सरिता विशेष

14 अप्रैल 2016 को लखनऊ के डाक्टर अंबेडकर सामाजिक परिर्वतन स्थल पर जुटी भीड पहले के मुकाबले काफी कम थी. उम्मीद की जा रही थी कि 2017 के विधानसभा चुनावों को देखते हुये मायावती विरोधी दलों को करारा जवाब देने के लिये भारी भीड जुटायेंगी. रैली में आये ज्यादातर लोग बसपा के अगडे नेताओं द्वारा बसों से लाये गये लोग थे. पहले मायावती शक्ति प्रदर्शन करने के लिये रमा देवी पार्क में रैली करती थी. वह बडा पार्क है. इस बार भीड में कमी का अंदाजा बसपा के लोगों को पहले लग गया था, इसलिये रैली के लिये दूसरी जगह चुनी गई. 

उत्तर प्रदेश जैसे बडे प्रदेश का 4 बार मुख्यमंत्री बनने के बाद मायावती राजनीति में वो मुकाम हासिल नहीं कर पाई जिसकी उम्मीद कांशीराम ने की थी. उत्तर प्रदेश के बाहर राष्ट्रीय स्तर पर बसपा का संगठन धारदार नहीं बन सका. इसकी मूल वजह उसका दलित मुद्दों से कट जाना, कुरीतियों और रूढिवादी सोंच का विरोध बंद कर देना, मूर्तियां लगवाकर पूजा पद्वति का समर्थन करना और भ्रष्टाचार में डूब जाना रहा है. संगठन को विस्तार देने के लिये दूसरे नेताओं पर भरोसा करना पडता है. मायावती ने पार्टी को अपने आसपास ही समेट कर रख दिया. सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर बसपा में वह नेता आ गये, जिनका कभी  बसपा विरोध करती थी. मायावती पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने उनकी छवि को बहुत कमजोर कर दिया.

इस बात का अहसास खुद मायावती को अब हो रहा है. मायावती कहती हैं ‘अब स्मारक नहीं बनवाऊंगी. प्रदेश में विकास और कानून का राज स्थापित करूंगी.’ मायावती को दलित राजनीति की कुंजी मिली थी. जिसका प्रयोग करके वह देश की राजनीति में दलितों को मजबूत कर सकती थी. राजनीति में आज गठबंधन का दौर है. मायावती इस बात को भी सीखने को तैयार नहीं है. देश के अलग अलग हिस्सों में काम कर रहे दलित नेताओं, उनकी पार्टियों और दूसरे संगठनों के साथ तालमेल बनाने में मायावती असफल रही हैं.

पिछले 20 सालों में दलितों की सोच में बदलाव आया है. अब वह केवल जाति के नाम पर बसपा के पीछे खड़े होने को तैयार नहीं हैं. बसपा दलित विकास के बजाये केवल दलित स्वाभिमान की बात करती है. मायावती के विपरीत दूसरे दलों ने दलित वर्ग को अपने से जोडने और पार्टी में जगह देने की शुरूआत की है.