सरिता विशेष

कांग्रेस से निकाले जाने के बाद अपनी अलग पार्टी बना चुके छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी शरद पवार या ममता बनर्जी साबित होंगे या नहीं, इस सवाल का जबाब 2 साल बाद विधान सभा चुनाव नतीजे देंगे, पर हाल फिलहाल फुर्सत में बैठे अजीत जोगी ने चुनावी फंड इकट्ठा करने अपना खुद का टकसाल खोलने का मन जरूर बना लिया है. फैसला प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की 8 नवंबर वाली नोट बंदी से लिया गया लगता है, जिसने देश भर में हाहाकार मचा दिया था. उलट इसके जोगी की मंशा अपने नाम के सिक्के चलवाने की है, जिन्हे बाकायदा बेचने की योजना जोगी कांग्रेस के उत्साही रणनीतिकार रायपुर में बैठकर बना चुके हैं.

योजना के मुताबिक जोगी कांग्रेस 500 किलो चांदी खरीदेगी, जिसकी कीमत लगभग 2.5 करोड़ रुपये होती है. इस चांदी को सिक्कों में ढाला जाएगा. एक सिक्का 5 ग्राम वजन का होगा, जिसे 2 हजार रुपये में बेचा जाएगा. इस तरह तकरीबन 20 करोड़ रुपये इकट्ठा किये जाएंगे. अंदाजा है कि सिक्के ढालने यानि टकसाल डालने मे 50 लाख रुपये का खर्च आएगा. सिक्के की खासियत यह होगी कि इसके एक तरफ अजीत जोगी का फोटो होगा, तो दूसरी तरफ रजत अक्षरों में अंकित होगा 50 वर्षों की समर्पित जनसेवा.

सार्वजनिक जीवन के 50 साल पूरे करने जा रहे रिटायर्ड आईएएस अधिकारी और छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी कभी नेहरू गांधी परिवार के इतने नजदीक माने जाते थे कि कहा यह भी जाने लगा था कि राजीव या सोनिया गांधी को छींक भी आती थी तो जो कांग्रेसी अपनी नाक पोंछने लगते थे अजीत जोगी उनमे से एक होते थे. अजीत जोगी ने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की लुटिया डुबो दी, यह कतई दिक्कत की बात नहीं थी. दिक्कत की बात थी उनका बेटे अमित सहित राहुल गांधी पर आखें तरेरने लगना, नतीजा वही जिसके लिए कांग्रेस जानी जाती है पार्टी से निष्कासन. दाद देनी होगी अजीत जोगी की हिम्मत को जो निष्कासन के बाद ज्यादा रोये गाये नहीं और रातों रात अपनी पार्टी खड़ी कर ली.

यह दीगर बात है कि जोगी कांग्रेस अपनी उम्र और हैसियत के मुताबिक अभी घुटनो के बल घिसट सी रही है उसके पास नींद से ज्यादा और बड़े सपने हैं. एक हादसे में अपने दोनों पैर गंवा चुके जोगी के हौसले बुलंद हैं, जिनका राजनैतिक चिंतन मंथन एक दायरे में सिमटा है कि छग की जनता मुख्यमंत्री रमन सिंह और भाजपा से आजिज़ आ चुकी है और कांग्रेस उनके बगैर चलने से रही, लिहाजा उनकी तो चांदी ही चांदी है. इसी चांदी चिंतन की देन है चांदी के सिक्के जो अभी बनना शुरू नहीं हुये हैं, लेकिन 25-30 कार्यकर्ताओं ने उनकी ब्रांडिंग और मार्केटिंग शुरू कर दी है. अब देखना दिलचस्पी की बात होगी कि लोग सौ रुपये का सिक्का 2 हजार में खरीदते हैं या नहीं.