सरिता विशेष

देश की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव के साथ दिल्ली में आई ‘आप’ की सरकार 49 दिनों में ही भ्रष्ट और निकम्मी व्यवस्था की बलि चढ़ गई. सरकार बनते ही अरविंद केजरीवाल की आक्रामक कार्यशैली से घबराए भाजपा व कांग्रेस ने इस बार संविधान और नियमकानूनों की आड़ में उम्मीदों से भरी आम आदमी पार्टी की सरकार को लील लिया. पेश है जगदीश पंवार का यह विश्लेषण.

देश के राजनीतिक इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब कोई पार्टी अपनी सत्ता बचाने के लिए हाथपैर मारने के बजाय बेईमान, भ्रष्ट और अकर्मण्य व्यवस्था में परिवर्तन के लिए कुरसी को ठुकरा कर विपक्ष को ललकारते हुए दिखाई दे रही हो और सरकार के जाने के लिए सफाई विपक्षी दलों को देनी पड़ रही हो.

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दशकों से नियमकायदों के नाम पर चलाई जा रही भ्रष्ट, अकर्मण्य, बेईमान और उलझाऊ व्यवस्था का नमूना एक बार फिर 14 फरवरी को दिल्ली में उस समय देखने को मिला जब एक चुनी हुई बहुमतप्राप्त आम आदमी पार्टी यानी ‘आप’ की सरकार को नियमकायदों के नाम पर जनलोकपाल बिल पेश नहीं करने दिया गया. संविधान और नियमकायदों के नाम पर रची गई जिस बेईमान और अकर्मण्य व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष के लिए ‘आप’ नेता अरविंद केजरीवाल सियासी मैदान में उतरे थे, उसी व्यवस्था ने महज 49 दिन पुरानी उन की सरकार को लील लिया. लेकिन अरविंद केजरीवाल नियमकायदों के नाम पर गूंथे गए चक्रव्यूह में फंसने के बजाय उसे भेदने का इरादा जाहिर करते व सत्ता की परवा न करते हुए चुनावी मैदान में आ खड़े हुए हैं. उन्होंने एक बार फिर परंपरागत राजनीतिक दलों के सामने चुनौती पेश कर दी है.

केजरीवाल पर तरहतरह के आरोप लगाए जा रहे हैं. विपक्ष द्वारा केजरीवाल पर भाग खड़े होने का आरोप लगाया गया. कहा गया कि केजरीवाल अब सत्ता के फंदे से मुक्ति चाहते हैं. वे वादों से भाग रहे हैं और उन की निगाह केंद्र के सिंहासन पर है. विपक्ष ने आम आदमी पार्टी को अयोग्य, सत्ता चला पाने में नाकाबिल साबित करने का कोई मौका नहीं गंवाना चाहा. यह वही विपक्ष है जिस ने कभी अपने गिरेबां में नहीं झांका. आप को नकारा बताने वाले भाजपा जैसे दल भूल जाते हैं कि जिन राज्यों में उन की सरकारें हैं वहां कितना भ्रष्टाचार फैला है. लेकिन केजरीवाल तो असल में भागे नहीं हैं, दशकों से बेईमान, निकम्मी व्यवस्था ने उन को उलझाने की कोशिश की पर उन्होेंने संविधान और नियमकायदों के नाम पर रचे गए चक्रव्यूह में फंसने के बजाय बाहर आ कर उसे भेदने के लिए जनता के सामने जाना उचित समझा.

आखिरी मुद्दे में था केंद्र सरकार का एक नियम, जिस के मुताबिक दिल्ली सरकार को कोई भी विधेयक पेश करने से पहले उपराज्यपाल या केंद्र सरकार की अनुमति लेनी जरूरी है. केजरीवाल सरकार का कहना था कि इस से पहले शीला दीक्षित सरकार ने एक के बाद एक 13 विधेयक बिना उपराज्यपाल या केंद्र की मंजूरी के पारित करवाए थे लेकिन कांग्रेस और भाजपा जनलोेकपाल विधेयक को असंवैधानिक तरीके से रखने की बात कहती रहीं. आखिरकार, विधेयक को पेश करने पर वोटिंग हुई, जिस में पक्ष में 27 जबकि विपक्ष में 42 वोट पड़े.

लोकतंत्र का नायक

28 दिसंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में बतौर मुख्यमंत्री शपथ लेने वाले केजरीवाल का कार्यकाल इतना उथलपुथल भरा रहा कि आधेअधूरे राज्य के मुख्यमंत्री होते हुए भी वे पूरे देशभर  में चर्चित रहे. उन की नीतियों, फैसलों पर देश की निगाहें लगी रहीं. मीडिया में नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी से ज्यादा चर्चा केजरीवाल की होने लगी. 8 दिसंबर को जब दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित हुए तो अचानक मीडिया को लोकतंत्र का नया हीरो मिल गया.

केजरीवाल देश की राजनीति की नई उम्मीद बन कर उभरे लेकिन इस से विपक्षी दलों, खासतौर से भाजपा को खतरा नजर आने लगा. तमाम राजनीतिक दलों ने पूरी ताकत के साथ उन्हें नाकाम साबित करने के प्रयास शुरू कर दिए. भाजपा और कांग्रेस दोनों राष्ट्रीय दल ‘आप’ पर हमलावर होने लगे. केजरीवाल सरकार की बातबात पर आलोचना की जाने लगी.

व्यवस्था को चुनौती

केजरीवाल सरकार ने अपने थोड़े से समय में जो कुछ किया, उस से घबराए और बौखलाए विपक्ष द्वारा उन के हर कदम को नौटंकी करार दिया जाने लगा. विपक्ष उन्हें अराजक साबित करने पर तुल गया.

केजरीवाल के फैसलों से भ्रष्ट, बेईमान व्यवस्था की चूलें हिलने की आशंका पैदा हो गई. इस व्यवस्था को पालपोस रहे राजनीतिक दलों ने पूरे जोरशोर से केजरीवाल में जबरदस्ती कमियां निकालनी शुरू कर दीं.

असल में केजरीवाल के कुछ कड़े कदमों से कांगे्रस और भाजपा के नेताओं में खलबली मच गई. व्यवस्था में रह कर व्यवस्था के खिलाफ काम करना भ्रष्ट, बेईमान व्यवस्था को रास नहीं आया और कदमकदम पर अड़ंगेबाजी शुरू कर दी गई. केजरीवाल के ज्यादातर फैसले व्यवस्था को चुनौती देने वाले रहे. उन्होंने कांग्रेस के कुछ नेताओं पर सीधा हमला बोला. बेईमानी को उजागर करने वाले कदम उठाए. ऐसे में कांग्रेस व विपक्ष को डर था कि अगर सत्ता  में ‘आप’ रही तो उन की सभी कारगुजारियों का कच्चा चिट्ठा जनता के सामने खुल जाएगा.

जनलोकपाल विधेयक बिना केंद्र या उपराज्यपाल की अनुमति के पारित करने का प्रस्ताव रखने का विपक्ष समेत उपराज्यपाल ने विरोध किया लेकिन केजरीवाल ने विधेयक के लिए अनुमति को गैरजरूरी बताया. कांग्रेस और भाजपा ने लगातार नियमों के उल्लंघन का मामला उठा कर कानूनी जाल बिछाना शुरू कर दिया था.

पूरे किए वादे

रामलीला मैदान में केजरीवाल सरकार ने जब शपथ ली थी तो सरकार के एजेंडे में 18 कार्यों की सूची थी. सत्ता में आने के कुछ घंटों बाद ही दिल्ली सरकार ने घरेलू इस्तेमाल के लिए 400 यूनिट तक की बिजली खपत में 50 फीसदी तक दाम कम करने का आदेश दे दिया. इस के साथ ही बिजली वितरण कंपनियों के खिलाफ सीएजी औडिट का आदेश पारित किया गया. इस से पहले बिजली कंपनियां अदालत के नाम पर औडिट न कराने की बात कहती रहीं लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने औडिट पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. 20 हजार लिटर पानी मुफ्त देने का ऐलान किया गया.

8 जनवरी को भ्रष्टाचार की शिकायत दर्ज कराने के लिए हैल्पलाइन शुरू की गई. इस में शुरुआती 20 दिनों में 1 लाख से ज्यादा शिकायतें आईं. नर्सरी दाखिले में निजी स्कूलों की मनमानी को रोकने के लिए शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने हैल्पलाइन की शुरुआत की. सभी सरकारी अस्पतालों में जेनेरिक दवाएं अनिवार्य करने का फैसला किया गया. सरकार ने डीटीसी ड्राइवर, कंडक्टर, स्कूल टीचर, सहित कई विभागों के ठेका कर्मचारियों को पक्का करने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया. समिति को 1 महीने के अंदर रिपोर्ट देने को  कहा गया था.

रसोई गैस मूल्यवृद्धि मामले में पैट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली, पूर्व मंत्री मुरली देवड़ा और उद्योगपति मुकेश अंबानी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने का आदेश दिया गया. इस के लिए 4 प्रमुख लोगों ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से शिकायत की थी.

दिल्ली में वीआईपी कल्चर खत्म करना प्राथमिकता में था. स्वयं केजरीवाल ने लालबत्ती लगी गाड़ी लेने से मना कर दिया. केजरीवाल खुद अपनी गाड़ी से चलते थे. सुरक्षा का कोई तामझाम नहीं. रेड लाइट पर आम जनता की तरह रुकते थे. अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों और सरकारी अफसरों की गाडि़यों से लालबत्ती उतरवा दी. मंत्रियों के लिए बने बंगले खाली ही रहे.

खिसियाए विपक्षी दल

जनलोकपाल के माध्यम से कांग्रेस के पिछले 15 साल और नगर निगम में भाजपा के 7 साल के शासन में हुए घोटालों की जांच होनी थी. केजरीवाल सरकार ने टैंकर माफिया राज खत्म करने की पहल की. राजनीतिक दलों की शह पर दिल्ली में टैंकर माफिया सक्रिय था. इस से लोगों को पानी नहीं मिल पाता था. इसे खत्म करने के लिए इन्हें संरक्षण देने वालों के खिलाफ सख्त कार्यवाही का अभियान चलाया गया. जल बोर्ड के कुछ अधिकारियों के खिलाफ कदम उठाए गए और बड़ी संख्या में तबादले किए गए.

ऐंटी करप्शन ब्रांच का चेहरा बदल दिया गया जिसे दिल्ली की जनता जानती नहीं थी. इस विभाग में ईमानदार अफसरों के लिए केंद्रीय गृहमंत्रालय को लिखा गया पर केंद्र की ओर से सकारात्मक जवाब नहीं दिया गया. यहां भी केंद्र ने निकम्मापन दिखाया और जनहित से जुड़े काम को पूरा न होने दिया.

केजरीवाल सरकार ‘स्वराज बिल’ भी लाना चाहती थी. स्वराज बिल स्थानीय विकास का बजट व एजेंडा जनता के हाथ सौंपने का बिल है. इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए आप सरकार रैजिडैंट वैलफेयर एसोसिएशन की भागीदारी योजना का बजट शून्य करने की तैयारी में थी. कानून बनने पर स्वराज बिल निगम पार्षदों के बजट को भी शून्य कर देता. इस के अनुसार, आबादी के हिसाब से महल्ला सभाएं बनाई जातीं. 1 हजार परिवार पर 1 महल्ला सभा के हिसाब से दिल्ली में करीब 3 हजार महल्ला सभाएं होतीं. उन के अपनेअपने स्थानीय सचिवालय होते. वे अपने प्रतिनिधि चुनतीं. विधायक और पार्षद इस के अनिवार्य सदस्य होते. महल्ला सभाएं प्राप्त धन का अपनी योजनाओं के मुताबिक आवंटन कर खर्च कर सकतीं.

विवादों का साया

वहीं, सरकार के खाते में कुछ विवाद भी जुड़े. दिल्ली के कानून मंत्री सोमनाथ भारती का अफ्रीकी महिलाओं पर ड्रग और सैक्स रैकेट में शामिल होने का आरोप लगाया गया और पुलिस कार्यवाही न होने पर दिल्ली सरकार को रेल भवन पर धरने पर बैठना पड़ा था. इसे ले कर विपक्ष ने अरविंद केजरीवाल सरकार पर अराजकता का आरोप लगाया. केजरीवाल ने दिल्ली में चल रहे ड्रग और सैक्स रैकेट पर  कार्यवाही न करने पर पुलिस के कुछ अफसरों को हटाने की मांग की थी पर केंद्रीय गृह मंत्रालय टस से मस नहीं हुआ. उलटे, दिल्ली सरकार को ही दोषी ठहराने पर तुल गया. सोमनाथ भारती पर एफआईआर दर्ज करा दी गई. उन्हें दिल्ली महिला आयोग की ओर से नोटिस भिजवाया गया. जनलोकपाल बिल पारित न होने देने के कारण विधानसभा में जोरशोर से भारती को हटाने की मांग उठाई गई. दरअसल ‘आप’ सरकार के बहुत तेजी से किए गए कामों से भाजपा व कांग्रेस को अपनी सियासी जमीन खिसकती नजर आई. सत्ता के भूखे इन दलों को ‘आप’ की ईमानदारी नागवार गुजरी. इसलिए नियमकायदों की आड़ में उन्होंने अपना असली रंग दिखा दिया.

देश के 95 प्रतिशत व्यापारी, किसान, दुकानदार और आम लोग ईमानदारी से काम करना चाहते हैं. लेकिन वह पूरी तरह से ऐसी बना दी गईर् है कि व्यवस्था इन सब को चोर, बेईमान की तरह देखती है. हर छोटेछोटे सरकारी काम के लिए सरकारी तंत्र के पास कागजातों की लंबी फेहरिस्त होती है. ये सब कागज देने के बाद भी लोगों का काम नहीं हो पाता, जब तक कि मोटी रिश्वत न दी जाए. सरकारी कामों में तमाम तरह की अडं़गेबाजी जानबूझ कर लगाई  जाती है ताकि घूस मिल सके.

इस देश का आम आदमी रोजीरोटी, पहनने को कपड़े, सिर पर छत, बिजली, पानी, बच्चों की पढ़ाईलिखाई, बीमार का इलाज, परिवार व बच्चों की सुरक्षा और एक अच्छी न्याय व्यवस्था चाहता है. लेकिन आजादी के 65 सालों बाद भी यह संभव नहीं हो पाया है. राजनीतिक और सरकारी तंत्र ने मिल कर ऐसा स्वार्थी ढांचा विकसित कर लिया है कि बिना घूसखोरी के कोई काम नहीं होता.

देश की राजनीतिक, सामाजिक व्यवस्था में बुराइयां भरी पड़ी हैं लेकिन देश व समाज चलाने वालों को बुराइयां नहीं दिख रहीं. वे इन्हें संस्कृति, सामाजिक, संवैधानिक परंपराएं कह कर गर्व करते हैं. व्यवस्था को बड़े व्यवस्थित तरीके से व्यवस्था के नाम पर भ्रष्ट किया गया. संसद से ले कर सचिवालय तक ऐसी व्यवस्था है जिसे सरकारी तंत्र कहा जाता है. और यह तंत्र जनता के लिए बनाया गया है लेकिन इसी सरकारी तंत्र में पहुंच कर पढ़ालिखा व्यक्ति भी अकर्मण्य हो जाता है.

केजरीवाल ने इस काजल की कोठरी में कदम रखा तो उन्होंने गंदगी को ढकने से इनकार कर दिया, जैसा कि दूसरे दल और उन के नेता करते रहे हैं. इस गंदगी की सफाई करने का इरादा जता कर जनता को बताने बाहर आ गए कि देखो, ये लोग सफाई होने नहीं देंगे.

केजरीवाल ने जिस सत्तातंत्र पर हमला किया है वह इस देश के साधारण लोगों का कोई समूह नहीं है जो इस नेता को स्वीकार कर ले. वह एक बहुत सुव्यवस्थित और संगठित भ्रष्टतंत्र है. वह ऐसी व्यवस्था है जो हर ईमानदार को बहुत प्यार से भ्रष्टाचार का संस्कार सिखाने में सक्षम है. सत्तातंत्र केजरीवाल को भी समझाने की कोशिश कर रहा है कि वे सुविधा न ले कर व्यवस्था को कमजोर कर रहे हैं. लेकिन केजरीवाल मजबूती से, सादगी से यथार्थ की जमीन पर खड़े हो कर इस व्यवस्था को ही ललकार रहे हैं.

संविधान के नाम पर जनलोकपाल बिल पारित न किए जाने के इस टकराव को देखा जाए तो इस में जीत अरविंद केजरीवाल की ही हुई है. पोल खुली है तो राजनीतिक दलों की उस निकम्मी, बेईमान सोच की खुली है जो जनता और देश के नाम पर हांहां तो करती रहती है पर काम नहीं करती. नियमकायदों के नाम पर अड़ंगे डालती रहती है. कांग्रेस और भाजपा दोनों कहती हैं कि वे तो जनलोकपाल बिल पारित कराने को तैयार थीं पर यह संवैधानिक तरीके से रखा जाना चाहिए था. अगर यह संवैधानिक नहीं था तो क्या कांग्रेस और भाजपा ने मिल कर केंद्र या उपराज्यपाल को लिखा कि वह आदेश रद्द किया जाए ताकि हम  मिल कर भ्रष्टाचार को खत्म करने वाला जनलोकपाल बिल पास कराने में सहयोग करें.

कांग्रेस व भाजपा एकजुट

असल में राजनीतिक दल चाहते ही नहीं कि जमीजमाई भ्रष्ट व्यवस्था पर कोई आंच आए. यही कारण है कि इस मामले में चोरचोर मौसेरे भाई की तर्ज पर कांग्रेस और भाजपा दोनों मिल कर एकजुट दिखाई दीं. व्यवस्था का फायदा उठा रहे लोग केजरीवाल के काम को किसी भी तरह से खारिज कर दें पर जिस व्यवस्था को आजादी के 65 साल बाद भी देश स्वीकार नहीं कर पाया है, केजरीवाल की उसी व्यवस्था को बदलने की जिद है. और देश भी यही चाहता है. लोकतंत्र में जनता की इच्छा बड़ी होती है या केंद्र सरकार के तानाशाही आदेश. दिल्ली विधानसभा में जनलोकपाल बिल पेश न करने देना लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं, तानाशाही नजर आई.

ऐसे तानाशाहीपूर्ण आदेशों, नियमकायदों को क्या हटाया नहीं जाना चाहिए. ये कानून लोकतंत्र के बजाय तानाशाही को प्रश्रय देते प्रतीत होते हैं.  

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