उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव में अभी समय है. विधानसभा के चुनाव 2017 में होने वाले है. भाजपा के लिये यह चुनाव जियो और मरो वाले होगे. उत्तर प्रदेश के विधनसभा चुनाव ही 2019 के लोकसभा चुनावों का भविष्य तय करेगे. 2014 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश से भाजपा गठबंधन को 73 सांसद मिले थे. इस प्रदर्शन की उम्मीद 2019 में नहीं की जा रही है.

भाजपा चाहती है कि अगर 2017 के विधानसभा में उत्तर प्रदेश की सत्ता उसके हाथ आ जाये तो 2019 में केन्द्र सरकार बनाने का रास्ता सरल हो जायेगा. भाजपा ने इसके लिये जाति और धर्म दोनो का सहारा लेने की योजना बनाई है.

2016 में भाजपा राम मंदिर के एजेंडें पर आगे बढेगी. जातीय संतुलन में भाजपा पिछडे वर्ग को आगे लानाचाहती है.भाजपा नेता और राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह के जन्मदिन पर उमडी भीड को देखकर यह लगता था कि कल्याण सिंह को उत्तर प्रदेश में बडी जिम्मेदारी मिल सकती है.अयोध्या मसले से जुडी उनकी पहचान और जाति से पिछडा होने का पफैक्टर काम दे सकता है.

जातीय संतुलन साधने के लिये भाजपा ने संगठन में पिछडों को आगे करने का काम शुरू किया है. भाजपा ने शुरूआत में 51 जिलों में जिलाअध्यक्ष के नामों की घोषणा की तो उसमें 22 अध्यक्ष पिछडी जाति के रखे. इनमें केवल यादव और कुर्मी ही नहीं है, बल्कि लोहार, कुशवाहा, मौर्या, कहार और नाई जाति के लोगों को भी मौका दिया जा रहा है. राजधनी लखनउ में भाजपा ने मुकेश वर्मा को अपना जिला अध्यक्ष बनाया है. मुकेश वर्मा पार्टी के लोगों के लिये पूरी तरह से नया चेहरा है. बिहार में हार के बाद भाजपा अपने जातीय समीकरण को खूब मजबूत करना चाह रही है.

पिछडों को पार्टी से जोडने की एक प्रमुख वजह यह भी है कि यह लोग तेजी के साथ पैसे वाले हुये है. यह धर्म और पूजापाठ के नाम पर ज्यादा ही कर्मकांड करने लगे हैं. अगडी जातियों से मुकाबला करने के लिये पिछडे अब बिना कुछ सोंचे समझे भाजपा और पूजापाठ को अपनाने लगे है. भाजपाइसे अपने पक्ष में देखकर पिछडो को अपने जनाधर से जोडने में लग गई है.भाजपा को लगता है कि दलितों के जोडने में कठिनाई है ऐसे में पिछडो को जोडना सरल है. उत्तर प्रदेश में अभी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पद पर ब्राहमण जाति के डॉक्टर लक्ष्मीकांत वाजपेई हैं.

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी इस बात के संकेत दे चुके है कि पार्टी पिछडे नेताओं आगे बढाने का काम करेगी. उत्तर प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष का कार्यकाल पूरा हो चुका है. नये सिरे से चुनाव होने है. प्रदेश अध्यक्ष पद के लिये पिछडे वर्ग के नेताओं का नाम ज्यादा चल रहा है. भाजपा इस सोंच में है कि प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री पद पर क्या जातीय समीकरण बनाया जाये. प्रदेश अध्यक्ष के लिये जो नाम दौड में सबसे आगे हैं उनमें केन्द्रीय मंत्री रामशंकर कठेरिया, स्वतंत्रा देव सिंह, डाक्टर दिनेश शर्मा, धर्मपालसिंह और मनोज सिन्हा का नाम सबसे आगे है.

भाजपा बारबार इस बात को भी जताने की कोशिश कर रही है कि उसने ही पहली बार नरेन्द्र मोदी के रूप में पिछडी जाति का प्रधनमंत्री दिया. उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव भाजपा के लिये बहुत खास है. ऐसे में वह कोई भी कोरकसर छोडने वालीनहीं है. 2016 का साल इस लिहाज से बहुत अहम होने वाला है.