सरिता विशेष

आज लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं को सजा होने पर लोग इतरा रहे हैं जबकि इन हालात के असल जिम्मेदार वे खुद ही हैं. किसी ने भी ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ नेताओं व अफसरों के लिए कुछ नहीं किया. ऐसे में दोष घोटालेबाजों को क्यों दिया जाए? पढि़ए जगदीश पंवार का लेख.

बिहार के 17 साल पुराने चारा घोटाले में राष्ट्रीय जनता दल के मुखिया लालू प्रसाद यादव को सीबीआई विशेष अदालत ने 3 अक्तूबर को जब 5 साल की सजा सुनाई तो ज्यादातर लोगों को सुखद आश्चर्य हुआ. ढाई दशक से भारतीय राजनीति में चर्चित लालू यादव को 1996 में किए गए घोटाले के लिए 5 साल की कैद की सजा हुई है. सजा होने के चलते लालू यादव की संसद सदस्यता स्वत: ही खत्म हो गई.

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सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, 2 या इस से ज्यादा साल की सजा पाने वाला कोईर् भी व्यक्ति सजा होने के 6 साल बाद तक चुनाव नहीं लड़ सकता. यानी कानून के मुताबिक अब लालू यादव न चुनाव लड़ सकेंगे न किसी कुरसी पर रह पाएंगे और सजा पूरी होने के 6 साल बाद यानी पूरे 11 साल बाद ही सक्रिय राजनीति में फिर से आ पाएंगे. 68 वर्षीय लालू यादव तब तक शायद राजनीति करने लायक न रहें.

मामले में लालू यादव के अलावा बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र, जनता दल (यूनाइटेड) सांसद जगदीश शर्मा समेत कई नेता और अधिकारियों को जेल की सजा सुनाई गई है. लालू यादव को 1990 में चाईबासा ट्रेजरी से 37.7 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी के मामले में यह सजा हुई है. उन्हें 5 साल की सजा के अलावा 25 लाख रुपए जुर्माना, जगन्नाथ मिश्र को 4 साल की सजा व 2 लाख रुपए जुर्माना, विधायक आर के राणा पर 30 लाख रुपए जबकि पशुपालन विभाग के 6 अफसरों पर डेढ़डेढ़ करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया गया है. इन अफसरों को भी 5-5 साल की सजा हुई है.

जनवरी 1996 में 950 करोड़ रुपए के चारा घोटाले का परदाफाश हुआ था. जांच शुरू हुई और पशुपालन विभाग के दफ्तरों पर छापे मारे गए. ऐसे दस्तावेज जब्त किए गए जिन से पता चला कि चारा आपूर्ति के नाम पर अस्तित्वहीन कंपनियों द्वारा पैसों की हेराफेरी की गई. बाद में जांच सीबीआई को सौंपी गई. सीबीआई ने लालू यादव को भी आरोपी बनाया और सीबीआई की विशेष अदालत ने 30 सितंबर को उन्हें दोषी करार दिया.

चारा घोटाले में सजा सुनाते हुए विशेष सीबीआई कोर्ट के जज प्रवास कुमार सिंह ने अपने फैसले में लिखा है, ‘‘हम सभी सुनते हैं कि भगवान सर्वशक्तिमान, अंतर्यामी और सर्वव्यापी हैं लेकिन अब देख रहे हैं कि भगवान शब्द की जगह भ्रष्टाचार शब्द को दिलाने की कोशिश हो रही है. यह तब है जब रोजाना भ्रष्टाचाररूपी शैतान को ले कर प्रवचन होते हैं. यह मामला इस का उदाहरण है कि किस प्रकार बड़े राजनेता, नौकरशाह और बिजनैसमेन ने साजिश के तहत सरकारी खजाने को लूटा.’’

इसी समय, 17 साल पुराने एक अन्य मामले में कांग्रेस के सांसद रशीद मसूद को भी 5 साल की जेल हुई है. उन पर आरोप था कि अपने रसूख का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने पात्र छात्रों का हक मार कर अपात्र छात्रों के त्रिपुरा के मैडिकल कालेज में दाखिले कराए थे.

दागी नेताओं के लिए सरकार के अध्यादेश का राहुल गांधी द्वारा विरोध करने के चलते लालू यादव, रशीद मसूद जैसे नेताओं को राजनीति से दरबदर होना पड़ा. राहुल गांधी के इस अध्यादेश को बकवास और फाड़ कर कूड़ेदान में फेंकने लायक बताने के बाद संप्रग सरकार और समूची पार्टी में हलचल मच गई. प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने राहुल गांधी की इच्छा के मुताबिक कैबिनेट मीटिंग बुलाई और फिर सरकार द्वारा अध्यादेश को वापस लेने का ऐलान किया गया.

यह अध्यादेश 24 सितंबर को कैबिनेट द्वारा संप्रग के लालू यादव जैसे सहयोगियों को बचाने के लिए ही लाया गया था ताकि आगामी लोकसभा चुनावों में बहुमत न मिलने की दशा में उन जैसों का फिर सहयोग लिया जा सके. अध्यादेश को वापस लेने से सरकार की खूब किरकिरी हुई है.

10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि 2 या उस से ज्यादा साल की जेल की सजा मिलने पर सांसद या विधायक की सदस्यता तुरंत खत्म मानी जाएगी. कोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व ऐक्ट 1951 के सेक्शन 8(4) को खारिज कर दिया जो सजा पाए सांसदों, विधायकों को 3 महीने में  उच्च न्यायालय में अपील करने तक अयोग्य होने से बचाता था.

संप्रग सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को पलटने के लिए पहले तो कानून में संशोधन लाने की ठानी पर सहमति नहीं बनी. बाद में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सजायाफ्ता सांसद, विधायकों की सदस्यता को बचाने के लिए जनप्रतिनिधित्व कानून (संशोधन एवं विधिमान्यीकरण) अध्यादेश को मंजूरी दी.

अध्यादेश जब राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पास स्वीकृति के लिए भेजा गया तो उन्होंने संशोधन की सलाह दी. राष्ट्रपति को उस की संवैधानिकता व उस के औचित्य पर संदेह था. कानून के जानकारों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8(4) को इसलिए असंवैधानिक ठहराया क्योंकि उस ने इसे संविधान के अनुच्छेद 101 और 102 के अनुरूप नहीं पाया. सरकार ने शुरू में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए संविधान के इन दोनों अनुच्छेदों में संशोधन का प्रस्ताव किया पर इस पर राजनीतिक सहमति नहीं बनी तो उस ने संविधान संशोधन के बिना जनप्रतिनिधित्व कानून को बदलने का कदम उठाया और उस में 2 विवादास्पद प्रावधान जोड़ दिए. इन के अनुसार, सजायाफ्ता सांसद, विधायक की सदस्यता रद्द नहीं होगी.

नेताओं का भ्रष्टाचार    

अदालत का यह फैसला सही है लेकिन साथ ही एक और गलती पूरे देश की है. इस देश ने हमेशा धर्मों और राजाओं को तन, मन, धन सभी कुछ दिया. दोनों हाथों से खूब लुटाया. धर्मगं्रथों में देवताओं, अवतारों, दूसरे नायकों और राजाओं की बेईमानी, चोरी, लूट के सैकड़ों किस्से मौजूद हैं. पुराणों के नायक शिव, राम या कृष्ण, जिन्हें कभी देवता, कभी राजा मान कर पूजा जाता है, आम जनता के लिए करते क्या थे? वे जनता से काम ही लेते थे और हम हैं कि उन किस्सों को श्रद्धा से सुन कर, पढ़ कर खुश होेते रहे. इधर आज के नेता, आज के अफसर लूट रहे हैं, उस पर आपत्ति है जबकि सदियों से उस लूट के आगे सिर नवाते रहे हैं.

आज देश घोटालेबाजों पर तो खूब हायतौबा कर रहा है पर दूसरी तरफ क्या शरीफ, ईमानदारों के साथ सही व्यवहार कर रहा है? क्या हम ने ईमानदारों के लिए कुछ किया, उन्हें क्या दिया?

हम तो सोच कर चल रहे हैं कि दूध के धुले नेताओं को राजनीति चलाने के लिए कुछ नहीं चाहिए. सवाल पूछना जरूरी है कि राजनीति में रहते हुए किसी लोकप्रिय नेता की राजनीति कैसे चलती है? किसी भी विधायक, सांसद, मंत्री और मुख्यमंत्री के घर और दफ्तर में काम कराने के सिलसिले में आनेजाने वाले लोगों का तांता लगा रहता है. आमजन के अलावा उन के पास दूसरे बड़े नेता, अफसर और कभीकभी विदेशी मेहमान भी आते रहते हैं.

नेता के यहां इन सब को चाय पिलाई जाएगी, लोग बिस्कुट भी खाएंगे, ठंडा पानी भी नेता की ओर से आप को पिलाया जाएगा. उन का चपरासी या नौकर आप के लिए खड़ा रहेगा. आप के काम की अर्जी आगे बढ़ाएगा. नेताजी से मिलवाएगा. इन सब के लिए नेताजी को पैसा खर्च करना होता है. क्या किसी नेता का घर और औफिस बिना पैसे के चल सकता है?

वर्ष 2011 में बिहार के विधायकों को वेतन और भत्ते मिला कर करीब 80 हजार रुपए मिलते थे लेकिन बाद में बढ़ाए गए. 1996 में जब चारा घोटाला हुआ था तब लालू यादव मुख्यमंत्री थे और उन्होंने जो इनकम टैक्स रिटर्न भरा था उस के अनुसार, उन के पास मुख्यमंत्री के तौर पर सालाना वेतन और भत्ते मिला कर कुल 9,90,940 रुपए थे. यानी 17 साल पहले इतने बड़े राज्य के मुख्यमंत्री को आज की तुलना में एक विधायक के बराबर पैसा मिलता था. क्या एक बड़े राज्य के मुख्यमंत्री द्वारा मात्र इतने रुपए में घर और राजनीति चलाना आसान है? बिना कहीं और का पैसा लिए जनता की सेवा करना क्या मुमकिन है?

हायतौबा मचाई जा रही है कि सारे मुख्यमंत्री घोटालेबाज हैं, सारे नेता भ्रष्टाचारी हैं. कोई कहता है, इन सब को जेल होनी चाहिए, कोईर् फांसी की वकालत कर रहा है. यानी जनता चाहती है देश के नेता अपनी जेब से पैसा खर्च कर के जनता की, समाज की और देश की सेवा करते रहें. यानी मुफ्त की सेवा.

कहने का मतलब यह नहीं है कि भ्रष्टाचार, घोटाले जायज हैं. उस समय मुख्यमंत्री रहते लालू यादव के सामने अफसरों ने चारे की फाइल रखी होगी तो साइन कर दिए होंगे. उन की वकालत करने का हमारा कोई इरादा नहीं है. यह बात सही है कि दस्तावेजों पर साइन मुख्यमंत्री के होने के कारण कानून की नजर में दोषियों में भी वे गिने जाएंगे.

पर यह घोटाला तो लालू यादव के मुख्यमंत्रित्व काल से पहले से चला आ रहा था. 1985 में तब के सीएजी टी एन चतुर्वेदी ने मुख्यमंत्री चंद्रशेखर सिंह को पत्र लिख कर चारा खरीद में चल रहे घोटाले की जानकारी दी थी. उस के बाद मुख्यमंत्री और अफसर आतेजाते रहे और चारा घोटाले में शामिल रहे. उन्हें बारबार सचेत किया गया पर कोई ठोस कार्यवाही नहीं हुई. घोटाला दशकों तक चलता रहा और इस में मुख्यमंत्री से ले कर अफसर व दूसरे कर्मचारी शामिल रहे. घोटाले में 55 मुकदमे दर्ज हुए थे. लालू यादव 3,200 करोड़ रुपए के चारा घोटाले मामले में आरोपी बनाए गए.

यहां मकसद लालू यादव का पक्ष लेना नहीं है. हां, ठीक है लालू यादव ने घोटाला किया और उन्हें सजा मिलनी चाहिए लेकिन सवाल यह है कि जनता धर्म के नाम पर साधु, संतों,

गुरुओं को खूब पैसा चढ़ा रही है, क्रिकेट, फिल्मों पर खूब खर्च कर रही है लेकिन आसाराम जैसे तथाकथित संत, क्रिकेट खिलाड़ी, फिल्म अभिनेता देश को क्या दे रहे हैं? क्या इन का किसी तरह के सामाजिक प्रशासनिक या आर्थिक उत्थान में कोई योगदान है?

बिहार में कर्पूरी ठाकुर के बाद दलित, पिछड़ों में सामाजिक, राजनीतिक जागृति पैदा करने में लालू के योगदान को कौन भुला सकता है. लालू गांवों में गरीबों के घर खाट पर जा बैठते थे. उन का सुखदुख पूछते, पढ़ाईलिखाई के मकसद से चरवाहा स्कूल खुलवाए, गंदी बस्तियों में पानी के टैंकर ले जा कर बच्चों को नहलाते थे और साफसफाई का महत्त्व समझाते थे. यह भले ही जनसंपर्क की कलाबाजी हो पर वे गरीब, अनपढ़ों में एक चेतना जगाने का काम करते थे.

धर्म के धंधेबाजों के पास जा कर जनता लुटपिट रही है, अपनी बेटियों तक को दांव पर लगा रही है. क्रिकेट आप का केवल मनोरंजन कर रहा है, मुफ्त में नहीं, पैसा खर्च करना पड़ता है. क्रिकेट में परदे के पीछे क्या होता है, चौकों, छक्कों पर तालियां पीटने वाली जनता को पता ही नहीं होता कि वे जो खेल देख रहे हैं वह तो नूराकुश्ती है. बात जब खिलाडि़यों, टीम मैनेजरों और सट्टेबाजों के बीच फिक्सिंग की सामने आती है तब आंखें खुलती हैं. आप माथा पीटते हैं, रोते हैं, गालियां देते हैं. क्या यह घोटाला नहीं है? और इन घोटालेबाजों को जनता अपनी जेब से खुशीखुशी पैसे दे रही है. फिल्मकारों के लिए भी आप सर्कस के तमाशे की तरह पैसा बहा रहे हैं.

दिखने में राजनीतिबाजों का रुतबा बड़ा आकर्षक लगता है. सुरक्षाकर्मियों का घेरा, हैलिकौप्टर या हवाईर् जहाज का सफर, हरदम जनता या बाहरी मेहमानों से घिरे रहना. पर यह लालू यादव के लिए नहीं, यह तो राज्य के मुख्यमंत्री की सुरक्षा, स्टेटस और ड्यूटी के लिए आवश्यक होता है, वह चाहे कोई भी हो.

अगर भारतीय राजनीति से 100-150 नेताओं को निकाल दिया जाए तो क्या देश चल सकेगा? संसद में अभी कई नेता ऐसे हैं जो लालू, रशीद मसूद की तरह सदस्यता गंवाने वाले हैं. इन में भाजपा के 18, कांग्रेस के 14 और अन्य दलों के 14 सांसद हैं, उन पर लगे आरोप साबित हुए तो उन की संसद सदस्यता जा सकती है. ये तमाम भ्रष्ट नेता हमारे ही दिए हुए तो हैं.

सवाल है कि यह देश भ्रष्टाचारियों पर तो इतना हल्ला मचा रहा है पर उस ने ईमानदार नेताओं, अफसरों को क्या दिया?ईमानदार इसलिए नहीं आ पाते क्योंकि हमारा व्यवहार उन के लिए ठीक नहीं है. आप शरीफ नेताओं की मांग करते हैं पर हम ने शरीफ, ईमानदार नेताओं और अफसरों के साथ कैसा सुलूक किया?

देश के पहले राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद अपना कार्यकाल खत्म कर के दिल्ली में रहने के बजाय बिहार अपने गांव लौट गए. वहां वे अपने टूटेफूटे घर में रहे. उन के पास कोई नौकरचाकर भी नहीं था. वे अपनी धोती स्वयं धोने से ले कर सारा काम करते थे. उन के पास कोई बैंक बैलेंस नहीं था. प्रधानमंत्री रहे लाल बहादुर शास्त्री अपनी ऐंबैसडर कार का कर्ज तक नहीं चुका पाए थे. प्रधानमंत्री रहे गुलजारी लाल नंदा दिल्ली के लाजपत नगर में एक कमरे के मकान में रहते थे. हमेशा आर्थिक तौर पर कमजोर रहे.

दूसरी ओर ऐसे राष्ट्रपति भी आए जो राष्ट्रपति भवन में जब आए तो केवल 2 ट्रक सामान के साथ और जब गए तब 22 ट्रकों में सामान भर कर निकले थे. हम बात प्रतिभा देवी सिंह पाटिल की कर रहे हैं. इस बारे में उस समय अखबारों में खूब छपा था. हौकी में स्वर्ण पदक दिलाने वाले ध्यानचंद के पास इलाज के पैसे नहीं होते थे. आज क्रिकेट खिलाड़ी सिर्फ धन बटोर रहे हैं. सामाजिक बुराइयों पर अपने नाटकों के जरिए समाज में संदेश फैलाने वाले महाराष्ट्र के नाटककार विजय तेंदुलकर कब मरे, क्या हुआ, पता नहीं. देश ने ऐसे लेखक को याद भी नहीं किया.

अभी देश सचिन तेंदुलकर के संन्यास पर विलाप कर रहा है. उन के रनों, शतकों, टैस्ट मैचों पर टैलीविजन चैनल व्यस्त दिखाई दे रहे हैं और अखबारों के पन्ने भरे जा रहे हैं. कथित उपलब्धियों के गुणगान किए जा रहे हैं. और तो और, सचिन तेंदुलकर को भगवान का दरजा दे कर पूजा की हद तक देश पहुंच गया है लेकिन उन का जिस खेल से संबंध है वह खेल सट्टेबाजों, सौदागरों, डौन, माफियाओं, अपराधियों से जुड़ा रहा है. दशकों से इन अपराधियों का इस खेल में बोलबाला रहा. देश, समाज को इस से क्या मिला? सट्टेबाज, माफिया पैदा नहीं किए? चीन, अमेरिका इस खेल के कायल नहीं हैं फिर भी तरक्की में इन देशों की गिनती भारत से ऊपर है.

वैज्ञानिक हरगोविंद खुराना की भारत ने उपेक्षा की. काम नहीं मिला तो उन्हें बाहर जाना पड़ा. यानी जो ईमानदार, शरीफ होता है वह मारा जाता है. भ्रष्ट नेताओं और माफियाओं के लिए सांसत पैदा करने वाले महाराष्ट्र के चर्चित नौकरशाह जी आर खैरनार गुमनामी में जी रहे हैं. उन्हें केवल अपनी पैंशन से गुजारा करना पड़ रहा है. खैरनार ने कहा था कि एक समय शरद पवार और उन के परिवार की माली हालत एक जैसी थी. आज पवार का परिवार विशाल आर्थिक साम्राज्य का मालिक है जबकि खैरनार की बहन आज भी घरों में बरतन मांज कर अपना गुजारा चलाती हैं.

भ्रष्टाचार के खिलाफ देशभर में मुहिम चलाने वाले अन्ना हजारे को हम ने क्या दिया. वे आज भी अपने पुराने आश्रम में हैं. भ्रष्टाचार में उन का साथ देने का दंभ भरने वाले अन्यत्र चले गए. यानी हम ईमानदार अफसर तो चाहते हैं पर हम ने उन्हें क्या दिया या क्या देते हैं?

इन हालात के लिए गलती हमारी है. हम ने ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ, शरीफ नेता, अफसर, शिक्षक, समाजसेवी के साथ व्यवहार ठीक नहीं किया. ऐसे में अगर लालू यादव जैसे नेताओं के घोटाले सामने आते हैं और उन्हें सजा मिलती है तो यह दोष घोटालेबाजों को क्यों दिया जाए? जब हम ने ईमानदार नेताओं और नौकरशाहों के लिए कुछ किया ही नहीं तो राजनीति व लोकसेवा के क्षेत्र में शरीफ लोग क्यों, कैसे आएंगे. फिर लालू यादव का क्या कुसूर है?

देश का रुदन भ्रष्टाचारियों, बेईमानों, घोटालेबाजों को ले कर तो है लेकिन ईमानदारों, शरीफों के साथ सितम किया जा रहा है. उन की उपेक्षा की जा रही है. कोई भी देश अच्छा, अपने नागरिकों की वजह से बनता है. नागरिक अच्छे हैं तो देश अच्छा होगा लेकिन जिस देश की रगरग में बेईमानी, भ्रष्टाचार, अकर्मण्यता भरी हो वह ईमानदार नेताओं की उम्मीद करे, यह कैसे संभव है? ऐसे में अच्छे लोग कहां से आ पाएंगे जो देश को निष्पक्ष, ईमानदार और भ्रष्टाचारमुक्त नेतृत्व प्रदान करेंगे.

 

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