राष्ट्रीय

प्रणव मुखर्जी की गुगली पर सकते में सरकार

राष्ट्रपति पद की मर्यादा और कूटनीति दोनों एक साथ निभाते आखिरकार प्रणव मुखर्जी ने नोट बंदी पर अपनी राय दे ही दी कि इससे गरीबों की परेशानियां बढ़ीं हैं. बयान सरकार से असहमति जताता हो और सरकार का स्पष्ट विरोध भी  न लगे, इस बाबत राष्ट्रपति ने कुछ किन्तु परंतु भी इसमे जोड़े मसलन यह कि वे इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि गरीबों को सशक्त बनाने की कोशिशें हो रही हैं और संभवतः नोटबंदी से लंबे समय में गरीबों का फ़ायदा होगा लेकिन इसमे शक है कि गरीब इतना लंबा इंतजार कर सकते हैं.

देखा जाए तो बहुत कम शब्दों में प्रणव मुखर्जी ने देश भर के राज्यपालों और उप राज्यपालों के सम्मेलन को संबोधित करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फैसले को नादानी करार देते उसके दुष्परिणामों से भी आगाह करा दिया है. बयान से ज्यादा अहम उसके आने का वक्त है. पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की तारीखें घोषित हो चुकी हैं, जिनमे नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और मित्रों वाली शैली दांव पर लगी है. ऐसे में जो काम विपक्ष दो महीने में नहीं कर पाया था, वह राष्ट्रपति ने दो मिनट में कर दिखाया, तो इसे बजाय राजनीति के वित्त, अर्थव्यवस्था और भारतीय जीवन शैली के साथ साथ एक राष्ट्रपति की देश के प्रति संवैधानिक जिम्मेदारियों के नजरिए से देखा जाना ज्यादा प्रासंगिक है.

प्रणव मुखर्जी लंबे वक्त तक वित्त मंत्री भी रहे हैं. इस नाते वे देश की अर्थव्यवस्था से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि एक नगदी प्रधान अर्थव्यवस्था में केश लेस तरीके एक अव्यवहारिक अवधारणा और एक व्यक्ति विशेष की सनक भर हैं. बात चूंकि राष्ट्रपति ने कही है इसलिए सरकार या सत्तारूढ़ दल भाजपा की तरफ से फौरी तौर पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन देर सबेर किसी न किसी रूप में आएगी जरूर.

मोदी भक्त नीम में लिपटी यह चाशनी गटक पाएंगे, इसमें शक है. अब देखना दिलचस्प होगा कि वे क्या रुख अपनाते हैं. चुप रहे तो राष्ट्रपति से सहमत ही माने जाएंगे और ज्यादा कड़वा कुछ बोले तो यह देश के सबसे बड़े संवैधानिक पद की शान मे गुस्ताखी होगी. एक बड़ी दिक्कत मोदी भक्तों के सामने ब्लूमबर्ग न्यूज़ एजेंसी की यह रिपोर्ट भी है कि अब तक 70 फीसदी बड़े अमान्य नोट रिजर्व बैंक के पास वापस आ चुके हैं यानि देश में कालाधन है ही नहीं, क्योंकि 2-3 फीसदी नोट तो चलन के दौरान ही नष्ट हो जाते हैं. इस मुद्दे पर वित्त मंत्री अरुण जेटली की इस मासूमियत पर मर मिटने किसका जी नहीं करेगा कि उन्हे इस बारे में कुछ नहीं मालूम. 

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