लोग बाबू राव स्टाइल का मसखरा ही न समझते रहें इसके लिए अभिनेता और सांसद परेश रावल को जरूरी लगने था कि वे भी ऐसी कोई बात कहें जो बुद्धिजीवियों जैसी लगती हो. इससे भी आसान रास्ता उन्हें यह लगा कि बेहतर और शॉर्ट कट तो यह है कि किसी बुद्धिजीवी की आलोचना कर दी जाये. इससे मीडिया इस बात का प्रचार प्रसार कर देगा कि परेश रावल भी मुख्य धारा से जुड़े हुये हैं.

बिना किसी शोध या खोजबीन के उन्हें बुकर पुरुस्कार विजेता लेखिका अरुंधति राय की याद हो आईं जिन्होंने कश्मीर में पत्थरबाजों को जीप के आगे बांधकर भ्रमण कराने पर एतराज दर्ज कराया था. बस इस पर परेश रावल ने ट्वीट कर दिया कि अब आर्मी जीप में अरुंधति रॉय को बांधना चाहिए. इस ट्वीट को उम्मीद से भी ज्यादा रेस्पोंस मिला, तो वे धन्य हो उठे, इतनी प्रतिक्रिया तो बाबू राव और डाक्टर घुंघरू वाले किरदार निभाने पर तो दूर कभी मिस इंडिया रहीं अभिनेत्री स्वरूप सम्पत से शादी करने पर भी नहीं मिली थी. ट्वीट पर जो प्रतिक्रियाएँ मिलीं वे जाहिर है कथित गंवार, देहातियों की नहीं, बल्कि उस बुद्धिजीवी वर्ग की ही थीं जिसके बीच पहचान और पैठ बनाने परेश रावल बेताब थे.

पर असल मुद्दा या मन की बात कुछ और है कि अरुंधति की विचारधारा कुछ कुछ माओवादियों से मिलती जुलती है, एक हद तक वे सशत्र हिंसा की सशर्त हिमायती हैं और भगवावाद की विरोधी भी हैं इसलिए पौराणिकवादियों की आंख की किरकिरी भी बनी रहती हैं. अरुंधति राय का स्पष्ट मानना है कि कितने भी सैनिक तैनात कर दो, उससे कश्मीर समस्या हल नहीं होने वाली, उलट इसके भक्तों की मांग और मंशा यह है कि एक बार सेना को आतंकियों के सफाये का हुक्म सरकार दे दे, तो घाटी आतंक मुक्त हो जाएगी.

अरुंधति के बहाने परेश रावल भक्त मण्डल का प्रतिनिधित्व करते समूचे हिंसा विरोधियों पर निशाना साधने की कोशिश में गच्चा खा गए हैं, क्योंकि जो वह कह गए वह कानून के साथ साथ उस नैतिकता के भी खिलाफ है जिसका राग आए दिन धर्म के ठेकेदार अलापते रहते हैं, जबकि रामायण सहित तमाम धर्मग्रंथ हिंसा खून खराबे और छल कपट से भरे पड़े हैं. हिन्दू स्वभावतः हिंसक नहीं हैं, यह गीत गाने वालों को एक दफा परेश रावल की मंशा समझने की कोशिश करनी चाहिए, जिन्होंने सिर्फ प्रचार के लिए अरुंधति राय के नाम का सहारा लिया, नहीं तो उनके ट्वीट्स पर कोई नजर भी नहीं डालता.  

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