केन्द्र सरकार ने मिशन कश्मीर का जिम्मा होम मिनिस्टर राजनाथ सिंह के कधों पर रखकर उनको कश्मीर भेजा तो यह उम्मीद की गई थी कि कुछ उम्मीद की लौ जलेगी. कश्मीर में राजनाथ सिंह ने बेहद नपे तुले शब्दों में अपनी राय रखी. शब्दों का चुनाव ऐसा था कि जिसके तमाम अर्थ निकल सकते हैं.

सबसे अहम सवाल था कि अपनी 2 दिन की कश्मीर यात्रा के दौरान किन लोगों और संगठनों से होम मिनिस्टर राजनाथ सिंह बातचीत करेंगे. राजनाथ सिंह ने जबाव दिया कि जो लेाग और संगठन ‘कश्मीरियत, इंसानियत और जम्हूरियत‘ में यकीन रखने वाले हैं उन सभी से बात होगी.

अलगाववादी नेता हो या आतंकवादी सभी अपने अपने हिसाब से ‘कश्मीरियत, इंसानियत और जम्हूरियत‘ में यकीन रखते है. सभी अपनी बात को सही मानते हैं. अगर कोई अपनी बात को गलत मानता तो ऐसे काम ही नहीं करता. धर्म की आड़ लेकर आतंकवादी भी अपने काम को सही ठहराते है. ऐसे में सभी के लिये ‘कश्मीरियत, इंसानियत और जम्हूरियत‘ के मायने अपनेअपने तर्को के आधार पर हैं.       

केन्द्र सरकार के लिये मिशन कश्मीर बेहद संवेनशील विषय है. राजनाथ सिंह से एक ठोस पहल की उम्मीद की जा रही है. यह सच है कि 2 दिन की यात्रा से कश्मीर का बिगड़ा माहौल सुधरने की उम्मीद करना बेमानी सा है. राजनाथ सिंह से अधिक प्रभावशाली तरीके से जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने अपनी बात रखी. उनकी बात में आक्रोश और संवेदना दोनों दिख रही थी.

कश्मीर मुद्दे को लेकर जहां कांग्रेस केन्द्र सरकार के समर्थन में है, वहीं नेशनल काफ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला बीच का रास्ता पकड़े दिखे. वह केन्द्र सरकार के साथ बातचीत करके यह दिखाने की कोशिश में नजर आये जैसे बदलाव की दिशा उनकी पहल पर तय होगी. पैलेट गन की वापसी का मुद्दा उमर अब्दुल्ला जोर-शोर से उठा रहे है.

कश्मीर में पैलेट गन का प्रयोग 2010 से हो रहा है. राजनाथ सिंह ने इसकी वापसी और इसकी जगह दूसरे असरदार तरीके का समर्थन और भरोसा दिया. अब इसकी वापसी की मांग जोर पकड़ने लगी है. इस गन के प्रयोग से लोगों की जान भले ही न जाती हो पर उसके शरीर का बहुत पीडा पहुंचती है.

भाजपा समर्थकों ने एक मुहिम चला कर इस पैलेटगन के प्रयोग को ले कर मोदी सरकार की तारीफ की. अब राजनाथ सिंह इसकी वापसी की बात कर रहे है. केन्द्र सरकार ने बलूचिस्तान और पीओके के मुद्दे पर अपनी नई राय जाहिर की है. जिससे पाकिस्तान पर दबाव पड़ेगा.

ऐसे हालात समय समय पर पहले भी दिखते रहे है पर इससे कश्मीर का हल निकलता नहीं दिखता. भाजपा की परेशानी यह है कि वह कई संगठनों से बातचीत का हमेशा से विरोध करती रही है. ऐसे में उसके नेताओं के सामने परेशानी यह है कि वह किन संगठनों से बात करेगी और किन से नहीं इस बात को खुलकर नहीं कह सकती.

इस परेशानी को हल करने के लिये ही होम मिनिस्टर राजनाथ सिंह ने ‘कश्मीरियत, इंसानियत और जम्हूरियत‘ जैसे शब्दों का प्रयोग किया जिससे साफ कुछ पता नही चल सकता कि वह किन लोगों से मिलना चाहते है और किन से नहीं.

इन शब्दों के सहारे वह भले ही साफ बात करने से बच गये हो पर कश्मीर मसले को हल करने के लिये खुले दिल और माहौल के साथ हर पक्ष से बात करनी होगी.कश्मीर की समस्या में वहां के नेताओं का भी बड़ा हाथ है जो अपने अपने वोटबैकं को बनाये रखने के लिये हर तरह की लामबंदी में माहिर है.