सरिता विशेष

14 फरवरी, 2017 को आरएसएस मुखिया मोहन भागवत उज्जैन के वाल्मीकि धाम पहुंचे थे. इस से ज्यादा हैरत की बात यह थी कि उन्होंने यहां के मुखिया, दलित संत, उमेशनाथ के पैर छू कर आशीर्वाद लिया था. इन दोनों में लंबी चर्चा हुई. चर्चा का अंत उमेशनाथ की इस चेतावनी के साथ हुआ था कि आरक्षण खत्म नहीं होना चाहिए, दूधमलाई वालों को नहीं, बल्कि सफाई करने वालों को मिलना चाहिए. उमेशनाथ की दलित समुदाय में वैसी ही पूछपरख है जैसी सवर्णों में शंकराचार्यों और ब्रैंडेड धर्मगुरुओं श्रीश्री रविशंकर और अवधेशानंद जैसों की है. यह दीगर बात है कि वे रहते बेहद साधारण ढंग से हैं. क्षिप्रा नदी के किनारे बसे वाल्मीकि धाम में विलासिता का कोई साधन नहीं है और यह आश्रम लगभग कच्चा बना हुआ है.

मोहन भागवत उमेशनाथ की आरक्षण सलामती की मांग पर लगभग प्रतिक्रियाहीन रहे थे पर उस दिन उन्होंने जोर दे कर कहा था कि संस्कृति गांवों और जंगलों से विकसित होती है. उन्होंने गांधी के ग्राम्यदर्शन की भी जम कर तारीफ की.

तब इस मुलाकात के माने यह निकाले गए थे कि मोहन भागवत 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों, खासतौर से उत्तर प्रदेश के चुनाव, की तैयारी कर रहे हैं. उमेशनाथ के पैर पड़ने का सीधा सा मतलब था कि संघ और भाजपा अब दलित संतों के आगे नतमस्तक हैं और उन्हें किसी कीमत पर दलितों के वोट चाहिए. 11 मार्च के नतीजों में यह साफ भी हो गया कि उत्तर प्रदेश में दलितों ने बहुजन समाज पार्टी और मायावती को नकार कर भाजपा के पक्ष में बड़े पैमाने पर वोट किया है. खासतौर से वाल्मीकि समाज ने, जिस के नाम से ऊंची जाति वालों का नाकभौं सिकोड़ना आज भी बरकरार है.

किसे कहां क्या मिला

5 राज्यों के चुनावों में भाजपा को 2 और कांग्रेस को 1 राज्य में सरकार चलाने का बहुमत मिला. गोआ और मणिपुर में दोनों ही दलों को बहुमत नहीं मिला. कांग्रेस नंबर वन पार्टी होने के बाद भी सरकार नहीं बना सकी. कांग्रेस को उसी के पुराने दांव से मात दे कर भाजपा ने 5 राज्यों के चुनावों का फैसला 4-1 से अपने पक्ष में करने के लिए अपनी साख को दांव पर लगा दिया.

जिस तरह से केंद्र के दखल से राज्यों में कभी कांग्रेस सरकार बनतीबिगड़ती थी, अब भाजपा उसी का अनुसरण कर रही है. गोआ और मणिपुर में सब से बड़ी पार्टी के रूप में कांग्रेस जीत कर आई. गोआ में कांग्रेस को 17 और मणिपुर में 28 सीटें मिलीं. इस के मुकाबले भाजपा को गोआ में 13 और मणिपुर में 21 सीटें ही मिल पाईं. दोनों ही राज्यों में सरकार बनाने के लिए बहुमत किसी दल के पास नहीं है. ऐसे में अन्य विधायकों को अपनी ओर मिला कर के भाजपा ने गोआ और मणिपुर में अपनी सरकारें बना लीं.

कांग्रेस इसे केंद्र सरकार द्वारा सत्ता का दुरुपयोग किया जाना बता रही है. उस ने इस मुद्दे को ले कर लोकसभा में हंगामा भी मचाया. जिस तरह से मणिपुर और गोआ में सब से बड़ी पार्टी होने के बाद भी कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए नहीं बुलाया गया, उस को ले कर दोनों ही राज्यों के राज्यपालों पर भी आरोप लग रहे हैं. आमतौर पर राज्यपाल जिस पार्टी के सब से अधिक विधायक होते हैं, उसे ही सरकार बनाने का न्योता देते हैं. कई बार राज्यपाल अपने विवेक से भी फैसला करते हैं.

अप्रत्याशित बहुमत मिलने के बाद उत्तर प्रदेश में भाजपा किसे मुख्यमंत्री बनाएगी, यह चुनाव से कम रोमांच नहीं था जो राजनाथ सिंह के नाम से शुरू होते गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ पर खत्म हुआ.

पंजाब में उतरा भगवा नशा

उत्तर प्रदेश की कामयाबी का भाजपा का नशा अगर पंजाब में उतरता दिखाई दिया तो इस से ये तथ्य तो स्थापित होते हैं कि 5 राज्यों के चुनावों में कोई राष्ट्रीय या दूसरी लहर नहीं थी और राज्यों में सिर्फ सत्ताविरोधी लहर चली है. आमतौर पर लोग अपनेअपने राज्यों की सरकारों के कामकाज से संतुष्ट नहीं रहते, भाजपा ने इस का फायदा अगर खासतौर से उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में उठाया तो पंजाब में इस का खमियाजा भी उसे भुगतना पड़ा. शिरोमणि अकाली दल और भाजपा का गठबंधन खारिज कर दिया गया है और वोटरों ने कांग्रेस पर भरोसा जताया है तो बात हैरत की इस लिहाज से है कि वहां सत्ता की प्रबल दावेदार आम आदमी पार्टी एक बेहतर विकल्प के रूप में थी, पर धाकड़ कांग्रेसी नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह की जमीनी पकड़ कांग्रेस के काम आई.

नशा पंजाब चुनाव में एक बड़ा मुद्दा था जिसे ले कर काफी बवंडर पिछले एक साल से मच रहा था. राज्य सरकार का उम्मीदों पर खरा न उतरना और बादल परिवार की बदनामी भी हार की वजह बनी. इसीलिए भाजपा अब बड़ी मासूमियत से कह रही है कि हम तो पंजाब में अतिथि और सहयोगी थे. प्रचार का जिम्मा तो एसएडी का था. यानी मीठामीठा गप और कड़वाकड़वा थू वाली बात की जा रही है, जो राजनीति का शगल भी है.

नरेंद्र मोदी प्रचार के दौरान सिर्फ पंजाब की शान और खेतीबाड़ी की बातें करते बादल साहब, बादल साहब करते रहे थे लेकिन राहुल गांधी ने नशे पर रोक की बात प्रमुखता से कही थी और सारे फैसले अपने हाथ में रखने का एक पुराना कांग्रेसी रिवाज भी पहली दफा तोड़ते अमरिंदर सिंह को अपने हिसाब से फैसले लेने की छूट दी थी, जिस से मतदाता में यह संदेश गया था कि अब कांग्रेस बदल रही है और सबकुछ 10 जनपथ से तय नहीं होगा.

दरअसल, पंजाब में कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती भाजपा-एसएडी गठबंधन नहीं, बल्कि आम आदमी पार्टी थी. अरविंद केजरीवाल यहां लंबे वक्त से सक्रिय थे, पर संगठनात्मक ढांचा न बना पाने के कारण वे पीछे रह गए. नवजोत सिंह सिद्धू भी पंजाब में एक बड़ा फैक्टर थे, जिन्होंने पत्नी नवजोत कौर सहित भाजपा छोड़ दी थी. आम आदमी पार्टी ने उन्हें नहीं लिया तो वे कांग्रेस में चले गए. उन की लोकप्रियता का फायदा कांग्रेस को मिला, नतीजा सामने है कि भाजपा व एसएडी के गठबंधन और आप को पछाड़ कर कांग्रेस सत्ता में हैं.

पंजाब में कांग्रेस की वापसी से यह भी जाहिर होता है कि वोटरों का मूड हर जगह अलग है. विधानसभा चुनाव में स्थानीय मुद्दे काफी अहम होते हैं और रही बात जाति या धर्म की तो ये मुद्दे पंजाब में कहनेभर को थे. यहां का युवा अच्छी बात है कि नशे के दुष्परिणामों को समझने लगा है, इसलिए उस ने पंजाब के नाम या बदनामी से ऊपर उठते कांग्रेस को मौका दिया.

सरिता विशेष

ऐसे उलझी कांग्रेस

उत्तराखंड के नतीजे इस लिहाज से चौंकाने वाले नहीं हैं कि वहां कांग्रेस और मुख्यमंत्री हरीश रावत को ले कर जबरदस्त असंतोष था. वहां भाजपा ने 70 में से 57 सीटें जीतीं और कांग्रेस को महज 11 सीटें मिल पाईं. पहाड़ी और मैदानी दोनों इलाकों में कांग्रेस मतदाताओं की नाराजगी का शिकार इस तरह हुई कि हरीश रावत दोनों सीटें हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा से हार गए.

उत्तराखंड में भाजपा ने उत्तर प्रदेश की तरह हाहाकारी प्रचार नहीं किया था. यह बात उस से छिपी नहीं रह गई थी कि जो हालत उस की पंजाब में है वही यहां कांग्रेस की है. लिहाजा, उसे उत्तराखंड में उत्तर प्रदेश जितना पसीना नहीं बहाना पड़ा.

पिछले साल उत्तराखंड में हुई कांग्रेसी बगावत के बाद कांग्रेस को सुप्रीम कोर्ट की शरण लेनी पड़ी थी, तब कहीं जा कर हरीश रावत मुख्यमंत्री बन पाए थे. उन्होंने बजाय जनहित के काम करने और मुद्दों पर बात करने के, भाजपा का रास्ता अपनाया और सालभर पूजापाठ में उलझे रहे. नतीजतन, जनता ने उन्हें खारिज कर दिया.

इन नतीजों से यह भी स्पष्ट हो गया था कि उत्तर प्रदेश में केवल दलितों ने ही नहीं, बल्कि सपा को नकारते पिछड़ों ने भी भाजपा को वोट दिया. कुछ मुसलिमबाहुल्य सीटों पर भी भाजपा जीती तो साफ लगा कि आरएसएस अपने राष्ट्रवाद की नई अवधारणा में सफल हो रहा है जिस के तहत अब हिंदू केवल सवर्ण नहीं, बल्कि सभी देशवासी हैं.

दलितों और आदिवासियों को घेरने का काम आरएसएस और भाजपा ने बड़े पैमाने पर उज्जैन के सिंहस्थ महाकुंभ में भी किया था जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इन्हीं उमेशनाथ के साथ क्षिप्रा में डुबकी लगाई थी और सामाजिक समरसता का नारा बुलंद किया था. कुछ बड़े और सनातनी हिंदू धर्मगुरुओं को भी दलित संतों के साथ डुबकी लगवाई गई थी.

खुद मोहन भागवत ने अलग से दलित आदिवासियों के साथ डुबकी लगाई थी और उन के साथ बैठ कर खाना भी खाया था. इस से और पहले यह काम अमित शाह उत्तर प्रदेश में कर चुके थे तो इन सब की मंशा साफ थी कि अब हिंदू और हिंदुत्व के माने बदले जा रहे हैं. दलित भले ही सवर्णों के लिए अछूत और हेय हों पर अस्वीकार्य नहीं हैं.

राष्ट्रवाद हुआ हिंदुत्व

उत्तर प्रदेश का नतीजा हैरान कर देने वाला है. खुद अमित शाह ने 11 मार्च को लखनऊ की पत्रकारवार्त्ता में माना था कि दलितों और गरीबों ने भाजपा सरकार और नरेंद्र मोदी में भरोसा जताया है.  तमाम अनुमानों और सर्वेक्षणों को ध्वस्त करते उत्तर प्रदेश में भाजपा ने यों ही 325 सीटों का आंकड़ा नहीं छू लिया है जिस के बारे में कहा जा रहा है कि 1991 की रामलहर से ज्यादा जोरदार और असरदार 2017 की मोदीलहर है. दिलचस्पी और हैरत की बात यह है कि कहीं भी उग्र हिंदुत्व की बात नहीं की गई, चुनावप्रचार के दौरान बाबरी मसजिद को धक्का दे कर तोड़ने की धौंस भी नहीं दी गई थी. जयजय श्रीराम के उद्घोष नहीं किए गए थे, सबकुछ बड़ी योजनाबद्घ तरीके से किया गया.

यह योजना कई चरणों में कई बिंदुओं पर चली. पहली यह कि दलितों को उन के हिंदू होने का एहसास कराया गया. इस बाबत तमाम टोटके किए गए, यहां तक कि मोहन भागवत और अमित शाह ने उमेशनाथ के चरणों में सिर तक नवा दिया. दूसरी अहम बात, बड़े पैमाने पर बजाय हिंदुत्व के राष्ट्रवाद की बात की गई.

यह राष्ट्रवाद है क्या बला, यह बात खुद इस का राग अलाप रहे लोग नहीं समझ पा रहे जिस के बारे में मोहन भागवत बहुत स्पष्ट कह चुके हैं कि आरएसएस की लत एक बार जिसे लग जाए तो फिर वह छूटती नहीं. यानी राष्ट्रवाद एक नया नशा है जिस के तहत वंदेमातरम और भारत माता की जय बोलना अनिवार्य है. चुनावी सभाओं में नरेंद्र मोदी ने जयजय श्रीराम की जगह हरहर महादेव के नारे लगाए और लगवाए और मतदान समाप्त के बाद वे सीधे सोमनाथ के मंदिर भी गए थे.

इन तमाम ड्रामेबाजियों का हिंदू जातियों की आपसी लड़ाई और बैर से गहरा संबंध है. राममंदिर निर्माण आंदोलन के वक्त हिंदुओं में एक धार्मिक उन्माद था जिसे भी भाजपा अब कहीं जा कर एक सामाजिक क्रांति व बदलाव में ढाल कर पेश कर पाने में कामयाब हो रही है. अब कोई सीधे नहीं कहता कि धर्म के नाम पर देश को मजबूत करो. अब कहा जाता है कि विकास और सामाजिक समरसता चाहिए तो भाजपा को वोट दो.

लोगों ने उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड में भाजपा को वोट दिया तो भाजपा बहुत साफ कहने लगी है कि वह दलितों और मुसलमानों की दुश्मन नहीं, बल्कि हमदर्द है. वह अब महज ब्राह्मण और बनियों की पार्टी नहीं रह गई है, बल्कि उन सब की पार्टी है जो खुद को भारतीय मानते हैं. उस का मानना है कि भारत को खतरा कट्टरवादी हिंदुओं से नहीं, बल्कि कट्टरवादी मुसलमानों और वामपंथियों से ज्यादा है जो आएदिन राष्ट्रद्रोह की बातें करते रहते हैं. यह राष्ट्रद्रोह भारत माता की जय न बोलना और देश को अपना न मानना है. वामपंथी राष्ट्रद्रोह के नारे लगाते हैं, इसलिए वे भगवा मंडली के अनुसार देश यानी नए हिंदुत्व के दुश्मन हैं और उन से निबटना है तो भाजपा को मजबूती देनी होगी. वहीं, वामपंथियों का मकसद देश के टुकड़े करना है और इस काम में मुसलमान भी उन के साथ हैं. ये ही नक्सली हिंसा को बढ़ावा देते हैं और दलितों को बरगलाते हैं. देश की सहिष्णुता को उन से बड़ा खतरा है और वे हमारी जातिगत फूट का फायदा उठाते हैं, इसलिए हमारा एक होना जरूरी है.

इस वर्ग का मानना है कि अभिव्यक्ति और आजादी की मांग करने वाले ये लोग नहीं चाहते कि देश एक हो. और ये विघटनकारी, अलगाववादी हैं और बोलने की आजादी का बेजा फायदा उठाते रहते हैं. ये नास्तिक और अधर्मी हैं. इन्हें सबक सिखाना जरूरी है कि अब सभी लोग जातपात छोड़ कर आरएसएस और भाजपा के तंबू के

नीचे आ जाएं जिस से इन के नापाक मंसूबों को नाकाम किया जा सके. ये लोग ऐयाश हैं, एहसानफरामोश हैं जो खातेपीते तो देश का हैं पर वफादारी पाकिस्तान की करते हैं. दरअसल ये ऋषिमुनियों वाले धर्म और संस्कृति को फलतेफूलते नहीं देखना चाहते. ऐसा भाजपा के कार्यकर्ता ही नहीं, दूसरे आम लोग भी कहते हैं जो धर्म में अंधश्रद्धा रखते हैं.

चूंकि हिंदू धर्म और हिंदुत्व के नाम पर दलितों व पिछड़ों को साथ मिला पाना मुश्किल था, इसलिए चाल, चरित्र और चेहरा बदलते आरएसएस और भाजपा ने राष्ट्रवाद का नारा दिया जिस में कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र नहीं है बल्कि सभी हिंदू हैं. हिंदू शब्द की नई परिभाषा देने में 20 साल लग गए. इस दौरान कई उतारचढ़ाव आए. लेकिन इन हिंदूवादियों ने जोखिम उठाया और 2014 के लोकसभा चुनाव में पिछड़े वर्ग के नरेंद्र मोदी को नायक के रूप में पेश कर दिया.

हीनता का फायदा

नरेंद्र मोदी पसंद किए गए तो इस की वजह गुजरात का उन का विकास मौडल या देसी भाषणशैली कम, बल्कि उन का पिछड़े वर्ग से होना अहम था जिस ने पिछड़ों और दलितों को भाजपा के प्रति आश्वस्त किया था. इस के बाद तो भाजपा सवर्णों की बात करना ही भूल गई. वह दलितों, गरीबों की बात करती रही. बस, ‘दलित’ की जगह शब्द ‘गरीब’ इस्तेमाल किया गया.

इसी वजह से मायावती अपना हश्र देख सकते में है. वे शायद ही कभी यह हकीकत समझ पाएं कि दलितों के अंदर पसरी जातिगतहीनता को भाजपा ने भावनात्मक रूप से भुनाया है. भाजपा गांधी की कांग्रेस की तरह सदियों से प्रताडि़त और उपेक्षित रहे दलित समुदाय को यह गारंटी देने में सफल रही कि अब उस का झुकाव छोटी जातियों की तरफ है, जिन की दुर्दशा की एक बड़ी वजह जातिगत अत्याचार, भेदभाव या प्रताड़ना कम, बल्कि उन का गरीब होना ज्यादा है. इसलिए अब उन के भले और उत्थान की योजनाएं बना कर उन्हें अमल में भी लाया जाएगा.

पढ़ेलिखे और पैसे वाले पिछड़ों, जिन की गिनती लगातार बढ़ रही है, को भी यह अदा भायी और उन्होंने भाजपा में ही सुरक्षा देखी तो बात कतई हैरानी की नहीं क्योंकि ये भी अपनी जातिगतहीनता से उबरने को बेचैन थे.  2007 की मायावती की सोशल इंजीनियरिंग राजनीतिक थी पर भाजपा ने इसे सामाजिक तौर पर अपनाने का प्रचार किया.

बड़ी तेजी से यह प्रचार भी हुआ कि सिर्फ मुसलमान ही देश का दुश्मन नहीं, बल्कि देश का दुश्मन वह भी है जो इस राष्ट्रवाद की परत में छिपे नव हिंदुत्व को नहीं मानता. उत्तर प्रदेश के नतीजों के बाद सोशल मीडिया पर इस आशय के मैसेज खूब वायरल हुए जिन में यह कहा गया था कि भूतप्रेत भगाने के लिए हनुमानचालीसा पढि़ए और वामपंथी, राष्ट्रद्रोहियों को भगाने के लिए वंदेमातरम व भारत माता की जय बोलिए. एक मैसेज का आशय यह था कि अगर 3 तलाक का मामला सुप्रीम कोर्ट तय नहीं कर सकता क्योंकि इस से मुसलमानों के धर्म और मन को ठेस पहुंचती है तो उस सुप्रीम कोर्ट को यह हक भी नहीं कि वह राममंदिर निर्माण का फैसला करे क्योंकि इस से 100 करोड़ हिंदुओं को ठेस पहुंचती है. कुछ छुटभैये और मंझोले हिंदूवादियों ने अब दोबारा राममंदिर निर्माण की बात कहनी शुरू कर दी है. यह साजिश के तौर पर हो रहा है ताकि ऊंचे सवर्ण भाजपा के जहाज को छोड़ कर न जाने लगें कि उस पर दलित व पिछड़े सवार होने लगे हैं.

इस तरह की बातें पढ़े और लिखे सवर्णों, जिन्हें देशदुनिया और धार्मिक पोंगापंथ से कोई सरोकार नहीं रहा, के लिए नहीं, बल्कि तेजी से हिंदू हो रहे पिछड़ों और दलितों को बरगलाने के लिए ज्यादा की जाती हैं जो यह मानने लगे हैं कि अब वे देश की मुख्यधारा है और देश की जिम्मेदारी उन के कंधों पर आ गई है और चूंकि देश खतरे में है, इसलिए भाजपा ने उत्तर प्रदेश के चुनाव में एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया. मायावती ने सौ मुसलमानों को टिकट दिए तो उन की मंशा दलितों के कंधों पर मुसलमानों की पालकी ढुलवाने की थी. कितनी चालाकी से यादवमुसलमान गठजोड़ तोड़ा गया और दलितमुसलमान गठजोड़ बनने ही नहीं दिया गया. यह बात न तो अखिलेश यादव समझ पाए और न मायावती. मायावती इस मुगालते में रहीं कि दलित अभी भी मनुवाद के नाम पर उन के साथ हैं.

बात साफ भी है कि भाजपा और आरएसएस की तरफ से अब यह नहीं कहा जाता कि हिंदू धर्म खतरे में है बल्कि यह कहा जाता है कि देश खतरे में है. देशविरोधी ताकतों को सिर्फ भाजपा ही सबक सिखा सकती है जो दिनोंदिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में मजबूत हो रही है. इस उन्मादी प्रचार का एक फायदा यह भी होता है कि लोग बढ़ती महंगाई को भूल जाते हैं, अपनी रोजमर्राई परेशानियों से दूर हो जाते हैं और नए भजनों पर झूमना शुरू कर देते हैं.

अब बढ़ेगा पूजापाठ

दलित और पिछड़े, दरअसल, घोषित तौर पर मुख्यधारा के हिंदू यानी खुद को सवर्ण कहलाने और महसूस करने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं. लेकिन करवाया उन से भजनपूजन ही जाएगा जिस से पंडेपुजारियों को बदस्तूर दानदक्षिणा मिलती रहे. भारत माता के नाम पर वही छल किया जा रहा है जो बाली को मारने के लिए राम ने किया था. फर्क इतना भर है कि एक बड़ी सामाजिक ताकत, जिसे खत्म नहीं किया जा सकता, को गले लगा कर अपने सनातनी स्वार्थ सिद्ध किए जा रहे हैं.

यही काम आजादी के बाद से कांग्रेस कट्टर लोगों को छलती रही थी. महात्मा गांधी इस के जनक थे जो वर्णव्यवस्था को कायम रखने के हिमायती थे और ‘रघुपति राघव राजा राम’ जैसे भजन गाया करते थे. बाद में जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल ने इस रिवाज को कायम रखा और मंदिरों व हिंदुत्व पर खासा ध्यान दिया. तब सिर्फ कांग्रेसी ही सोचते थे कि धर्मप्रधान इस देश में सत्ता में रहना है तो पूजापाठ करते रहना होगा जिस से धर्म और जातिवाद बना रहे और ढका भी. सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का काम इसी षड्यंत्र का हिस्सा था.

60 साल कांग्रेस जो करती रही, वही अब भाजपा कर रही है. उस ने गांधी की चालाकियों को हथियार बना लिया है. गांधी की तरह मोहन भागवत, अमित शाह और नरेंद्र मोदी को देर से सही, पर समझ आया कि दरअसल हिंदुस्तान और हिंदुत्व की ताकत मुट्ठीभर सवर्ण नहीं, बल्कि दलित, पिछड़े और आदिवासी हैं. इसलिए अब कोई राममनोहर लोहिया या कांशीराम पैदा ही न होने दिया जाए वरना हिंदुत्व की पोल खुल जाएगी. उत्तर प्रदेश के पिछड़े अब यादव और गैरयादव जातियों में बंट गए हैं तो यह हिंदुत्व के लिहाज से चिंता की नहीं, बल्कि सुकून की बात है.

इस बाबत पहले आरएसएस ने वैचारिक प्लेटफौर्म बनाया और फिर नरेंद्र मोदी ने खूब श्मशान व दीवाली की बातें की, गायों को हाथ से चारा खिलाया और देखते ही देखते खुद को गांधी के बराबर लोकप्रिय मानने लगे.

सरिता विशेष

दरअसल, सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस धर्म और उस के पोंगापंथ से दूर होने लगी थी, इसलिए उस पर तुरंत वामपंथियों के सहयोगी होने का ठप्पा लगा दिया गया. इस का आधार वैचारिक कम, धार्मिक न होना ज्यादा था. जितने मंदिरों में दर्शन और पूजापाठ नरेंद्र मोदी 3 साल से कम वक्त की मियाद में कर चुके हैं, उस से कहीं कम मनमोहन सिंह ने 10 साल में किए होंगे.

धर्मप्रधान देश में विकास योजनाओं और उन के नाम पर भ्रष्टाचार कहनेभर की बात रहती है. असल मुद्दा पूजापाठ होता है जिसे भूलने का खमियाजा कांग्रेस भुगत रही है और यह सिलसिला अभी और चलने का अंदेशा है क्योंकि राज उस भाजपा का है जिस की बुनियाद धर्म पर ही रखी है. ऊंची जाति वालों को दरअसल समझ आ गया है कि वे तो हर लिहाज से श्रेष्ठ हैं और रहेंगे, इसलिए देश के लिए काम करने की जिम्मेदारी दलितों व पिछड़ों को अब दे दी जाए तो सौदा घाटे का नहीं. इन की हैसियत रहेगी तो खेत में काम करने वाले मजदूरों सरीखी ही, काम करते रहने से वे खेत के मालिक नहीं हो जाएंगे. ये लोग अभी धर्म की चालाकियां नहीं सीख पाए हैं.

अब पूजापाठ, यज्ञ, हवन और दानदक्षिणा का जो दौर धीमा होता दिखाई दे रहा था वह बहुत बड़े पैमाने पर होगा. भाजपा और आरएसएस का मकसद पंडों के लिए नए ग्राहक तैयार करना था, जिस में वे कामयाब हो गए हैं.

भाजपाशासित राज्यों में अवधेशानंद, रामदेव और श्रीश्री रविशंकर जैसे धर्मगुरु त्रेता व द्वापर युग के ऋषिमुनियों की तरह स्वच्छंद विचरण करते हैं. वे योग, आयुर्वेदिक दवाइयों, प्रवचनों, दीक्षाओं, यज्ञ, हवन का कारोबार करते हैं और बदले में मुख्यमंत्रियों को आशीर्वाद देते चलते बनते हैं.

व्यक्तिपूजा व चाटुकारिता

इन चुनावों में जिस तरह से मोदी का भक्तिगान किया गया, उस से साबित हो गया कि चुनावों में व्यक्तिपूजा व चाटुकारिता की परंपरा आज भी बरकरार है.

सत्तर के दशक के एक धाकड़ कांग्रेसी नेता थे असम के देवकांत बरुआ. उन की इकलौती योग्यता थी इंदिरा गांधी की चापलूसी करते रहना. एवज में इंदिरा गांधी ने उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया था और बिहार का राज्यपाल भी बना दिया था. एक और कांग्रेसी नेता विद्याचरण शुक्ल थे जो इंदिरा गांधी की स्तुति यह कहते करते थे कि तेरी सुबह की जय, तेरी शाम की जय, तेरे काम की जय, तेरे नाम की जय. विद्याचरण शुक्ल ने ‘सरिता’ का गला घोंटने की कोशिश की थी कि वह धर्म की पोल न खोले.

व्यक्तिपूजा की यह हद इंदिरा युग की याद बेवजह नहीं दिलाती, जिन्हें कांग्रेसियों ने देवी साबित करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी थी, जिस का खमियाजा आखिरकार आपातकाल के रूप में देश को भुगतना पड़ा था. इंदिरा गांधी हार तो हार, अदालत का फैसला न मानने तक की हद तक मनमानी करने पर उतारू हो गई थीं, जिस की एक बड़ी वजह तत्कालीन चाटुकार थे. नरेंद्र मोदी को भगवान साबित करने पर तुले लोग बरुआ और शुक्ला सरीखा गुनाह ही कर रहे हैं जिन्हें रोकने वाला कोई नहीं, क्योंकि यह उन का हक हर लिहाज से है.

मोदीभक्त इस बात की जानबूझ कर अनदेखी कर रहे हैं कि 3 राज्यों में भाजपा कांग्रेस से पिछड़ी है. जोड़तोड़ कर उस ने गोआ और मणिपुर में सरकार बना लिया तो यह उस का संवैधानिक अधिकार है. पर इस से साबित यह होता है कि कोई लहर मोदी के नाम की नहीं थी. अगर होती तो पंजाब उस से अछूता नहीं रहता. फिर जश्न किस बात का? बिलाशक उत्तर प्रदेश में भाजपा ने उम्मीद से परे वह आंकड़ा पार कर लिया है जिस का अंदाजा उस मीडिया को भी नहीं था, जो अब दिनरात मोदी के गुणगान तरहतरह से कर अपनी झेंप व खिसियाहट ढक रहा है. नरेंद्र मोदी को 2014 के मुकाबले, प्रतिशत में इस बार कम वोट मिले हैं. षड्यंत्र रचा जा रहा है कि इस पूरे खेल में लोकतंत्र कहीं नहीं दिखना चाहिए, और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर बोलने वालों का गला दबोचते रहना जरूरी है जिस से जातिगत गुलामी बनी रहे.      

दक्षिणपंथ के बढ़ते खतरे

संकीर्णता की आंधी जब समूची दुनिया में चल रही हो तो धर्म, जातियों का गढ़ भारत कैसे बच सकता है. कुछ समय से विश्वभर में उदार बनाम संकीर्ण विचारों की लड़ाई चल रही है. इस में लोकतंत्र के नाम पर संकीर्ण विचारों की विजय होती दिख रही है. भारत जैसे सब से बड़े लोकतंत्र में ऐसी शक्तियों का मजबूत होना निश्चित ही नुकसानदायक है.

अब यह तय है कि आने वाले समय में विश्व में संकीर्णता फैलेगी, लोकतंत्र की उदारता के लिए कोई जगह नहीं होगी, सोच विस्तृत होने के बजाय सिकुड़ती जाएगी क्योंकि माहौल ऐसा बनाया जा रहा है. तर्क, बहस के लिए स्पेस नहीं रहेगा. स्वतंत्र बोलने, लिखने वालों पर अपने देश का द्रोही होने के आरोप लगाए जाएंगे. कालेजों, विश्वविद्यालयों और इंगलैंड का औक्सफौर्ड विश्वविद्यालय ब्रैक्सिट का शिकार हो रहा है. स्कूलों से इस की शुरुआत की जा चुकी है. हर जगह असहमति के विचार रखने वालों पर हिंसा का प्रयोग किया जाने लगा है. विचारों से मतभेद रखने वालों की खैर नहीं होगी. अमेरिका फर्स्ट, भारत अग्रणी, चीनी साम्राज्य, तुर्की का औटोमन एंपायर शब्द एक ही बात कह रहे हैं. राजनीतिबाजों के हाथ में धर्म हमेशा लोकतंत्र को खत्म करने का हथियार रहा है. अब ये लोग लोकतंत्र के नाम पर तानाशाही रवैए को जगजाहिर करने पर उतारू होंगे. डोनाल्ड ट्रंप के नए बजट में कितने ही उदारवादी संस्थानों को आर्थिक सहायता बंद कर दी गई है.