भाजपा के पितृ पुरुष लाल कृष्ण आडवाणी का मन व्यथित है और इतना है कि उन्होंने सांसद पद से इस्तीफे की पेशकश कर डाली है. बक़ौल आडवाणी ऐसी हालत में अटल जी भी नाराज होते. ऐसे हालात यानि संसद का न चलना, लेकिन हर कोई समझ रहा है कि इशारा देश की तरफ है, जहां लोग आशकाए ओढ़ कर सोते हैं और सहमे सहमे से उठते हैं.

असल समस्या संसद नहीं देश का न चल पाना है, इस बात को साफ साफ बोलने की हिम्मत न तो आडवाणी में है, न दूसरे किसी भाजपा नेता में है. बहरहाल आडवाणी के दुख और उसकी आंशिक यानि सेन्सर्ड अभिव्यक्ति स्वागत योग्य है. एक अच्छी शीर्ष स्तरीय पहल है कि सब कुछ ठीक ठाक नहीं है. देश एक त्रासद दौर से गुजर रहा है, जिसकी ज़िम्मेदारी तय न हो पाना ही मन डोलने की वजह है.

संसद चल भी जाती तो क्या हो जाता, क्या लोगों को उनका पैसा सहूलियत से मिल जाता, क्या अरबों की नई करेंसी बरामद होना बंद हो जाती, जैसे दर्जनों यक्ष प्रश्न ज्यों के त्यों रहते फिर संसद के चलने न चलने पर विलाप बेमानी है.

आडवाणी का छिपा दर्द यह है कि उनके भूतपूर्व प्रिय शिष्य की मनमानी पर किसी का ज़ोर नहीं चल रहा. वे नरेंद्र मोदी का स्वभाव बेहतर समझते हैं, इसलिए काफी पहले आपातकाल जैसी स्थिति का जिक्र भी कर चुके हैं. यह आडवाणी जैसा सधा और तजुर्बेकार नेता ही समझ सकता है कि देश लगातार अराजकता की तरफ बढ़ रहा है नोट बंदी के बाद से बिगड़े हालातों को संभालने में सरकार नाकाम रही है.

आडवाणी के इस्तीफे की पेशकश का राजनैतिक पहलू यह भर हो सकता है कि पार्टी के अंदर मोदी के पनपते विरोध को न केवल आंका जाये, बल्कि उसे हवा भी दी जाये. राजनीति में कभी भी कुछ भी हो जाने के सिद्धान्त के तहत थके हारे आडवाणी का यह दांव सफल हो या न हो पर इस बहाने भड़ास तो निकलना शुरू हो गई है. 

COMMENT