‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस‘ का नारा देते समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोचा भी नहीं था कभी उनकी सरकार भी मंत्रियों की संख्या के आधार पर डाक्टर मनमोहन सिंह सरकार के बराबर पहुंच जायेगी. ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस‘ का मतलब यह होता है कि सरकार कम खर्च में ज्यादा काम करेगी. अपनी बात को सही साबित करने के लिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने केवल 45 मंत्रियों के साथ शपथ ग्रहण की थी. 2 साल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस‘ वाले किफायती सिद्वांत को दरकिनार करते हुये 78 मंत्रियों को सरकार में शामिल करके शाहखर्ची का काम शुरू कर दिया गया है.

वैसे सबसे अधिक मंत्रियो का रिकार्ड वाजपेयी सरकार के नाम है. 1999 की वाजपेयी सरकार में मंत्रियों की संख्या 56 से शुरू होकर 88 तक पहुंच गई थी. उसके बाद सबसे अधिक मंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह सरकार में थे. उस समय 78 मंत्री बनाये गये थे. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार में भी 78 मंत्री हो गये हैं. जिससे साफ हो गया है कि सरकार अब किफायत को भूल कर शाहखर्ची की तरफ बढ़ चुकी है. वैसे कानूनी हक की बात की जाये तो संविधान के अनुच्छेद 72 के अनुसार केन्द्र सरकार में 82 मंत्री हो सकते है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘गवर्नेंस‘ पर ‘पॉलिटिकल बैलेंस’ साधने की मजबूरी समझ नहीं आ रही है.

वाजपेयी सरकार और डाक्टर मनमोहन सरकार की मजबूरियां थी जिसके कारण उनको अपने मंत्रिमंडल का आकार बढाना पडा था. यह दोनो ही सरकारें सहयोगी दलो के सहारे पर टिकी थी. सहयोगी दलों का लगातार दबाव पड़ता था. सहयोगी दलों का दबाव कई बार सरकार बचाने और गिराने की हद तक चला जाता था. डाक्टर मनमोहन सिंह सरकार पर यह दबाव कुछ अधिक ही था, जिसके कारण उनको सहयोगी दलों को प्रमुख विभाग भी देने पड़े थे. भ्रष्टाचार के मामलों में देखे तो सबसे अधिक आरोप सहयोगी दलों के मंत्रियों पर था. इसी तरह के दबाव में वाजपेयी सरकार भी थी. दबाव का ही कारण था कि पहली बार वाजपेयी सरकार केवल 13 दिन ही चल पाई थी. 1 वोट से वह ससंद में अपना बहुमत साबित नहीं कर पाई थी.

2014 में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में बनी सरकार में देश की जनता ने भारतीय जनता पार्टी को पूरा बहुमत दिया था. भाजपा को सरकार बनाने के लिये सहयोगी दलों के जरूरत नहीं थी. इसके बाद भी भाजपा ने अकाली दल, लोकजनशक्ति पार्टी और शिवसेना जैसे सहयोगी दलों के नेताओं को मंत्रिमंडल में शामिल किया था. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 45 मंत्रियों के साथ अपना काम शुरू किया तो लगा कि बहुमत की सरकार कम खर्च में काम कर देश के सामने एक मिसाल कायम करेगी. 2014 के लोकसभा चुनाव में सरकार की चमक लगातार फीकी पड़ती जा रही है. इस चमक का असर था कि भाजपा दिल्ली, बिहार जैसे प्रमुख प्रदेशों में चुनाव हार गई.

2017 में उत्तर प्रदेश और गुजरात में विधानसभा के चुनाव हैं. भाजपा किसी भी कीमत पर उत्तर प्रदेश और गुजरात जीतना चाहती है. ऐसे में केन्द्र सरकार में उत्तर प्रदेश से 13 मंत्री बनाये गये हैं. सबसे अलग दिखने वाली बात यह है कि जिन मंत्रियों की संख्या बढ़ाई गई, उनमें ज्यादातर भाजपा के लोग है. सहयोगी दलों के सांसदो को मंत्रिमंडल विस्तार में कम मौके ही मिल सके है. इस बात को लेकर शिवसेना अपना मत साफ कर चुकी है. मंत्रिमंडल के सहारे केन्द्र सरकार ने अपनी खोई चमक को वापस पाने और नये जातीय समीकरण को साधने का प्रयास कर रही है. मंत्रिमंडल के विस्तार से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस‘ सिद्वांत को चोट पहुंची है. उनकी छवि प्रभावित हुई है.

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