन पर निशाना साधते रहें तो उन पर लानतें ही भेजी जा सकती हैं.

भाजपा और सूबे में शिवराज सिंह की इमेज पहले जैसी नहीं रह गई है. आये दिन उन्हें आर एस एस की मीटिंग में भी सर झुकाकर अपने न किए की सफाई देनी पड़ती है. बेलगाम होती अफसरशाही पर सफाई देनी पड़ती है तो आम लोगों को उनसे उतनी ही हमदर्दी होने लगती है जितनी साल 2003 के पहले दिग्विजय सिंह से होती थी. यानि खासतौर से अंदरूनी हालात कतई अच्छे नहीं हैं इसलिए अब वे जनता की निगाह में लोकप्रिय बने रहने के लिए गाल बजा रहे हैं और जनता बेचारी विकास ढूंढ रही है कि आखिरकार वह हुआ कहां है?