सरिता विशेष

आर्ट ऑफ लिविंग के आविष्कारक श्री श्री रविशंकर अभी तक बड़ी शांति और समझदारी से आध्यात्म का अपना कारोबार चला रहे थे, जिसे और विस्तार देने के लिए उन्होने एक अंतर्राष्ट्रीय महासम्मेलन के आयोजन की घोषणा कर डाली. इतिहास गवाह है कि धर्म कर्म संबंधी ऐसे आयोजन नदी या समुद्र किनारे ही होते रहे हैं, सो रविशंकर ने भी यमुना नदी का किनारा चुन लिया, पर यह भूल गए कि यह त्रेता या द्वापर नहीं, बल्कि कलयुग है जिसमे लोकतन्त्र के चलते इतने बड़े, ख़र्चीले और भव्य आयोजनों के लिए कई सरकारी एजेंसियों से बाकायदा लिखित इजाजत लेनी पड़ती है.

सरकारी बाबू और अधिकारी अपनी पर आ जाएं तो नियम कायदे और क़ानूनों का हवाला देकर यह तक साबित कर सकते हैं कि जिस मकान मे राम लाल रह रहा है वह दरअसल मे उसका है ही नहीं. ऐसा ही कुछ विवाद उनके कार्यक्रम के लिए बने पुल और संभावित की जाने बाली गंदगी को लेकर हुआ तो श्री श्री का अपने ज्ञानी होने का भ्रम एक झटके मे टूट गया, लिहाजा वे 8 मार्च की शाम सफाई देते नजर आए कि गंदगी नहीं होगी और हुई तो साफ सफाई कर के देंगे.

गौरतलब है कि इस महासम्मेलन का उदघाटन पीएम नरेंद्र मोदी करने बाले हैं इसलिए भी रविशंकर बे-फिक्र थे कि जिस आयोजन मे खुद प्रधानमंत्री आने बाले हों, वहां कोई क्या खाकर अड़ंगा डालेगा. अब भला कौन रविशंकर को समझाता कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हैं जो बिना आंखे मूंदे ध्यानस्थ रहते हैं, मुमकिन है उनकी भी इच्छा आत्मा और परमात्मा के मिलन के इस खेल को देखने की रही हो, उन्हे अगर स-सम्मान आमंत्रित किया जाता तो नल-नील की भूमिका निभाने बाले बस्सियों की नादानी नजरंदाज कर दी जाती और पुल पर एतराज न जताया जाता और न ही मामला एनजीटी तक जाता.

विश्व शांति का ढिढोरा पीट रहे श्री श्री भीतर से तो उसी दिन अशांत हो गए थे जब राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कला और आध्यात्म की इस गंगा मे डुबकी लगाने से मना कर दिया था. रही सही कसर एनजीटी ने पूरी कर दी जिस पर उनके धन कुबेर शिष्यों का भी ज़ोर नहीं चल रहा. ये विवाद अगर वक्त रहते नहीं थमे तो रविशंकर का शांति नोबल पुरुस्कार की होड और दौड़ से नाक आउट दौर में ही बाहर होना तय दिख रहा है.