सरिता विशेष

भोपाल में शिवराज सिंह चौहान की जनआशीर्वाद यात्रा के समापन के दिन हुआ सियासी जलसा भाजपा के अंतर्द्वंद्व और नरेंद्र मोदी बनाम लालकृष्ण आडवाणी में ही सिमटता दिखा. मंच पर नायक बनने की ख्वाहिश पाले मोदी की दाल यहां नहीं गली. पढि़ए भारत भूषण श्रीवास्तव का लेख.

भोपाल के जंबूरी मैदान में गत 25 सितंबर को आयोजित भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता सम्मेलन को दुनिया का सब से बड़ा राजनीतिक जलसा मानने को गिनीज बुक औफ वर्ल्ड रिकौर्ड्स के अधिकारी भी तैयार हैं. इस महाकुंभ में मध्य प्रदेश के लगभग 6 लाख कार्यकर्ता इकट्ठा हुए थे. भारतीय जनता पार्टी का यह शो दरअसल मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का मेगा शो था जिन्होंने इस दिन 2 महीने तक चली अपनी जन आशीर्वाद यात्रा का समापन किया.

मालवा क्षेत्र के एक युवा भाजपा विधायक की मानें तो 2 बातें एकसाथ हुईं जिन्होंने शिवराज सिंह को परेशानी में डाल दिया था. पहली, नरेंद्र मोदी को आननफानन पीएम पद का उम्मीदवार घोषित किया जाना जिस से प्रदेश में मुसलिम वोटों का नफा, नुकसान में बदल रहा था और दूसरी, कांग्रेसी दिग्गजों का कई दफा एकसाथ मंच पर दिखना व ज्योतिरादित्य सिंधिया का राहुल गांधी के इशारे पर एकदम सक्रिय हो जाना रही. लेकिन इस आयोजन से शिवराज ने एक तीर से दो निशाने साध डाले.

जाहिर है दोनों बातों का चुनाव और मतदाता के मूड से गहरा नाता है. 2003 और 2008 के विधानसभा चुनाव नतीजों से साफ हो गया था कि मध्य प्रदेश का मुसलमान मतदाता भाजपा से परहेज नहीं करता है लेकिन मोदी को थोपा गया तो करेगा और शिवराज की दरियादिली और मेहनत दोनों पर पानी फिर जाएगा. ज्योतिरादित्य सिंधिया इसलिए चिंता की बात हैं कि उन की दादी और बूआएं भाजपा सरकारों में मंत्री रही हैं.

ज्योतिरादित्य सिंधिया भले ही अभी सत्ता पलटने की स्थिति में कांग्रेसी फूट के चलते न हों पर आने वाले वक्त में बड़ा खतरा भाजपा के लिए बन सकते हैं. ऐसे में शिवराज सिंह चौहान के लिए जरूरी हो गया था कि वे अपनी जमीनी ताकत दिखाएं. भाजपा आलाकमान और संघ भी चाहते थे कि दिल्ली की खटास को पाटने के लिए जरूरी है कि लालकृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी ज्यादा से ज्यादा एकसाथ मंच पर दिखें जिस से कार्यकर्ताओं का मनोबल बना रहे और मतदाता में गलत संदेश न जाए.

लेकिन भोपाल में उलटा और दिलचस्प यह हुआ कि लाखों के जमावड़े और दिग्गजों की एकसाथ मौजूदगी से कार्यकर्ताओं का जोश तो बढ़ा लेकिन खटास बजाय कम होने के और बढ़ती दिखाई दी, जिस के विधानसभा चुनावों तक ज्योें की त्यों रहने की आशंका है. अगर भाजपा मध्य प्रदेश में सम्मानजनक तरीके से जीती यानी 230 सीटों में से 125 सीटें भी जीत ले गई तो आडवाणी के तेवर देखने लायक होंगे. वजह, शिवराज सिंह चौहान की गिनती उन के खास शिष्यों और गुट में होती है. मुमकिन है आडवाणी, मोदी के नाम पर दूसरा अड़ंगा साल के आखिर में डालें. इस का संकेत भोपाल में मंच पर साफ दिखा, मोदी और आडवाणी अपने बीच की दूरी छिपा न सके.

भाषणों का सच

24 सितंबर की रात जब प्रदेशभर से कार्यकर्ता बसों, जीपों, ट्रेनों और ट्रैक्टरों से भोपाल आ रहे थे तब रात के 3 बजे मध्य प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर, राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रामलाल और अनंत कुमार तीनों माथापच्ची कर रहे थे कि वक्ताओं के बोलने का क्रम कैसे तय किया जाए.

शिवराज सिंह चौहान किसी भी कीमत पर आडवाणी को नाराज करने और मोदी को हीरो बताने का जोखिम नहीं उठाना चाहते थे, इसलिए बीच का रास्ता यह निकाला गया कि आडवाणी से इस महाकुंभ का उद्घाटन करवाया जाए और फिर उन्हें पहले बोलने दिया जाए.

अपने भाषण में आडवाणी ने आधे से ज्यादा वक्त शिवराज सिंह की संगठन क्षमता और सरकार की तारीफ की.  साथ ही उन्होंने नरेंद्र मोदी और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह की भी तारीफ कर के यह जता दिया कि उन की नजर में भाजपा शासित प्रदेशों के सभी मुख्यमंत्री एक समान हैं. मोदी के प्रधानमंत्री घोषित होने के बाबत वे चुप ही रहे और उसी चुप्पी ने जताया कि वे अभी भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इशारे पर हुए इस फैसले पर न खुश हैं, न इत्तफाक रखते हैं.

कुछ कार्यकर्ताओं द्वारा आडवाणी के भाषण के दौरान मोदीमोदी के नारे लगे तो नाराज आडवाणी ने अपना भाषण अधूरा छोड़ दिया. 3 दिन बाद भाजपा प्रदेश कार्यालय के सूत्रों के हवाले से यह खबर आम लोगों के सामने आई कि 2 हजार कार्यकर्ता गुजरात से मोदी की हर सभा में जाते हैं, जिन का काम ही मोदीमोदी चिल्लाना होता है. प्रधानमंत्री बनने के लिए मोदी इतने बचकाने स्तर पर आ जाएंगे, यह किसी को रास नहीं आ रहा.

पूर्व केंद्रीय मंत्री व भाजपा नेता अरुण जेटली ने भाषण के नाम पर बोलने की रस्म निभाई. जबकि पार्टी के पूर्व अध्यक्ष वेंकैया नायडू मुद्दों से भागते नजर आए पर इन दोनों ने शिवराज की तारीफों के पुल अपने संक्षिप्त भाषण में जरूर बांधे और दूसरों की तरह हारी और थकी आवाज में नरेंद्र मोदी को भविष्य का प्रधानमंत्री कहा.

लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज अपने भाषण में महाभारत का जिक्र करते हुए बोलीं, ‘मैं द्वापर के महाभारत की बात कर रही हूं, सभी मिलजुल कर बैठे हैं.’

यह जल्दबाजी थी या सोचीसमझी चाल, यह तो वही जानें पर सुनने वालों को अचानक ही लालकृष्ण आडवाणी भीष्म पितामह नजर आने लगे और नरेंद्र मोदी दुर्योधन, जिस की सत्ता की भूख ने यह भीषण युद्ध करवाया था. यह चर्चा कई दिनों बाद तक लोग करकर चुटकियां लेते रहे कि मुरली मनोहर जोशी, विदुर या कृपाचार्य हैं, नकुल, सहदेव उन्होंने जेटली और नायडू को माना. भीम का दरजा राजनाथ सिंह को दे दिया पर अर्जुन कौन है जिसे भीष्म पितामह का आशीर्वाद मिल चुका था, यह कोई तय नहीं कर पाया. इस लिहाज से अनजाने में सही, सुषमा ने आरएसएस को धृतराष्ट्र साबित कर डाला.उमा भारती ने शुरू में ही मान लिया कि शिवराज सिंह की राह में वे टंगड़ी नहीं अड़ाएंगी.

मोदी ने किया निराश

देश की दूसरी सब से बड़ी पार्टी भाजपा ने नरेंद्र मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार घोषित किया है तो जाहिर है उन में कोई खास और अलग बात होनी चाहिए, आम और खास लोगों की यह राय भोपाल में नरेंद्र मोदी के भाषण के साथ ही ध्वस्त हो गई.

दरअसल, नरेंद्र मोदी उम्मीद से ज्यादा भीड़ देख सम्मोहित थे और उन से पहले बोले सभी नेता खुलेआम शिवराज सिंह की तारीफ कर उन्हें एहसास भी करा चुके थे कि वास्तव में लोकप्रियता होती क्या है.

जबलपुर से आए एक संभाग स्तर के भाजपा पदाधिकारी का कहना था कि मोदी, शिवराज की तारीफ करें, यह दिक्कत की बात नहीं, दिक्कत की बात यह है कि वे शिवराज की चाटुकारिता कर रहे थे और सारा देश इस के साथसाथ यह भी देख रहा था कि मोदी की उम्मीदवारी से भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं में फूट पड़ गई है और उन का आत्मविश्वास भी डगमगा गया है. यह विधानसभा चुनावों के लिहाज से नहीं, बल्कि लोकसभा के लिहाज से चिंता की बात है.

संघ से भी जुड़े इस छोटे पदाधिकारी की चिंता बेवजह नहीं है और उस की दलील में दम है. भोपाल के एक मुसलमान भाजपा कार्यकर्ता का कहना था, ‘हमें शिवराज सिंह से परहेज नहीं, मोदी से है. उम्मीद थी कि वे भोपाल के इस महाकुंभ में अपने सियासी पाप धोएंगे. वे टोपी भले न पहनें पर होने वाले प्रधानमंत्री में जो निरपेक्षता और उदारता होनी चाहिए वह उन में नहीं दिखी. जाने क्यों इस बड़े जलसे में भाजपा ने शहनवाज हुसैन या मुख्तार अब्बास नकवी को नहीं बुलाया.’

मोदी को खासतौर से सुनने आए भोपाल के एक सरकारी कालेज के प्राध्यापक की मानें तो, ‘मोदी भोपाल  न आते तो उन का ‘क्रेज’ बना रहता. अपने भाषण में उन्होंने शिवराज सिंह और रमन सिंह की तारीफ प्रदेशों के विकास की बाबत की पर खुद  को अलग रखा. वे तो अभी से खुद को पीएम समझने लगे हैं और बोल भी ऐसे रहे थे मानो प्रधानमंत्री बन ही गए हों.’

मोदी की सत्ता लालसा और जल्दबाजी पर आम लोग बिदके दिखे तो जाहिर है मोदी न केवल भाजपा में बल्कि आम लोगों में भी सर्वमान्य नहीं हैं. भाजपा को उन के नाम पर वोट नहीं मिलने वाले. भाजपा की नीति अगर उन के नाम पर हिंदुओं की भावनाओं को भड़का कर वोट झटकने की है तो हो उलटा भी सकता है कि मुसलमानों के साथसाथ छोटी जाति के हिंदू वोट भी उन से कट जाएं.

इस पूरे जलसे के हीरो शिवराज सिंह चौहान रहे जो यह जताने में कामयाब रहे कि प्रदेश में वे अकेले सर्वमान्य नेता हैं. कार्यकर्ता उन के नाम से जुटता और काम करता है इसीलिए आयोजन के पहले प्रकाशित विज्ञापनों और भाषण में वे कार्यकर्ता की ही स्तुति करते रहे जो कार्यकर्ताओं के उत्साह की बड़ी वजह थी.

कांग्रेसी खेमा इस सम्मेलन से इसलिए सकते में है कि विधानसभा चुनाव के नतीजे उसे साफ नजर आ रहे हैं. 2 महीनों में किसी चमत्कार की उम्मीद अब कांग्रेसी नहीं कर सकते. भाजपा की ऊपरी फूट और गुटबाजी का कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में कोई फायदा होता नजर नहीं आ रहा क्योंकि इस सम्मेलन में शिवराज सिंह चौहान ही छाए रहे.

ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी शिवराज की रणनीति समझ आ गई है कि भाजपा का सारा ध्यान अब यूथ और बूथ पर है. वे पसीना बहा कर कांग्रेस के वोट तो बढ़ा सकते हैं पर सीटें इतनी नहीं बढ़ा सकते कि हालफिलहाल के अनुमान गड़बड़ा जाएं. इसलिए वे भी 2018 को ध्यान में रखते बिसात बिछा रहे हैं. कांग्रेस को पहले से, 8-10 ही सही, ज्यादा सीटें मिलीं, जैसी कि जानकार उम्मीद जता रहे हैं, तो इस का श्रेय सिंधिया लेते हुए 5 साल तक ठाकुर लौबी को किनारे कर खुद को मजबूत करेंगे, जो कांग्रेस के लिहाज से जरूरी भी है वरना वह मध्य प्रदेश में बेहद दयनीय स्थिति में पहुंच जाएगी.

शिवराज सिंह की मंशा भी साफ दिख रही है कि विधानसभा जीते तो लोकसभा में उन की चलेगी और मध्य प्रदेश में टिकट उन की पसंद से ही दिए जाएंगे. भाजपा इन दिनों दोहरे द्वंद्व से गुजर रही है. पहले के मुकाबले वह थोड़ी मजबूत जरूर हो रही है पर इस का श्रेय मोदी, आडवाणी को न जा कर शिवराज सिंह, रमन सिंह और वसुंधरा सहित दिल्ली में प्रदेश अध्यक्ष विजय गोयल को जा रहा है.

भाजपा में समीकरण 5 राज्यों के चुनावी नतीजों के बाद तेजी से बदलेंगे. नरेंद्र मोदी भोपाल की भीड़ देख एक तरह से यह मान गए हैं कि मध्य प्रदेश में वोट उन के नहीं शिवराज के नाम पर पड़ेंगे. पर दुर्योधन की तरह वे सब से बड़ी कुरसी के लिए अड़ गए हैं. असल और कलियुगी महाभारत तय है, साल 2014 की शुरुआत में दिखेगा.