कल तक भाजपा के प्रमुख और अग्रिम पंक्ति के नेता आज नरेंद्र मोदी के आगेपीछे घूमते नजर आ रहे हैं. ज्योंज्यों चुनाव प्रचार चरम पर पहुंच रहा है त्योंत्यों पार्टी के ये नेता मोदी के सामने चाकरों से नजर आ रहे हैं. मोदी के इस प्रचार अभियान ने क्यों और कैसे इन वरिष्ठ नेताओं को हाशिए पर ला पटका है, विश्लेषण कर रहे हैं शैलेंद्र सिंह.
लोकसभा चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के प्रचार अभियान ने पार्टी के नेताओं और संस्थापकों तक को हाशिए पर कर दिया है. पार्टी के चुनाव निशान कमल को बदला नहीं जा सकता वरना तो शायद कमल की जगह पर ‘हरहर मोदी, घरघर मोदी’ जैसा कुछ नारा आ जाता. प्रचार के दौरान प्रयोग की जा रही मोदी टोपी से ले कर मोदी पैन तक छा गए हैं. ऐसे में दूसरे नेता केवल पिछलग्गू बने ही नजर आ रहे हैं.
टीवी पर दिखाए जाने वाले सीरियलों की तरह भाजपा यानी भारतीय जनता पार्टी में भी नेताओं के रोल की कांटछांट होने लगी है. समय और टीआरपी को ध्यान में रखते हुए या तो उन को सीन से ही बाहर कर दिया जाता है या उन के रोल काट कर इतने छोटे कर दिए जाते हैं कि वे परदे पर कब आए और कब चले गए, पता ही नहीं चलता. कल तक जिन भाजपा नेताओं को पार्टी का प्रमुख चेहरा माना जाता था आज वे हाशिए पर नजर आ रहे हैं.
एक समय था जब लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, वेंकैया नायडू, रविशंकर प्रसाद, यशवंत सिंह और मुरली मनोहर जोशी का नाम हर चुनाव के दौरान जोरजोर से लिया जाता था. उन को स्टार प्रचारक मान कर हर प्रदेश में उन की मांग होती थी. उन में कुछ नेता कल्याण सिंह और उमा भारती जैसे अक्खड़ स्वभाव के होते थे, जो अपनी उपेक्षा से आहत हो कर धार्मिक कहानियों के संतमहात्माओं की तरह श्राप दे कर तपस्या करने के लिए अज्ञातवास पर चले जाते थे.
पीएम से कम नहीं समझते मोदी
आगामी लोकसभा चुनावों का प्रचार जैसेजैसे आगे बढ़ रहा है वैसेवैसे भाजपा के ये बड़े नेता गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और उन के खास सिपहसालारों के सामने चाकर से नजर आने लगे हैं. भाजपा ने नरेंद्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बनाया है. नरेंद्र मोदी अभी चुनाव जीते नहीं हैं पर उन्होंने अपने को प्रधानमंत्री मानना शुरू कर दिया है.
रैलियों में उन की अकड़ और घमंड साफतौर पर देखा जा सकता है. वे विरोधियों को ललकारते हैं और अपनी पार्टी के नेताओं पर अपना नेतृत्व दिखाते हैं. उन के मंच पर किस नेता की कुरसी लगेगी, किस की नहीं, इस का फैसला उन के सिपहसालार करते हैं. रैलियों के प्रबंधन और संचालन में भाजपा के जमीन से जुड़े नेताओं की पूरी उपेक्षा की जाती है.
लोकसभा चुनावों के टिकट वितरण में भी भाजपा पर नरेंद्र मोदी के सलाहकारों की टीम भारी पड़ती दिख रही है. मोदी की टीम चाहती है कि भाजपा के बड़े नेता लोकसभा का चुनाव न लड़ें. इस में सब से पहला नाम लालकृष्ण आडवाणी का है जो गुजरात के गांधीनगर से चुनाव लड़ते हैं. दूसरा नाम मुरली मनोहर जोशी का है जो उत्तर प्रदेश की वाराणसी सीट से सांसद हैं.
मुरली मनोहर जोशी ऐसे नेताओं में हैं जो हर हालत में चुनाव जीतते हैं. 2009 के लोकसभा चुनाव में जब भाजपा की सब से खराब हालत थी तब भी वे वाराणसी से चुनाव जीत गए थे. इस के बाद भी इस चुनाव में उन से लोकसभा चुनाव न लड़ने को कहा गया. लेकिन आडवाणी और जोशी दोनों ही प्रमुख नेताओं ने लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला लिया है. पार्टी की तरफ से यह कहा गया कि वे लोग लोकसभा चुनाव न लड़ें, चुनाव के बाद उन को राज्यसभा में भेजा जाएगा.
दरअसल, नरेंद्र मोदी की टीम को लगता है कि अगर लोकसभा की 272 सीटें जीतने का मोदी का सपना पूरा नहीं हुआ तो पार्टी में प्रधानमंत्री पद के लिए लड़ाई नए सिरे से शुरू हो जाएगी. इस हालत में पार्टी के नंबर वन रहे नेता प्रधानमंत्री की कुरसी के सब से करीबी दावेदार हो सकते हैं. ऐसे में उन का पत्ता पहले ही साफ कर दिया जाए. जब वे लोकसभा सदस्य ही नहीं रहेंगे तो प्रधानमंत्री पद के दावेदार भी नहीं बन सकेंगे. भाजपा के ये नंबर वन नेता टीम मोदी की इस चाल को अच्छी तरह समझते हैं. इसीलिए वे हर हालत में लोकसभा चुनाव लड़ने का अपना इरादा जाहिर कर चुके हैं.
अध्यक्ष पर हावी प्रभारी
लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों का अपना अलग महत्त्व है. यहां पर 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को केवल 9 सीटें ही मिली थीं. भाजपा को लगता है कि वह यहां ज्यादा से ज्यादा सीटें ला सकती है. इस के लिए नरेंद्र मोदी ने अपने सब से खास अमित शाह को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनवाया. अमित शाह के प्रदेश प्रभारी बनते ही उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता कलराज मिश्र, विनय कटियार, कल्याण सिंह, ओम प्रकाश सिंह, लालजी टंडन, प्रेमलता कटियार सहित खुद प्रदेश अध्यक्ष डा. लक्ष्मीकांत वाजपेयी जैसे लोग फकत तमाशाई बन कर रह गए. जो दरबार पहले इन नेताओं के यहां लगता था अब वह अमित शाह के आसपास लगने लगा है. अमित शाह को प्रदेश प्रभारी बने 1 साल से ज्यादा का समय बीत चुका है. वे लखनऊ में नहीं रहते. अगर कभी लखनऊ में रुकना पडे़ तो सरकारी गेस्ट हाउस के बजाय होटल में रुकना पसंद करते थे.
रात रुकने के लिए दिल्ली या गुजरात वापस चले जाते थे. चुनाव के दरम्यान काम के बोझ के बढ़ने पर अमित शाह ने लखनऊ में ही एक घर लेने की बात चलाई तो पूरी भाजपा उन के लिए मकान तलाश करने लगी. आखिरकार एक भाजपा कार्यकर्ता का ही फ्लैट उन को पसंद आया. अब इस में अमित शाह कितना रहेंगे, यह वक्त बताएगा. अमित शाह की टिकट वितरण पर पूरी पकड़ है. इस कारण भाजपा का हर नेता और कार्यकर्ता उन के आसपास रहना चाहता है. कोई यह नहीं चाहता कि वह अमित शाह से दूर रहे. उत्तर प्रदेश भाजपा में कोई भी राज्य प्रभारी इस से ज्यादा ताकतवर कभी नहीं रहा. पिछले चुनाव के समय कल्याण सिंह को यह जिम्मेदारी दी गई थी. टिकट वितरण में उन की एक नहीं चली थी. भाजपा हाईकमान ने अपने मनमाने तरीके से टिकट वितरण किया. इस से नाराज हो कर कल्याण सिंह ने भाजपा छोड़ दी. वे अब वापस भाजपा में हैं.
कल्याण सिंह का रुतबा भी अमित शाह के सामने फीका पड़ गया है. भाजपा से जुड़े लोग कहते हैं कि कल्याण सिंह के बारबार पार्टी से बाहर जाने से उन की यह हालत हो गई है. पार्टी महासचिव विनय कटियार और 3 बार प्रदेश अध्यक्ष की कुरसी संभाल चुके कलराज मिश्र उपेक्षित क्यों हैं, यह बात समझ नहीं आई.
भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही, रमापतिराम त्रिपाठी जैसे लोग कब कार्यालय आते हैं कब नहीं, इस की सूचना भाजपा का मीडिया विभाग कभी नहीं देता. अमित शाह कब आते हैं, कब जाते हैं, क्या बोलते हैं, इस की औफ द रिकौर्ड और औन द रिकौर्ड दोनों ही तरह की सूचनाएं भेज दी जाती हैं. नरेंद्र मोदी के दबाव में उत्तर प्रदेश भाजपा के ये नेता कसमसा जरूर रहे हैं पर चुनाव तक चुप रहने में ही भलाई समझ रहे हैं. दबी जबान से ये लोग स्वीकार करते हैं कि अमित शाह के कद के आगे प्रदेश के तमाम नेता उपेक्षित किए जा रहे हैं.
प्रचार में बस मोदी ही मोदी
लोकसभा चुनाव में प्रचार के लिए नरेंद्र मोदी मोबाइल की कौलर ट्यून से ले कर सड़कचौराहों पर चाय की चौपाल लगाने तक का काम कर रहे हैं. मोदी टोपी, मोदी स्कार्फ, मोदी टीशर्ट, मोदी पैन, मोदी बज और मोदी नोटपैड तक दिखाई दे रहे हैं. हर जगह केवल मोदी ही मोदी है. भाजपा के किसी दूसरे नेता का प्रचारप्रसार में नाम नहीं है.
नरेंद्र मोदी अपने को ऊपर रखने के लिए भाजपा के बड़े महापुरुषों, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय के नाम को याद करने के लिए कांगे्रसी सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति लगाने का काम कर रहे हैं. ‘मोदी फौर पीएम डोनेशन’ अभियान में भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं का पूरी तरह से उपयोग तो किया जा रहा है पर किसी नेता का नाम इस के प्रचार में शामिल नहीं किया गया.
मोदी ने रैलियों की तैयारी के लिए जो टीम बनाई उस में उन के अपने खास लोग ही शामिल हैं. गुजरात की राजधानी अहमदाबाद में ही वाररूम बनाया गया है. इस में 250 लोगों की एक टीम रिसर्च का काम करती है. मोदी ने अपने काम की जिम्मेदारी जिन नेताओं को दे रखी है उन में महाराष्ट्र से मंगल प्रभात लोढ़ा, हरियाणा से कैप्टन अभिमन्यु, पंजाब में अजय जामवाल, ओडिशा में धर्मेंद्र प्रधान, बिहार में सुशील कुमार मोदी और उत्तर प्रदेश में अमित शाह प्रमुख हैं. मोदी ने अपने खास लोगों को परदे के पीछे रख कर उन से काम करने के लिए कहा है. ये लोग हर लोकसभा सीट को देखसमझ रहे हैं. उन की रिपोर्ट पर ही मोदी कुछ भाजपा नेताओं को चुनाव न लड़ने की बात कह रहे हैं. मोदी का प्रचार बड़े ही सलीके से सोशल मीडिया फेसबुक, ट्वीटर और यूट्यूब पर किया जा रहा है.
मोदी सीधे धर्म की बात करने से जरूर बचते हैं पर अपनी रैली में वे उस जगह के धार्मिक मंदिर का नाम लेना नहीं भूलते. उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और बनारस में वे गोरखपुर मंदिर और काशी विश्वनाथ मंदिर जाते हैं तो ओडिशा में जगन्नाथ मंदिर की ओर हाथ कर के भीड़ से जय जगन्नाथ का नारा लगवाना नहीं भूलते हैं. मोदी की हर रैली को टीवी नैटवर्क पर लाइव दिखाने का पूरा इंतजाम होता है. मोदी की रिसर्च टीम ने देश की करीब 150 ऐसी लोकसभा सीटों का चयन किया है जहां सोशल मीडिया के जरिए ज्यादा प्रचार किया जाएगा. छोटे शहरों और कसबों तक पहुंच बनाने के लिए ‘चाय की चौपाल’ लगाने का फैसला किया गया है. मोदी जो भाषण देते हैं, उन के विषयों को तैयार करने के लिए 25 से अधिक लोगों की एक टीम काम करती है. इस के आधार पर ही नरेंद्र मोदी अपना भाषण तय करते हैं.
5 माह में मोदी पूरे देश में 78 रैली कर चुके हैं. इस चुनाव प्रचार में लगे युवाओं को रोजगार का मौका भी मिल गया है. रैली में भारी भीड़ जुटाने के लिए हर बूथ लैवल के कार्यकर्ता को कम से कम 100 लोगों को लाने का काम सौंपा जाता है. इस बहाने कार्यकर्ताओं को मोदी से जुड़ने का सीधा अवसर प्राप्त हो रहा है. वह मोदी से जुड़ाव के चलते भाजपा के पुराने नेताओं को भूल रहा है.