मीडिया और बसपा का साथ कभी बहुत अच्छा नहीं रहा. मीडिया में कुछ खास चेहरों पर ही बसपा भरोसा करती है. विधानसभा चुनाव के समय बसपा ने अपने लोकल स्तर तक के नेताओं को मीडिया से दूर रहने का फरमान दिया है. बसपा सोचती है कि मीडिया में उसके पक्ष को सही तरह से नहीं रखा जाता.

बसपा प्रमुख मायावती जब प्रेस कॉंन्फ्रेंस करती हैं तो चुने गये मुद्दे पर अपनी बात रखती है. वे ज्यादातर सवालों के जवाब नहीं देती हैं. प्रदेश स्तर पर दूसरे नेता भी मीडिया में अपनी बात नहीं रखते. अभी तक बसपा के लोकल स्तर के नेता लोकल मीडिया के संपर्क में आ जाते थे. लोकल मीडिया की रिपोर्ट और जानकारी के आधार पर अधिकतर रिपोर्ट तयार होती रही है. अब बसपा ने अपने लोकल नेताओं और विधानसभा चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों को भी मीडिया से दूरी बना कर रखने के लिए कहा है.

मीडिया से दूरी रखने वाली बसपा सोशल मीडिया पर पूरी तरह से सक्रिय हो

गयी है. सोशल मीडिया पर पार्टी के प्रचार में पंपलेट जारी किये गये है. बसपा के कई दूसरे नेताओं के भी सोशल मीडिया पर अपने एकांउट बन गये है. उसके जरीये यह प्रचार चल रहा है. मीडिया से दूर रहने वाली बसपा को सोशल मीडिया पर भरोसा कैसे जगा ? असल में बसपा आर उसके नेताओं को मीडिया से कोई परहेज नहीं है. बसपा नेताओं का असल परहेज मीडिया के सवालों से है. वह इन सवालों से बचने के लिये मीडिया से दूरी बना कर रखती है. कई बार बसपा नेताओे के बयान उनकी नीतियों से अलग होते हैं. ऐसे सवालों पर वह कोई जवाब नहीं देना चाहते. नापंसद सवाल पूछने वाले को विरोधी दल से मिला हुआ तक कह दिया जाता है.

आज के दौर में मीडिया प्रचार का बड़ा साधन है. मीडिया की इस कमी को पूरा करने के लिये बसपा ने मीडिया से दूरी रखते हुये सोशल मीडिया पर खुद को एक्टिव कर लिया है. सोशल मीडिया के जरीये बसपा अपनी बात कह भी ले रही है और उसको किसी भी तरह के सवाल को जवाब भी नहीं देना पड़ता. बात केवल बसपा की ही नहीं है. अब ज्यादातर नेता अपनी पंसद की मीडिया को ही महत्व देने लगे हैं. हर नेता कठिन सवालों से बचने की कोशिश में लगे हैं. ऐसे में यह लोग सोशल मडिया के जरीये अपनी बात कह कर निकल जाते हैं.

इसे एक तरह से नेताओं में बढ़ती हठधर्मिता के रूप में देखा जा सकता है. अब नेताओं को चुभते हुये सवाल अच्छे नहीं लगते. कई दलों के नेता विपक्ष में रहते हुये मीडिया के साथ अच्छे संबंध रखते हैं पर सत्ता में आते ही मीडिया से दूरी बना लेते हैं. बसपा इस मामले में ज्यादा बदनाम है. अब मीडिया की कमी को पूरा करने के लिये सोशल मीडिया को जरिया बनाकर उसके जरीये अपनी बात कह कर बाकी सवालों से बचने का रास्ता मिल जाता है. मीडिया से दूरी के कारण ही मीडिया में बसपा की बात नहीं आती जिसे बसपा इस तरह पेश करती है जैसे पूरी मीडिया दलितों के खिलाफ हो.