सरिता विशेष

मध्य प्रदेश में साल 2014-15 के दौरान लोकायुक्त ने तकरीबन 8 सौ सरकारी मुलाजिमों को भ्रष्टाचार के इलजाम में रंगे हाथ घूस लेते पकड़ा था. इस में हैरत की बात यह थी कि पटवारियों की तादाद सब से ज्यादा तकरीबन 6 सौ थी और इस से भी ज्यादा हैरानी की बात यह थी कि इन 6 सौ में से 80 फीसदी यानी 480 पटवारी नामांतरण यानी रजिस्टर में एक नाम की जगह पर दूसरा नाम चढ़ान के एवज में घूस लेते धरे गए थे. यह आम राय नहीं, बल्कि कड़वी सचाई है कि बगैर घूस लिए पटवारी नामांतरण नहीं करता यानी पनपती घूसखोरी की सब से अहम वजह नामांतरण है, जो वक्त रहते किसान न कराए, तो हजार कानूनी परेशानियां भी उस के सामने मुंहबाए खड़ी रहती हैं.

इस राज्य में कलक्टरों ने तो अपने दरबार यानी जनसुनवाई जैसे सरकारी जलसे अभी शुरू किए हैं, लेकिन किसान तो अंगरेजों के जमाने से पटवारी की दहलीज पर बैनामा और बहीखाता ले कर बैठते रहे हैं कि कब पटवारी साहब का मूड या नजरें इनायत हों और वे जमीन के कागज में नाम बदलने की जरा सी जहमत उठाएं. घूस तो वे लेंगे ही, क्योंकि यह उन का हक है. दाखिलखारिज यानी नामांतरण नाम की जिस कागजी कार्यवाही पर अरबों रुपए की घूस चलती है, वह बेहद मामूली है कि किसान की मौत के बाद वारिस या वारिसों के नाम कागजों पर चढ़ाना है या फिर जिस किसी ने भी जमीन खरीदी है, उसे वह अपने नाम करवाना. इन दोनों से भी अहम है बंटवारा, जो जज्बाती तौर पर तो तकलीफदेह होता ही है, लेकिन कागजी तौर पर उस से भी ज्यादा नुकसानदेह साबित होता है.

नामांतरण क्यों

जमीन कैसी भी हो और कितनी भी हो, उस की मिलकीयत को ले कर जमीन मालिक या खरीदार उस वक्त तक बेफिक्र नहीं होता, जब तक कि सरकारी कागजों में वह दर्ज न हो जाए. बदलाव के इस दौर का हर तरफ दिखने वाला नजारा यह है कि किसान खासतौर से छोटी जोत वाले किसान अपनी जमीन बेच कर शहरों में बस रहे हैं. बिल्डरों ने चारों दिशाओं में पैर पसार लिए हैं. हर कहीं इमारतें और रिहायशी इलाके बढ़ रहे हैं, जिन से जमीनों के दाम उम्मीद से कहीं ज्यादा बढ़े हैं. नतीजतन, जमीन की रजिस्ट्री की तादाद तेजी से बढ़ रही है, जिसे देख कर ऐसा लगता है मानो आने वाले समय में जमीन का अकाल पड़ने वाला है.

एक जमीन बिक कर तकरीबन आधा दर्जन हाथों से हो कर गुजर रही है और हर दफा उस का नामांतरण हो रहा है. खरीदार कोई जोखिम नहीं उठाता. उस की जेब में पैसा है. वह जानता भी है और समझता भी है कि नामांतरण अहम है, इसलिए वह पटवारी को इस बाबत मुंहमांगी रकम दे रहा है, जिस से आगे चल कर इसे बढ़े दामों पर बेचने में दिक्कत न आए. किसानों की परेशानी यह है कि वे नामांतरण चाहे वारिस होने की बिना पर कराएं या वसीयत की बिना पर, बगैर उन के नाम हुए जमीन पर न तो कर्ज मिलता है, न ही खादबीज मिलते हैं और न ही तमाम सरकारी सहूलियतें मिलती हैं. लिहाजा, उन्हें नामांतरण कराने की जल्दी रहती है. भूमाफिया को बड़ीबड़ी गाडि़यों में आते देख उन्हें यह डर भी सताने लगा है कि कहीं ऐसा न हो कि कोई और उन की जमीन की फर्जी रजिस्ट्री करा कर नामांतरण भी अपने हक में करा ले.

इस बेचैनी में सब से ज्यादा फायदे में पटवारी रहता है, जो नामांतरण की पहली सीढ़ी भी है और छत भी. जिस किसी को नामांतरण कराना होता है, वह रजिस्ट्री समेत दूसरे जरूरी कागजात ले कर पटवारी के पास पहुंचता है. पटवारी कागजों का मुआयना कर के तय करता है कि वे ठीक हैं या नहीं. अगर उसे कागजात ठीक लगते हैं, तो वह नाम दर्ज कर फाइल तहसीलदार के पास पहुंचा देता है. तहसीलदार इस पर दस्तखत कर देता है, तो नामांतरण नाम का काम पूरा हो जाता है. इस के लिए दक्षिणा जमीन की कीमत या जरूरत के मुताबिक एडवांस में चढ़ा दी गई होती है. यह 10 हजार से ले कर 10 लाख रुपए या उस से ज्यादा भी हो सकती है. इस बाबत पटवारी को कोई जल्दी नहीं होती, क्योंकि तुरुप का पत्ता उस के हाथ में रहता है. लिहाजा, वह इतमीनान से काम करता है.

सब्र नहीं होता

13 जनवरी, 2016 को मध्य प्रदेश राज्य के निमाड़ इलाके के बड़वानी जिले के एक पटवारी एसबी डोंगरे को इंदौर के लोकायुक्त ने एक हजार रुपए की घूस लेते रंगे हाथ दबोचा था. भीकम कड़वाल नाम के इस किसान को जमीन का नामांतरण कराना था. जब वह थकहार कर परेशान हो गया, तो उस ने लोकायुक्त में शिकायत कर डाली. वह पटवारी फरवरी, 2016 में रिटायर होने वाला था. आमतौर पर तमाम सरकारी मुलाजिम रिटायरमैंट के सालभर पहले से घूस लेना बंद कर देते हैं. वजह शराफत नहीं, बल्कि यह मजबूरी रहती है कि अगर पकड़े गए तो कानूनी कार्यवाही होगी ही, लेकिन साथसाथ पैंशन और जीपीएफ की भी रकम रुक जाएगी. पटवारी एसबी डोंगरे से इतना सब्र भी न हुआ. लिहाजा, वह नप गया. इसी दिन राज्य के बालाघाट जिले के खैरलांजी तहसील के दफ्तर में एक और पटवारी भूपेंद्र देशमुख को भी लोकायुक्त ने 15 हजार रुपए की घूस लेते पकड़ा था.

भूपेंद्र ने एक किसान रमेश बिसेन से बंटवारानामा तैयार करने और नामांतरण कर नई बही बनाने के एवज में यह घूस ली थी. ठीक इसी दिन राजगढ़ जिले में पटवारी सुलतान सिंह पवार लोकायुक्त द्वारा ही 45 सौ रुपए की घूस लेते धरा गया था. इस बार इलजाम नामांतरण न हो कर मनरेगा के तहत कुआं खोदने व खसरे की नकल की दरकार का था.  एक किसान अनार सिंह से यह सौदा तकरीबन 18 हजार रुपए में तय हुआ था, जिस की पहली किस्त दी जा रही थी. रतलाम जिले का एक पटवारी गणतंत्र दिवस पर घूस लेते पकड़ा गया था, तो कहा जा सकता है कि घूसखोर पटवारी कतई नहीं सुधरने वाले और सरकार का जोर इन पर नहीं चलना. लिहाजा बेहतर यह होगा कि नामांतरण का ही तरीका बदल दिया जाए.

क्या है रास्ता

अपने ही पटवारियों की घूसखोरी के आगे घुटने टेक चुकी सरकार को समझ नहीं आ रहा कि वह कैसे इस लत पर लगाम कसे. 26 जनवरी, 2016 को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने रतलाम में ही ऐलान किया था कि जिन जमीनों के नामांतरण में कोई विवाद नहीं है, उन का नामांतरण अब ग्राम पंचायतें करेंगी. मुमकिन है कि इस फैसले पर जल्द अमल भी हो जाए, पर ऐसा हुआ तो तय है कि किसान कुएं से बच कर खाई में जा गिरेंगे. वजह, ग्राम पंचायत में मुंह फाड़ने वालों की तादाद ज्यादा रहेगी और इस बात की कोई गारंटी नहीं कि वहां थाल में सजा कर नामांतरण होगा. होना तो यह चाहिए था कि विवाद वाले नामांतरण ग्राम पंचायतों को सौंप दिए जाते. जिस विवाद का निबटारा तहसील में भी न सुलझे, तो ऊपरी अदालतों  में चला जाता है. इस में भी पटवारी का रोल और यह गवाही अहम होती है कि हां, इस जमीन के इतने ही वारिस हैं, जितने मालिक ने बताए हैं. पटवारी के अलावा नामांतरण का काम करने का हक किसी और को न होने का वह बेजा फायदा उठाता है. आंकड़ों से हट कर देखें, तो तकरीबन हर पटवारी करोड़पति है. सभी के पास बड़ीबड़ी गाडि़यां हैं, उन के बच्चे महंगे अंगरेजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं. ज्यादातर पटवारियों ने नजदीकी रिश्तेदारों के नाम पर जमीनें खरीद रखी हैं. मकान बना रखे हैं. इतना सब डकारने के बाद भी वे घूस खा रहे हैं, जिस का एक बड़ा हिस्सा नामांतरण की कार्यवाही से आता है. ऐसे में रास्ता क्या है, जिस से कि किसानों को नामांतरण के लिए परेशान न होना पड़े और कम घूस में काम हो जाए? इस सवाल का जवाब देना बेहद मुश्किल है. भोपाल के ही कुछ पटवारियों की मानें, तो नामांतरण बंद नहीं हो सकता, पर यह जरूर हो सकता है कि उत्तर प्रदेश की ताजा पहल की तर्ज पर इसे रजिस्ट्री के साथ ही कर दिया जाए. यह आइडिया फौरी तौर पर बुरा नहीं है कि नामांतरण और रजिस्ट्री में फर्क नहीं किया जाए यानी रजिस्ट्री को ही नामांतरण माना जाए. यह आइडिया कितना कारगर हुआ, यह उत्तर प्रदेश से ही पता चला है कि वहां घूसखोरी रुकी नहीं है, बल्कि उस का तरीका बदल गया है. अब नामांतरण का नहीं, बल्कि रजिस्ट्रार दफ्तर के ही नजदीक एक अलग कमरा बना कर घूस लेने का इंतजाम कर दिया गया है. सरकारी मुलाजिमों के ओहदे भले ही अलगअलग हों, लेकिन दिमाग सब का एक सा खुराफाती होता है. भोपाल के नजदीक सीहोर के एक पटवारी का कहना है कि यह न समझें कि नामांतरण या दूसरे कामों की घूस की पूरी रकम हम ही डकार जाते हैं. हां, पर सच यह है कि हमें एक बड़ा हिस्सा उम्मीद से ज्यादा मिलता है. इस पटवारी के मुताबिक, हर एक सर्किल का रेट बंधा हुआ है. ऊपर से पटवारी को घूस लेने के लिए मजबूर किया जाता है. ये लोग अपना कौलर तो साफ रखते हैं, लेकिन बदनाम पटवारी होते हैं. कारगर तो यह होगा कि नामांतरण न होने की बाबत पटवारी को ही जिम्मेदार ठहराया जाए और उस से ही पैनाल्टी वसूली जाए. साथ ही, पटवारी को मजबूत किया जाए कि वह कैसे भी हो, एक हफ्ते में नामांतरण करे, नहीं तो फिर सजा भुगतने को तैयार रहे तो ही बात बन सकती है, नहीं तो किसानों को तरहतरह से परेशान होना ही है.