सरिता विशेष

दिल्ली के बाहर सियासी जमीन और वजूद तलाश रहे आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल की भोपाल में आयोजित परिवर्तन रैली लगभग फ्लाप रही. पुराने भोपाल के छोला दशहरा मैदान में आयोजित इस रैली में केजरीवाल की उम्मीद कद काठी और नाम के मुताबिक भीड़ इकट्ठा नहीं हुईए तो साफ हो गया कि आप की प्रदेश इकाई को अभी और मेहनत की जरूरत है और उसे कुछ जाने पहचाने चेहरे व नाम भी पार्टी से जोड़ना होंगे.

शिवराज सिंह चौहान के गढ़ में उन्हे घेरने में नाकाम रहे केजरीवाल कोई हाहाकारी भाषण भी नहीं दे पाये. केजरीवाल अपने पूरे संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उन मुद्दों पर कोसते रहे जिनसे जनता पहले से ही वाकिफ है. मसलन यह कि नोट बंदी के जरिये मोदी अपने दोस्तों (अंबानी और अदानी) का आठ हजार करोड़ रुपये का कर्ज माफ करना चाहते हैं, इसलिए उन्होंने देश की आम जनता की जमा पूंजी बैंकों में जमा करा ली है और उनका मकसद न तो कालाधन लाने का था और न ही भ्रष्टाचार खत्म करने का है.

इस तरह की बातें महत्व खो रही हैं और नोटबन्दी के बाद से केजरीवाल इतनी दफा कह चुके हैं कि लगता है कि कोई कर्मकांडी पंडित बिना  पोथी खोले रट्टू तोते की तरह सत्य नारायण की कथा बांच रहा है. अपने भाषण को मसालेदार बनाने के चक्कर में गच्चा खा गए केजरीवाल दरअसल में आप को एक बेहतर विकल्प के रूप में पेश नहीं कर पाये और न ही नोट बंदी की तकनीकी खामियां गिना पाये. भोपाल में वे असहनीय दांत दर्द से पीड़ित थे, जिसके चलते किसी से मिले नहीं.

मध्य प्रदेश में कांग्रेस कुछ ब्रांडेड चेहरों की वजह से वजूद में है नहीं, तो उसकी हालत भी पतली है, ऐसे में केजरीवाल और आप से उम्मीदें पाले बैठे आम लोगों को इस रैली से निराशा ही हाथ लगी है, जो एक मजबूत विपक्ष आप में देख रहे थे. आप के प्रदेश मुखिया आलोक अग्रवाल भीड़ जुटाने में असफल रहे, तो इसकी वजह आत्म मुग्धता और यह मुगालता पाले रखना है कि चूंकि लोगों का मन भाजपा से उचट रहा है और कांग्रेस भरोसा खो चुकी है, इसलिए लोग मजबूरी में आप को वोट देंगे, काफी महंगा साबित हुआ. वजह दिल्ली और भोपाल में जमीन आसमान का फर्क है, जिसे आप की नवोदित टीम समझ नहीं पा रही और शो बाजी में उलझी है.