सरिता विशेष

जातीय नफरत का भेडि़या इस बार देशभक्ति की खाल में है. हैदराबाद सैंट्रल यूनिवर्सिटी से निकल कर अब यह राजधानी दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में घुस आया. हैदराबाद में रोहित वेमुला का शिकार करने के बाद उस ने अब कन्हैया कुमार को दबोच लिया है. देशभर के विश्वविद्यालय, खासतौर से केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कैंपस उबल रहे हैं. देश 2 भागों में बंटा दिखाईर् दे रहा है. देशभक्ति पर बहस छिड़ी हुई है. एक कन्हैया कुमार को राष्ट्रद्रोही साबित करने पर तुला है तो दूसरा देशभक्त. सरकार पर विरोधी विचारों के दमन के आरोप लग रहे हैं.

बजट अधिवेशन शुरू होते ही देश की संसद गरम होने लगी. विपक्ष सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहा है. जेएनयू मामला सरकार के गले की फांस बन रहा है. हालांकि, हाई कोर्ट ने कन्हैया कुमार को जमानत दे दी है. पर ऐसी शर्तें लगा दी हैं जो जमानत के मामले में अति लगती हैं हालांकि कोई इस मामले में उच्च न्यायालय में नहीं जाएगा. देशभर के लोगों में रोष फैल रहा है. इस से पहले कन्हैया की रिहाई की मांग को ले कर चारों तरफ से आवाजें बुलंद हुईं और प्रदर्शनों के दौर चले.

9 फरवरी को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु की तीसरी बरसी पर वामपंथी छात्र संगठनों ने कार्यक्रम आयोजित किया था. कार्यक्रम में संगठन से जुड़े कई छात्र इकट्ठा थे. कहा जाता है कि कार्यक्रम में बाहर से आए हुए कुछ लोगों ने पाकिस्तान जिंदाबाद और कश्मीर की आजादी ले कर रहेंगे, जैसे नारे लगाए जिन्हें अब तक ढूंढ़ा नहीं जा सका है. उस समय न कोई तोड़फोड़ हुई न देश के विरुद्ध विद्रोह की साजिश की गई.

अगले दिन भाजपा की छात्र इकाई एबीवीपी ने इस कार्यक्रम के विरोध में वाइस चांसलर का घेराव किया और जांच की मांग की. इस पर वाइस चांसलर ने जांच कमेटी बनाई. इस बीच, दिल्ली के भाजपा सांसद महेश गिरी ने पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी. शिकायत के आधार पर दिल्ली पुलिस ने औल इंडिया स्टूडैंट फैडरेशन यानी एआईएसएफ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर गिरफ्तार कर लिया.

कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी के बाद राजनीतिक दल मैदान में कूद पड़े. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, कांग्रेस नेता आनंद शर्मा, कम्युनिस्ट नेता सीताराम येचुरी 13 फरवरी को जेएनयू जा पहुंचे और कन्हैया की गिरफ्तारी के विरोध में भाजपा व उस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर हमला बोला.

14 फरवरी को गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने एक बयान दे कर मामले को और गंभीर बना दिया. उन्होंने कहा कि जेएनयू में राष्ट्रविरोधी नारों को लश्कर ए तैयबा प्रमुख हाफिज सईद का समर्थन हासिल है. इस पर विपक्ष ने सुबूत मांगे. अगले दिन यह सच सामने आया कि गृहमंत्री ने जिस ट्विटर हैंडल के जरिए हाफिज सईद का बयान पढ़ा था वह फर्जी था. यानी देश के गृहमंत्री ने एक फर्जी ट्वीट के सहारे इतना बड़ा बयान दे डाला और उन्हें तो शर्मिंदगी तक न हुई.

उधर, जेएनयू के विवादित कार्यक्रम के वीडियो सामने आने लगे. मीडिया का एक गुट कन्हैया के देशद्रोह वाले नारे का वीडियो दिखाने लगा तो दूसरा उसे डौक्टर्ड किया हुआ बता कर कन्हैया का देशभक्ति के भाषण वाला वीडियो दिखा रहा था.

कन्हैया को पटियाला हाउस कोर्ट में पेश किया गया तो देशभक्ति का चोला पहने भाजपा समर्थक वकीलों के एक समूह द्वारा उसे पीटा गया. हमलावरों में दिल्ली से भाजपा के विधायक व वकील ओमप्रकाश शर्मा भी शामिल थे. कन्हैया के समर्थन में आए छात्रों और शिक्षकों के साथसाथ पत्रकारों को भी मारापीटा गया. अगले दिन फिर यही वाकेआ दोहराया गया.

अदालत में असुरक्षा के हालात को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट को दिल्ली पुलिस को कन्हैया और पत्रकारों की सुरक्षा पुख्ता करने के लिए आदेश देना पड़ा. फिर भी पेशी के दौरान हिंसा हुई. वरिष्ठ वकीलों को गालियां दी गईं. सुप्रीम कोर्ट के आदेश को भी पुलिस द्वारा गंभीरता से नहीं लिया गया. पुलिस कमिश्नर भीम सेन बस्सी हिंसा को मामूली झड़प कहते रहे और उन्होंने हिंसा के आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही करने में कोई रुचि नहीं दिखाई. कन्हैया की दोनों पेशियों में  मारपीट करने वाले ज्यादातर काले कोट में वकील ही थे. अदालत में खुलेआम संवैधानिक मर्यादाओं की तौहीन देखी गई.

इस बीच, दिल्ली के प्रैस क्लब में प्रोफैसर एस आर ए गिलानी को देश विरोधी नारे लगाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. दूसरे विश्वविद्यालय भी सुलगने लगे. जेएनयू की आग पश्चिम बंगाल के जाधवपुर विश्वविद्यालय तक पहुंच गई. वहां कन्हैया कुमार के पक्ष में आइसा समेत एसएफआई, एसयूसीआई, डीएसओ, सीपीआईएम-एल जैसे छात्र संगठनों से जुड़े छात्रों के अलावा ऐसे छात्र भी जुलूस में शामिल थे जिन का इन संगठनों से दूर का भी नाता नहीं था.

जहां तक पश्चिम बंगाल में एबीवीपी की ताकत का सवाल है, अभी वहां उस के पैरों के नीचे पुख्ता जमीन है नहीं. लंबे समय बाद पुरुलिया जिले के लालपुर कालेज में एबीवीपी ने 2014 में छात्र संगठन का चुनाव जीता था. इस के अलावा कूचबिहार के मेखलीगंज कालेज, पुरुलिया के झालदा कालेज जैसे कुछ कालेजों में उस ने कुछ सीटें हासिल कीं. एबीवीपी ने इन कालेजों में अपनी उपस्थिति तब दर्ज कराई जब केंद्र में भाजपा की सरकार बन गई थी.

जेएनयू मामले का पश्चिम बंगाल की राजनीति पर खासा असर पड़ रहा है. मालूम हो कि राज्य में इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं. तृणमूल कांग्रेस एबीवीपी के पक्ष में तो नहीं बोल सकती पर इसी के साथ कन्हैया, चूंकि भाकपा के छात्र नेता हैं, इसीलिए उस के पक्ष में बोल कर तृणमूल कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहती. उधर, कन्हैया के गृहराज्य बिहार की बात करें तो दिल्ली में पैदा हुई सियासी आग की गर?माहट वहां भी पहुंच गई. सब से पहले भाजपा के शत्रुघ्न सिन्हा ने कन्हैया के बहाने सियासी आग में यह कह कर घी डाल दिया कि हमारे बिहारी लड़के (कन्हैया) ने कुछ भी गलत नहीं कहा है. उस ने सभा में देश और संविधान के विरोध में कुछ नहीं कहा. यह कह कर उन्होंने अपनी ही पार्टी को कठघरे में खड़ा किया.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने केंद्र सरकार से मांग की है कि  कन्हैया के खिलाफ सुबूत सौंपे जाएं. वे कहते हैं कि देशद्रोह के खिलाफ हर कोई खड़ा है पर बगैर सुबूत के किसी पर देशद्रोह का मुकदमा कैसे कर दिया गया. राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव कहते हैं कि देशद्रोह का मामला तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पर दर्ज होना चाहिए क्योंकि पिछले विधानसभा चुनावप्रचार के समय उन्होंने कहा था कि महागठबंधन की जीत पर पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे. उन पर कोई कार्यवाही नहीं हुई क्योंकि वे धर्ममत हैं.

पटना में 18 फरवरी को वाम समेत कई दलों के कार्यकर्ता और उन की स्टूडैंट विंग्स के सदस्य व भाजपा के कार्यकर्ताओं के बीच भिडं़त हो गई. इस से वीरचंद पटेल रोड जंग का मैदान बन गया. भाजपा का कलासंस्कृति मंच प्रदर्शन की तैयारी में था पर पुलिस ने उस के कार्यकर्ताओं को पार्टी कार्यालय से बाहर नहीं निकलने दिया. इसी बीच, वाम दलों के औल इंडिया स्टूडैंट फैडरेशन समेत कई दूसरे छात्र संगठनों ने भाजपा दफ्तर पर हमला बोल दिया. पुलिस ने जब उन्हें रोकने की कोशिश की तो छात्रों ने भाजपा दफ्तर व पुलिस पर पत्थर फेंके. 

पटना के समाजशास्त्री एम एन कर्ण कहते हैं, ‘‘कन्हैया के बहाने केंद्र सरकार असहमति के मौलिक और लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलना चाहती है.’’ वहीं जेएनयू के पूर्व छात्र इमरान खान ने कहा, ‘‘जेएनयू हमेशा से वाम विचारों का गढ़ रहा है और कन्हैया की गिरफ्तारी ने फासीवाद का डरावना चेहरा भारतीय जनता के सामने खड़ा कर दिया है.’’ नाट्यकर्मी अनीश अंकुर का मानना है, ‘‘कन्हैया पर देशद्रोह का इल्जाम लगाने के पीछे बड़ी और सोचीसमझी साजिश है. कन्हैया को इंसाफ दिलाने और फासीवादी चेहरों को बेनकाब करने तक लड़ाई जारी रहेगी.’’

विश्वभर में गूंज
मामला अंतर्राष्ट्रीय हो गया. दुनिया के 400 प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों ने जेएनयू मामले पर चिंता जताई. विदेशी मीडिया में भी प्रतिकूल टिप्पणियां आने लगीं. भारत के 40 केंद्रीय विश्वविद्यालयों के शिक्षक संगठनों ने भी जेएनयू मामले में अकादमिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी बनाए रखने की वकालत की है.

मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, हरियाणा जैसे भाजपा शासित राज्यों में कन्हैया मामले में छात्र संगठनों में ज्यादा सक्रियता नजर नहीं आई क्योंकि वहां भाजपा विचारधारा ज्यादा प्रभावी है. फिर भी वहां उदारवादी, स्वतंत्रता प्रेमी लोगों में कन्हैया की गिरफ्तारी पर गहरा गुस्सा है. भाजपा शासित राज्यों में दलित और मुसलिम आंदोलन फिलहाल लगभग खत्म हो गए हैं. हालांकि इन राज्यों में दलितों और मुसलिमों की आबादी काफी है.

उत्तर प्रदेश में हालांकि समाजवादी पार्टी की सरकार है पर वह इस मामले में मौन है हालांकि राज्य के मुख्य विश्वविद्यालयों में एबीवीपी का वर्चस्व है. कन्हैया चूंकि दलित नहीं है, इसलिए बसपा प्रमुख मायावती चुप हैं. सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी की छात्र इकाई का कोई वैचारिक आधार नहीं है. यहां उस के लिए केवल अपने नेताजी मुलायम सिंह के विचार ही सर्वोपरि हैं.

दलित बुद्धिजीवी और दलित संगठन जरूर उत्तर प्रदेश में जेएनयू, रोहित वेमुला आत्महत्या जैसे मामलों पर कभीकभार सक्रिय दिखाई देते हैं पर गोरखपुर से सांसद महंत आदित्य नाथ, साध्वी प्राची, साध्वी निरंजन ज्योति, साक्षी महाराज, सुब्रह्मण्यम स्वामी जैसे हिंदुत्व के उग्र नेता अधिक हावी दिखाई देते हैं.

दरअसल, रोहित वेमुला की आत्महत्या और कन्हैया की गिरफ्तारी, दोनों घटनाओं में समानता है. जेएनयू की घटना रोहित मामले का सीक्वैंस है. रोहित को तो जान गंवानी पड़ी जबकि कन्हैया जिंदा है. इस के लिए पौराणिक सोच जिम्मेदार है.

कन्हैया की गिरफ्तारी तो एक प्रतीक है. असल में यह सत्ताधीशों द्वारा धर्म के धंधेबाजों को फायदा पहुंचाने वालों की नजर में देशद्रोह नहीं, धर्मद्रोह है. जेएनयू नास्तिकता का गढ़ रहा है. धर्म को नकारता आया है. यहां आस्था की नहीं, तर्कवादी बातें होती हैं. कन्हैया कुमार ने जेल से छूटने के बाद भाषण में साफ कहा कि वह ईश्वर में विश्वास नहीं करता. यही उसे धर्मद्रोही यानी पौराणिक दृष्टि से देशद्रोही साबित करने के लिए काफी है. अब यहां आस्था, अंधभक्ति थोपे जाने की कोशिशें होने लगी हैं. सत्ता में आने के बाद भाजपा उच्च शिक्षा संस्थानों का भगवाकरण करने में लगी है क्योंकि तभी मंदिरों का धंधा चमकेगा. विश्वविद्यालयों में एबीवीपी अपना रुतबा कायम करने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार दिखाई देती है.

सरकार की ताबड़तोड़ कार्यवाही का मकसद जेएनयू में चल रहे धर्म, जाति के  विरोधी आंदोलन की कमर तोड़ना है,  मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी के खिलाफ लग रहे आरोपों से ध्यान हटाना है. रोहित वेमुला की आत्महत्या का कलंक धोने के लिए देशद्रोह का हौआ खड़ा किया गया है. यह देशद्रोह का मामला नहीं, पौराणिक धर्मद्रोह का है. धर्म ही दान का मुख्य स्रोत है, धर्म के दुकानदारों की रोजीरोटी का स्रोत है. अब तो धर्म के इर्दगिर्द बड़े व्यवसाय चमक रहे हैं जिन में रामदेव जैसे योग विक्रेता शामिल हैं. सैकड़ों तरह के चमत्कारी कवच अब करोड़ों में धर्म के नाम पर बिक रहे हैं.

भाजपा सरकार रोहित वेमुला, कन्हैया आदि से क्यों डर रही है? क्या हमारा राष्ट्रवाद इतना कमजोर है कि किसी के महज एकदो नारे लगा देने भर से देश पर संकट आ जाता है. ‘धर्म खतरे में है’, ‘धर्म खतरे में है’ की तरह ‘देश खतरे में है’ का फुजूल में शोर मचाया जा रहा है. यह तो उसी तरह हो गया जिस तरह बातबात पर लोग धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की शिकायतें करते हैं.

पिछले कुछ समय से जेएनयू में दुर्गा के बजाय महिषासुर बलिदान दिवस मनाया जा रहा है. इस में महिषासुर की महानता का बखान किया जाता है. वे महिषासुर को शूद्र वर्ग से जोड़ पुराणपंथियों को हर साल कोसते हैं. इस से विश्वविद्यालय में हिंदुत्व समर्थक छात्रों के  बीच बहस और तनातनी चलती रही है. इस से पंडों की धार्मिक दुकानदारी पर असर पड़ रहा था. असल में यह झगड़ा जेएनयू बनाम जनेऊ का है. इन के लिए अभिव्यक्ति नहीं, भक्ति बड़ी है. इस बार हिंदुत्व के ऊपर देशभक्ति की चाशनी चस्पां कर दी गई है पर यह हर देशवासियों को हजम नहीं हो पा रही है. बहुतों को यह कड़वी लग रही है.

विरोधियों की नजर में कन्हैया ने ईशनिंदा कर दी है और इस अपराध के लिए उस पर पुराणवादी धर्म, संस्कृति के ठेकेदार, पुरोहितों की पूरी फौज टूट पड़ी है और उन के साथ हैं अंधविश्वासी भक्त. यह पुराणवादी व्यवस्था को बचाने की हिमायत है. धर्म के ठेकेदार अब देशभक्ति के ठेकेदार हो गए हैं. यह उस घबराहट का परिणाम है जो सच उजागर होने के डर से पैदा होती है.

भले ही भाजपा, संघ ने आजादी से पहले या बाद में किसी तरह की देशभक्ति न दिखाई हो, सिवा नारेबाजी के पर उन का राष्ट्रवाद ‘वसुधैव कुटुंबकं’ और तुलसीदास के ‘सियाराम मय सब जग जानी’ जैसा है. यह उन का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है. भाजपा सरकार के लिए भारत माता जननी नहीं, पालक नहीं, सीता माता की तरह है जिसे जब चाहे भक्त पूजें, जब चाहे दुत्कारें, जब चाहे अग्निपरीक्षा लें, जब चाहे घर से निष्कासन कर दें. सीता के साथ वे मरजी से कुछ भी चाहें, कर सकते हैं रामायण इस बारे में स्पष्ट है.

कन्हैया के खिलाफ कार्यवाही करने वालों का व्यवहार इस तरह का है जैसे वे कोई देवता, अवतार के रूप में जपतप, यज्ञ में विघ्न पैदा करने वाले राक्षसों का वध, बुराइयों का खात्मा करने और ऋषियों, मुनियों, साधुओं का उद्धार करने कथित स्वर्ग से उतर कर आए हैं. पुराणवादी सोचते हैं कि वे धर्म की अफीम चटा कर लोगों को गहरी नींद में सुला कर पैसे वाले अंधभक्तों के साथ मिल कर राज करेंगे. व्यापारियों ने देशभर में धर्म की बड़ीबड़ी दुकानें बना कर पंडों को सौंपने का योगदान दिया. ये दोनों वर्ग चालाकी, चतुराई से मेहतनकशों की कमाई लूटते रहे हैं. इन्हें कामकाजी दलितों, पिछड़ों, औरतों और मुसलमानों, इन वर्गों की सांठगांठ रास नहीं आ रही है. जबकि इन की उत्पादकता ही देश की गरीबी दूर कर सकती है और देश का विकास कर सकती है. कर्मठ, जागरूक, तार्किक, शिक्षित मजदूर ही सफलता दे सकता है.

संघ के लिए जेएनयू हमेशा से सब से असुविधाजनक केंद्र रहा है. विश्वविद्यालय परिसर में बौद्धिक खुलापन, तर्कवाद, प्रगतिशीलता का माहौल है. लेकिन पुराणवादियों को अंधभक्ति वाले शिक्षा केंद्र चाहिए जो धार्मिक चमत्कारों, अवतारों की कहानियों पर आस्था, जाति व्यवस्था को ईश्वर की देन मानने वाले और इसी तरह के विचारों को पोषित करने वाले हों. जहां लोग धर्म की लकीर से एक सूत भी इधर से उधर न डिग जाएं. जहां पूजापाठ जम कर हो. सांस्कृतिक राष्ट्र्रवादियों को आपत्ति है कि कन्हैया हिरण्यकश्यप क्यों बन गया, भक्त प्रहलाद क्यों नहीं बना

क्या है राष्ट्रवाद?
राष्ट्रवाद एक विश्वास, पंथ या राजनीतिक विचारधारा है जिस के द्वारा व्यक्ति अपने गृहराष्ट्र के साथ अपनी पहचान बनाता है या लगाव जाहिर करता है. यह एक ऐसी अवधारणा है जिस में राष्ट्र को सब से अधिक प्राथमिकता दी जाती है. लेकिन भाजपा का राष्ट्रवाद हिंदुत्व से सराबोर है जो प्रगतिशील नहीं, अतीत का पिछलग्गू है. उस में वर्णव्यवस्था है, पूजापाठ, दानदक्षिणा, परंपराएं हैं. उस में धार्मिक, जातीय और सांस्कृतिक पहलू हावी हैं. इसलिए वह एकसूत्र में बांधने के बजाय हिंसक संघर्ष और प्रतिस्पर्धा में फंसा हुआ है.

विभिन्न धर्मों, जातियों, वर्गों में बंटे देश का बहुत बड़ा वर्ग धर्म की पुरानी व्यवस्था को मानने से इनकार करता है. वैसे, राष्ट्रभक्ति को प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन, डा. राधाकृष्णन, रवींद्रनाथ टैगोर जैसी शख्सीयतों ने नकारा है. आइंस्टाइन ने कहा था कि विज्ञान की खोजों का लाभ मानव जाति को तब तक नहीं मिल सकता जब तक वह देशभक्त और राष्ट्रीयता जैसी बीमारियों का शिकार है. डा. राधाकृष्णन ने कहा था, राष्ट्रीयता एक जहर है. रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था, शांति निकेतन देशभक्तों के लिए नहीं, शांत, चित्त विश्वनागरिकों के लिए है.

इन विचारों के निहितार्थ बहुत कुछ है. देशभक्ति की परिभाषा हमारे संविधान में दी गई है और सरकार से ले कर हर पार्टी उस पर अमल करने को बाध्य है. इस परिभाषा के अनुसार, कोई भी व्यक्ति सरकार की नीतियों की आलोचना कर सकता है, उस का शांतिपूर्ण विरोध कर सकता है, किसी कौम के हक की बात कर सकता है पर वह सरकार के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह या हिंसा में लिप्त या हिंसा के लिए भड़काने में लिप्त होता है तो उस पर देशद्रोह का मामला चलाया जा सकता है. राज्य का हर जन किसी न किसी बात से सरकार से नाराज रहता है और वह खुलेआम सरकार के बारे में कुछ भी बोल देता है. राजा से नाराज हो कर ब्राह्मण राज्य का नाश होने, टुकड़ेटुकड़े होने का श्राप दे दिया करते थे. क्या उन्हें राजद्रोह का दोषी मान कर सजा दी जाती थी?

कन्हैया : बेगूसराय से जेएनयू का सफर
बिहार की राजधानी पटना से 120 किलोमीटर दूरी पर बसा है बेगूसराय शहर. बेगूसराय से करीब 14 किलोमीटर की दूरी पर तेघड़ा विधानसभा क्षेत्र में एक प्रखंड है बीहट. वामपंथियों का पुराना गढ़ होने की वजह से बेगूसराय को बिहार का लेनिनग्राद कहा जाता है जबकि बीहट मिनी मास्को के नाम से पुकारा जाता है. जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार बेगूसराय जिले के बरौनी थाने के बीहट प्रखंड के मसलनपुर टोला गांव के रहने वाले हैं.

जेएनयू के स्कूल औफ इंटरनैशनल स्टडीज से सोशल ट्रांसफोर्मेशन इन साउथ एशिया (1994-2015) विषय पर पीएचडी कर रहे कन्हैया ने गांव के ही स्कूल से शुरुआती पढ़ाई की. इस के बाद बरौनी के आरकेसी स्कूल से मैट्रिक पास किया.

आगे की पढ़ाईर् के लिए पटना के कालेज औफ कौमर्स (मगध विश्वविद्यालय) में दाखिला लिया. स्नातक की पढ़ाई के दौरान ही वे औल इंडिया स्टूडैंट फैडरेशन के अध्यक्ष बने थे. उस के बाद उन्होंने नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी से डिस्टैंस? एजुकेशन के जरिए एमए की डिगरी हासिल की. उस के बाद वे पीएचडी करने के लिए जेएनयू आ गए.

देशभक्ति का उन्माद
जेएनयू का निर्माण 1966 में हुआ था. इस साल यह 50 साल पूरे कर रहा है. विश्वविद्यालय का उद्देश्य अध्ययन, अनुसंधान, ज्ञान का प्रसार, राष्ट्र्रीय एकता, सामाजिक न्याय, जीवन की लोकतांत्रिक पद्घति, अंतर्राष्ट्र्रीय समझ और सामाजिक समस्याओं के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देना था. यह विश्वविद्यालय कुछ इसी उद्देश्य से आगे बढ़ रहा है. इसीलिए यह अंतर्राष्ट्र्रीय स्तर पर विख्यात है. यहां 1975 में आपातकाल, 1984 में सिख दंगों, बाबरी विध्वंस और गुजरात हिंसा जैसी तमाम राष्ट्रीय घटनाओं का विरोध हुआ था. निर्भया मामले में आंदोलन की पहल इसी विश्वविद्यालय के छात्रों ने की थी. विश्वविद्यालय परिसर से अकसर किसान आत्महत्या, जातीय भेदभाव, गैरबराबरी, नक्सल समस्या, दलित शोषण तथा विदेश नीति तक पर सवाल उठते रहे हैं.

कन्हैया को निशाना इसलिए बनाया गया क्योंकि उन्होंने सरकार की छात्र विरोधी, गरीब विरोधी नीतियों, महंगाई, बेरोजगारी के खिलाफ आवाज उठाई थी. कन्हैया यहां केंद्र सरकार से स्कौलरशिप, वाईफाई, हौस्टल निर्माण, जातीय भेदभाव को ले कर सवाल कर रहे थे. यह सब सत्ता को रास नहीं आया. देशभक्ति का जो उन्माद आजकल फैलाया जा रहा है, उस के शिकार देश के दलित, पिछड़े, गरीब और अल्पसंख्यक हो रहे हैं. देशप्रेम सहज स्वभाव और स्वतंत्रता से जन्म लेता है, किसी पर जबरदस्ती नहीं थोपा जा सकता. देशभक्ति लादी जा सकती है जैसी कि कोशिशें हो रही हैं.

लेकिन इस तरह की नीतियों, विचारों से उपजा भेदभाव, नफरत, आतंक, नस्ल, नक्सलवाद अब सत्ता वालों के लिए भस्मासुर बन रहा है. यह डरावनी देशभक्ति है. यह देश, समाज को पीछे ले जाने वाली है. ऐसे में तो यह कहना सही होगा कि हम जरमन हिटलर के राष्ट्र्रवाद की ओर बढ़ रहे हैं? विश्व में बेहतरी के लिए वैज्ञानिकों और प्रतिभाओं के हाथ में फैसले आएं. लेकिन इस से तानाशाही सत्ताएं घबराती हैं. ऐसा होगा तो मजहबी नेता और राजनीतिबाज हाशिए पर खिसकते नजर आएंगे. जेल से बाहर आ जाने के बाद कन्हैया क्या ऐसी किसी क्रांति की शुरुआत कर पाएगा?

विरोधी आवाजों को दबाने की मुहिम

–एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, औल इंडिया पीपुल्स फ्रंट

हैदाराबाद के केंद्रीय विद्यालय में रोहित वेमुला कांड से शुरू हुई कहानी दिल्ली के जेएनयू तक पहुंच गई. इस बारे में हमारे प्रतिनिधि ने औल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय प्रवक्ता एस आर दारापुरी से बातचीत की. पेश हैं अंश :

रोहित वेमुला और जेएनयू प्रकरण को कैसे देखते हैं?
रोहित वेमुला का मामला शुद्ध रूप से छात्र राजनीति का परिणाम था. केवल हैदराबाद विश्वविद्यालय में ही नहीं, देश के बाकी तमाम विश्वविद्यालयों में दलित जातियों के विद्यार्थियों से पक्षपातपूर्ण व्यवहार होता है. जब इस का विरोध किया जाता है तो इस को दबाने की कोशिश की जाती है. रोहित के साथ यही हुआ. भाजपा की केंद्र सरकार के दबाव में छात्र राजनीति में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को स्थापित करने का प्रयास चल रहा है. रोहित कांड के विरोध में सब से प्रखर आवाज जेएनयू से उठी थी, तब से सरकार वहां के छात्रों को दबाने के प्रयास में थी.

जेएनयू में जिस तरह से राष्ट्रविरोधी नारे लगे, उन से कितना सहमत हैं?
जेएनयू में इस तरह के विचार, संवाद और मंथन बहुत पहले से चलते रहे हैं. रोहित कांड पर जेएनयू में विरोध को सबक सिखाने के लिए एक मुहिम के तहत फर्जी सीडी का सहारा लिया गया. उस को आधार बना कर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाया गया. राष्ट्रद्रोह कानून को ले कर सुप्रीम कोर्ट के तमाम फैसले हैं जिन में कहा गया है कि केवल नारे लगाना राष्ट्रद्रोह नहीं हो सकता. भाजपा ने सत्ता, कानून और सरकार का दुरुपयोग कर के इस मसले में पूरे देश को भरमाने का काम किया है. 

केंद्र सरकार को इस से क्या लाभ हो सकता है?
बजट सत्र में केंद्र सरकार के चुनावी वादों की पोल न खुले और आने वाले विधानसभा चुनावों में राष्ट्रवादएक मुद्दा बने, इन 2 कारणों से सरकार ने यह कदम उठाया. सरकार को यह समझना चाहिए कि भावनात्मक मुद्दे कुछ समय के लिए होते हैं. बाकी समय जनता को अपनी रोजीरोटी की चिंता होती है. केंद्र सरकार के खिलाफ पूरे देश में विरोध का जो माहौल बन गया है उसे सत्ता और संगठन की ताकत से दबाने का प्रयास किया जा रहा है. राष्ट्रवाद की आड़ में केंद्र सरकार धर्म के मुद्दे को आगे बढ़ाना चाहती है.