‘भेडि़या आया भेडि़या आया’ कह कर गांव के बाहर रहने वाला एक गड़रिया रोज शोर मचाता था.  इस बहाने वह यह देखना चाहता था कि गांव के लोग उस के कितने मददगार साबित होते हैं. उस की चीखपुकार सुन कर गांव वाले दौड़ कर उस के घर पर आ जुटते थे. वहां आ कर उन को पता चलता कि भेडि़या तो आया नहीं. ऐसा कई बार हो चुका था. एक दिन सच में भेडि़या आ गया. गड़रिया फिर से चिल्लाया. गांव वालों ने उस की चीखपुकार सुनी, उन को लगा कि हर बार की तरह वह लोगोें को परेशान कर रहा होगा. कोई गांव वाला उस की मदद को आगे नहीं आया. भेडि़या उस की सारी भेड़ें खा गया. अब उस को अफसोस हो रहा था कि अगर वह रोज  झूठ नहीं बोलता तो गांव के लोग उस की बात को सच मान कर भेडि़या आने पर उस की मदद के लिए आ जुटते.

गांव वाले की यह कहानी राजनीतिक दलों पर फिट बैठती है. 20 साल से ज्यादा समय से राजनीतिक दल अपने मतदाताओं को यह कह कर बरगलाते रहते थे कि अगर वे एकजुट नहीं रहेंगे तो विरोधी दल सत्ता में आ जाएगा. जनता अपनी जाति और बिरादरी के सम्मान के लिए आ जुटती थी. सत्ता पा कर ये दल अपनी बिरादरी को भूल कर कुरसी का मजा लेते थे. 1989 के बाद से 2014 तक राजनीतिक दलों की यह जुगत कारगर होती रही. 16वीं लोकसभा के चुनावों में जनता ने ऐसे दलों की बातों पर भरोसा नहीं किया. नतीजतन, वे हाशिए पर आ गए. उत्तर प्रदेश,  झारखंड और बिहार की 140 सीटों में से विरोधी दलों के हिस्से में 17 सीटें ही आ सकीं. विरोधी दलों को उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से 7, बिहार की 40 में से 9 और  झारखंड की 14 में से 1 सीट मिली. 

ऐसे में उत्तर प्रदेश, बिहार और  झारखंड में जाति की राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल युनाइटेड, राष्ट्रीय लोकदल और  झारखंड मुक्ति मोरचा के गिरते जनाधार पर सवाल उठने स्वाभाविक हैं. राजनीतिक स्तंभकार योगेश श्रीवास्तव कहते हैं, ‘‘जिन नीतियों को ले कर ये दल गैरकांग्रेस और गैर भाजपा की बातें कर रहे थे वे अब प्रभावी नहीं रह गई हैं. ऐसे में इन का स्वाभाविक दलित, पिछड़ा, गरीब और किसान वर्ग अपने को छला महसूस करने लगा है.  चुनाव से पहले आपस में लड़ाई और चुनाव के बाद आपसी तालमेल से सरकार बनाने की इन की प्रस्तावित मुहिम को जनता ने सही नहीं माना. जनता सम झ चुकी थी कि यह तालमेल केवल कुरसी के लिए होता है. उस के हित के लिए नहीं. ये दल अपने वोटबैंक का भरोसा खो चुके थे. यही वजह है कि लोकसभा चुनाव में वे हाशिए पर पहुंच गए.’’     

परिवारवाद में सिमटा समाजवाद

लोकसभा चुनावों के नतीजे उत्तर प्रदेश में सपा के लिए सब से निराशाजनक रहे हैं. वह केवल 5 सीटें जीत पाई. उन में से 2 सीटें आजमगढ़ और मैनपुरी की सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने जीतीं. कन्नौज से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव ने जीत हासिल की तो बदायूं से मुलायम सिंह के भतीजे धर्मेंद्र यादव और फिरोजाबाद से अक्षय यादव को विजयश्री हासिल हुई.

कुल मिला कर देखें तो पूरी पार्टी परिवार में ही सिमट कर रह गई. लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद पार्टी ने जब हार की समीक्षा करनी शुरू की तो असल मुद्दों से हट कर केवल समीक्षा का दिखावा करती रही. पार्टी में 3 प्रमुख पदों में से 1 मुलायम सिंह यादव और 2 अखिलेश यादव के पास हैं. मुलायम सिंह यादव पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. अखिलेश यादव पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं.

चुनावी हार की समीक्षा करते हुए अखिलेश यादव ने कहा, ‘‘हम ने बहुत काम किया लेकिन अपने काम को सही ढंग से जनता तक पहुंचा नहीं पाए. अपने काम को वोट और समर्थन में बदल नहीं पाए.’’ हार से बौखलाई सपा सरकार ने सब से पहले 36 दरजाप्राप्त मंत्रियों को पदों से हटा दिया. आगे भी ऐसे दिखावे वाले कदम उठाए जा सकते हैं. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपने कामकाज का सही आकलन जब तक नहीं करेंगे तब तक सुधार की शुरुआत नहीं हो सकती. 

समाजवादी पार्टी का उदय भले ही 1990 में हुआ हो पर इस के संस्थापक मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक विचारधारा सोशलिस्ट और समाजवादी थी. इन विचारधाराओं के जनक के रूप में जयप्रकाश नारायण, डा. राममनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव और चौधरी चरण सिंह का प्रभाव मुलायम के जीवन पर पड़ा था. 

सोशलिस्ट पार्टी की विचारधारा में धर्म के कट्टरवाद को सही नहीं माना गया था. इसी वजह से ये लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा के खिलाफ थे. संघ का समर्थन करने वाला जनसंघ भी इन के लिए कांग्रेस जैसी ही दूरी रखता था. राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण ने जो सामाजिक सुधार की मुहिम चलाई वह कुछ दिनों में ही कांग्रेस विरोध की राजनीति में बदल गई. खासतौर पर यह विरोध कांग्रेसी नेता इंदिरा गांधी के खिलाफ था. 1975 में इमरजैंसी के दौरान इस गठजोड़ का असर दिखा. इंदिरा गांधी सत्ता से बाहर हो गईं. सामाजिक और जातीय आंदोलन करने वाली सोशलिस्ट पार्टी राजनीतिक बदलाव की हिमायती हो गई. इस कारण 1977 में गैरकांग्रेसी दलों का या जनता पार्टी में विलय हो गए. अलगअलग विचारधाराओं का यह गठबंधन  2 साल में ही बिखर गया.

चौधरी चरण सिंह के लोकदल के सहारे मुलायम सिंह यादव ने अपनी राजनीति शुरू की. विश्वनाथ प्रताप सिंह के जनता दल के प्रयोग के बाद मुलायम ने अपनी समाजवादी पार्टी बनाई. उस समय उन की नीतियां आडंबर, धार्मिक कट्टरता के खिलाफ थीं. वोट की राजनीतिमें फंस कर बाद में मुलायम सिंह यादव को ‘मुल्ला मुलायम’ भी कहा जाने लगा. वे अपनी नीतियों से सम झौता करने लगे.

समाजवाद का जन्म देश को नेहरूगांधी खानदान से छुटकारा दिलाने के लिए हुआ था. कुछ ही दिनों में बिहार के लालू प्रसाद यादव से ले कर मुलायम सिंह यादव तक बदल गए. समाजवाद इन के परिवारवाद में बदल गया. मुलायम सिंह यादव पूजापाठ, धार्मिक आडंबर जैसे पाखंड में जुट गए. ऐसे में उन के एजेंडे से पिछड़े, मजदूर और किसान बाहर हो गए. चुनाव के समय जब समाजवादी पार्टी का घोषणापत्र बनता है तो इन बातों को दिखावे के लिए उस में शामिल किया जाता है. सही माने में सपा ने इन के जीवनस्तर को सुधारने के लिए कोई योजना नहीं बनाई.

1989 के बाद से 2014 तक मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज रहे और वर्तमान में सत्ता उन्हीं के हाथों में है भी. इस दौरान गांवों में रहने वाले मजदूर, किसान और पिछड़ों का कोई भला नहीं हुआ. मुसलिमों को हिंदू कट्टरवादी ताकतों से बचाने की लड़ाई लड़ने वाले मुलायम सिंह यादव खुद भी पूजापाठ और धार्मिक अनुष्ठानों जैसे पाखंड करने लगे. जबकि एक समय समाजवादी और सोशलिस्ट विचारधारा इस का विरोध करती थी. अब मुलायम सिंह यादव खुद हाथ में कलावा पहन कर, माथे पर तिलक लगा कर इस में शामिल होने लगे. ऐसे में पिछड़ी जातियों की एक बड़ी आबादी भी इस में शामिल हो गई जिस से मुलायम का अपना मूल जनाधार कमजोर पड़ा.

लोकसभा चुनावों में बड़ी संख्या में पिछड़ी जातियां मुलायम को छोड़ तिलकधारियों के पीछे चली गईं.  आज के समय में जितना बड़ा और चटकदार तिलक हिंदुत्व की अगुआई करने वाले नेता नहीं लगाते हैं उस से बड़ा और चटकदार तिलक समाजवादी पार्टी के नेता लगाने लगे हैं. ऐसे नेता जानते हैं कि जब पार्टी के मुखिया को ऐसे पाखंड से कोई आपत्ति नहीं है तो वे पीछे क्यों रहें?

मुलायम बनाम अखिलेश

साल 2003 में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी. मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे.  सरकार चलाने में सपा को पूर्ण बहुमत हासिल नहीं था. इस के बाद भी जब 2004 के लोकसभा चुनाव हुए तो सपा को लोकसभा की 36 सीटें मिली थीं. उस समय सत्ताविरोधी वोटों का असर पार्टी पर नहीं पड़ा. सवाल उठता है कि सत्ता विरोधी वोटों का असर केवल अखिलेश यादव की सरकार पर ही क्यों पड़ा?

2014 के लोकसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, तमिलनाडु में जयललिता और ओडिशा में नवीन पटनायक अपनी साख बचाने में सफल कैसे रहे? ये दल अभी भी अपनी नीतियों और विचारधारा से जुडे़ हुए हैं. वे जनता के करीब हैं. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और सपा प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव अपनी सरकार की जिन उपलब्धियों पर नाज कर रहे हैं वे जनता को उतना प्रभावित नहीं कर पाईं जितना ममता बनर्जी, जे जयललिता और नवीन पटनायक की नीतियों ने किया.

मुलायम सिंह यादव जब खुद मुख्यमंत्री थे तो वे काफी हद तक जनता के बीच एक सा व्यवहार करते थे. वे जो कहते थे, करते थे. अखिलेश यादव ने अपनी योजनाओं को पूरा करने में भेदभाव किया. मुलायम सिंह यादव के समय बेरोजगारी भत्ता 500 रुपए ही भले था पर सब को दिया गया था. अखिलेश यादव ने बेरोजगारी भत्ते की रकम बढ़ा कर 1 हजार रुपए कर दी पर गिनेचुने लोगों को दिया. कन्या विद्या धन योजना के साथ भी यही हाल है. अखिलेश यादव की सब से महत्त्वाकांक्षी लैपटौप और टैबलेट वितरण योजना पूरी तरह से शुरू ही नहीं हो पाई. उस की सफलता का इतना प्रचारप्रसार किया गया कि वह उलटा प्रभाव डालने लगी.  

केवल यही नहीं, बाकी सरकारी योजनाओं का सही तरह से लाभ उचित लोगों तक नहीं पहुंचा जिस की वजह से सपा सरकार को इस हार का मुंह देखना पड़ा. अखिलेश सरकार के मंत्री, अफसर सभी जनता से दूरी बना चुके थे. खुद मुख्यमंत्री का जनतादर्शन कार्यक्रम जोरशोर से कुछ दिन चला, बाद में वह भी बंद हो गया. थाना दिवस, तहसील दिवस दिखावा बन कर रह गए. वहां लोगोें को निराशा मिलने लगी.

सच से दूर हुए मुख्यमंत्री

अखिलेश यादव जब मुख्यमंत्री बने थे तो लोगों को लगा था कि वे कोई ऐसा सिस्टम बनाएंगे जिस से आम लोगों के संदेश उन तक पहुंच सकें. दिखावे के लिए कई फेसबुक अकाउंट बने. यहां भी लोगों ने अपनी बात कहने की कोशिश की पर मुख्यमंत्री तक उन की बात पहुंच नहीं सकी क्योंकि मुख्यमंत्री के आसपास ऐसे लोग घेरा बनाने में सफल रहे जो हर काम में केवल तारीफ ही करते थे. सूचना विभाग से ले कर पार्टी के मीडिया विभाग तक ऐसे लोगों की लाइन लगी रही जो अपने काम के लिए सरकार की वाहवाही करते रहे. ऐसे में मुख्यमंत्री  सच से दूर होते चले गए. मुलायम सिंह यादव जब मुख्यमंत्री थे, मीडिया के लाड़ले थे. इस के बाद भी वे सच बोलने वाले और  झूठी तारीफ करने वाले के बीच के फर्क को सम झ लेते थे.

पूरक बनने की रणनीति

समाजवादी पार्टी का जन्म और भारतीय जनता पार्टी का उत्थान करीबकरीब एकसाथ ही शुरू हुआ. गैरसांप्रदायिक  और सांप्रदायिक वोटों के ध्रुवीकरण पर दोनों ही दलों का उत्थानपतन होता रहा. सपा को लगने लगा कि जबजब भाजपा मजबूत होगी वह खुद भी ताकतवर होती जाएगी. सपा का गणित तब तक सही था जब तक आधे से अधिक वोटर मतदान करने नहीं जाते थे. ऐसे में हर तरह के समीकरण का प्रयोग करना सरल होता था. जब आधे से अधिक वोटर मतदान करने पहुंचने लगे तो इस तरह के समीकरण टूटने लगे. जैसेजैसे मतदान बढे़गा, राजनीति में अपराधीकरण जैसे तत्त्व खत्म होते जाएंगे. समीकरणों की राजनीति हाशिए पर पहुंच जाएगी. ऐसे में जरूरी होगा कि सभी को ध्यान में रख कर विकास की योजनाएं बनें. 

वर्ष 2012 के विधानसभा चुनावों में अखिलेश यादव की जीत के पीछे 2 वजहें थीं. पहली, मायावती सरकार के भ्रष्टाचार और उस का जनता से दूर हो जाना. दूसरी, अखिलेश यादव के रूप में उम्मीद की नई रोशनी का दिखना. अखिलेश 2017 में पुरानी ऊंचाइयों को फिर से छू सकते हैं बशर्ते वे अपने आसपास बने वाहवाही चक्र को तोड़ कर बाहर आ सकें. 

योगेश श्रीवास्तव कहते हैं, ‘‘राजनीति में विचारधारा का अपना खास महत्त्व होता है. राजनीतिक  विचारधारा से पता चलता है कि सरकार बनाने के बाद दल किस तरह से काम करेंगे. चमचमाते, शहर, बडे़बडे़ मौल्स, ऐक्सप्रैस हाईवे जैसे विकास का प्रभाव गांव के गरीब, किसान पर कम ही पड़ता है. वोट के लिए दलों ने जिस तरह से अपनी विचारधारा से सम झौता करना शुरू किया उस से जनाधार कमजोर हुआ.’’

बसपा बनी मनुवाद की पिछलग्गू

बसपा नेता मायावती इन चुनावों में ज्यादा से ज्यादा सीटें जीत कर किंगमेकर की भूमिका निभाना चाहती थीं. चुनाव परिणाम आने के पहले उन्होंने घोषणा भी कर दी कि वे भाजपा को समर्थन नहीं देंगी. जब चुनाव परिणाम आए तो उन्हें सब से करारा  झटका लगा. देश में बसपा को एक भी सीट नहीं मिली. इसे मायावती की सब से करारी हार के रूप में देखा जा रहा है. मायावती इस के लिए मुसलिम और अपने दूसरे वोटबैंक को दोष दे रही हैं. बसपा को इस चुनाव में 19 फीसदी के करीब वोट मिले. उस से कम वोट पा कर कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 2 सीटें मिल गईं. मायावती कहती हैं कि उन का दलित वोटबैंक उन के साथ एकजुट है. 

राजनीतिक जानकार इसे सही नहीं मानते. वे मानते हैं कि बसपा क ो जो वोट मिला है उस में दलित, पिछड़ा, मुसलिम और अगड़ी जातियां शामिल हैं. ऐसा नहीं हो सकता कि 2007 के विधानसभा और 2009 के लोकसभा चुनावों में जो जातियां बसपा के साथ रही हों वे पूरी तौर से बसपा से दूर हो जाएं. सचाई यह है कि दलितों में एक बड़ा वर्ग अपने को अगड़ी जातियों सा महसूस करने लगा है. उस ने जब देखा कि बसपा अपनी विचारधारा से भटक रही है तो वह क्यों बसपा से जुड़ा रहे. सो, उस वर्ग ने बसपा से दूरी अख्तियार कर भाजपा को वोट दे दिया.

मूर्तिपूजा को दी पहचान

बसपा को उत्तर प्रदेश में जो सत्ता मिली थी उस के पीछे केवल मायावती का चमत्कार नहीं था. सदियों से दलितों के विकास के लिए जो आंदोलन चल रहे थे उन के कारण दलित जागरूक हुआ था. तब ‘तिलक, तराजू और तलवार’ का नारा दलित जागरूकता का प्रतीक होता था. वोट की राजनीति ने इस विचारधारा को बदल कर ‘हाथी नहीं गणेश है ब्रह्मा विष्णु महेश है’ कर दिया. इस का नुकसान इस चुनाव में बसपा के सामने आ गया. 1995 से 2012 तक करीब 8 साल मायावती उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री रहीं. 2007 से 2012 तक तो वे बहुमत से सरकार चला रही थीं. इस के बाद भी उन्होंने दलितों के रहनसहन और विकास के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए.

आज प्रदेश में जनता को मायावती के काम के रूप में लखनऊ व नोएडा में बने पार्क, उन में लगी मूर्तियां ही दिखाई देती हैं. थोड़ाबहुत काम यमुना ऐक्सप्रैस वे के रूप में दिखता है. दलित के लिए मायावती ने सत्ता में रहते कोई काम नहीं किया. गांव में रहने वाले गरीब दलित की जरूरत थी कि उस के लिए छोटे पक्के मकान बनते जहां वह धूप, धूल और बरसात से अपनी सुरक्षा कर सकता. कांशीराम आवास योजना के तहत मायावती ने जो मकान बनाए भी वे गरीब दलित की पहुंच से बहुत दूर थे. इन मकानों पर उन दलित लोगों ने कब्जा किया जो शहर में रहते थे, जिन के पास मकान को पाने के लिए, खर्च करने के लिए पैसा था. ऐक्सप्रैस वे बन जाने से दलितों को क्या लाभ मिला? यह सोचने की फुरसत मायावती को नहीं थी. जिन दलितों में जागरूकता आई वे खुद मनुवादी बन कर अगड़ों में शामिल होने लगे. अगर मायावती ने विकास के साथ ही साथ अपनी विचारधारा का खयाल रखा होता तो बसपा कोे इस तरह की चुनावी हार का मुंह नहीं देखना पड़ता.

मनुवाद के साथ जुड़ कर मायावती ने खुद बहुत ज्यादा पूजापाठ भले न किया हो पर धार्मिक पाखंडों से उन को एतराज भी नहीं था. उन की सभाओं में शंख बजाते लोग देखे जा सकते हैं. बड़ी संख्या में मायावती को धार्मिक प्रतीक मिलने लगे हैं. वे भले ही हिंदू देवीदेवताओं की मूर्तियों को न रखती हों पर जिस तरह से पार्कों और स्मारकों में मूर्तियों को रखा गया उस से साफ लगने लगा कि पाखंड में वे कांग्रेसी या भाजपाई नेताओं से अलग नहीं हैं. मनुवाद की पिछलग्गू बनने से न केवल बसपा और मायावती को नुकसान हुआ बल्कि दलितों को जागरूक कर रहे लोगों की चाल भी धीमी पड़ गई.

रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘अब दलित अपने को दलित कहलाने में शर्म महसूस करता है. वह समाज में अपनी पहचान बदलने के लिए छटपटा रहा है. जब बसपा में मनुवाद का कब्जा नहीं था तबतक यहीदलित अपने स्वाभिमान के लिए मनुवादी नहीं बनना चाहता था. उसे मनुवाद गाली लगती थी. बसपा की सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर जिस तरह से ब्राह्मणवाद का बसपा पर कब्जा हुआ उस से दलित उस स्वाभिमान को भूल कर खुद ब्राह्मण बनने की राह पर चल पड़ा है. अब उस में बसपा और भाजपा का भेद खत्म हो रहा है. ऐसे में बसपा को राजनीतिक नुकसान होना लाजिमी है. मनुवाद का मतलब केवल जातिबिरादरी से नहीं था, मनुवाद वह विचारधारा थी जो समाज को जाति, बिरादरी, छुआछूत और पाखंड के नाम पर बांटने का काम करती थी. धार्मिक पाखंड इस का बड़ा हथियार था. परेशानी की बात यह है कि जो दलित राजनीतिक रूप से इतना जागरूक दिखता था वह अंदर से पूरी तरह से खोखला निकला. आज भी समाज में सामाजिक आंदोलनों की जरूरत है जिस से लोगों को पाखंड से दूर रखा जा सके. विकास का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि सहीगलत की सम झ भूल कर दूसरों के पीछे दौड़ लगाई जाए.’’

लालू, नीतीश की दोस्ती

लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के बाद बिहार में दलितपिछड़ों की अगुआई करने वाले दलों को जोरदार  झटका लगा. बिहार में सब से ज्यादा सीटें जीतने वाली भाजपा का मुख्य आधार अगड़ी जातियां थीं. वे तादाद में इतनी नहीं थीं कि भाजपा को ऐसी जीत मिल सकती. ऐसे में दलित और पिछड़ों ने भी बड़ी संख्या में भाजपा को वोट दिया. बिहार में राष्ट्रीय जनता दल यानी राजद और जनता दल युनाइटेड यानी जदयू सब से बडे़ दल के रूप में काम कर रहे हैं. जदयू के नीतीश कुमार लोकसभा चुनाव तक बिहार के मुख्यमंत्री हुआ करते थे. लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद जदयू और राजद में दोस्ती हो गई है. राजद ने जदयू की सरकार को बिहार विधान सभा में अपना समर्थन दे कर मजबूत कर दिया है. बिहार के जातीय समीकरण को ठीक करने के लिए जदयू ने महादलित बिरादरी के जीतन राम मां झी को बिहार का नया मुख्यमंत्री बना दिया है. नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है.

इस दोस्ती से तत्काल बिहार में भाजपा के बढ़ते प्रभाव को रोकना संभव हो गया है. अब भाजपा बिहार विधानसभा को भंग नहीं करवा सकती. ऐसे में जदयू की सरकार बनी रहेगी. दूसरा लाभ यह होगा कि राज्यसभा की 3 सीटों के लिए होने वाले उपचुनाव में जदयू और राजद को लाभ हो सकता है. राज्यसभा की 3 सीटें राजीव प्रताप रूड़ी, रामविलास पासवान और रामकृपाल यादव के सांसद बनने से खाली हो रही हैं. लालू प्रसाद यादव इस दोस्ती का नया रोडमैप दिखाते कहते हैं, ‘‘मंडल वालों पर हमला हो रहा है. ऐसे में एकजुटता समय की जरूरत है. हमारा सांप्रदायिक शक्तियों के खिलाफ संघर्ष जारी रहेगा.’’

नीतीश कुमार ने दलितों को कमजोर करने के लिए दलित और महादलित की अलग बिरादरी बना दी. जिन जीतन राम मां झी को बिहार का नया मुख्यमंत्री बनाया गया है वे इसी महादलित समुदाय से आते हैं. इस बहाने पिछड़ी और दलित जातियों का नया समीकरण बनाने की कोशिश की गई है ताकि सक्षम जातियों को बिहार की सत्ता से दूर रखने में सफलता हासिल की जा सके. अगर सही माने में बिहार में मंडल का विरोध करने वालों को माकूल जवाब देना है तो लालू और नीतीश को पिछड़ों और दलितों को धार्मिक पाखंड से दूर रखना होगा. अगर इन के मन में मनुवादी सोच का जन्म हो गया तो नीतीश और लालू का वही हाल होगा जो उत्तर प्रदेश में मुलायम और मायावती का हुआ है.

बिहार की राजनीति में दलितों पर पकड़ रखने वाली लोक जनशक्ति पार्टी का अपना अलग स्थान है. इस के नेता रामविलास पासवान लालू और भाजपा दोनों से तालमेल कर राजनीति करने के लिए मशहूर रहे हैं. लोकसभा चुनावों में वे भाजपा के साथ रहे.

भाजपा के साथ जा कर रामविलास पासवान को फौरीतौर पर सफलता जरूर मिल गई है पर दलित जब तक मनुवादी पाखंड से दूर रहेगा तब तक अपनी पुरानी विचारधारा से जुड़ा रहेगा. जैसे ही वह मनुवादी पाखंड का हिस्सा बनेगा वैसे ही वह मंडल का विरोध करने वालों के करीब खड़ा नजर आने लगेगा. समाजवादी और सोशलिस्ट विचारधारा व पाखंड एकसाथ नहीं चल सकता. वहीं, राजनीतिक जानकार कहते हैं कि धार्मिक कहानियों में पाखंड को इतना बढ़ाचढ़ा कर प्रस्तुत किया जाता है कि इन की बुराई आसानी से सम झ में नहीं आती है. मंदिरों में अगर दलितों को पूजा करने का अधिकार मिल गया है तो इस से उन को नुकसान ही हुआ है. जिस तरह से पाखंड में फंस कर अब तक अगडे़ चढ़ावा चढ़ाते थे, अब दलितपिछडे़ भी चढ़ावा चढ़ाने में उन से मुकाबला करने लगे हैं.

लालू प्रसाद यादव जिस मंडल की बात कर रहे हैं उस का इशारा अगड़ी जातियों को सत्ता में आने से रोकने का है. कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों की मूल नीतियां समान ही हैं. जो कुछ अंतर शुरू में था वह भी अब खत्म सा हो गया है. ऐसे में विचारधारा के आधार पर बने दलों को अपनी पूंजी संभाल कर रखनी पडे़गी

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