सरिता विशेष

महाराष्ट्र के पुणे शहर में जन्मीं 35 वर्षीय जांबाज शीतल राणे महाजन देश की पहली महिला प्रोफैशनल पैराशूट जंपर और स्काई डाइवर हैं. 2004 के बाद से शीतल ने स्काई डाइविंग में विश्व चैंपियनशिप में प्रतिनिधित्व किया है. शीतल ने आज तक 705 पैराशूट जंप किए हैं. ये सारे जंप उन्होंने 13,500 फुट की ऊंचाई से किए हैं. कुछ जंप उन्होंने 18,000 फुट से औक्सीजन ले कर और 1 जंप उन्होंने 30,500 फुट की ऊंचाई से औक्सीजन मास्क के साथ किया है.

इस के अलावा शीतल ने 8 अलगअलग एअरक्राफ्ट से अलगअलग स्थानों जैसे उत्तरी धु्रव (आर्कटिक) और दक्षिणी धु्रव (अंटार्कटिका), आस्टे्रलिया, अमेरिका, एशिया, अफ्रीका, यूरोप डाइविंग की है. उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं.

शीतल ने फिनलैंड के सौफ्टवेयर इंजीनियर वैभव राणे से 19 अप्रैल, 2008 में जमीन से 600 फुट की ऊंचाई पर हौट एअर बैलून में शादी की और इसे ‘लिम्का बुक औफ वर्ल्ड रिकौर्ड्स’ में दर्ज करवाया. वे इस समय 2 जुड़वां बेटों की मां हैं. 2011 में उन्हें ‘पद्मश्री’ सम्मान भी मिल चुका है.

12 फरवरी, 2018 को शीतल ने थाईलैंड के पटाया में महाराष्ट्र की रंगीन नौवारी साड़ी पहन कर 13,000 फुट की ऊंचाई से छलांग लगा कर सब को चौंका दिया. इसे करने के पीछे उन का मकसद था कि भारतीय महिला केवल सामान्य दिनचर्या में ही इस साड़ी को नहीं पहनती है, बल्कि इसे पहन कर वह स्काई डाइविंग जैसे ऐडवैंचर को भी अंजाम दे सकती हैं. पेश हैं, शीतल से हुए कुछ सवालजवाब:

इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा कहां से मिली?

मेरी बचपन से ही कुछ अलग करने की इच्छा थी. मैं ने आर्मी में जाने की कोशिश की थी. 10वीं कक्षा में पढ़ते हुए पता चला कि महिलाओं के लिए आर्म फोर्सेज में जाना स्नातक के बाद ही संभव हो सकता है. ऐसे में स्नातक के बाद मैं ने इस क्षेत्र में आने की सोची. इस से पहले मुझे कला से बहुत प्यार था. मैं अच्छी पेंटिंग भी कर लेती थी. मैं सचिन तेंदुलकर और लता मंगेशकर से बहुत प्रभावित हूं. इसीलिए इन्हीं की तरह कुछ अलग करने की इच्छा थी.

मेरे दोस्त का भाई एनडीए में काम करता था और आर्म फोर्सेज की ट्रेनिंग देता था. मैं ने उसे स्काई डाइविंग करते देखा तो इस क्षेत्र में आ गई. 21 साल की उम्र में मैं ने पहला जंप उत्तरी धु्रव पर बिना किसी ट्रेनिंग के किया था. मैं इस में सफल रही. इस से मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली.

यहां तक पहुंचने में कितना संघर्ष रहा?

इस स्पोर्ट में समस्या पैसों की आती है. स्पौंसरशिप पर यह खेल चलता है. भारत सरकार इसे मान्यता नहीं देती. ‘पद्मश्री’ होने के बावजूद किसी प्रकार की सहायता सरकार से नहीं मिली. मुझे इस के लिए अपने पिता, पति और स्पौंसर पर निर्भर रहना पड़ता है.

स्काई डाइविंग कितनी चुनौतीपूर्ण होती है?

स्काई डाइविंग वाकई बहुत चैलेंजिंग होती है. अगर एक पैराशूट नहीं खुला, तो दूसरा पैराशूट खोलना पड़ता है. अधिकतर स्काई डाइविंग के वक्त एक पैराशूट में 2 और पैराशूट होते हैं. पहला पैराशूट जिसे हम साधारणतया खोलते हैं, उस में समस्या आने पर इमरजैंसी में दूसरे को खोल कर सेफ लैंडिंग की जाती है. अगर आप इमरजैंसी वाले पैराशूट को नहीं खोल पाते हैं, तो एक औटोमैटिक ओपन डिवाइस होता है, जो 1,500 फुट की ऊंचाई पर अगर आप पैराशूट खोलना भूल गए, तो वह खोल देता है. इस तरह यह एक सुरक्षित स्पोर्ट है, पर डर तो सभी को लगता है.

आप को कभी स्काई डाइविंग करते डर नहीं लगा?

नहीं, मुझे कभी डर नहीं लगा, क्योंकि मुझे पूरे विश्व में प्रूव करना था कि महिला होने पर भी मैं इस एडवैंचर खेल में आगे हूं. मुझे याद है जब मैं पहली बार नौर्थ पोल पर जंप कर रही थी, तो मेरी पहली जंप का पैराशूट फटा हुआ था. मुझे तब डर लगा था, लेकिन पैराशूट खोलने के बाद मैं ने पाया कि वह फटा नहीं था, बल्कि उस की डिजाइन ही वैसी थी. मेरी डिक्शनरी में डर की कोई जगह नहीं है.

शादी के बाद खेल और परिवार में कैसे तालमेल बैठाती हैं?

शादी के बाद एडजस्ट करने में मुझे थोड़ी मुश्किलें आईं, क्योंकि मैं जुड़वां बेटों की मां बनी थी. परिवार वालों ने पहले सहमति नहीं जताई. कहा कि मैं इस खेल को छोड़ दूं, पर मैं ने उन से कहा कि मैं शादी छोड़ सकती हूं, खेल नहीं. मैं ने शादी से पहले इस खेल में कदम रखा था. शादी के बाद इसे छोड़ दूं, यह संभव नहीं था. मैं ने अपने पति और ससुराल वालों से शादी से पहले ही बात की थी, पर जुड़वां बच्चों के बाद यह समस्या आई. बच्चों के 1 साल का होने के बाद जब मैं ने फिर से जंप किया तो उस समय मेरे पति मेरे साथ थे. मेरे सासससुर भी थोड़े दिनों के विरोध के बाद शांत हो गए थे.

कामयाबी का श्रेय किसे देती हैं?

अपने पिता कमलाकर महाजन को, जिन्होंने हर मुश्किल में मेरा साथ दिया और अब भी साथ हैं. इसीलिए मैं यहां तक पहुंच पाई. वे मेरी लाइफ में मेरे लिए हीरो हैं. मेरी कामयाबी का सारा श्रेय उन्हीं को जाता है.