सरिता विशेष
सियासत क्या न करवाए. विचारधारा को ताक पर रख कर जिस तरह से सियासी धुरंधर वर्तमान राजनीति में पाला बदल रहे हैं उस को देख कर दलबदलू सियासत का पुराना दौर याद आ जाता है. हवा का रुख देख सियासतदां कैसे दोस्त को दुश्मन और दुश्मन को दोस्त बना रहे हैं, पढि़ए शैलेंद्र सिंह की रिपोर्ट.
 
उत्तर प्रदेश के एक दिन के मुख्यमंत्री के रूप में पहचाने जाने वाले जगदंबिका पाल ने 2009 में डुमरियागंज लोकसभा सीट से चुनाव जीता था. इस के पहले वे उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सहित दूसरे महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे हैं. चुनाव जीतने के बाद वे टीवी चैनलों पर कांग्रेस का पक्ष बहुत मजबूती से रखते देखे जाते थे. 
2014 के लोकसभा चुनाव आतेआते उन का मन बदल गया. वे कांग्रेस के बजाय भारतीय जनता पार्टी से चुनाव लड़ने की कवायद करने लगे. यह उन के बाहुबल का ही कमाल था कि उन को भाजपा की सदस्यता और लोकसभा का टिकट एकसाथ मिल गया. इस को ले कर भाजपा में विवाद भी खड़ा हुआ पर जगदंबिका पाल की सैटिंग के आगे सारा विरोध फेल हो गया. डुमरियागंज लोकसभा सीट में 5 विधानसभा क्षेत्र बांसी, कपिलवस्तु (नौगढ़), डुमरियागंज, सोहरतगढ़ और इटवा आते हैं. कांग्रेस ने जगदंबिका पाल के खिलाफ मजबूत घेराबंदी करने के लिए भाजपा के विधायक जयप्रताप सिंह की पत्नी वसुंधरा कुमारी को डुमरियागंज लोकसभा क्षेत्र से टिकट दे दिया है. ऐसे में दलबदल करने के बाद भी जगदंबिका पाल की चुनावी राह आसान नहीं है. 
प्रदेश के बस्ती शहर व उस के आसपास के क्षेत्र में जगदंबिका पाल जानापहचाना नाम है. उन की पत्नी स्नेहलता पाल यहां से नगर पालिका अध्यक्ष रही हैं. इसी जनाधार का लाभ उठाने के लिए 2012 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपने पुत्र अभिषेक पाल को बस्ती विधानसभा सीट से चुनाव लड़ाया. वह हार गया. बांसी क्षेत्र के नरही गांव के रहने वाले मंगेश दुबे कहते हैं, ‘‘जगदंबिका पाल ने 1 साल पहले से ही भाजपा में जाने की तैयारी कर ली थी. चुनाव जीतने के बाद वे आम लोगों से मिलते नहीं थे. जो उन के करीबी होते थे उन्हीं से वे घिरे रहते थे. हम लोग कई बार उन से मिलने जाते व क्षेत्र की परेशानियां, खासकर बाढ़ से बचाव की योजना बनाने की बात करते तो वे टाल जाते थे. ऐसे में उन को लगने लगा था कि लोकसभा चुनाव में उन की जीत नहीं होगी. इस वजह से वे मोदी के कंधे पर सवार हो गए हैं. लेकिन वसुंधरा कुमारी के आने के बाद कांग्रेस यहां मजबूत हालत में आ 
गई है.’’ 
जगदंबिका पाल ने लोकतांत्रिक कांग्रेस बना कर भाजपा के तब के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की सरकार गिरा दी थी. वे खुद मुख्यमंत्री बन बैठे थे. आज भी वे अपने को पूर्व मुख्यमंत्री कहलवाना पसंद करते हैं. यह बात और है कि अदालत ने इस तख्तापलट को रद्द करते हुए 1 दिन के बाद ही कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री बना दिया था. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह उस समय भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष होते थे. कल्याण सिंह की सरकार बचाने के लिए भाजपा के बडे़ नेताओं को राष्ट्रपति के दर पर जाना पड़ा था. वहां विधायकों की परेड हुई. 
इसे वोटों का फेर ही कहेंगे कि आज राजनाथ सिंह, जगदंबिका पाल और कल्याण सिंह एक ही पार्टी में हैं. इस से साफ लग रहा है कि राजनीति में विचारधारा नहीं केवल ‘राज’ लीला का दौर चल रहा है. 
चुनाव की पूर्व संध्या पर दलबदल करने वालों में जगदंबिका पाल अके ले नेता नहीं हैं. छोटेबडे़ हर स्तर पर इतने नेताओं ने दलबदल किया है कि उन के नाम गिना पाना संभव नहीं है. चर्चा का विषय वे नेता हैं जो किसी विचारधारा के साथ राजनीति कर रहे थे, अब दलबदल कर ठीक उलटी विचारधारा के साथ चुनाव लड़ने के लिए मैदान में हैं.
दोस्त बन जाते हैं दुश्मन
बिहार के रामकृपाल यादव राष्ट्रीय जनता दल यानी राजद के पुराने सिपाही रहे हैं. अपने नेता लालू प्रसाद यादव के साथ वे हर सुखदुख की घड़ी में खडे़ रहते थे. समाजवादी विचारों से ओतप्रोत रामकृपाल यादव पटना लोकसभा सीट से सांसद रहे हैं. राजद ने उन को राज्यसभा सदस्य भी बनवाया था. इस लोकसभा में वे पाटलिपुत्र क्षेत्र से चुनाव लड़ना चाहते थे. राजद ने यहां से लालू यादव की बेटी मीसा यादव को टिकट दे दिया. यह बात रामकृपाल यादव को अच्छी नहीं लगी.  उन्होंने राजद नेता लालू प्रसाद यादव के खिलाफ मोरचा खोल दिया. वे भाजपा में चले गए. भाजपा ने उन को पाटलिपुत्र से टिकट दे दिया. जिस भाजपा और उस 
की सांप्रदायिकता को कोसकोस कर रामकृपाल यादव ने अपनी राजनीति को आगे बढ़ाया, आज उसी भाजपा की शान में कसीदेपढ़ते वे नजर आ रहे हैं. 
कुछ यही हाल है जनता दल यूनाइटेड के नेता साबिर अली का. जदयू ने साबिर अली को पार्टी की दिल्ली इकाई का अध्यक्ष बनाया था. वे लोकजनशक्ति पार्टी से जदयू में आए थे. साबिर अली को जदयू ने बिहार की शिवहर सीट से लोकसभा का प्रत्याशी घोषित किया था. जब लोकजनशक्ति पार्टी का भाजपा के साथ चुनावी तालमेल हो गया तो साबिर अली को भी जदयू बोझ लगने लगा. वे पार्टी की लाइन के खिलाफ जा कर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करने लगे. यह बात जदयू को पसंद नहीं आई और उस ने साबिर अली को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया. उस के बाद साबिर अली को भाजपा का सहारा मिला लेकिन पार्टी के ही अंदर विरोध के कारण साबिर अली से भाजपा का सहारा भी छिन गया. दलबदल करने वाले नेताओं की लिस्ट में नाम खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे हैं.
इस लिस्ट में मध्य प्रदेश के कांग्रेसी नेता डा. भागीरथ प्रसाद के साथसाथ उत्तर प्रदेश में अमर सिंह और जयाप्रदा जैसे बडे़ नाम भी शामिल हैं. कभी समाजवादी विचारधारा को पालपोस कर खड़ा करने वाले अमर सिंह व जयाप्रदा अब राष्ट्रीय लोकदल से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं. अमर सिंह कहते हैं, ‘‘मेरे 2 बेटियां हैं, कोई बेटा नहीं है. ऐसे में मैं लोकदल नेता जयंत चौधरी को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित करता हूं.’’ अमर सिंह ऐसे बोल मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश यादव के लिए कभी बोला करते थे. ऐन चुनाव के पहले नेता न केवल पार्टी बदल रहे हैं बल्कि नए रिश्ते बनाने से भी नहीं चूक रहे हैं. वैसे देखा जाए तो चुनाव के पहले दलबदल करने की आदत नई नहीं है. नई बात यह है कि इस बार दलबदल में विचारधारा को पूरी तरह से ताक पर रख दिया गया है. 
अपनी बातों पर भरोसा नहीं
केवल दलबदल करने वाले ये नेता ही नहीं, उन को टिकट देनी वाली पार्टियां भी सवालों के घेरे में हैं. नेताओं ने साफ कर दिया है कि उन को किसी तरह की नीतियों या अपनी कही बातों पर भरोसा नहीं है. ऐसे नेता राजनीति में इसलिए हैं कि उन की सत्ता बनी रहे. इस के लिए उन को जिस का भी सहारा लेना पडे़गा, लेने में कोई परेशानी नहीं है. क ई नेताओं ने इस चुनाव में टिकट कटने पर दलबदल करने का काम किया है. उन में राजस्थान के भाजपा नेता जसवंत सिंह प्रमुख हैं. 
भाजपा ने जब जसवंत सिंह को बाड़मेर से टिकट नहीं दिया तो वे निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में आ गए. यहां भाजपा ने कांग्रेस से आए सोनाराम को टिकट दिया है. वैसे जसवंत सिंह इस के पहले दार्जिलिंग से लोकसभा पहुंचे थे. वे अपना रिटायरमैंट बाड़मेर सीट से लेना चाहते हैं. उन के बेटे मानवेंद्र सिंह भाजपा से विधायक हैं. 
नेता चुनाव हारने का जोखिम लेने को तैयार रहते हैं. पर चुनाव न लड़ें, ऐसा नहीं करना चाहते. हारने के बाद भी नेताओं की पहचान बनी रहती है. नेताओं को आम लोगों की कोई परवा नहीं होती. वे केवल अपने चमचों की बात सुनते और उसी पर यकीन करते हैं. हैरानी की बात यह है कि नेताओं के चमचे उन को सही बात नहीं बताते, केवल उन की तारीफ ही करते रहते हैं. ऐसे में नेता को सचाई का पता नहीं चलता है. दरअसल, नेता को अपने आसपास भीड़ देखने की बुरी आदत पड़ जाती है. वह चमचों का सच जान कर भी इसलिए चुप रहता है कि उस के आसपास लोगों की भीड़ लगी रहे. 
क्यों बदलते हैं पार्टी
नेताओं का राजनीति और विचारधारा से कोई मतलब नहीं रह गया है. नेताओं और उन के चमचों के कारण जनता का एक बड़ा वर्ग नेताओं से नाराज हो जाता है. ऐसे में नेताओं को लगता है कि अब चुनाव जीतना संभव नहीं है. तब वे दलबदल कर दोबारा चुनाव? मैदान में आ जाते हैं. 
कांग्रेस के सांसद रहे जगदंबिका पाल ने अगर अपनी सांसद निधि से क्षेत्र का सही तरह से विकास किया होता तो आज उन को अपनी सीट जीतने के लिए भाजपा की चौखट पर नाक नहीं रगड़नी पड़ती. जगदंबिका पाल को लगता है कि कांग्रेसी विचारधारा को मानने वाला वोटर उन की सचाई को समझ चुका है. ऐसे में अब भाजपाई विचारधारा वाले वोटर को बरगलाया जाए.
जिन नेताओं ने दलबदल किया उन में से ज्यादातर नेता अपने इलाके में ही सिमट कर रह गए थे. वे अपने इलाके में जाते तक नहीं थे. इन में से ज्यादातर को यह लग रहा है कि भाजपा की पतंग ऊंची उड़ रही है, वे उस के सहारे अपनी वाहवाही भी करवा सकते हैं. कल तक जो नेता भाजपा को पानी पीपी कर कोस रहे थे अब उस की वाहवाह करते दिख रहे हैं.
हकीकत में इन लोगों ने जिस पार्टी में ये थे वहां के लिए कुछ नहीं किया. जहां जा रहे हैं वहां भी वे कुछ नहीं करेंगे. इन की न कोई अपनी नीति है न  जिम्मेदारी. जिस पार्टी में गए हैं वहां 2 दिन तक इन का खूब आदर होगा. इस के बाद इन की हालत पुराने रिश्तेदार सी हो जाएगी. 
नेताओं के इस खेल को भाजपा भी समझती है. उसे अपने नेता, वोटर और उस के वोटबैंक पर पूरा भरोसा नहीं था. ऐसे में उसे लग रहा है कि जिन नेताओं से जो कुछ मिल रहा है, ले लो. बाद में उन को देख लिया जाएगा. जो होशियार नेता थे उन्होंने अपना विलय भाजपा में नहीं किया ताकि समय आते ही आसानी से भाजपा का साथ छोड़ जाएं. जो नेता पार्टी विलय कर भाजपा में आ चुके हैं उन के सामने असमंजस के हालात बने रहेंगे. जो नेता चुनाव हार जाएंगे उन के सामने तो रास्ते खुले होंगे पर जो जीत कर सांसद बन जाएंगे वे कब तक 
घुटन महसूस करेंगे, यह देखने वाली बात होगी.