सरिता विशेष

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल दूसरे नेता हैं जो किसी भी स्तर पर नरेंद्र मोदी का न तो लिहाज करते हैं, न ही किसी धोंस धपट मे आते हैं, उल्टे नए नए तरीके मोदी के विरोध के ईजाद कर लेते हैं. मोदी की एक कमजोर नस उनकी डिग्री है, जिसके होने न होने पर सस्पेंस कायम है.

बक़ौल केजरीवाल नरेंद्र मोदी के वकील तुषार मेहता को गुजरात हाईकोर्ट में यह कहना चाहिए कि वह डिग्री दिखाने को तैयार हैं. यह देश की जनता का संवैधानिक अधिकार है कि वह अपने प्रधानमंत्री की शिक्षा के बारे मे जान सके. मोदी की डिग्री को शिक्षा और अर्थशास्त्र से जोड़ते केजरीवाल ने कहा कि क्या उन्हे (मोदी को) इसकी जानकारी भी है या फिर उन्होंने अमित शाह के कहने पर नोट बंदी का फैसला ले लिया.

बात मे दम इस लिहाज से तो है कि मोदी की डिग्री अगर है तो उसे छिपाया क्यों जा रहा है, सार्वजनिक क्यों नहीं कर दिया जाता. मोदी अगर कम पढ़े लिखे हैं, तो भी बात हर्ज या शर्म की नहीं, इन्दिरा गांधी भी बहुत ज्यादा शिक्षित नहीं थीं फिर भी देश चलातीं थीं. इस सर्वोच्च पद के लिए कोई न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता निर्धारित नहीं है, फिर हिचकिचाहट क्यों.

यह ठीक है कि अब समाज में अर्ध शिक्षित लोगों को भाव नहीं दिया जाता, लेकिन मोदी का पद और व्यक्तित्व किसी भी औपचारिक डिग्री से कहीं ज्यादा अहम है. लेकिन मोदी की डिग्री को एक मुखी रुद्राक्ष या मणिधारी सांप की तरह दुर्लभ बना देना कोई तुक की बात नहीं, इससे असमंजस और संदेह बढ़ता है. इस मसले से यह भी समझ आता है कि अब वक्त आ गया है कि शीर्ष संवैधानिक पदों के लिए शैक्षणिक योयगता पर विचार किया जाये.

वह दौर गया कि हम मान लें कि पुराने जमाने का पांचवी पास आदमी भी आज के ग्रेजुएट से ज्यादा बुद्धिमान होता है. यह एक अवैज्ञानिक पैमाना था. रही बात केजरीवाल की तो उनकी मंशा बेहद साफ मोदी की दुखती रग पर हाथ रख उन्हे उकसाने की ही है. मोदी की डिग्री के मामले में हुआ यह था कि मुख्य सूचना आयुक्त ने उनकी डिग्री जारी करने को कहा था, लेकिन गुजरात हाईकोर्ट ने यूनिवर्सिटी की याचिका पर सुनवाई करते हुये सूचना आयोग के फैसले पर रोक लगा दी थी.