मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की नमामि देवी नर्मदे सेवा यात्रा एक महत्वाकांक्षी राजनैतिक अभियान के साथ साथ उनकी धार्मिक आस्थाओं की सार्वजनिक अभिव्यक्ति भी है. यह यात्रा मध्य प्रदेश के 11 जिलों की 90 विधानसभा सीटों से होकर गुजर रही है जिनमे से अधिकांश आदिवासी बाहुल्य हैं. इसलिए राजनैतिक विश्लेषक इसे 2018 के विधानसभा चुनाव की आक्रामक तैयारी भी मान रहे हैं.

इस यात्रा की एक विशेषता इसमे पंडे पुजारियों की भरमार है जिसमे नामी ब्रांडेड से लेकर लोकल पंडे भी पूजे और पूछे जा रहे हैं. यात्रा जहां भी पड़ाव डालती है वहां धार्मिक मंत्रों का उद्घोष, पूजन पाठ, हवन आरती वगैरह जरूर हो रहे हैं जिनमे लोग खासतौर से गांव वाले उत्साह से हिस्सा लेते दान दक्षिणा भी चढ़ा रहे हैं. इस  सरकारी यात्रा मे शामिल होने जन प्रतिनिधियों को सख्त निर्देश हैं और प्रशासनिक अधिकारियों की तो यह मजबूरी हो गई है कि वे इसके स्वागत और प्रस्थान के लिए मौजूद रहें. सेवा यात्रा की ब्रांडिंग के लिए खासतौर से बुलाये गए नोबल पुरुस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी की मौजूदगी इस लिहाज से हैरान कर देने वाली थी कि सत्यार्थी मूल रूप से आर्य समाजी हैं और धार्मिक पाखण्डों वर्ण वाद और अंधविश्वासों के घोर विरोधी रहे हैं, लेकिन उन्हे इस यात्रा के होशंगाबाद जिले मे प्रवेश के दौरान उमरधा गांव में यात्रा का स्वागत करते देखना कई वजहों के चलते चिंतनीय बात थी.

उनके साथ जन प्रतिनिधियों के अलावा थोक मे धर्मगुरु और पंडे पुजारी मौजूद थे जिनहे उनकी हैसियत के मुताबिक और अपने मिजाज के खिलाफ सत्यार्थी ने सर झुकाते प्रणाम भी किया. इनमे प्रमुख या उल्लेखनीय नाम स्वामी अखिलेश्व्ररारनन्द, साध्वी प्रज्ञा भारती, जबलपुर की एक कथावाचक प्रज्ञा भारती, साध्वी योग मायातीर्थ और महंत बालकदास  के हैं. लग ऐसा रहा था कि नोबल पुरुस्कार विजेता या तो अति महत्वाकांक्षी होने के चलते इस राजनैतिक चक्रव्यूह में फंस गए हैं क्योंकि भारत रत्न भी हासिल कर लेने का रास्ता यहीं से होकर जाता है या फिर वे शिवराज सिंह चौहान का वह कर्ज उतार रहे हैं जो नोबल लेने के बाद भोपाल मे स्वागत समारोह आयोजित कर उन पर लादा गया था.

मुद्दे की बात कैलाश सत्यार्थी की आर्यसमाजी छवि है जो इस धार्मिक आयोजन में बिकी हुई सी दिखी, जिसे विवादों से बचाने प्रदूषण पर्यावरण के नाम पर सामाजिक चुनरी पहना दी गई है. बाल अधिकारों की लंबी लड़ाई लड़ने वाले सत्यार्थी को जाने क्यों बाल श्रमिक हमेशा कारखानों, खदानों ढ़ावों और कालीन उद्योग में ही दिखे. बच्चे सबसे ज्यादा धर्म की आड़ में किस तरह शोषित किए जाते हैं यह वे शायद धार्मिक आस्थाओं की नकाब ओढ़े रहने के कारण नहीं देख पाये, न ही यह चिंतन मनन कर पाये कि बच्चों का जबरन मुंडन करना, उन्हे जनेऊ पहनाना, तरह तरह की दीक्षाएं दी जाना भी उनके अधिकारों का हनन हैं जिनसे वे ज़िंदगी भर उबर नहीं पाते.

पिपरिया और होशंगाबाद में कैलाश सत्यार्थी के वे तेवर नदारद दिखे, जिन्होंने उन्हे नोबल के मुकाम तक पहुंचाने में अहम रोल निभाया था कि धार्मिक पाखण्डों के सामने घुटने मत टेको, फिर चाहे हश्र जो भी हो और अब जब दूसरे कई आर्य समाजियों की तरह उन्होंने भी कट्टर हिंदुवादी अपने ही शहर विदिशा के शिवराज सिंह चौहान के आग्रह या आदेश पर घुटने टेक ही दिये हैं, तो मुमकिन है उन्हे भी अनुपम खेर और गजेंद्र चौहान जैसों की तर्ज पर कोई सरकारी बख्शीश दे दी जाये.  

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