सरिता विशेष

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भाजपा सांसदो से कहा कि वे अपने नाते-रिश्तेदारों को टिकट दिलाने की पैरवी न करें. प्रधानमंत्री की यह बात बताती है कि भाजपा सांसदों के बेटे, बेटियों, पत्नी, भाई और भतीजों को उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं मिलेंगे. प्रधानमंत्री की इस बात में कितना दम है यह तो भाजपा के प्रत्याशियों की लिस्ट देखने के बाद ही पता चलेगा. प्रधानमंत्री की इस बात के बाद भाजपा के लिये मुश्किल भरा समय आ गया है.

भाजपा के दर्जन भर नेता ही नहीं दल बदल कर आये नेता भी अपने करीबी लोगों को टिकट दिलाने के भरोसे के बाद ही पार्टी में आये थे. अब ये लोग बेचैन हैं कि उनका क्या होगा?

भाजपा के लिये मुश्किल है कि वह अपने प्रधानमंत्री के बयान की लाज रखे या उसे चुनावी जुमला समझ कर भुला दे. अगर भाजपा ने अपने प्रधानमंत्री के बयान की लाज रखी तो बहुत सारे नेता नाराज होकर पार्टी के साथ भीतर घात कर सकते है. अगर प्रधानमंत्री के बयान के बाद भी परिवार के लोगों को टिकट दिया तो उनका अपमान होगा. भाजपा को इस बात का इल्म है. भाजपा के प्रदेश प्रभारी ओम प्रकाश माथुर, प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्य, महामंत्री संगठन सुनील बंसल को सांसदों के साथ तालमेल बैठाने को कहा गया है.

असल में भाजपा के कई सांसद अपने करीबी लोगों को विधानसभा चुनाव में टिकट दिलाने की पैरवी कर रहे हैं. इन सांसदों में कुछ अपनी जाति के नाम पर तो कुछ अपने रसूख के नाम पर हक मांग रहे हैं. भाजपा में पहले भी ऐसा होता आया है. पार्टी में कई नेता अपने परिवार के लोगों को टिकट दिलाते रहे हैं. ऐसे नेताओं की लिस्ट लंबी है. भाजपा भले ही दूसरी पार्टियों में परिवारवाद का विरोध करती रही हो पर अपने यहां भी वह इसी राह पर चलती रही है.

विधानसभा चुनाव के पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भाजपा सांसदों से अपने करीबियों को टिकट दिलाने की सिफारिश करने से मना कर दिया तो सभी असंतोष में हैं. भाजपा के कई सांसद अपने करीबियों के लिये टिकट चाह रहे थे. इनके लिये असमंजस के हालात बन गये हैं. अब भाजपा के लिये यह मुद्दा साख से जुड़ गया है. एक तरफ मोदी की आदेश है तो दूसरी ओर सांसद की इच्छा है. इसके बीच से रास्ता निकालना सरल नहीं है.

राजनीतिक समीक्षक और पत्रकार नागेन्द्र बहादुर सिंह चैहान कहते हैं ‘परिवारवाद हर दल में कायम है. भाजपा हमेशा से खुद को इससे अलग मानती रही है. इसके बाद भी पार्टी में धीरे-धीरे परिवारवाद बढ़ता जा रहा है. प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे को मधुमक्खी के छत्ते सा छेड़ कर असंतोष भड़का दिया है. इसके साथ ही साथ बाहरी नेताओं के आने से भाजपा के लोगों में असंतोष है. टिकट वितरण के साथ यह असंतोष सामने आयेगा. इसको संभालना भाजपा के लिये सरल नहीं होगा. अगर यह लोग अभी कुछ न भी कहे तो चुनाव में भीतरघात तो कर ही सकते है. यह चुनौती भाजपा के लिये सरल नहीं है.’