इसे सत्ता की भूख कहें या सियासी समझौता, पर इतना तो तय है कि दलित विचारधारा के समर्थक व हाशिए पर पड़ी इस जाति की रहनुमाई का दावा करने वाले नेता चुनाव आते ही स्वार्थसिद्धि में मसरूफ हो जाते हैं. आज जागरूक हो चुका दलित क्या अपने तथाकथित रहनुमाओं के पीछे चलेगा, इस का विश्लेषण कर रहे हैं शैलेंद्र.
‘‘देश की राजनीति में दलित विचारधारा का अपना अलग और खास महत्त्व है. दलित बिरादरी अब जागरूक और समझदार हो चली है. वह अपना भलाबुरा सहीसही समझती है. ऐसे में यह समझना कि वह दलित नेताओं की भक्त बनी रहेगी, जरूरी नहीं,’’ यह कहना है दलित चिंतक और अवकाशप्राप्त पुलिस औफिसर एस आर दारापुरी का. वे कहते हैं, ‘‘साल 2012 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में दलितों की अगुआई करने वाली बहुजन समाज पार्टी यानी बसपा को उन सीटों पर भी हार का मुंह देखना पड़ा जो दलित के लिए सुरक्षित थीं. कई ऐसे दलित नेता चुनाव हारे जो दलितों की अगुआई का दंभ भरते थे.’’
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के ग्रामीण इलाके में मोहनलालगंज विधानसभा सीट है. यह दलित बिरादरी के लिए सुरक्षित सीट है. यहां दलितों के बडे़ नेता होने का दंभ भरने वाले आर के चौधरी चुनाव लड़ रहे थे.
आर के चौधरी बसपा सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके थे. वे कांशीराम के समय से मायावती के साथ जुडे़ रहे. बसपा से अलग
हो कर उन्होंने ‘बीएस 4’ नामक पार्टी बनाई. वे मोहनलालगंज विधानसभा क्षेत्र से विधायक रह भी चुके थे. ऐसे में उन का दावा मजबूत था. मोहनलालगंज के वोटरों ने न केवल आर के चौधरी को हरा दिया बल्कि बसपा से चुनाव लड़ने वाली पुष्पा रावत को भी वोट नहीं दिया. यहां पिछड़ों की अगुआई करने वाली समाजवादी पार्टी की चंद्रा रावत को जीत मिली. ऐसी एक नहीं, कई सुरक्षित सीटें हैं जहां से बसपा को हार का सामना करना पड़ा था.
सुरक्षित सीटों पर केवल बसपा ही नहीं दलित की अगुआई का दावा करने वाली तमाम पार्टियां भी जीत हासिल नहीं कर पाईं. दलित नेता उदितराज की इंडियन जस्टिस पार्टी, रामदास अठावले  की रिपब्लिकन पार्टी औफ इंडिया और रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी यानी लोजपा भी इस लाइन में खड़ी नजर आती हैं. एस आर दारापुरी कहते हैं, ‘‘दलित वर्ग की सोच में बहुत बदलाव आ चुका है. वह अब वोटबैंक बन कर नहीं रहना चाहता. उस ने देखा है कि किस तरह से दलितों की राजनीति करने वाले नेताओं ने उस का शोषण किया है. बसपा की बदलती राजनीति का प्रभाव इस वोटबैंक पर बहुत गहरे तक हुआ है. अब वह ऐसे किसी बहकावे में आएगा, इस के आसार नजर नहीं
आ रहे.’’
आरक्षण का सब्जबाग
अखिल भारतीय पासी समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामलखन पासी उत्तर प्रदेश में पासी समाज को सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से बढ़ाने की दिशा में 35 साल से काम कर रहे हैं. वे कहते हैं, ‘‘इंडियन जस्टिस पार्टी के उदितराज ने आरक्षण के नाम पर दिल्ली में कुछ लोगों की भीड़ एकत्र कर यह दिखाने की कोशिश की थी कि वे दलितों के बडे़ नेता हैं. जब वे उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए आए तो उन की बुरी हालत हो गई. वे 3 बार उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर, रौबर्ट्सगंज और हरदोई से लोकसभा का चुनाव लड़ चुके हैं. लोकसभा चुनाव में उन को अधिकतम 5 हजार वोट ही मिल सके. ऐसे में उत्तर प्रदेश में उदितराज के जनाधार को समझा जा सकता है.’’
वरिष्ठ पत्रकार योगेश श्रीवास्तव कहते हैं, ‘‘दलित वोटबैंक देख चुका है कि उस के नाम का सहारा ले कर राजनीतिक दल और नेता अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं. उसे कोई लाभ नहीं मिला है. बसपा ने अपने नेताओं के हितों को पूरा करने के लिए दलितपिछड़ों के गठबंधन को 1995 में तोड़ा, उस का नुकसान दलित और पिछड़ी दोनों ही जातियों को उठाना पड़ा. अगर दलित पिछड़ों का यह गठबंधन उत्तर प्रदेश में कायम रहता तो इस वर्ग का ज्यादा भला हो सकता था. दलित पिछड़ों के टकराव में ये जातियां हाशिए पर आ गईं. इन के नेता अवसरवादी गठबंधन कर के अपना हित साधने में सफल होते रहे.’’
अहम है दलित वोट
देश की राजनीति में दलित वोटबैंक करीब 20 फीसदी के आसपास है. दलित वोटों का एक बड़ा यानी भाजपा समूह दलित पार्टियों के साथ जुड़ा रहा है. एक हिस्सा अभी भी कांग्रेस के साथ खड़ा नजर आता है. भारतीय जनता पार्टी यानी भाजपा ने दलितों को जोड़ने के लिए समयसमय पर कुछ उपाय किए पर दलित वोट उस के साथ खड़ा नहीं हुआ.
भाजपा में दलितों को प्रतिनिधित्व देने के नाम पर पार्टी फोरम के लेवल पर संगठन भी बनाए गए हैं पर इन के नेताओं को कभी महत्त्व नहीं दिया गया. भाजपा को अपनी भूल का एहसास चुनाव के समय होता है. इस भूल को सुधारने के लिए वह फौरीतौर पर दलित नेताओं को पार्टी में जोड़ने का काम करती है.
उत्तर प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव के पहले बसपा से निकाले गए बाबू सिंह कुशवाहा कोभाजपा में लाया गया. इस के बाद उन का क्या हुआ, कुछ पता नहीं चला. बाद में बाबू सिंह कुशवाहा की पत्नी और भाई समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए. रामलखन पासी कहते हैं, ‘‘भाजपा वैचारिक रूप से ऊंची जातियों की पार्टी है, जिन की सोच मनुवादी व्यवस्था पर कायम है. ऐसे में उस के साथ दलित नेता या दलित नेताओं के साथ भाजपा लंबे समय तक नहीं रह सकती.
‘‘चुनाव के समय भाजपा ऐसे काम वोटबैंक को संदेश देने के लिए करती है. दलित वोटर उस की इस बात को समझता है. ऐसे गठबंधन समाज का किसी भी तरह से हित नहीं कर पाएंगे.’’
योगेश श्रीवास्तव कहते हैं, ‘‘भाजपा ने दलितपिछड़ों को एकजुट होने से रोकने के लिए बसपा नेता मायावती को सहारा दे कर उन को मुख्यमंत्री बनवाने का काम किया था. इस से दलितपिछड़ों के वोट बंट गए पर इस का लाभ भाजपा को नहीं हुआ. अपनी इसी रणनीति के कारण भाजपा उत्तर प्रदेश में लगातार पिछड़ती चली गई. इस लोकसभा चुनाव में भी उसे अपने पर भरोसा नहीं है. इसी वजह से वह उदितराज, कौशल किशोर और अनुप्रिया पटेल जैसे दलित बिरादरी के नेताओं को साधने में लगी रही. ये दलित नेता भी बिरादरी में अपनी साख खो चुके हैं. इसी कारण अहम वोटबैंक होने के बाद भी दलित नेता हाशिए पर दिखते हैं.’’
विकास पर चढ़ा जातिवाद का रंग
भाजपा ने कांग्रेस के भ्रष्टाचार और गुजरात के विकास को चुनाव का मुख्य मुद्दा बनाने की बात कही थी. जैसेजैसे चुनाव प्रचार ने गति पकड़नी शुरू की, भाजपा के ये दोनों ही मुद्दे पिछड़ते नजर आने लगे. सीधेतौर पर भाजपा ने राममंदिर की बात करने से परहेज किया पर इशारोंइशारों में वह हिंदुत्व और भगवा रंग को सामने रखती रही. गुजरात के विकास की बात केवल भाषणों तक सीमित हो गई.
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने को पिछड़ी जाति और चाय वाला बता कर प्रचारित किया. जब इस का असर भी वोटरों पर नहीं दिखा तो वह दलित वोटबैंक पर डोरे डालने लगी. इस के लिए वह दलित नेता रामविलास पासवान, उदित राज और रामदास अठावले को पार्टी में ले आई. भाजपा में इसे मोदी की नई टीम के रूप में प्रचारित किया जाने लगा.
बिहार में 15 फीसदी दलित वोट हैं. यह कहा जाता रहा है कि बिहार में रामविलास पासवान का इस वोटबैंक पर मजबूत कब्जा है. 2009 के लोकसभा चुनाव में यह महसूस नहीं हुआ. लोकसभा चुनाव में रामविलास पासवान की पार्टी 12 सीटों पर चुनाव लड़ी पर एक भी सीट पर उसे जीत हासिल नहीं हो सकी. दरअसल, बिहार में दलित वोटों के 15 फीसदी में से केवल 4 फीसदी पर ही रामविलास पासवान का प्रभाव है. यह पूरा वोटबैंक रामविलास का साथ देता नहीं दिख रहा है. बिहार में भाजपा की छवि सवर्ण पार्टी के तौर पर है. ऐसे में रामविलास के साथ आने से भाजपा की यह छवि सही दिख सकती है.
उत्तर प्रदेश में उदितराज का तो इस से भी बुरा हाल है. आरक्षण की राजनीति कर के उदितराज दलितों के नेता जरूर हो सकते हैं पर उन के साथ वोटर नहीं हैं. उदितराज राजनीतिक रूप से भाजपा के लिए किसी भी तरह से लाभकारी नहीं हो सकते. उन का प्रभाव केवल सोनकर बिरादरी पर है जिन की आबादी बहुत कम है. वह भी पूरी तरह से उदित राज के पक्ष में एकजुट नहीं है.
महाराष्ट्र के रामदास अठावले पहले कांग्रेस व एनसीपी के साथ रहे हैं. 2009 में लोकसभा चुनाव में हार के बाद वे इस गठबंधन से बाहर हुए और अब भाजपा के साथ हैं. महाराष्ट्र में उन का प्रभाव केवल मुंबई तक ही सीमित है. महाराष्ट्र में वे शुरू से ही भाजपा व शिवसेना के विरोध की राजनीति करते रहे हैं. ऐसे में वे इन के साथ कितने दिन चल पाएंगे, यह देखने वाली बात होगी.
भाजपा का छिपा स्वार्थ
भाजपा के लोग मानते हैं कि दलित नेताओं के आने से भाजपा को कोई बहुत बड़ा लाभ नहीं होने वाला है. दलित वोटबैंक इन के साथ नहीं है. इन को भाजपा में लाना पार्टी की एक रणनीति का हिस्सा भर है.
नरेंद्र मोदी का विरोध करने वाले तर्क देते थे कि उन की अगुआई में दूसरे दल भाजपा के गठबंधन का साथ नहीं देंगे. इन छोटीछोटी पार्टियों को अपने साथ ला कर भाजपा इस तर्क का उत्तर देने की कोशिश कर रही है. इन नेताओं से भाजपा का केवल यही स्वार्थ है.
इस बहाने अगर कुछ वोट उसे मिल  जाएं तो वह उस के लिए अतिरिक्त लाभ होगा.