सरिता विशेष

जनता दल राष्ट्रवादी के राष्ट्रीय संयोजक अशफाक रहमान का मानना है कि देश में हिंदू और मुसलमान के बीच विवाद राजनीतिक दलों के द्वारा पैदा किए जाते हैं. विवाद की आग में राजनेता राजनीतिक रोटियां सेंकते रहे हैं. आज सभी राष्ट्रीय और इलाकाई दल मुसलमानों व दलितों का शोषण कर राजनीति कर रहे हैं. सैकड़ों सालों तक राजाओं, सामंतों और जमींदारों ने दलितों व मुसलमानों को चूसा और वही काम आज राजनीतिक पार्टियां कर रही हैं. वे कहते हैं कि कुछ सालों तक उन्होंने समता पार्टी से जुड़ कर राजनीतिक बदलाव की कोशिश की पर उन्हें लगा कि वे किसी दूसरे दल में रह कर अपनी सोच को जमीन पर नहीं उतार सकेंगे. तब साल 2013 में उन्होंने अपनी नई पार्टी जनता दल राष्ट्रवादी का गठन किया. इस साल होने वाले बिहार के विधानसभा चुनाव में वे 100 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारियों में लगे हैं. पेश हैं उन से हुई बातचीत के अंश :

आप की नई पार्टी नीतीशलालू के महागठबंधन को किस तरह चुनौती देगी क्योंकि दोनों ही दलितों और अल्पसंख्यकों के मसीहा माने जाते हैं? हम जनता के बीच जा कर बता रहे हैं कि 15 साल तक लालू और 10 साल तक नीतीश ने दलितों व अल्पसंख्यकों को बरगलाने का काम किया है. इन समुदायों के हित को ध्यान में रख कर और उन में राजनीतिक चेतना जगाने के मकसद से ही हम ने पार्टी बनाई. हमारा नारा है कि हर जाति और वर्ग को उस की आबादी के हिसाब से सत्ता में भागीदारी मिले.

कारोबारी से अचानक राजनेता बनने का मकसद क्या है?

राजनीति मेरे लिए नया मैदान नहीं है. 1990 से 1995 तक बिहार की राजनीति में रहा और सब से पहले मुसलमानों को आरक्षण देने की बात मैं ने ही उठाई थी. उस समय समता पार्टी से जुड़ा रहा और बिहार स्टेट मुसलिम कौन्फ्रेंस का प्रधान महासचिव भी रहा. चुनाव भी लड़ा पर कामयाबी नहीं मिल सकी. राजनीतिक दलों की मौकापरस्ती और जनता को धोखा देने वाली नीयत को देख कर राजनीति से मन उचट गया था. राजनीति से कई साल तक कटा रहा पर हमेशा मुसलमानों व दलितों की बदतर हालत को देख कर कोफ्त होती थी, इसलिए नए सिरे से कमर कस कर राजनीति में उतरा हूं.

आप की नजर में राजनीति क्या है?

राजनीति मिलबांट कर जनता की मेहनत की कमाई को खाने का धंधा बन कर रह गई है, जबकि इस का असली मकसद जनता की सेवा करना है. बिहार की राजनीति की ही बात करें तो यहां कांगे्रस के विरोध में लालू यादव का जन्म हुआ. लालू राज का विरोध कर नीतीश कुमार का उदय हुआ. इन तीनों दलों की लूटखसोट की नीति ने भाजपा को पांव जमाने का मौका दिया. आज कांगे्रस, लालू और नीतीश एकसाथ हो गए हैं, यह स्वार्थ की राजनीति नहीं तो क्या है? चुनाव का बिगुल बजते ही हर दल मुसलमानों को रिझाने और खुद को सब से बड़ा सैक्युलर साबित करने की कोशिश में लग जाता है. ऐसा क्यों होता है?

राजनीतिक दलों की नजर में सैक्युलरिज्म का मतलब धोखे से मुसलमानों का वोट लेना ही रह गया है. देश का हर दल मुसलमानों का वोट पाने के लिए ढोंग रच रहा है. मुसलिम टोपी पहन कर और मजारों पर चादर चढ़ा कर हर दल के नेता खुद को मुसलमानों का सच्चा हितैषी साबित करने में लगे हुए हैं, जबकि उन की साजिश है कि मुसलमानों और दलितों को अनपढ़ व जाहिल बना कर रखा जाए. चुनाव आते ही हर छोटेबड़े दल के नेताओं में टोपी पहनने और मजार पर चादर चढ़ाने की होड़ मच जाती है. नेताओं के असली चेहरे को मुसलमान अब समझने लगा है. 

लालू, नीतीश और मुलायम के गठबंधन को मुसलमानों का वोट मिलेगा?

इन नेताओं ने मुसलमानों की तरक्की के लिए कभी कुछ नहीं किया. लालू के राज में मुसलमान नेता की पहचान ‘कबाब मंत्री’ और ‘शराब मंत्री’ के तौर पर ही की जाती थी. नेताओं ने मुसलमानों को अपना पिट्ठू बना कर ही रखा है. नीतीश ने एक मुसलमान मंत्री को इसलिए हटा दिया क्योंकि उन्होंने एक्साइज घोटाले का भंडाफोड़ कर दिया था. फारबिसगंज उपद्रव के दौरान अल्पसंख्यक की लाश पर चढ़ कर नाचने वाले सिपाही को आज तक सस्पैंड नहीं किया गया है. साल 1947 में 33 प्रतिशत मुसलमान सरकारी नौकरियों में थे और आज यह आंकड़ा मात्र 3 प्रतिशत रह गया है.  बिहार में मुसलमानों की आबादी 22 फीसदी है और 4 फीसदी ही पढ़ेलिखे हैं. क्या यही है मुसलमानों की तरक्की? सैक्युलर का ढोल पीटने वाली किसी भी पार्टी को मुसलमानों की चिंता नहीं है. चुनाव आते ही पार्टियां मुसलमानों को 4 फीसदी, 9 फीसदी और 19 फीसदी आरक्षण देने का राग अलापने लगती हैं और चुनाव के बाद सब खत्म. सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफारिशों को सरकारी अलमारियों में सड़ने के लिए छोड़ दिया गया है.

नरेंद्र मोदी ‘सब का साथ, सब का विकास’ के नारे लगा रहे हैं, क्या इस से मुसलमानों में भरोसा जगा है?

मोदी भी मुसलमानों को लौलीपौप ही दिखा रहे हैं. उन्होंने भारत के मुसलमानों को समझा ही नहीं है. अपने शपथग्रहण जलसे में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को बुला कर उन्होंने मान लिया कि इस से भारत का मुसलमान उन का पक्का वोटर बन जाएगा. जबकि असल में ऐसा नहीं है. मोदी समेत हर नेता भारतीय मुसलमानों की देशभक्ति को गलत तरीके से आंकता रहा है. भारत का मुसलमान कभी भी पाकिस्तान के समर्थन में नहीं रहा है.

आप बाकी राजनीतिक दलों से खुद को अलग कैसे साबित करेंगे?

पिछले लोकसभा चुनाव में हम ने 12 उम्मीदवार उतारे थे और उन्हें आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों से ज्यादा वोट मिले थे. पढ़ेलिखे और जागरूक लोगों को ही विधानसभा चुनाव में उतारा जाएगा. हमारी पार्टी ठगी की राजनीति नहीं करेगी. शोषित (मुसलिम) समाज को तालीम देने से ही उन में हर तरह की जागरूकता आएगी और कोई उन का शोषण नहीं कर सकेगा. हम युनाइटेड मुसलिम, युनाइटेड हिंदू और युनाइटेड नैशन में यकीन रखते हैं. हमारी पार्टी किसी खास जाति या वर्ग की बात नहीं करती और न ही जाति और धर्म के आधार पर टिकट बांटने में यकीन रखती है.