मसाले किसी भी व्यंजन में न केवल स्वाद और सुगंध बढ़ाते हैं बल्कि वे स्वास्थ्यवर्धक भी होते हैं. यही वजह है कि पूरी दुनिया भारतीय व्यंजनों की दीवानी होती जा रही है. मसालों का प्रयोग ही भारत के व्यंजनों को बाकी देशों के व्यंजनों से अलग करता है. आइए, जानते हैं कुछ महत्त्वपूर्ण मसालों के बारे में :

– केसर

केसर मूलतया पर्शिया क्षेत्रों में पाया जाता है. बाद में इस की खेती यूरेशिया, उत्तरी अमेरिका, उत्तरी अफ्रीका में भी होने लगी. अमूमन केसर का इस्तेमाल किसी भी डिश में रंग लाने के लिए किया जाता है. यह मसालों में सब से महंगा है. खीर, रबड़ी और कई तरह की मिठाइयों के अलावा केसर का बिरयानी, पुलाव आदि नमकीन डिशेज में भी इस्तेमाल किया जाता है. यही नहीं, सांस लेने में तकलीफ हो, पाचनतंत्र में गड़बड़ी या रक्तस्राव को कम करना हो तो केसर का सेवन सही रहता है. इस के साथ ही यह नींद में सुधार, हृदय को दुरुस्त, हड्डियों को मजबूत और प्रतिरक्षा प्रणाली में सुधार लाता है. यह चेहरे की रंगत निखारने का भी काम करता है.

– छोटी इलायची

मैसूर, मंगलौर, मालाबार और श्रीलंका में छोटी इलायची बहुतायत में पैदा होती है. इसे हरी इलायची भी कहा जाता है. इस का पौधा 5 से 10 फुट लंबा होता है और इस की फसल 3-4 वर्षों में तैयार होती है. अपने यहां छोटी इलायची का इस्तेमाल मेहमानों के स्वागतसत्कार, मुखशुद्धि और डिशेज में भीनी खुशबू लाने के लिए किया जाता है. खीर, मिठाइयां और बिरयानी में छोटी इलायची न हो तो वे अधूरी लगती हैं.

सुबह उठते और रात को सोते समय छोटी इलायची को चबा कर खाने और फिर गुनगुना पानी पीने से गले की खराश ठीक हो जाती है. खांसी होने पर भी अदरक, लौंग और तुलसी के पत्ते के साथ इस का सेवन सही रहता है.

खीर में हरी इलायची न हो तो खीर का लगभग 25 फीसद स्वाद कम रहता है. कुछ लोगों को आइसक्रीम में भी हरी इलायची का स्वाद अच्छा लगता है. नौनवेज पसंद करने वाले खासकर चिकन खाने वाले हरी इलायची के हिमायती मिलेंगे, क्योंकि यह चिकन की रैसिपी में दम भर देता है.

– दालचीनी

दालचीनी दक्षिण भारत, श्रीलंका और चीन में खूब मिलती है. भारत में इस के पेड़ पूर्वी हिमालय, असम, सिक्किम और खासीजौंतिया की पहाडि़यों में मिलते हैं. यह 10-15 मीटर ऊंचा सदाबहार पेड़ है, जिस की छाल का प्रयोग मसाले की तरह किया जाता है. इसे गरम मसालों की श्रेणी में रखा गया है. इस का सुगंधित तेल भी निकाला जाता है.

पेड़ से छाल उतारने के बाद पेड़ बेकार हो जाता है, लेकिन इस के मुख्य तने से 4 से 7 नई शाखाएं निकल आती हैं. इन से भी 2 वर्षों तक छाल निकाली जाती है. छाल को सुखाने के बाद साफ कर के पतली सुराहीदार आकार में बांध कर बेचा जाता है. दालचीनी का प्रयोग केक, मिठाई और गरममसालों में किया जाता है.

दालचीनी स्वाद में तीखी होती है. दालचीनी के तेल का इस्तेमाल इत्र के रूप में किया जाता है. अपच, पेटदर्द, सीने में जलन, पाचन में सुधार लाने, उलटी रोकने, कब्ज की समस्या कम करने, जुकाम कम करने आदि में दालचीनी बहुत फायदेमंद होती है.

रोजाना एक सी चाय पी कर ऊब गए हैं तो एक बार दालचीनी पाउडर चाय में डाल कर देखें. इसे पीस कर डब्बे में बंद कर के रख लें, जब भी एक मसाले से ऊब जाएं तो पकी सब्जियों या कटे फलों पर इसे डाल लें. पुडिंग, मिठाई या मीठे ब्रैड को बनाते समय भी कई लोग इस का इस्तेमाल करते हैं.

– काली इलायची

काली इलायची को बड़ी इलायची भी कहा जाता है. भारतीय और अन्य देशों के व्यंजनों में इस का काफी प्रयोग किया जाता है. इस के बीज से कपूर की खुशबू आती है. इस के पेड़ 5 फुट तक ऊंचे होते हैं. ये भारत, भूटान और नेपाल के पहाड़ी प्रदेशों में पाए जाते हैं. पुलाव, मुगलई व्यंजन, चाय, मीट, सूप आदि में काली इलायची का प्रयोग खूब किया जाता है.

गरम मसाले की यह जरूरी सामग्री है. मुंह के छाले ठीक करने के लिए काली इलायची और मिश्री को मिला कर पीसने के बाद जबान पर रखने से लाभ होता है. उलटी हो तो इसे पानी में उबाल लें और उस पानी को पीने से उलटी बंद हो जाती है.

भारतीय भोजन में करी, दाल, चावल, सूप आदि में काली इलायची का इस्तेमाल जम कर किया जाता है. कुछ विशेष तरह की मिठाइयों में भी काली इलायची का प्रयोग किया जाता है. विशेष तरह का पान खाने वाले अपने पान में काली इलायची डलवाते हैं.

– लौंग

भारतीय व्यंजनों में लौंग का खूब प्रयोग किया जाता है. चीन, सुमात्रा, जमैका, ब्राजील, पेबा और वैस्टइंडीज में लौंग की अच्छी पैदावार होती है. इस के पौधे में छठे साल फूल निकल आते हैं और 12 से 25 साल तक अच्छी उपज देता है. इस की कलियों को तोड़ कर धूप या आग पर सुखाया जाता है. सुखाने के बाद केवल 40 फीसद लौंग ही बचती है. किसी भी व्यंजन में लौंग के इस्तेमाल से उस में अच्छी खुशबू आने लगती है.

दवा के तौर पर भी इस के तेल का प्रयोग किया जाता है. दांतदर्द, मुंह की बदबू, उलटी आने, जोड़ों के दर्द, सिरदर्द व कानदर्द में लौंग का इस्तेमाल लाभकारी है.

मीठी चीजें बनाते समय लौंग का खास इस्तेमाल किया जाता है. कई तरह की मिठाइयों के अलावा बिहार में बनने वाले ठेकुआ में लौंग को डाला ही जाता है. लौंग के नाम से तो एक मिठाई ही है, जिस का नाम लौंगलत्ता है. कई बार सिर्फ गार्निशिंग के तौर पर भी लौंग का प्रयोग किया जाता है.

– साबुत सरसों

सरसों के पौधे की ऊंचाई एक से 3 फुट तक होती है. इस की फलियां पक जाने पर बीज जमीन पर गिर जाते हैं. इस के बीज काले और पीले रंग के होते हैं. पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और गुजरात में इस की खेती की जाती है. इस के बीज का प्रयोग सब्जी में बेहतरीन स्वाद ले कर आता है. गरम तेल में सरसों का तड़का अधिकतर व्यंजनों का जायका दोगुना कर देता है. सरसों कौलेस्ट्रौल को कम करने और मेनोपौज के दौरान महिलाओं के लिए बेहतरीन है. यह एंटी इंफ्लेमेटरी भी है, जो मांसपेशियों और गठिया के दर्द में फायदा पहुंचाता है.

– साबुत धनिया

धनिया को कोथमीर भी कहा जाता है. यह भारतीय रसोई का अहम हिस्सा है. रोजमर्रा के खाने में साबुत धनिया अहम भूमिका निभाता है, इस के लिए इसे पीस कर सूखा मसाला तैयार किया जाता है. एयरटाइट डब्बे में महीनों तक इसे रखा जा सकता है. हमारा देश धनिया का प्रमुख निर्यातक है. विटामिन सी होने की वजह से यह सर्दीजुकाम में फायदेमंद है. धनिया के बीजों को पानी में उबाल कर ठंडा करने के बाद पीने से कौलेस्ट्रौल का स्तर कम होता है.

ब्रोकलीसूप में साबुत धनिया को पीस कर डालने से उस का स्वाद बढ़ जाता है. नौनवेज का स्वाद बढ़ाना और कुछ अलग करना है तो उस में साबुत धनिया को जीरा और अदरक के साथ पीस कर डालें. दाल में कभी जीरा की जगह साबुत धनिया का तड़का लगा कर देखिए, स्वाद अलग और सोंधा लगेगा.

– तेजपत्ता

तेजपत्ता का इस्तेमाल अलग स्वाद और खुशबू के लिए किया जाता है. तुर्की, फ्रांस, बेल्जियम, इटली, रूस, मध्य अमेरिका, उत्तरी अमेरिका और भारत में तेजपत्ता की पैदावार होती है. तोड़े जाने के कई  हफ्ते बाद तक सुखाए जाने के बावजूद इस का स्वाद पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाता.

इसे सूखा नहीं खाया जा सकता, क्योंकि यह स्वाद में काफी तेज और कड़वा होता है. इस का इस्तेमाल सूप, मीट, सी फूड, सब्जियों, पुलाव, बिरयानी आदि में खूब किया जाता है. गरम मसालों में शामिल तेजपत्ता में ऐसे कई गुण हैं जो इसे डायबिटीज, माइग्रेन, बैक्टीरियल इन्फैक्शन, गैस्ट्रिक, अलसर जैसे रोगों के इलाज में उपयोगी बनाते हैं. यह एक बेहतरीन एंटीऔक्सिडैंट भी है.

सौस, सूप, स्टू में तेजपत्ता का प्रयोग उस के स्वाद को बढ़ाने के लिए किया जाता है. पुलाव या बिरयानी में भी इस का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन डिश तैयार होने के बाद खाने से पहले इसे निकाल भी दिया जाता है.

– जीरा

जीरा खानपान के व्यंजनों में साबुत या पिसा हुआ मसाले के रूप में प्रयोग किया जाता है. भूने जीरे की सोंधी महक के कारण दहीप्रेमी जीरा को भला कैसे भूल सकते हैं, खासकर, नमकीन दही खाने वाले लोग. नमक और लालमिर्च पाउडर के साथ भुना जीरा पाउडर दही के स्वाद को कई गुना बढ़ा देता है. दहीबड़े तो बिना भुने जीरा पाउडर के खाए ही नहीं जाते. दाल हो या कोई दूसरी सब्जी, गरम घी या सरसों के तेल में तड़कता जीरा उस के स्वाद को सोंधा बना देता है.

– जायफल

जायफल एक सदाबहार पेड़ है, जो चीन, ताइवान, वैस्टइंडीज, दक्षिणी अमेरिका, श्रीलंका और भारत के केरल में खूब पनपता है. दरअसल, इस के पेड़ को मिरिस्टिका कहते हैं और इस के बीज को जायफल. पूरी तरह से पक जाने पर इस का फल 2 हिस्सों में फट जाता है और अंदर सिंदूरी रंग की जावित्री दिखाई देने लगती है. जावित्री के अंदर की गुठली को तोड़ने पर भीतर जायफल रहता है.

जायफल जावित्री से ज्यादा मीठा होता है. अल्कोहल में जायफल एक परंपरागत मसाला है. विदेशों में जायफल का अचार भी मिलता है, लेकिन अपने यहां जायफल का प्रयोग मिठाई के साथ मुगलई व्यंजन बनाने में किया जाता है. यह भी एक गरम मसाला है. कई देशों में इस का प्रयोग सब्जी, सूप, सौस और मीट में भी किया जाता है. इस के तेल का प्रयोग कई तरह के कौस्मेटिक्स तैयार करने में किया जाता है. सर्दी के लिए यह बहुत उपयोगी है. छोटे बच्चों को जायफल मिलाए हुए सरसों के तेल से मालिश करने से आराम मिलता है. यह पेट और त्वचा संबंधी समस्याओं को भी दूर रखता है.

– गौतम चौधरी, शेफ, डेमीअर्जिक हौस्पिटैलिटी