सरिता विशेष

लोकसभा में  युवा सांसदों की बढ़ती तादाद ने राजनीति को एक संभावित कैरियर क्षेत्र बना दिया है. इस क्षेत्र में आने के लिए युवाओं को काफी मुश्किलें झेलनी पड़ती हैं. उन्हें सही प्लेटफौर्म नहीं मिल पाता. यदि कहीं कोई आसार दिखते भी हैं तो वहां पहले से ही सीटें भरी हैं. वैसे तो इस के कई कारण हो सकते हैं, पर सब से बड़ा कारण है, वंशवाद, धनी और बाहुबली लोगों का वर्चस्व. भारत दुनिया का सब से बड़ा लोकतांत्रिक देश है. प्रजातंत्र पर टिकी इस की राजनीति आज भी अपने स्वरूप को स्पष्ट नहीं कर पाई है. भारतीय राजनीति पर गौर करें तो पाएंगे कि इस का रास्ता बड़ा कठिन व टेढ़ामेढ़ा है, जो आम लोगों के लिए सुलभ नहीं है. यहां सिर्फ वही चल सकता है, जो धनी व बाहुबली हो, जो धांधलेबाजी व घोटाले करने में  माहिर हो. जो अपनी बात मनवाने के हथकंडे जानता हो, जो रातोंरात मालदार बनने का गुर जानता हो. फास्ट मनी की कला में माहिर हो.

युवा जहां हर क्षेत्र चाहे वह इंजीनियरिंग का हो, मैडिकल या फिर आईटी, हर जगह पूरे जोशखरोश के साथ दिखते हैं. वहीं फास्ट मनी कमाने वाले क्षेत्र राजनीति को नगण्य मानते हैं. एक आम युवा राजनीति में हिस्सेदार नहीं बनना चाहता है. वह राजनीति के पचड़े से कोसों दूर रहना चाहता है. दूसरी तरफ युवाओं में यह धारणा भी बनी है कि भारतीय राजनीति वंशवाद की जंजीरों में जकड़ी हुई है. भारतीय राजनीति में शुरू से ही वंशवाद का बोलबाला रहा है. युवा नेताओं की बात की जाए तो जो युवा आज राजनीति में हैं, उन की पृष्ठभूमि पहले से ही राजनीति से जुड़ी है. उन की राजनीतिक पारिवारिक विरासत की जड़ें बहुत गहरी हैं. फिर चाहे वे जम्मूकश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुला हों, कांगे्रस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी, कांगे्रस के दिवंगत नेता माधवराव सिंधिया के पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया, राजेश पायलट के बेटे सचिन पायलट, शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित, मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश यादव, मिलिंद देवड़ा, कांग्रेस नेता व सिने स्टार सुनील दत्त की पुत्री प्रिया दत्त, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के महासचिव पी ए संगमा की पुत्री अगाथा संगमा, भाजपा की वरिष्ठ नेता व राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के बेटे दुष्यंत सिंह, जसवंत सिंह के बेटे मानवेंद्र सिंह हों, शरद पवार की पुत्री सुप्रिया सुले या दिवंगत संजय गांधी के पुत्र वरुण गांधी, इन सभी युवा नेताओं को राजनीति विरासत में मिली है.

ऐसे में हम अगर बात करें राजनीतिक कैरियर क्षेत्र की तो आम युवाओं को आज भी मशक्कत करनी पड़ती है. यदि देश की राजनीति सुचारु तरीके से पटरी पर लानी है तो युवाओं को देश की राजनीति में मुख्य भूमिका निभानी ही होगी. भारत संभावनाओं का देश है. यहां हर कोई अपना भविष्य संवार सकता है. हम यह कह सकते हैं कि राजनीति और युवा एकदूसरे के पूरक हैं. राजनीति हमें शासन करने की शक्ति प्रदान करती है. राहुल गांधी अकेले नहीं और भी कई प्रतिभाशाली युवा हैं, जो लोक कल्याणकारी व देश के सर्वांगीण विकास के उद्देश्य के तहत एक सुनहरे भविष्य व विकसित भारत की बात कर सकते हैं. 

आज भले ही राजनीति का लाभ कुछ परिवारों तक सिमटा हुआ है, पर फिर भी अगर एक साधारण युवा सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़े तो आम युवाओं के लिए भी रास्ता आसान हो जाएगा. युवाओं में जोश तथा मौलिक सोच होती है. काम करने का जोश भी होता है, लेकिन एक आम युवा के लिए क्या राजनीति में कहीं कोई गुंजाइश है? अगर कोई युवा विकास और परिवर्तन की बात करेगा तो सत्तासीन नेता व प्रमुख राजनीतिक दल उसे ऐसा नहीं करने देंगे, क्योंकि ऐसा करने से उन्हें खुद के लिए खतरा लगता है. अपने स्वार्थ के लिए ये नेता व दल किसी भी हद तक जा सकते हैं. इसलिए यही डर इन युवाओं को सता रहा है.

राजनीति में आगे बढ़ने के लिए युवाओं और महिलाओं को खुद ही अपने में जागृति लानी होगी. हमारे देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा युवा महिलाएं हैं. इन में मौलिक सोच तथा कुछ नया कर दिखाने का हुनर होता है. अगर ये जोशीले युवा राजनीति में नहीं आएंगे तो राजनीति का भविष्य उज्ज्वल नहीं होगा. फिलहाल जो राजनीतिक परिदृश्य दिखाई दे रहा है, उस से ऐसा लगता है कि युवाओं का रुख राजनीति की तरफ कम ही हो रहा है. नीतियों व कार्यक्रमों को लोकलुभावन तो बनाया जा रहा है, लेकिन ये कहां कारगर साबित हो रहे हैं या होंगे, इस पर कुछ कहना जल्दबाजी होगी.

जिस देश की मुख्यधारा राजनीति हो, वहां की उदासीनता देश व राजनीति के लिए अच्छी नहीं है. आज देश को स्वस्थ राजनीति की आवश्यकता है, पर यह सबकुछ तभी संभव है जब हर किसी की सोच कुछ करने के लिए सकारात्मक हो. असंमजस की स्थिति बेहतर परिणाम नहीं देगी.