आम चुनाव से पहले सरकार खुद के दामन में लगे महंगाई व  भ्रष्टाचार के दागों को धोने के लिए भले ही भूमि अर्जन विधेयक का सहारा ले रही हो, लेकिन इस प्रस्तावित कानून के प्रावधानों से भूमिहीनों और गरीब किसानों को जमीन व संपत्ति वितरण व्यवस्था के मामले में बड़ी राहत मिलेगी, बशर्ते नौकरशाही और कानूनी दांवपेंच  अड़ंगा न डालें. पढि़ए जगदीश पंवार का लेख.

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी संप्रग सरकार ने संसद के मौजूदा मानसून सत्र में नए भूमि अधिग्रहण विधेयक को पारित कराने के लिए कमर कस ली है, हालांकि तमाम दलों को मनाने के बावजूद कम्युनिस्ट पार्टी व द्रमुक जैसे दल अभी भी नाखुश हैं. सरकार अपने सब से बड़े प्रतिद्वंद्वी विपक्ष भाजपा की कुछ शर्तों के आगे ?ाक कर उसे मनाने में कामयाब रही. इधर कौर्पोरेट जगत समेत भूमि अधिकार आंदोलन के कार्यकर्ता बिल के मौजूदा स्वरूप से नाराज हैं. कौर्पोरेट जगत को तो ऐसा लग रहा है मानो उस से उस का जन्मसिद्ध अधिकार छीना जा रहा है.

उद्योग जगत पहले इस बात से हैरान था कि भूमि अधिग्रहण बिल पर संसदीय समिति ने अपनी सिफारिश सरकार के सामने रखी तो निजी कंपनियों के लिए भूमि अधिग्रहण के अवसर सीमित करने वाले इस बिल को ले कर सरकार ने हस्तक्षेप क्यों नहीं किया? कौर्पोरेट सैक्टर का मानना है कि बिल के प्रावधान इंडस्ट्री के लिए अच्छे नहीं हैं. उधर, आदिवासियों, दलितों, भूमिहीनों और विस्थापितों के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठन इन लोगों के पुनर्वास संबंधित प्रावधानों को ले कर संतुष्ट नहीं हैं. किसान आंदोलन के अगुआ नेताओं का मानना है कि इस कानून से किसानों को ज्यादा लाभ नहीं होगा.

कुछ राजनीतिबाज भी बिल में किसानों के लिए पर्याप्त मुआवजे का प्रावधान न होने पर विरोध  जता रहे हैं लेकिन केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश कहते हैं कि कौर्पोरेट, जंगलों, आदिवासियों, और किसानों की बात करने वाले गैर सरकारी संगठनों के असंतुष्ट रुख को देखते हुए हम ने बीच का रास्ता निकाला है. वास्तव में आम चुनाव से पहले संप्रग सरकार शहरियों व ग्रामीण भूमालिकों, गरीबों, दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, किसानों की हितैषी दिखने की कोशिश कर रही है और अपने दामन पर लगे महंगाई, भ्रष्टाचार, असुरक्षा जैसे तमाम दाग धो देना चाहती है.

दरअसल, मौजूदा भूमि अधिग्रहण विधेयक में कौर्पोरेट क्षेत्र की अधिक तरफदारी है. उस में भूस्वामियों की जमीनें जबरन छीन लेने तक के प्रावधान हैं, इसलिए कौर्पोरेट को प्रस्तावित नए कानून के प्रावधानों  और उस के आगे हरदम ?ाकी रहने वाली सरकार के रवैये से हैरानी हो रही है.

नए ‘भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन विधेयक-2011’ के मसौदे पर गौर किया जाए तो उस में न केवल सरकारी व जनहित विकास परियोजनाओं, उद्योग जगत और शहरियों का, बल्कि ग्रामीणों, किसानों, भूमिहीन मजदूरों, आदिवासियों तक का पूरा खयाल रखा गया है. बिल में भूमालिकों की जमीन को संरक्षित रखने और पर्याप्त मुआवजे व रोजगार तक का इंतजाम किया गया है.

दरअसल, ग्लोबलाइजेशन के दौर में पिछले करीब 2 दशक में सरकारी विकास परियोजनाओं और निजी उद्योगों की स्थापना के कारण शहरी लोगों की ही नहीं, ग्रामीण किसानों, मजदूरों, आदिवासियों की दिक्कतें भी बढ़ने लगीं. विभिन्न परियोजनाओं से मौजूदा कानून में सही मुआवजे और पुनर्वास के पर्याप्त प्रावधान न होने की वजह से शहरी भी अपने घर, जमीन से बेदखल हुए तो गरीब किसानों को भी अपनी जमीन और आजीविका से महरूम होना पड़ा.

इस दौरान बुनियादी ढांचागत और औद्योगिक विकास के नाम पर देश में बड़े पैमाने पर जमीनों, शहरों में मकानों, दुकानों व व्यापारिक प्रतिष्ठानों का सरकारों व निजी कंपनियों के लिए अधिग्रहण किया गया. सदियों से जो लोग जिस जमीन पर रह रहे थे, उन्हें वहां से जबरन बेदखल कर दिया गया. ग्रामीण लोगों के पास शहरों के स्लम क्षेत्रों की ओर पलायन कर के मजदूरी के अलावा कोई विकल्प नहीं रहा तो शहरियों को अन्यत्र कामधंधा और रिहाइश तलाशनी पड़ी. यह सब हुआ देश के मौजूदा भू अधिग्रहण कानून की वजह से. वर्तमान भू मालिकाना कानून बहुत ही असमान और अन्यायपूर्ण वितरण वाला है.

पश्चिम बंगाल के सिंगूर का मामला इसी तरह का है. कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार ने टाटा कंपनी को नैनो कार का प्लांट लगाने के लिए सिंगूर के किसानों की 1 हजार एकड़ जमीन जबरन ले ली. अपनी जमीन से बेदखल और विस्थापित हुए किसानों ने विरोध किया तो पुलिस ने उन्हें मारापीटा. घरों में घुस कर महिलाओं को बेइज्जत तक किया गया. इसी दौरान विधानसभा चुनाव आए तो तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने किसानों के साथ खड़े हो कर नैनो प्लांट का विरोध किया. टाटा को विरोध के चलते सिंगूर प्लांट छोड़ने पर मजबूर कर दिया. बाद में जब ममता बनर्जी ने 2011 में राइटर्स बिल्ंिडग में सत्ता संभाली तो उन्होंने किसानों के हक के लिए ‘सिंगूर रिहैबिलिटेशन ऐंड डैवलपमैंट बिल-2011’ पारित कराया और किसानों को उन की 997 एकड़ जमीन वापस दिलाई. इस पर टाटा कंपनी सरकार के इस कदम के खिलाफ अदालत में चली गई. यह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में है. यानी वर्ष 1894 में बना भूमि अधिग्रहण कानून जो आज भी वजूद में  है किसानों के खिलाफ और टाटा जैसी कंपनियों के पक्ष में है. कानून में किसानों की जमीनें जबरन छीनने का हक तो सरकार के पास है पर पीडि़तों के पुनर्वास का दायित्व नहीं. इसीलिए सरकारें अब तक कौर्पोरेट कंपनियों के पक्ष में खड़ी दिखाई देती रही हैं पर किसानों, आदिवासियों, मजदूरों के खिलाफ रही हैं. लिहाजा, नए भूमि अर्जन बिल में संप्रग सरकार द्वारा इन सब खामियों को दूर करने का प्रयास किया गया है.     

फैडरेशन औफ इंडियन चैंबर्स औफ कौमर्स ऐंड इंडस्ट्री (फिक्की) की अध्यक्ष नैनालाल किदवई कहती हैं कि नया बिल बड़ी उत्पादन परियोजनाओं हेतु भूमि अधिग्रहण के लिए सही नहीं है. पोस्को और आर्सेलर मित्तल जैसी परियोजनाओं को जमीन मिलने में देरी नहीं चल सकती. कोई भी इतने सालों तक इंतजार नहीं कर सकता. पोस्को जैसी कंपनी ने बड़ा धैर्य रखा. यानी उद्योग जगत यथास्थिति चाहता है कि सरकार किसानों की जमीनें जबरदस्ती छीन कर उन्हें देती रहे चाहे किसान, भूस्वामी अपनी आजीविका खोएं या बेजमीन हो जाएं.

किदवई आगे कहती हैं कि अगर नया बिल मौजूदा स्वरूप में पेश किया जाता है तो बड़ी परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण करना संभव नहीं हो सकेगा. फिक्की अध्यक्ष को मुआवजे और पुनर्वास वाले प्रावधान पर भी एतराज है. वे कहती हैं कि पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापना की शर्त तब नहीं होनी चाहिए जब बड़ी निजी परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण खरीदार और विक्रेता की आपसी रजामंदी से होता है. उद्योग जगत का यह सामंती विचार है कि भूस्वामी से जमीन ले कर उसे बस चलता कर दिया जाए चाहे वह कुछ भी करे. इस खरीद में अकसर जबरन धमकी देने का भी कार्य करा जाता है. खेतों के मालिकों के खिलाफ मुकदमे दायर कर दिए जाते हैं, गुंडों से पिटवा दिया जाता है.

इसी सोच की वजह से पिछले समय में हुए जमीन अधिग्रहण के मामलों में कई दुष्परिणाम देखने में आए. सरकारों ने हरियाणा, उत्तर प्रदेश में जिन किसानों से भूमि अधिग्रहण की वे बेरोजगार हो गए. उन्हें मुआवजे के मिले पैसों का न तो सदुपयोग करना आया न वे उस पैसे को पचा पाए, नतीजतन, बेरोजगारी और अपराध पनपने लगे. कन्फैडरेशन औफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) का भी कहना है कि भूमि अधिग्रहण से प्रभावित परिवारों की सहमति 80 प्रतिशत की जगह घटा कर 60 प्रतिशत की जानी चाहिए.

सीआईआई के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी कहते हैं कि भूमि के सही रिकौर्ड के अभाव में अलगअलग मालिकों से जमीन का संचयन करना कौर्पोरेट क्षेत्र को प्रभावित कर सकता है, इसलिए सरकार का हस्तक्षेप जरूरी है. सीआईआई ने यह भी कहा कि बिल के प्रावधान अगर लागू हो जाते हैं तो देश में भूमि की कीमत साढे़ तीनगुना बढ़ सकती है. इस से औद्योगिक परियोजनाओं पर असर पड़ेगा और उत्पादन क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा का क्षय होगा. यानी सीआईआई चाहता है कि भूमि अधिग्रहण के मौजूदा गैर बराबरी, नाइंसाफी वाले कानून की तरह ही भूमालिकों को बेदखल कर दिया जाए और उन्हें जमीन दी जाए.

केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार भी कौर्पोरेट और सामंती व शोषकों की भाषा बोल रहे हैं. वे कहते हैं कि भूमि अर्जन बिल से डैम और अन्य परियोजनाओं के लिए गैर रजामंदी वाले किसानों से भूमि अधिग्रहण करना मुश्किल हो जाएगा. लगता है शरद पवार भी किसानों से जबरन भूमि हड़पने के पक्षधर हैं. इतने सालों से केंद्र में शक्तिशाली मंत्री रहे शरद पवार से कोई पूछे कि आजादी के बाद भी भूमि के बंटवारे को ले कर असमानता वाला कानून क्यों?

सीपीआई (एम) भूमि अधिग्रहण से प्रभावित 100 प्रतिशत परिवारों की सहमति की मांग कर रही है तो द्रमुक नेता टी आर बालू कहते हैं कि बिल संविधान के संघीय ढांचे के खिलाफ है और उन की पार्टी इस बिल से सहमत नहीं है. सिविल सोसायटी के कार्यकर्ता भी प्रस्तावित नए बिल से खुश नहीं हैं. कहा जा रहा है कि यह भूमि के कौर्पोरेटाइजेशन को शह देने वाला है और इस में पुनर्वास के प्रावधानों की भी कमी है.

एकता परिषद के संस्थापक और भूमि को ले कर सत्याग्रह आंदोलन के अगुआ रहे पी वी राजगोपाल कहते हैं कि इंडस्ट्री की धारणा है कि इस से रोजगार बढे़गा, सही नहीं है. उद्योग जिस जगह पर लगाया जाएगा, उस स्थान पर रहने वालों का अपना रोजगार खत्म हो जाएगा और केवल सीमित संख्या में ही रोजगार उत्पन्न होगा.

समाज सेविका मेधा पाटकर का कहना है कि यह बिल लोगों के समान विकास पर आधारित नहीं है. हालांकि इस में कुछ अच्छे प्रावधान भी हैं. बिल में दिक्कत यह है कि यह भूमि का आगे निगमीकरण करने के लिए प्रोत्साहित करता है और इस में पुनर्वास व आजीविका का कोई ठोस प्रावधान नहीं है. उद्योग जगत और एक्टीविस्ट की इस तरह की आपत्तियां जायज हैं या नहीं, अभी कहा नहीं जा सकता. कानून लागू होने के बाद व्यावहारिक तौर पर यह सब सामने आ पाएगा.

मगर मौजूदा कानून के चलते नुकसान के आंकड़ों पर यकीन करें तो पिछले 2 दशक में पुलों, बांधों, बिजली परियोजनाओं, खनन, राजमार्गों आदि के निर्माण के नाम पर करीब 50 लाख लोग विस्थापित हुए हैं और अगर आजादी के बाद की बात की जाए तो विभिन्न विकास परियोजनाओं के नाम पर देशभर में 3 करोड़ से अधिक लोगों को बिना कोई मुआवजा दिए उजाड़ दिया गया.  

देश में इस समय 1 करोड़, 30 लाख परिवार बेजमीन, बेघर, खानाबदोश की जिंदगी बसर कर रहे हैं. गांव के किसान व मजदूर ही नहीं, शहरों के मकान, दुकान, व्यापारिक प्रतिष्ठानों के मालिक भी अधिग्रहण की चपेट में आए. शहरों में आवासीय योजनाओं, कलकारखानों, मैट्रो रेल, पुलों आदि के लिए हजारों लोगों को उजड़ने का दर्द ?ोलना पड़ा.

मुंबई अर्बन इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजैक्ट यानी एमयूआईपी की विभिन्न परियोजनाओं के लिए मुंबई के 35 हजार परिवार विस्थापित हुए. दिल्ली की मैट्रो रेल परियोजना के तीसरे चरण में 399 दुकानें और 87 आवासीय इकाइयों को तोड़ना पड़ा. दिल्ली मैट्रो की अन्य लाइनों के लिए भी हजारों मकान, दुकानें, वर्कशौप, औद्योगिक यूनिटें पूरी या कहींकहीं, आधी हटानी पड़ीं. इस से हजारों भूमालिक, किराएदार प्रभावित हुए. इन लोगों को भी समुचित मुआवजा नहीं मिला. मुआवजे के सैकड़ों मामले निचली अदालतों और उच्च न्यायालय में लंबित हैं.  भारत के 43 प्रतिशत लोग अभी भी भूमिहीन हैं. 13.34 प्रतिशत दलित और 11.50 प्रतिशत जनजाति परिवार पूरी तरह जमीन से वंचित हैं. देश की15.20 प्रतिशत भूमि मात्र 1.33 प्रतिशत लोगों के  नियंत्रण में है. 63 फीसदी सीमांत भूमालिकों के पास सिर्फ 15.60 फीसदी जमीन है. 1977-78 में दलितों की भूमिहीनता 56.8 फीसदी से बढ़ कर 1983 में 61.9 फीसदी जा पहुंची. इसी वर्ष जन जातियों में यह 48.5 फीसदी से 49.4 फीसदी हो गई थी. कृषि भूमि की बात करें तो 95.65 प्रतिशत किसान छोटे और सीमांत वर्ग में आते हैं. करीब 62 प्रतिशत इस्तेमाल की जाने वाली जमीन मध्यम और बड़े किसानों के पास है. इन की तादाद मात्र 3.5 प्रतिशत है. यही लोग 37.72 फीसदी कृषि क्षेत्र के मालिक बने बैठे हैं.

सरकारों द्वारा लोगों को न तो उजाड़ने से पहले और न ही बाद में किसी तरह की कोई भरपाई, मुआवजा मुहैया कराया गया. सरकारों ने जमीनें गरीबों, आदिवासियों और किसानों से ले कर कौर्पोरेट जगत को मुहैया कराने में खूब रुचि दिखाई और इस प्रक्रिया में उन लोगों की उपेक्षा की जाती रही जो वास्तविक तौर पर हकदार थे और जिस जमीन, जंगल के सहारे उन की आजीविका चल रही थी. नतीजतन, इन लोगों के भीतर सरकारों और सरकारी नीतियों के भेदभावपूर्ण रवैये के प्रति आक्रोश बढ़ने लगा. देशभर में यह संदेश गया कि सरकारें शहरी लोगों, गरीबों, पिछड़ों, किसानों और आदिवासियों की जमीनें छीन कर अमीरों को कौडि़यों केभाव बांट रही हैं.

हाल के वर्षों में हजारों एकड़ संरक्षित और अनुसूचित भूमि बलपूर्वक खनन और औद्योगिकीकरण के नाम पर हस्तांतरित कर दी गई. बड़े पैमाने पर कृषि और वन भूमि उद्योग, खनन और विकास परियोजनाओं या ढांचागत परियोजनाओं के लिए दे दी गई.

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ?ारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में कोर्पोरेट कंपनियों को किसानों की कृषि भूमि, आदिवासियों के जंगल, शहरी लोगों की शहरों से सटी जमीनें अन्यायपूर्ण कानून के सहारे छीनी गईं. 2 दशक में करीब 7 लाख 50 हजार एकड़ भूमि खनन और 2,50,000 एकड़ औद्योगिक मकसद से हस्तांतरित की गई, वह भी बिना स्थानीय लोगों की आजीविका की परवा किए. नतीजतन, बंगाल में टाटा, छत्तीसगढ़ और ?ारखंड में जिंदल ग्रुप, ओडिशा में आर्सेलर मित्तल व पोस्को, गुजरात में अदानी, रिलायंस और उत्तर प्रदेश में रिलायंस के विरोध में हिंसात्मक घटनाएं घटीं.

गैरनियोजित शहरीकरण व गैरकानूनी कब्जे से भी सरकारी अफसरों और भूमाफिया की चांदी बन गई. इस का सब से बड़ा खमियाजा शहरी लोगों के साथसाथ किसानों और गरीब मजदूरों को भुगतना पड़ा. वर्तमान में लागू भूमि अधिग्रहण कानून-1894 सब से पुराना है. यह कानून बिना किन्हीं बाधाओं के भूमि अधिग्रहण की अनिवार्यता प्रदान करता है. अधिग्रहण संबंधित शुरुआती भागों में 55 सैक्शन हैं जो अधिग्रहण के लिए प्रारंभिक जांच, अधिग्रहण के इरादे की घोषणा, सर्वे, नोटिफिकेशन, आपत्तियों की सुनवाई, भूमि की माप, भूमालिकों को अधिग्रहण की सूचना, क्लेम पेश करते हैं लेकिन सैक्शन 16 या 17 (भाग-3) में कानून का अन्यायपूर्ण चेहरा उजागर होता है. इस के अंतर्गत किसी की भी भूमि शांतिपूर्ण या जबरन लेने का स्पष्ट प्रावधान है. मौजूदा भूमि अधिग्रहण कानून के भाग-2 के सैक्शन 38 से 41 में निजी कंपनियों के भूमि अधिग्रहण का प्रावधान है. इस में कहा गया है कि सरकार शांति से या जबरन कब्जा ले सकती है.

इसी तरह उद्योगों को आम आदमी की कीमत पर स्थापित करने वाला महाराष्ट्र इंडस्ट्रियल डैवलपमैंट ऐक्ट-1961 है जिस में राज्य में औद्योगिक क्षेत्र, उद्योगों की स्थापना के लिए विशेष प्रावधान है. इस के सैक्शन 32 (4) के अंतर्गत भूमि अधिग्रहण की हर तरह की बाधा को दूर करने के लिए सरकार पूरी तरह स्वतंत्र है. यानी यह कानून ही सरकार को निजी कंपनियों के पक्ष में और भूस्वामियों के विरोध में खड़ा करने वाला है. इसीलिए, सरकारें भूमालिकों से जमीन ले कर कौर्पोरेट को दिलाने का काम करती हैं. बौंबे मैट्रोपोलिटन रीजन डैवलपमैंट अथौरिटी ऐक्ट-1974 क्षेत्र में विकास की योजनाओं को निर्देशित करने के लिए है. इस के अध्याय-8 में सैक्शन 32 से 41 तक भूमि अधिग्रहण से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं. इस कानून के सैक्शन-33 के अंतर्गत सरकार कोई भी भूसंपत्ति भूमालिक को 30 दिन पहले सूचना दे कर ले सकती है. अगर भूमालिक शांति से कब्जा नहीं देता है तो बलपूर्वक कब्जा लिया जाता है. 1984 में भूमि अधिग्रहण कानून में केंद्र सरकार ने संशोधन किया जिस में मुआवजे को ले कर प्रावधान किया पर सरकार यह मुआवजा सर्किल रेट पर देती है जोकि बहुत ही कम होता है, इसीलिए मुआवजे के मामले अदालतों में बढ़ते जा रहे हैं.

इसी तरह  भूसंपत्ति की सीलिंग के शिकार ग्रामीण किसान ही नहीं, शहरी लोग भी हैं. केंद्र सरकार का अर्बन लैंड सीलिंग ऐंड रैगुलेशन ऐक्ट-1976 शहरियों की भूसंपत्ति की सीलिंग निर्धारित करता है. यह कानून महाराष्ट्र के ग्रेटर मुंबई (ए कैटेगरी शहरी क्षेत्र, म्युनिसिपल कौर्पोरेशन के 8 किलोमीटर तक), पुणे, शोलापुर, नागपुर, उल्हासनगर, थाणे, नासिक, सांगली में लागू है. इस के सैक्शन-3 के तहत प्रावधान है कि इन क्षेत्रों में कोई भी व्यक्ति सीलिंग सीमा से अधिक भूमि नहीं रख सकेगा. सैक्शन-4 के तहत मुंबई अर्बन संचय क्षेत्र में 500 स्क्वायर मीटर, पुणे में 1000 स्क्वायर मीटर, थाणे, नासिक, सांगली और कोल्हापुर में 1580 स्क्वायर मीटर सीलिंग सीमा तय है. इस से अधिक भूमि सरकार द्वारा ले ली गई.

सरकारों की इसी नीति और कानून के चलते देश के एक दर्जन से अधिक राज्यों में नक्सली आंदोलन फैला और किसानों, मजदूरों, गरीबों में आक्रोश बढ़ता गया. विकास के नाम पर बन रही परियोजनाओं के खिलाफ उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, पंजाब, ?ारखंड, छत्तीसगढ़ सुलगने लगे. किसान, मजदूर, गरीब धरनों, प्रदर्शनों में शामिल होने लगे.

सरकारों की इस तरह की अमानवीय नीतियों के खिलाफ देश भर के कुछ गैर सरकारी संगठन प्रभावित लोगों के समर्थन में जुटे और आंदोलन शुरू हुआ. सरकार से भूमि अधिग्रहण और इस से प्रभावित लोगों को बदले में जमीन, मकान व आजीविका सुनिश्चित कराने वाला कानून बनाए जाने की मांग उठने लगी. हालांकि संप्रग सरकार 2007 में विकास परियोजनाओं से प्रभावित लोगों के लिए पुनर्वास और पुनर्स्थापन बिल ले कर आई पर 2009 में वह गिर गया. सरकार के भीतर कुछ मतभेदों को ले कर इस बिल में भी मुआवजा, अधिग्रहण से पूर्व जमीन मालिकों की सहमति जैसे मुद्दों को ले कर विलंब होता रहा.

कहा जाता है कि इस कानून का उद्देश्य भूमिहीन परिवारों के लिए जमीन मुहैया कराना और अधिग्रहण की चपेट में आए किसानों, मकान मालिकों को पर्याप्त मुआवजा, आजीविका व पुनर्वास को सुनिश्चित करना है. यह बिल विकास के लिए अधिग्रहण होने वाली भूमि के मालिकों के अधिकारों को मजबूती देगा. भूमि सुधार के लिए समयसमय पर कानून बनते रहे हैं पर मौजूदा भूमि वितरण की व्यवस्था जातिगत सामाजिक व आर्थिक आधार पर की जाती है. बड़ी संख्या में जमीनों के मालिक ऊंची जातियों के हैं तो किसान मध्यम और कृषि मजदूर बड़ी संख्या में दलित व आदिवासी हैं. उन के पास कोई जमीन नहीं है. खेतों में मेहनत यही वर्ग करता है पर उन के लिए कोई सामाजिक, आर्थिक सुविधा, सुरक्षा नहीं है.

1997 की 9वीं योजना के ड्राफ्टपेपर के अनुसार, 77 फीसदी दलित और 90 फीसदी आदिवासी या तो कानूनन भूमिहीन हैं या वास्तव में भूमिहीन हैं.

  1. अब जरा नए बिल की कुछ खास बातों पर गौर करते हैं : 
  2. जमीन संबंधी नई नीति केवल गाइडलाइन उपलब्ध कराएगी और जमीन राज्य का विषय होगा. भूमि विवाद सुल?ाने के लिए लैंड ट्रिब्यूनल की स्थापना की जाएगी.
  3. भूमिहीन को 0.1 एकड़ (4,356 स्क्वायर फुट के बराबर) से कम जमीन नहीं मिलेगी. जमीन परिवार की वरिष्ठ महिला सदस्य के नाम होनी चाहिए.
  4. पिछले समय धर्म, शिक्षा का कारोबार और प्लांटेशन जैसी फर्जी योजनाएं खूब फलीफूलीं. सरकारों ने इन्हें कौडि़यों के भाव जमीनें बांटीं लेकिन नए बिल में धार्मिक, शैक्षिक, अनुसंधान और औद्योगिक संगठनों के साथसाथ प्लांटेशन के लिए कोई जमीन नहीं मिलेगी.
  5. बिल के अनुसार, राज्य स्तर पर भूमि बैंक की स्थापना की जाएगी.
  6. नए बिल में जमीन कहां से आएगी, इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि भूदान, वक्फ की जमीन के कब्जों को हटा कर सरकारें जमीन अपने कब्जे में ले सकेंगी. बिल में कुछ संस्थाओं के लिए जमीन की सीलिंग निर्धारित कर दी गई है. धार्मिक, शैक्षिक, चैरिटेबल संस्थाओं की जमीन 15 एकड़ से अधिक न हो सकेगी.

बिल में राज्य में सिंचाई के लिए10 एकड़ और गैर सिंचाई के लिए15 एकड़ जमीन की सीलिंग तय की गई है.दरअसल, दिखने में यह बिल बड़ा अच्छा है. मानो इस से भूमिहीनों, गरीबों, दलितों, पिछड़ों की जमीन व घर की समस्याएं खत्म हो जाएंगी और विस्थापितों को मुआवजा मिल जाएगा लेकिन जैसा कि हमारे देश के अन्य कानूनों का हश्र होता आया है, इस में भी नौकरशाहों की मरजी पर कोई अंकुश की बात नहीं है. भूमि अर्जन पर मुआवजे से ले कर पीडि़त को अन्यत्र जमीन और मकान देने के प्रावधान पर कलैक्टर का हुक्म हावी रहेगा. हमेशा की तरह गरीबों, भूमिहीनों का माईबाप कलैक्टर ही होगा. मुआवजा आसानी से मिल जाएगा, बिना घूस दिए, इस बात की कोई गारंटी नहीं है.

लेकिन हां, इस बिल में कुछ बातें जरूर ठीक हैं. मसलन, अधिगृहीत की जाने वाली जमीन को किनकिन लोकहित के लिए उपयोग में लाया जाएगा, इसे स्पष्टतौर पर परिभाषित किया गया है. भारतीय किसान यूनियन के महामंत्री युद्धवीर सिंह कहते हैं कि इस में किसानों के लिए पर्याप्त मुआवजे का प्रावधान नहीं है. जिन जमीनों का अधिग्रहण किया गया है उन्हें अभी भी बुनियादी हक नहीं मिल पाया है.

भाजपा नेता सुषमा स्वराज कहती हैं कि हम ने 12 सु?ाव दिए थे जिन पर सरकार सहमत है. हम ने सरकार से कहा कि जब आप भूमि अधिगृहीत करते हैं तो अपने मूल किसान को 50 प्रतिशत मुआवजा देंगे, इस पर सरकार सहमत थी. राज्य सरकार अपने खुद के कानून बना सकेगी, इस की इजाजत केंद्र देने के लिए राजी है. जैसा कि जमीन लीज का मामला राज्य का विषय है, यह मांग भी स्वीकार की गई कि भूमि अधिग्रहण के अलावा भूमि डैवलपर्स को लीज पर दी जा सकेगी, ताकि उस का मालिकाना हक किसानों के पास रह सके और वे इस से नियमित आय पा सकें.

भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता धर्मेंद्र कुमार मलिक कहते हैं कि नए भूमि अर्जन विधेयक से किसानों को कोई फायदा नहीं मिलेगा. इस में बहुफसली भूमि के अधिग्रहण के लिए जो अपवाद की बातें जोड़ी गई हैं उन से जब चाहे कोई कलैक्टर किसी भी जिले की बहुफसली जमीन का अधिग्रहण कर सकेगा. दरअसल, आजादी के बाद से ही भूमि सुधार की प्रक्रिया चलती रही है. पहले जमींदारी प्रथा का उन्मूलन हुआ और हर पंचवर्षीय योजना में भूमि सुधार के लिए नीतिनियमों को शामिल किया गया. सभी राज्य सरकारों से कहा गया कि कृषि भूमि सीलिंग ऐक्ट और अधिकतम भू अधिग्रहण सीमा को ले कर कानून बनाएं और भूमिहीनों व सीमांत किसानों को सरप्लस जमीन बांटी जाए.

1961 तक करीब सभी राज्य सरकारों ने कृषि भूमि सीलिंग कानून पारित कर दिए थे. जागीरदारी प्रथा उन्मूलन के पूरी तरह नाकाम रहने के परिणामस्वरूप योजना आयोग ने 1955 में सभी राज्य सरकारों को अधिग्रहण व भूमिहीनों और अन्य सीमांत किसानों को भूमि आवंटन करने के लिए कृषि भूमि जोत की सीलिंग करने की सलाह दी पर कानून (विधि निर्माण) में पूरी तरह से लूपहोल थे और बड़े भूस्वामियों के ही पक्ष में थे.

यह साफतौर पर जाहिर होता रहा कि ज्यादातर राज्य सरकारों ने जानबू?ा कर भूमि सीलिंग कानून में बड़े भूमालिकों के फायदे को देखते हुए विलंब किया. जमीन रिकौर्ड को और सरप्लस जमीन को ट्रांसफर करने में सरकारी नौकरों और बड़े भूमालिकों ने मिल कर खूब आपसी स्वार्थ साधे. नए विधेयक में कहींकहीं जो किंतुपरंतु हैं, उन से नौकरशाही और जमीन व संपत्ति संबंधी पुरानी मिल्कियत वाली सोच को प्रश्रय जरूर मिलेगा. यानी कई चीजें नौकरशाहों की मरजी पर होंगी. किंतुपरंतु  इस में इसलिए लगाया गया है ताकि सरकार अपनी मनमरजी चला सके.

नौकरशाही को मुआवजा देने, विस्थापितों के पुनर्वास के लिए घूसखोरी के रास्ते खुले दिखाई देते हैं. इसे रोकने के लिए कानून में कोई प्रावधान नहीं किया गया है.असल में सरकारों ने उद्योगों को जमीन, कर्ज व सब्सिडी जैसी अनेक सुविधाएं व अधिकार मुहैया करा दिए पर यह उन किसानों, मजदूरों की कीमत पर जो भूस्वामी थे और जो मेहनत करने वाले थे. यह जो बाद वाला वर्ग है वह हमेशा सरकार पर आश्रित रहा और सरकारें पहले वाले वर्ग के इशारे पर चलती रहीं.

इसी वजह से देश दो भागों में बंटा दिखने लगा. एक बड़ा हिस्सा मेहनत करने वालों का और दूसरा सत्ता के साथ मिल कर जमीन, संसाधन हड़प लेने और उस से मिलने वाले फायदे को स्वयं पचा लेने वाला. दरअसल, नया कानून जमीन और संपत्ति के समान वितरण की व्यवस्था प्रदान करेगा. हो सकता है निजी कंपनियों, किसानों और मजदूरों से जुड़े प्रावधानों को ले कर कुछ व्यावहारिक दिक्कतों के चलते कानून को लागू करने में दिक्कतें आएंगी.

अभी भी सामाजिक, सरकारी सोच में बदलाव नहीं आया है. फिर भी देरसबेर लोग जागरूक होंगे तो धीरेधीरे शहरी, बेजमीन, बेघर लोगों को उन का हक मिलने लगेगा और सिर्फ अपना फायदा देखने वाले औद्योगिक जगत की पुरानी सोच में भी धीरेधीरे तबदीली आ पाएगी. जमीन के समान बंटवारे को ले कर चल रहे भेदभाव और नाइंसाफी के खिलाफ अंगरेजों ने करीब 117 साल पहले और अब फिर एक विदेशी महिला सोनिया गांधी ने भूसंपत्ति से जुड़ा हक लोगों को कानून के जरिए दिलाने का प्रयास किया है.

नया बिल उद्योगों, कौर्पोरेट के साथसाथ किसानों, मजदूरों, आदिवासियों की भूमि संबंधी आवश्यकताओं का संरक्षण करने वाला है. देश की संपत्ति में असमान वितरण वाली धार्मिक, सामाजिक और सरकारी व्यवस्था को इस तरह के कानूनों से बदला जा सकता है.