धार्मिक राज की स्थापना के लिए दौड़ाए गए अश्वमेध के घोड़े को बिहार में रोक दिया गया. राज्य में भाजपा ने विकास के मुलम्मे में जो धर्म इस्तेमाल किया था, जनता ने उसे ठुकरा दिया. मतदाताओं को भरमाने, बरगलाने की तमाम कोशिशें नाकाम साबित हुईं. गो, पाकिस्तान, आरक्षण की समीक्षा जैसे धार्मिक मुद्दों को नकार दिया गया. 243 विधानसभाई सीटों वाले इस प्रदेश में 178 सीटें जीत कर नीतीश-लालू की अगुआई वाले महागठबंधन ने हिंदुत्व राष्ट्रवादी ताकतों को परास्त कर दिया. महीनों पहले ही दो घोर विरोधी नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव ने हाथ मिला लिया था. 2014 के लोकसभा  चुनाव में नरेंद्र मोदी की आंधी से आशंकित इन नेताओं ने महागठबंधन बनाया, हालांकि बारबार टूटने के लिए बदनाम इस गठबंधन को समाजवादी पार्टी छोड़ गई लेकिन राजद, जदयू और कांग्रेस ने मिल कर पूरी गंभीरता से चुनाव लड़ा. उधर, रामायणमहाभारत सरीखे विभीषणों को ढूंढ़ने और फायदा उठाने की चालों में माहिर भारतीय जनता पार्टी ने जीतनराम मांझी, उपेंद्र कुशवाहा को साथ ले लिया. बिहार में दलित वोटों में पैठ रखने वाले रामविलास  पासवान को उस ने पहले से ही केंद्र की सत्ता में भागीदार बना रखा है.

चुनावों में प्रदेश की जनता के सामने आज भी शिक्षा, रोजगार, बिजली, पानी, सड़कों जैसे अहम बुनियादी सवाल खड़े थे पर दोनों ही गठबंधनों के पास इन सवालों के ठोस जवाब नहीं थे, न ही कोई रूपरेखा. ऐसे मुद्दे उठाए गए जिन का प्रदेश और प्रदेशवासियों की तरक्की से किसी तरह का वास्ता नहीं था. लालू यादव को प्रदेश में सब से बड़ी कामयाबी मिली. यह सफलता भाजपा की गलत नीतियों की वजह से मिली है. भाजपा के चुनाव प्रचार में धर्म की संकीर्णता की जहरीली हवा बही. पार्टी और संघ के नेता जो भाषण दे रहे थे वे उस जातीय, धार्मिक नफरत की वारदातों से प्रभावित थे जो देश के दूसरे हिस्सों में हो रही थीं. बिहार में बहुसंख्यक दलितों और पिछड़ों को गुजरात के हार्दिक पटेल के आंदोलन का पता लगने लगा था और ऊपर से संघ प्रमुख मोहन भागवत द्वारा आरक्षण की समीक्षा करने की बात का भी. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के भाषण की इस बात से कि अगर नीतीश, लालू का महागठबंधन जीता तो पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे, लोगों ने भाजपा की संकुचित नजर को स्पष्ट तौर पर भांप लिया. स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 26 रैलियों से लोगों को आकर्षित नहीं कर पाए. प्रधानमंत्री के भाषणों में भीड़ तो जुटी पर वे उस भीड़ को भरोसा नहीं दिला पाए कि भाजपा की तरक्की का रास्ता दिखेगा.

लालू यादव भाजपा के नकारात्मक चुनाव प्रचार और देशभर में फैले उस के कट्टरवादी माहौल का पूरा फायदा उठाते हुए लोगों को समझाने में कामयाब रहे कि अगर भाजपा का राज आया तो फिर से  पौराणिक व्यवस्था लागू हो जाएगी. लालू ने धर्म की वर्णव्यवस्था से सताई जातियों को और कुछ दिया या न दिया हो, उन्हें पिछले साढ़े 3 दशक से सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर जरूर जाग्रत कर दिया, उन में इस बात की चेतना जगा दी कि धार्मिक व्यवस्था की वजह से वे गरीब, पिछड़े और नीची जातियों में हैं. यह किसी पूर्वजन्म के कर्मों का फल नहीं, स्वार्थी चालों की वजह से है. लालू अरसे से ब्राह्मणवाद को कोसते रहे हैं. लोहिया, जयप्रकाश नारायण की क्रांति के दौर में निकले लालू, शरद यादव जैसे पिछड़े नेताओं ने सदियों से चली आ रही धर्म की भेदभाव वाली व्यवस्था की पोल खोली और लोगों को सचेत किया. प्रदेश की अधिकांश निचली, पिछड़ी जातियां जानती हैं कि भाजपा फिर से वही व्यवस्था थोपना चाहती है जो उन की गरीबी, बदहाली का कारण रही है. दरअसल, 2014 में भाजपा को लोकसभा चुनाव में जो जनादेश मिला था, भाजपा ने उसे हिंदू राष्ट्रवाद पर मोहर समझ लिया पर वह कांग्रेस नेतृत्व वाले संप्रग के भ्रष्ट, निकम्मेपन के खिलाफ विकल्प के अभाव में आक्रोश का नतीजा था. ऐसा नहीं है कि  कांग्रेस हिंदूवादी नहीं है. कांग्रेस भी उतनी ही पाखंडी है जितनी भाजपा.

कांग्रेस में भी शुरू से ही ब्राह्मणवादी सोच हावी रही. यह सोच उस की पार्टी और शासन की नीतियों में उजागर होती रही. महात्मा गांधी स्वयं तो वर्णव्यवस्था के पैरोकार थे, मदनमोहन मालवीय, बाल गंगाधर तिलक और प्रगतिशील माने गए जवाहरलाल नेहरू ने भी हिंदुत्व विचारों का पोषण किया. कांग्रेस द्वारा जातियों में ऊंचनीच बनाए रखने की नीति का खुलासा करते हुए ‘मुक्ति के अग्रदूत बाबू जगजीवनराम’ नामक पुस्तक में जगजीवनराम ने लिखा है, ‘‘पंडित जवाहरलाल नेहरू ने एक कमेटी बनाई थी, ‘आर आर दिवाकर कमेटी’, जिस का काम यह देखना था कि लोग सरकारी कागजातों में अपनी जाति का नाम नहीं लिखें. कमेटी की सिफारिश आ गई. इस पर विचार हुआ. मैं ने पंडितजी से कहा कि दिवाकर कमेटी की सिफारिशें तो हमें ठगने के लिए हैं. मैं ने कहा कि मेरे नाम से पता नहीं चलता कि मैं कौन हूं. बाह्मण हूं कि राजपूत हूं, वैश्य हूं कि शूद्र हूं. जगजीवनराम बाह्मण भी हो सकता है, क्षत्रिय भी हो सकता है, लाला भी हो सकता है, शूद्र भी हो सकता है, अछूत भी हो सकता है. लेकिन पंतजी को जाति बताने की क्या जरूरत है? गोविंद वल्लभ पंत ब्राह्मण के अलावा दूसरा कोई हो ही नहीं सकता. मेरी जाति तो लिखना ही बंद करा दें, ब्राह्मणों व कुछ दूसरों की जाति लिखना चालू रहे, इस से बढ़ कर धोखा क्या हो सकता है. नेहरू कहने लगे कि बात तो ठीक कहते हो पर किया क्या जाए? मैं ने कहा कि बहुत सरल तरीका है कि किसी के नाम के आगे या पीछे कोई जाति सूचक विशेषण या उपाधि लगाई ही न जाए.

‘‘वे कहने लगे, बड़ी गड़बड़ी होगी. मैं ने कहा, हां, एक पीढ़ी में कठिनाइयां आएंगी, दूसरी पीढ़ी में ठीक हो जाएंगी. आज जाति सूचक उपाधि लगाने की बीमारी तेजी से बढ़ रही है, हम जाति मिटाने का नारा लगाते रहे. अपनी जाति का विज्ञापन करने पर क्यों तुले हैं. अपनी जाति को अपने नाम के साथ ले कर सारी दुनिया को क्यों बताने लगे कि हम इस जाति के हैं?’’ जाहिर है नेहरू ने कोई कारगर निर्णय नहीं लिया. गांधी ने भी ‘हरिजन’ नाम दे कर दलितों की अलग पहचान कायम रखी. कांग्रेस कम पाखंडी नहीं थी. गरीबी, जाति, गुलामी मिटाने के लिए उस ने कोई व्यावहारिक कदम नहीं उठाया. बिहार सब से अधिक नक्सलवाद प्रभावित राज्य है. नक्सलवाद कांग्रेस और भाजपा की इसी धार्मिक भेदभाव वाली नीति की देन है. नक्सली धर्म जाति के सताए दलित, पिछड़े और आदिवासी हैं जिन से उन की रोजीरोटी, जमीन छीनी जा रही है. धर्म के रास्ते पर चलने वाली भाजपा की सोच धर्मग्रंथों में वर्णित उन्हीं बातों जैसी है, जिन में शूद्रों को संपत्ति रखने का कोई अधिकार नहीं है और अगर किसी के पास कोई संपत्ति है तो उसे ब्राह्मण को छीन लेनी चाहिए.

संघ ने जोर लगाया कि दलितों, पिछड़ों को मंदिरों से जोड़ा जाए. वे सफल हुए. उन्हें 2 नंबर के देवता पकड़ा दिए गए. एक सेना तैयार कर ली गई. इन वर्गों को भाजपा धर्म के जंजाल में उलझा रही है. ऊंचे देवता, अवतार उन के  खुद के लिए और उन के सेवकों को शूद्रों, दलितों को पकड़ा दिया गया. आज बड़ी तादाद में ये वर्ग शिव, हनुमान, शनिदेव, साईं बाबा जैसों को अपना भगवान मान कृतज्ञ हो रहे हैं. भाजपा और संघ बिहार में विकास का नहीं पाखंड का एजेंडा ले कर आए. प्रधानमंत्री खुद को योग के विश्व ब्रैंड प्रचारक साबित करते सुने गए. मोहन भागवत जगतगुरु की भूमिका में नजर आए. प्रदेश की 85 प्रतिशत आरक्षण की पक्षधर जनता के सामने आरक्षण की समीक्षा की बात कह कर फंस गए. भले ही इतनी तादाद में पिछड़ों/दलितों का आरक्षण कोटा ऊंट के मुंह में जीरा हो पर इन वर्गों के लिए दिखाने के लिए आरक्षण बड़ा सहारा है. भागवत की एक तरह से यह धमकी थी कि भाजपा को वोट नहीं दिया तो आरक्षण बंद करा देंगे. संघ के हिंदुत्व एजेंडे ने बंटाधार कर दिया. उस ने खुद ही महागठबंधन के लिए जीत की बिसात तैयार कर दी. ‘सब का साथ सब का विकास’ का नारा देने वाले मोदी स्वयं बिहार में अपनी ही बात से भटक गए. उन के भाषणों में विकास की जगह योग, आयुर्वेद, गो, पाकिस्तान जैसे मुद्दे हावी हो गए.

बिहार चुनाव के दौरान देशभर में भाजपा नेताओं के धार्मिक संकीर्णता भरे बयान आते रहे. अरुण जेटली ने कहा था, ‘‘बलात्कार छोटी घटनाएं हैं,’’ फिर बोले, ‘‘मध्यवर्ग अपना खयाल खुद रखे.’’ शुक्र है यह नहीं कहा कि महंगाई, अपराध, असुरक्षा उन के पूर्वजन्मों के कर्मों का फल है. मोदी ने कहा था, ‘‘लड़की अगर अचार बेचे तो ज्यादा बिकेगा.’’ मनोहर लाल खट्टर ने कहा, ‘‘बलात्कार के लिए लड़कियां जिम्मेदार हैं.’’ फिर कहा, ‘‘गोमांस खाने वाले पाकिस्तान चले जाएं.’’ साक्षी महाराज ने फरमाया था, ‘‘महिलाएं 4-5 बच्चे पैदा करें.’’ भाजपा के कैलाश विजयवर्गीय के वचन थे, ‘‘लड़कियों को मर्यादा में रहना होगा, तब बलात्कार नहीं होगा.’’ अमित शाह ने कहा था, ‘‘राममंदिर के लिए 320 सीटें चाहिए.’’ बिहार से आने वाले सांसद एवं कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा कि किसान आत्महत्या प्रे्रम संबंधों और नपुंसकता की वजह से कर रहे हैं. कैलाश विजयवर्गीय फिर बोले, ‘‘भ्रष्टाचार ऐसे करो कि किसी को पता न चले.’’ हेमा मालिनी के बोल थे, ‘‘ज्यादातर बंगाल और बिहार की विधवा महिलाएं मथुरा में भीख मांगती हैं.’’ ये विधवाएं हिंदू धर्म की ही देन हैं, उन्होंने यह नहीं बताया.

दुनिया को बताने के लिए एक बार मोदी ने यह भी कहा था कि गुजरात की लड़कियां कुपोषण की शिकार नहीं हैं बल्कि वे तो अपना शरीर बनाने के चक्कर में कुपोषण जैसी हो रही हैं. एक और नेता पुरुषोत्तम रूपाला ने कहा था, ‘‘दलित और महिलाओं को मार मारने से ही वे सीधे चलते हैं.’’ देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने तो गालियों को ही वेद वाक्य बता दिया. रक्षा मंत्री वी के सिंह ने दलित की बराबरी कुत्ते से कर दी. इन के अलावा केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा, सांसद महंत आदित्य नाथ, साध्वी निरंजना जैसे कई नेताओं की शास्त्रसम्मत बातें जनता के सामने आईं.

मोदी दुनियाभर में दौरे करने में जुटे हैं पर मोदी को विदेशों में जो भाव मिल रहे हैं वह भारत से गए हुए उन संपन्न व सफल हिंदुओं की तरफ से ही हैं जो अलगअलग देशों में हिंदुत्व का झंडा उठाए वहां की सरकारों पर दबाव की कूवत रखते हैं. वे यहां से धर्म की पोटली लाद कर विदेशों में गए एनआरआई हैं जो भारत में धर्म के पाखंडों के बढ़ावे के लिए तो पैसा भेजते हैं पर शिक्षा और तार्किक सोच के प्रचारप्रसार में उन की उतनी रुचि नहीं है. ये लोग आईपीएल मैचों में भारत का झंडा लहराते दिखते हैं. पर जिन देशों में रहते हैं, सुविधाएं पाते हैं, उन के प्रति वे वफादारी कहां दिखाते हैं चाहे वे वहां के नागरिक बन गए हों. उन के दोहरेपन को कोसना जरूरी नहीं है क्या? वे रहते अमेरिका, फ्रांस में हैं, गुणगान भारत के नरेंद्र मोदी का करते हैं. संघ का एजेंडा भाजपा के सत्ता में आने के बाद तेज हुआ है. कांग्रेस तो पाखंडी थी. मगर वह धर्म को बेच नहीं रही थी. लेकिन भाजपा धर्म को विदेशों तक में बेचने का बाजार तैयार करने में जुटी है. भला किसी देश के प्रधानमंत्री को दुनियाभर में योग, आयुर्वेद, संस्कृति के प्रचार की क्या जरूरत है?

महागठबंधन की जीत भाजपा के पाखंडपूर्ण धार्मिक धु्रवीकरण के खिलाफ है. इस विजय का संदेश जमीनी हकीकत का जनादेश है. नीतीश कुमार ने अपने कार्यकाल में बिहार की जातियों के एकजुट रखने के साथसाथ बड़े इलाकोंमें पानी, बिजली और सड़क उपलब्ध कराई. इस के साथ ही वे लड़कियों की शिक्षा के लिए भी कार्यक्रम ले कर आए. ये काम सुर्खियां नहीं बनते, पिंक पन्नों पर छपे अखबारों में नहीं आते. इन से धन्ना सेठों को लाभ नहीं. भाजपा के पास विकास का कोई ब्लूप्रिंट अभी भी नहीं है. जो कुछ प्रचारित किया गया, वह विदेशी पूंजी को भारत में लाने तक सीमित है. बिहार ने देश को भी एक दिशा दी है. वोट के जरिए पाखंड की बर्बर सोच पर रोक लगा कर भाजपा ऐंड कंपनी द्वारा प्रदेश को जिस गलत दिशा की ओर ले जाने की तैयारी की गई थी, जनता ने वोट की चोट से उसे रोकने का काम किया है.

हिंदू कट्टरवाद से हारी भाजपा

क्या बिहार में मिली करारी हार के बाद कट्टरवाद को छोड़ कर मोदी विकास के एजेंडे पर वापस लौटेंगे? अगर कोई ऐसा एजेंडा है तो लोकसभा चुनाव में ‘सब का साथ, सब का विकास’ नारे के बूते बहुमत के साथ जीत हासिल करने वाले मोदी यह भूल गए कि आम आदमी ने उन्हें विकास के नाम पर वोट दिया था. जीत के बाद कट्टरवाद के रास्ते पर चल पड़ना भाजपा के लिए खतरनाक साबित हुआ है. एक भाजपा नेता कहते हैं कि बिहार में मोदी को हारना जरूरी था वरना उन की तानाशाही और कट्टरवाद की राजनीति ज्यादा धारदार हो जाती. मोदी से पहले भाजपा में लालकृष्ण आडवाणी सांप्रदायिक और कट्टरवाद की राजनीति को बढ़ावा देने के लिए जाने जाते थे, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी एक ऊंट की तरह आडवाणी के कट्टरवाद के हाथी को काबू में रखा करते थे. आज भाजपा में मोदी और अमित शाह दोनों ही ताकतवर नेता हैं और दोनों ही कट्टरवाद व धर्म की राजनीति की उपज रहे हैं. मोदी लाख कोशिश कर लें, लेकिन क्या वे गुजरात दंगों के कलंक से उबर सकते हैं?

लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने विकास पुरुष का चोला पहना और चुनाव में उतरे, जनता ने उन पर पूरा भरोसा किया, लेकिन अफसोस की बात है कि मोदी जनता के भरोसे को ज्यादा समय तक कायम नहीं रख सके. इसी का नतीजा है कि बिहार के चुनाव में उन्हें जनता ने सबक सिखा दिया है. अगर मोदी और शाह की जोड़ी अभी भी नहीं संभलती है तो अगले साल पश्चिम बंगाल, असम और तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव और 2017 में उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा का डब्बा गोल होना तय है. भाजपा सांसद आर के सिंह पार्टी आलाकमान पर निशाना साधते हुए कहते हैं कि भाजपा को गहराई में जा कर हार का आकलन करने की जरूरत है. पार्टी को मिली हार से साफ है कि प्रदेश भाजपा में जनता का भरोसा नहीं है और इस में जल्द से जल्द बदलाव की जरूरत है.

बिहार के चुनावी नतीजों ने कट्टरवाद के मसले पर आरएसएस और भाजपा को ठंडे दिमाग से मंथन करने का संदेश दिया है. उन्हें यह समझना होगा कि कट्टरवाद की राजनीति भारत के डीएनए में नहीं है. इस मसले पर भाजपा में भी विरोध की आवाजें उठने लगी हैं. भाजपा सांसद हुकुमदेव नारायण यादव मानते हैं कि ऐन चुनाव के मौके पर मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा की बात कह कर पिछली और दलित जातियों को नाराज कर दिया और वे महागठबंधन के पक्ष में गोलबंद हो गए. वहीं अमित शाह ने पाकिस्तान में पटाखे फूटने की बात कह कर हिंदू धु्रवीकरण की कोशिश की, जिसे जनता ने खारिज कर दिया.

भाजपा की सहयोगी पार्टी हिंदुस्तान आवाम मोरचा के अध्यक्ष जीतनराम मांझी भी कहते हैं कि भागवत के आरक्षण वाले बयान ने राजग की लुटिया डुबो दी. वे इस बात से इनकार नहीं करते हैं कि भागवत के असमय आए उस बयान को लालू समेत महागठबंधन के नेताओं ने कैश करा लिया. मांझी यह भी मानते हैं कि भागवत ने कुछ गलत नहीं कहा. आरक्षण की समीक्षा की जानी चाहिए, लेकिन चुनाव के समय इस तरह की बातें नहीं उठनी चाहिए थीं. नीतीश और लालू अपने वोटरों को यह समझाने में कामयाब हो गए कि भाजपा आरक्षण को खत्म करना चाहती है. चुनावी नतीजों ने राज्य में भाजपा विरोध का नया माहौल पैदा कर दिया है. इस माहौल को पैदा करने के जिम्मेदार उस के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में जब भाजपा नीतीश के साथ विकास के नारे के साथ चुनाव में उतरी थी तो उसे 102 में से 91 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. गौरतलब है कि उस समय भाजपा की लाख कोशिशों के बाद भी नीतीश ने नरेंद्र मोदी को चुनाव प्रचार के लिए बिहार नहीं आने दिया था. नीतीश को हमेशा इस बात का डर रहता था कि मोदी के साथ मंच शेयर करने से उन का वोटबैंक गड़बड़ हो सकता है. इसी वजह से नीतीश ने भाजपा के साथ रहते हुए भी मोदी से एक खास दूरी हमेशा बनाए रखी.

जबजब भाजपा विरोधी ताकतें एकजुट हो जाती हैं तो भाजपा को शिकस्त का मुंह देखना पड़ता है. दिल्ली विधानसभा चुनाव में कुछ ऐसा ही माहौल पैदा किया गया था. भाजपा विरोधी वोट के बंटने से ही भाजपा को राजनीतिक फायदा होता रहा है. बिहार विधानसभा के ताजा चुनाव में राजद, जदयू और कांगे्रस के एकसाथ आ जाने से भाजपा के लिए जीत दूर की कौड़ी हो गई. दरअसल, बिहार के चुनाव को नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने व्यक्तिवादी चुनाव बना दिया. भाजपा की बिहार शाखा के नेताओं को परदे के पीछे कर दिया गया और केवल नरेंद्र मोदी व शाह ही हर मंच पर नजर आए. भाजपा की हर चुनावी रैली को भाजपा की रैली कहने के बजाय मोदी की रैली कहा जाता रहा. इसी तरह लोकसभा चुनाव के समय भी पार्टी को गौण कर ‘हर हर मोदी, घर घर मोदी’, ‘अब की बार मोदी सरकार’ जैसे व्यक्ति केंद्रित नारे लगाए गए, बिहार में भाजपा के हर पोस्टर, बैनर, स्टीकर पर मोदी ही मोदी छाए रहे.

नरेंद्र मोदी ने नीतीश कुमार के डीएनए को खराब बता कर नीतीश कुमार पर सीधा और बड़ा ही तीखा हमला बोला था और उन्हें सीधी लड़ाई की चुनौती दी थी. इस लड़ाई में एक मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को करारी शिकस्त दी है. मोदी ने जब नीतीश के डीएनए को खराब बताया तो नीतीश उस मामले को सीधे जनता के बीच ले गए. जदयू और राजद के कार्यकर्ताओं ने अपने सिर के बाल और नाखून काट कर डीएनए टैस्ट के लिए मोदी को भेज कर बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया था. यह चुनाव नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के लिए करो या मरो वाली हालत थी. नीतीश यह साबित करना चाहते थे कि साल 2005 और 2010 का विधानसभा चुनाव वे भाजपा के भरोसे नहीं जीते थे. बिहार की जनता में उन की गहरी पैठ है. दलित पिछड़े तो उन्हें पसंद करते ही हैं, साथ ही शहरी और अगड़ी जातियों के ज्यादातर लोग भी उन के तरक्की के नारे में यकीन करते हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा के हाथों करारी हार मिलने के बाद नीतीश जीत के लिए किसी भी तरह का दांवपेंच छोड़ना नहीं चाहते थे. गौरतलब है पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव में नीतीश की पार्टी जदयू को केवल 2 सीटें ही मिलीं, जबकि 2009 के आम चुनाव में उन्होंने 20 सीटों पर कब्जा जमाया था. यही वजह है कि नीतीश अपने धुर विरोधी नरेंद्र मोदी को उन के ही दांव से उन्हें मात देने की कवायद में लगे हुए थे और जिस में उन्हें भारी कामयाबी मिली.

महागठबंधन के दलों के लिए सब से बड़ी ताकत यह रही कि सभी दल अपनेअपने वोट को सहयोगी दलों के खाते में ट्रांसफर कराने में कामयाब रहे, जिस को ले कर तीनों दलों के नेताओं में काफी आशंका थी. वोट ट्रांसफर को ले कर नीतीश और लालू बारबार अपने कार्यकर्ताओं के बीच गए और सारे कन्फ्यूजन दूर करने में सफल रहे. लालू यादव कहते हैं कि प्रमंडल स्तर पर कार्यकर्ताओं से रायविचार करने के बाद ही गठबंधन हुआ था. कहीं कोई भी विवाद या खींचतान के हालात नहीं थे. गठबंधन की सभी पार्टियों के नेताओं ने अपनेअपने कार्यकर्ताओं से मशविरा करने के बाद ही सीटों को ले कर तालमेल पर फैसला लिया था. जिन सीटों पर राजद के उम्मीदवार थे वहां 74 फीसदी यादव वोट मिले और जिन सीटों पर जदयू के उम्मीदवार थे वहां 60 फीसदी यादव वोट मिले. इसी तरह राज को 69 फीसदी कुर्मी और जदयू को 67 फीसदी कुर्मी वोट हासिल हो सके. ओबीसी का 33 फीसदी वोट जदयू को और 38 फीसदी राजद के खाते में पड़े. महादलितों के 23 फीसदी वोट जदयू को और 32 फीसदी राजद के हिस्से में पड़े. मुसलिमों के 78 फीसदी वोट जदयू को और 59 फीसदी राजद की झोली में गिरे.

भाजपा की संसदीय बोर्ड की बैठक में हार की समीक्षा की गई और शुतुर्मुर्गी फैसले किए गए. पार्टी नेताओं ने इस बात को खारिज कर दिया कि मोहन भागवत के आरक्षण की समीक्षा करने वाले बयान से भाजपा की हार हुई है. वहीं सहयोगी दलों को भी क्लीनचिट दे दी गई. जबकि सच यह है कि उपेंद्र कुशवाहा और जीतनराम मांझी जैसे नेताओं का कोई खास जनाधार नहीं रहा है. दोनों ही नेता नीतीश का विरोध कर उन से अलग हुए थे और उन्हें भाजपा ने लपक लिया. भाजपा ने दोनों नेताओं को ओवरएस्टीमेट करते हुए उन्हें 61 सीटों पर चुनाव लड़ने की सहमति दे थी. मांझी की पार्टी ‘हम’ से मांझी के अलावा कोई जीत नहीं सका, वहीं उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा के 40 में से 2 उम्मीदवार ही जीत पाए.

– साथ में बीरेंद्र बरियार