सरिता विशेष

उम्र के 5 दशक पार कर चुके मिलिंद सोमन एक सुपर मॉडल, अभिनेता, फिल्म निर्माता, स्पोर्टस पर्सन हैं और फिटनेस को प्रमोट करते हैं. महाराष्ट्र के मिलिंद सोमन को फिल्मों के अलावा स्पोर्ट्स भी काफी पसंद हैं. 10 साल की उम्र से ही उन्होंने महाराष्ट्र को राष्ट्रीय स्तर पर रिप्रेजेंट करना शुरू कर दिया था. उन्होंने 4 साल तक लगातार नेशनल सीनियर स्विमिंग चैम्पियनशिप जीती है. 30 दिनों में 1500 किलोमीटर दौड़कर उन्होंने अपना नाम लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज करवाया है. इसके अलावा उन्होंने ‘आयरन मैन’ चैलेंज को पहली ही कोशिश में 15 घंटे और 19 मिनट में पूरा किया है. इसमें साइकिलिंग, स्विमिंग और रनिंग शामिल हैं.

समय मिलने पर वे आज भी 10 से 12 किलोमीटर दौड़ते हैं और फिटनेस के लिए सबको प्रोत्साहित भी करते हैं. इस समय वे महिलाओं की मैराथन दौड़ ‘पिंकाथन’ के ब्रांड एम्बेसेडर हैं. ये उनका 5वां सत्र है जो 18 दिसम्बर को होने वाला है. हर बार मैराथन में भाग लेने वाली महिलाओं की बढ़ती संख्या को देखकर वे काफी खुश हैं. उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश.

प्र. अच्छी हेल्थ के लिए फिटनेस कितनी जरुरी है?

फिट रहने से केवल शरीर ही नहीं बल्कि मानसिक अवस्था भी अच्छी रहती है. आमतौर पर महिलाएं कुछ न कुछ बहाना बनाकर फिटनेस से भागती हैं. ऐसे में इस तरह की दौड़ उनके लिए काफी आकर्षक होती है. हमारे समाज में कुछ पुरुषों का ही कहना है कि महिलायें दौड़ नहीं सकती, यही वजह है कि मैं ‘पिंकाथन’ से जुड़ा हूं. अधिकतर महिलायें घरेलू होती हैं और उन्हें इसकी जानकारी नहीं है इसलिए आज मैं महिलाओं को अपने लिए, अपने हेल्थ के लिए दौड़ने के लिए कह रहा हूं. मेरे ख्याल से एक महिला जो सोचती है वह कर सकती है. कुछ महिलायें तो ऐसी हैं कि शादी से पहले अपने लिए सबकुछ करती हैं और शादी के बाद सब छोड़ कर घर परिवार में जुट जाती हैं, ऐसे में वे एक अच्छी सेहत को जी नहीं पाती. उनका स्ट्रेस लेवेल भी बढ़ता रहता है.

प्र. इतने सालों में महिलाओं का झुकाव इस ओर कितना बढ़ा है?

महिलाओं में अवेयरनेस बढ़ रहा है. पहले हम केवल 8 शहरों में इस दौड़ का आयोजन करते थे. अब छोटे-बड़े अनेक शहरों जैसे विशाखापत्तनम, विजयवाड़ा, नागपुर आदि जगहों से भी लोग हमें बुला रहे हैं. मैंने इन छोटे-बड़े शहरों के लिए एक दूसरा इवेंट ‘इंडिया गोईंग पिंक’ भी ऑरगेनाइज किया है, इस इवेंट से जुड़े लोग सबको गाइड करते हैं और दौड़ का आयोजन करते हैं. इस बार 14 शहरों में ये दौड़ होगी. मुंबई के पहले मैराथन में केवल दो हजार महिलाओं ने भाग लिया था. पिछले साल 11 हजार महिलाओं ने भाग लिया और इस बार तो ये संख्या लाखों में होने की संभावना है.

प्र. दौड़ या फिटनेस से महिला के जीवन में कौन से खास बदलाव आते हैं?

मैं तो सबको लेकर दौड़ता हूं. अंदर जो बदलाव आते हैं यह उन्हें ही पता चलता है. उनके अंदर आत्मविश्वास बढ़ता है कि वह जो चाहे वो कर सकती हैं. वे अच्छा फील करती हैं. हमारे देश में पिछले कुछ सालों से ही महिलाएं दौड़ती हैं, जबकि अमेरिका में 40-45 साल पहले ही यह ट्रेंड शुरू हो गया था. लेकिन तब केवल प्रतियोगिता के लिए ही लोग दौड़ते थे. जिनमें अधिकतर पुरुष ही होते थे. हेल्थ या रिक्रिएशन के लिए कोई भी नहीं दौड़ता था. अभी अमेरिका में हर सप्ताह 30 मिलियन लोग दौड़ते हैं, क्योंकि उन्हें इसके फायदे पता चल चुके हैं. वहां स्पोर्ट्स कल्चर है. पर अपने देश में ऐसा नहीं है.

महिलायें तो स्पोर्ट्स के मामले में और भी पीछे हैं. लेकिन अब हर स्कूल, गांव, शहर, क्लब आदि जगहों पर रनिंग के इवेंट कराये जा रहे हैं. लोग भाग भी ले रहे हैं. इस तरह सभी एक दूसरे से प्रेरित हो रहे हैं, यह एक अच्छी बात है. महिलाओं को लगता है कि हम अगर मन बना ले तो कुछ भी कर सकते हैं. उनकी झिझक दूर हो रही है उनके भाव खुल रहे हैं. अब उन्हें फिटनेस की गुणवत्ता समझ में आ रही है. इससे उनका स्ट्रेस दूर होता है और साथ ही कई सारी बिमारियां भी कम हो रही हैं.

स्ट्रेस को भगाना मुश्किल नहीं अगर हम अपने दैनिक रूटीन में दौड़, टहलना, व्यायाम आदि को शामिल करें. बड़े शहरों में महिलाएं सुबह से शाम तक दौड़ती रहती हैं, फिर भी बीमार रहती हैं. उन्हें लगता है कि वे काफी कसरत कर रही हैं. लेकिन वे सारा काम स्ट्रेस के साथ करती हैं. उन्हें अपने लिए थोड़ा समय निकाल कर व्यायाम या जो भी अच्छा लगे करना चाहिए. महिलाओं को अपने व्यायाम की समय सीमा खुद ही तय करनी चाहिए कि कितना वर्कआउट करने से वे अच्छा फील करती हैं. महिलाओं का सेल्फ अवेयर होना बहुत जरूरी है.