देश की राजनीति में 2 बड़े दलों का वर्चस्व हमेशा से रहा है. कांग्रेस का जनाधार टूटा तो भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली है. भाजपा और कांग्रेस के विचारों में अंतर हो सकता है पर दोनों ही दलों की नीतियों में कोई बुनियादी अंतर नहीं है. वैसे, 1980 के बाद केंद्र में कांग्रेस और भाजपा की बहुमत की सरकार बहुत कम बार बनी है. लंबे समय तक गठबंधन की सरकारों ने राज किया. कांग्रेस ने यूपीए और भाजपा ने एनडीए जैसे गठबंधन बनाकर सत्ता को अपने हाथों में रखा. कांग्रेस और भाजपा की बुनियादी नीतियों में फर्क न होने के कारण देश के विकास की रफ्तार एकजैसी ही रही है. टैक्स प्रणाली में दोनों दलों की सोच सामने दिखती है. जिन मुददों की, विपक्ष में रहते, भाजपा आलोचना करती थी, सत्ता में आ कर उन का समर्थन करने लगती है. कांग्रेस भी ऐसा ही करती है. 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने देश के वोटरों को जो सपना दिखाया था वह 2 सालों में पूरा होता नहीं दिख रहा है. दरअसल, बहुमत की सरकार बनाने के बाद भी भाजपा कांग्रेस के बनाए रास्ते पर ही चल रही है.

कांग्रेस जिस तरह से प्रदेशों में चल रही सरकारों को कमजोर करती थी वही काम भाजपा कर रही है.  लोकसभा में जिस तरह से भाजपा हंगामा करती थी, उसी तरह से कांग्रेस अब कर रही है. जमीन अधिग्रहण बिल, जीएसटी और एलपीजी जैसे मुद्दों में जनता को दोनों दलों में कोई बुनियादी फर्क नहीं दिखा. शायद यही वजह है कि लोकसभा चुनावों में भाजपा की जो चमक नरेंद्र मोदी की वजह से दिखी, वह गायब हो गई है. लोकसभा चुनावों के बाद 2 सालों के दौरान भाजपा ने कोई बड़ा चुनाव नहीं जीता है. दिल्ली और बिहार में हुए चुनावों में मिली करारी हार ने भाजपा की नीतियों की पोल खोल दी है. उत्तर प्रदेश और पंजाब के विधानसभा चुनावों में भाजपा अपनी जीत को ले कर पूरी तरह से भरोसा करने की हालत में नहीं है. उत्तर प्रदेश में भाजपा लगातार दूसरे दलों में तोड़फोड़ कर उन के लोगों को अपनी पार्टी में ला रही है. पंजाब में यही हालत है. अकाली और भाजपा के गठबंधन को हार का सामना करना पड़ सकता है.

बिखरती दो दलीय राजनीति

यह सच है कि कांग्रेस लाभ उठाने की हालत में नहीं दिख रही है. भाजपा को इस बात का सुख है कि उस ने कांग्रेसमुक्त भारत को काफी हद तक सफल बना लिया है. भाजपा को इस बात का भ्रम है कि केंद्र की राजनीति में कांग्रेस के कमजोर होने से उसे मैदान खाली मिलेगा. असल में जिसे भाजपा अपने लिए वाकओवर समझ रही है वह संकट का कारण है. पूरे देश के राजनीतिक हालात को देखें तो साफ

पता चलता है कि ज्यादातर राज्यों में गैरभाजपा और गैरकांग्रेस दलों का बोलबाला बढ़ गया है. देश के बडे़ हिस्से पर इन छोटे दलों का कब्जा है. ये दल अपना मजबूत जनाधार बना चुके हैं. ऐेसे में भाजपा के सामने अगर कांग्रेस खड़ी नहीं दिखेगी तो ये दल सीनातान कर खड़े दिखेंगे. भाजपा बहुत सारे प्रयास करने के बावजूद इन दलों को कमजोर नहीं कर पा रही है. राजनीति में जो जगह कांग्रेस और भाजपा के हटने से खाली हो रही है, उसे ये दल भर रहे हैं.

गैरभाजपा और गैरकांग्रेस दलों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है. पहले ये दल अलगअलग खडे़ दिखते थे, अब ये एकसाथ दिखने और चलने की कोशिश कर रहे हैं. इन दलों में बिहार में राजद और जदयू, उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा, दिल्ली व पंजाब में आम आदमी पार्टी यानी आप, बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, तमिलनाडु में जयललिता और ओडिशा में नवीन पटनायक, कश्मीर में महबूबा मुफ्ती, उमर अब्दुल्ला जैसे बहुत सारे नेता और उन के दल ऐसे हैं जो गैरभाजपा और गैरकांग्रेस की राजनीति कर रहे हैं. ये दल अब पहले की तरह नहीं हैं. अपनेअपने प्रदेशों में इन्होंने कांग्रेस और भाजपा को मजबूत नहीं होने दिया है. अब केंद्र में इन की महत्त्वपूर्ण भूमिका दिख रही है. जिस तरह से कांग्रेस और भाजपा ने गठबंधन की राजनीति सीखी है उसी तरह से गैरकांग्रेसी, गैरभाजपा दलों ने भी अपने में सुधार किया है. अब मौका मिलने पर वे केंद्र की राजनीति को भी बेहतर तरह से चला सकते हैं. ऐसे में केंद्र की राजनीति में केवल भाजपा और कांग्रेस को ही विकल्प के रूप में न देखें, गैरकांग्रेसी, गैरभाजपा दल भी बेहतर हालत में हैं.  

भाजपा-कांग्रेस की समान सोच  

कांग्रेस और भाजपा की समान सोच और नीतियों का ही परिणाम है कि गैरकांग्रेस और गैरभाजपाई दलों का देश की राजनीति में महत्त्व बढ़ता जा रहा है. राजनीति में जब कट्टरवादी सोच की बात होती है तो सब से पहले भारतीय जनता पार्टी और जनसंघ जैसों के नाम लिए जाते हैं. सही मानो में देखें तो भाजपा से अधिक कट्टरवादी सोच कांग्रेस की रही है. आजादी के बाद सब से पहले हिंदुओं को खुश करने के लिए कांग्रेस ने ही सोमनाथ मंदिर बनवाने का काम किया. कांग्रेस ने राजारजवाड़ों और जमींदारी प्रथा का उन्मूलन करने का दिखावा किया. उस ने समाज में एक नए प्रकार के राजारजवाड़ों व जमींदारों को स्थापित करने का काम किया. हिंदू कोड बिल में सुधार की जरूरतों को लंबे समय तक लटकाने का काम कांग्रेस ने किया. कांग्रेस के बड़े से बडे़ नेता कभी किसी मंदिर तो कभी किसी मजार पर जा कर इस बात को बताते रहे कि राजनीति के लिए धर्म का साथ जरूरी होता है. राजनीति में वे धर्म को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने से भी कभी संकोच नहीं करते थे. इसी तरह से नेता को चुनाव लड़ाने से पहले क्षेत्र के जातीय समीकरण को देखने की शुरुआत भी कांग्रेस के जमाने में ही हुई थी.

धर्म के तराजू के एक पलडे़ में वह कट्टर हिंदू रखती थी तो दूसरे में कट्टर मुसलिमों को रखना चाहती थी. इसी वजह से वह धर्मनिरपेक्ष हो कर काम नहीं कर पा रही थी. इंदिरा गांधी के समय तक जनता इन बातों को ठीक से समझ पाने में असफल थी. उन के बाद राजीव गांधी ने भी जब उसी राह पर चलना चाहा तो कांग्रेस की पोल खुल गई. शाहबानो कांड और उस के बाद अयोध्या में राममंदिर का ताला खुलवाने की घटना ने कांग्रेस की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष छवि को उजागर कर दिया. केवल धर्म ही नहीं, सामाजिक सुधार और रूढि़वादी सोच को खत्म करने की दिशा में कांग्रेस ने हर कदम उठाने से पहले यह देखने की कोशिश की कि इस का धार्मिक प्रभाव क्या पडे़गा? कांग्रेस की इसी परंपरा पर दूसरे दल भी चलने लगे. जिस का नुकसान देश को उठाना पड़ा. 

नएनए विरोधी पैदा करना, फिर उन को दरकिनार करने की रणनीति बना कर कांग्रेस ने लंबे समय तक देश में राज करने का रास्ता निकाला था. जिस से एक बार चुनाव में कांग्रेस ही हार हो भी जाती थी तो जल्द ही उस की वापसी हो जाती थी. ऐसे में देश की राजनीति 2 बडे़ दलों कांग्रेस और भाजपा के बीच फंस कर रह गई. दक्षिण भारत के कुछ राज्यों और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का मुकाबला वामपंथी दलों से था. इन को छोड़ कर देश के बाकी राज्यों में कांग्रेस का एकछत्र राज्य था. उत्तर प्रदेश और बिहार में जहां भाजपा व कांग्रेस सरीखे 2 दलों के मुकाबले तीसरे दल ने घुसपैठ की, वहां ये दोनों ही दल सत्ता हासिल करने को तरस गए. मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, दिल्ली और पंजाब जैसे राज्यों में कांग्रेस व भाजपा ने फ्रैंडली मैच खेल कर सत्ता पर कब्जा बनाए रखा. दिल्ली में पहली बार कांग्रेस व भाजपा के बीच आप पार्टी ने सेंधमारी की है. जिस का संदेश पूरे देश में गया.

बातें नहीं, काम चाहिए

चुनाव परिणामों को देखे तो अंदाजा लगाना कठिन नहीं है कि जनता अब नेताओं को बहानेबाजी करने का मौका नहीं देना चाहती है. लोकसभा चुनाव के दौरान ‘मोदी जी को लाना है’ का नारा खूब चला तो दिल्ली विधानसभा चुनाव के समय ‘पांच साल, केजरीवाल’ का नारा लोगों को पसंद आया. कांग्रेस ने सरकार चलाते समय इस बात का बारबार रोना रोया कि बहुमत से सरकार न चलाने के कारण वह अपनी पसंद का काम नहीं कर पाई, जिस से देश का सही तरह से विकास नहीं हो सका. जनता ने नरेंद्र मोदी की अगुआई में भाजपा को पूरी ताकत से देश चलाने का फैसला दे कर ऐसी बहानेबाजी करने की गुजाइंश को खत्म कर दिया. पिछली बार 49 दिन की सरकार चलाने के बाद केजरीवाल ने भी बहुमत न होने का रोना रोया तो जनता ने उन को भी पूरा बहुमत दे दिया. इस तरह के फैसलों से नेताओं के पास बहानेबाजी की गुंजाइश खत्म हो गई.

ऐसे फैसले देश के दूसरे हिस्सों की जनता भी कर रही है. 2005, 2010 और 2015 में बिहार, 2007 और 2012 में उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और पंजाब, 2008 और 2013 में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़, 2004, 2009 और 2014 में आंध्र प्रदेश, 2014 में तेलंगाना, 2002 से अब तक गुजरात, 2009 और 2014 में ओडिशा, 2011 में तमिलानाडु और पश्चिम बंगाल में जनता ने या तो किसी पार्टी या चुनाव से पहले बने गठबंधन को स्पष्ट बहुमत दे कर सरकार चलाने का मौका दिया. जिस पार्टी ने जनता से किए गए वादों को पूरा नहीं किया उस को अगले चुनाव में पूरी तरह से नकार दिया जाता है. उत्तर प्रदेश में 2007 में पहली

बार बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती को स्पष्ट बहुमत दिया. वह जनता की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी तो 2012 के विधानसभा चुनावों में पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया. इसी तरह से 2012 में समाजवादी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिला जब वह काम करती नहीं दिखी तो 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को केवल

5 सीटों तक सीमित कर दिया.

छोटे चुनावों का बड़ा महत्त्व

पहले राजनीति में लोकसभा और विधानसभा चुनावों का ही महत्त्व समझा जाता था. अब ऐसा नहीं है. अब कौर्पोरेशन के चुनाव से ले कर, ग्राम प्रधान, जिला पंचायत और ब्लौक स्तर के चुनाव भी महत्त्वपूर्ण होने लगे हैं. पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के पंचायती चुनावों में बडे़ दलों ने खुल कर हिस्सा लिया. भले ही ये चुनाव दलों के निशान पर न लडे़ गए हों पर दलों के नेताओं ने अपनेअपने लोगों को चुनाव मैदान में उतारा. जिला पंचायत और ब्लौक प्रमुख चुनावों में सभी दलों की ताकत देखने को मिली. पार्षद चुनावों में जीतहार की समीक्षा करते समय छोटे चुनावों के महत्त्व को सामने रखा जाता है. गुजरात और मध्य प्रदेश के पार्षद चुनावों में भाजपा और कांग्रेस के प्रदर्शन की समीक्षा इस तरह से हुई जैसे वे लोकसभा और विधानसभा के परिणाम हों.  दरअसल, छोटे चुनावों के जरिए नेता निचले स्तर तक वोटर से संपर्क साधने में सफल होते हैं. वोटर यह देखता है कि जो उस के काम आ रहा है उसे ही वोट दिया जाए.ऐसे चुनावों में जीत से छोटे नेताओं का मनोबल बढ़ता है. उन को राजनीति कैसे करनी है, यह समझ आता है और आर्थिक रूप से भी उन की हालत मजबूत होती है. आज के दौर में राजनीति साधारण किस्म से नहीं हो सकती, चुनाव लड़ने के लिए बडे़ बजट की जरूरत होती है. ऐसे में ये चुनाव बहुत काम के होते हैं. इन चुनावों में भी बहुत सारा पैसा मिलने लगा है, जिस की वजह से नेता इन चुनावों को महत्त्व देने लगे हैं. समाज में नेताओं की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है. ऐसे में केवल विधानसभा या लोकसभा चुनावों के भरोसे बैठने से अच्छा है कि छोटे चुनावों में जीत हासिल की जाए. छोटे चुनावों में कम लोगों तक अपनी बात पहुंचानी होती है, जिस से जीत हासिल करना सरल होता है. छोटे दलों के कार्यकर्ताओं और नेताओं को इन चुनावों में ज्यादा सफलता मिल रही है. उस का सब से बड़ा कारण यह है कि छोटे दलों में गुटबाजी कम है. वहां जो बेहतर होता है उसे चुनावी टिकट मिल जाता है.

क्षेत्रीय नेताओं का बढ़ता कद

कांग्रेस और भाजपा जैसे बडे़ दलों में प्रदेश स्तर के नेताओं का कद एक सीमा के अंदर रखा जाता है, जबकि क्षेत्रीय दलों के अगुआ नेताओं का कद अब राष्ट्रीय लैवल पर बड़ा होने लगा है. पहले जहां केंद्र में प्रधानमंत्री पद के लिए गैरभाजपाई और गैरकांग्रेसी दलों के नेताओं की ओर देखा जाता था, वहीं अब क्षेत्रीय दलों के नेता भी अपना मजबूत कद ले कर सामने खडे़ हैं. इन के पास कांग्रेसी और भाजपाई नेताओं से ज्यादा अनुभव भी है. उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और मायावती, बिहार में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव, बंगाल में ममता बनर्जी, तमिलनाडु में जयललिता, ओडिशा के नवीन पटनायक की साख कम नहीं है.

ये लोग अपनेअपने राज्यों में बेहतर काम कर रहे हैं. इन की सफलता ही कही जाएगी कि ये कांग्रेस और भाजपा जैसे बडे़ दलों के मुकाबले बेहतर हालत में खडे़ हैं. पहले यह कहा जाता था कि छोटे दल आपस में सुलह कर के नहीं चल सकते. अब ऐसा नहीं है. बिहार चुनाव में यह दिखा कि भाजपा के खिलाफ एक महागठबंधन तैयार हो गया. अब क्षेत्रीय दल पहले से अधिक सचेत और सतर्क हो गए हैं.

मुलायम सिंह यादव, नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव ने केंद्र में मंत्री रहते अपने काम से अच्छा प्रभाव डाला है. उन के विभागों में बेहतर काम हुआ. ऐसे में इन नेताओं को केंद्र और राज्य दोनों का अनुभव है. और अब इन के नाम पर दूसरे नेताओं में सहमति बनने में कोई परेशानी नहीं आएगी. पहले मुलायम सिंह के प्रधानमंत्री बनने की राह में लालू प्रसाद यादव रोड़ा लगा चुके हैं, अब ऐसा नहीं होगा. इसी तरह से नीतीश कुमार ने बिहार में सरकार चला कर दिखा दिया. अब वे केंद्र में प्रधानमंत्री पद के अच्छे दावेदार माने जा रहे हैं. आम आदमी पार्टी को भले ही राजनीति में लंबा अनुभव नहीं रहा हो पर जिस तरह से ‘आप’ ने मजबूत दिख रही भाजपा और कांग्रेस को दिल्ली में पछाड़ा और पंजाब में टक्कर दे रही है, उस से यह साफ है कि आप वोटर के बीच अपनी जगह बनाने की कोशिश में सफल हो रही है.

प्रदेशों से मिलेगी ताकत

राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और पंजाब जैसे प्रदेशों में भाजपा की सरकारें हैं. लंबे समय से राज करने के बाद भी इन प्रदेशों में विकास की गति दूसरे प्रदेशों की तरह ही है. लोकसभा चुनाव में गुजरात मौडल का बहुत प्रचार हुआ. चुनावी शोर के बाद असल तसवीर सामने आई तो पता चला कि गुजरात में भी गरीबी है. वहां भी गैरबराबरी के लोगों में जातीय लड़ाई है. गुजरात के ऊना में जिस तरह से दलितों की पिटाई हुई, वैसी घटनाएं उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे प्रदेशों तक में नहीं सुनी गईं. मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के सुशासन की नींव हिल चुकी है. व्यापमं घोटाला किसी परिचय का मुहताज नहीं है. यही मामला उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे गैरभाजपा शासित राज्यों में होता तो उन का भरपूर दुष्प्रचार किया जाता.

केंद्र में राज कर रही भाजपा मध्य प्रदेश, गुजरात और पंजाब में पहले जैसी सफलता हासिल नहीं कर पाएगी. जिस से केंद्र सरकार दबाव में आएगी. उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए सब से बड़ी चुनौती है. यहां भाजपा की खराब हालत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां वह अपने मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी का नाम तक सामने लाने से बच रही है. भाजपा के कमजोर होने का लाभ कांग्रेस को मिलता नहीं दिख रहा है. बहुत सारे प्रयासों के बाद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की हालत में सुधार होता नहीं दिख रहा है. जिस तरह से बिहार में नीतीश कुमार ने अपनी वापसी की, उसी तरह से उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव मजबूत दिखाई दे रहे हैं. अगर उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार की वापसी होती है तो भाजपा को सब से करारा झटका लगेगा. उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों से दिल्ली का रास्ता दिखेगा. यही वजह है कि नीतीश कुमार खुद भी उत्तर प्रदेश में काफी सक्रिय दिख रहे हैं. 5 माह के अंदर वे उत्तर प्रदेश में 5 बार सम्मेलन कर खुद को ब्रैंड बनाने की कोशिश में है.