सरिता विशेष

रिचा चड्ढा ने बहुत ही कम समय में अपनी अभिनय प्रतिभा के बल पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक पहचान बना ली है. उन की कई फिल्में कान फिल्म फैस्टिवल सहित कई इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल्स में सुर्खियां बटोर चुकी हैं. पर वे मुंहफट हैं. इस की वजह बताते हुए वे कहती हैं कि इंडस्ट्री में उन का कोई गौडफादर नहीं है. क्या आप अभी भी बौलीवुड में खुद को बाहरी मानती हैं? इस सवाल के जवाब में रिचा फरमाती हैं, ‘‘मुझे गैर फिल्मी परिवार के होने का कोई लाभ या नुकसान समझ में नहीं आया. मैं मेहनत कर रही हूं और व्यस्त हूं. मुझे अच्छा काम करने का मौका मिल रहा है. लोग मुझे बेहतरीन अदाकारा के रूप में पहचानते हैं. पर कड़वा सच यह है कि पूरे विश्व की किसी भी फिल्म इंडस्ट्री में वहां के कलाकार या तकनीशियन के लिए इस शब्द का प्रयोग नहीं किया जाता. सिर्फ बौलीवुड में ही ‘बाहरी’ शब्द का प्रयोग किया जाता है.’’

उन की फिल्म ‘मसान’ ने इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल में जम कर वाहवाही बटोरी. पर इस तरह की फिल्में भारत में बौक्स औफिस पर कमाल क्यों नहीं कर पातीं? इस बाबत वे कहती हैं, ‘‘ऐसा न कहें, ‘मसान’ को तो भारत में भी बहुत अच्छी शोहरत मिली. ‘मसान’ ने बौक्स औफिस पर बहुत अच्छा पैसा कमाया. सारा मामला बजट का है. बजट के अनुसार फिल्म ने अच्छी कमाई की है. यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि ‘मसान’ जैसी फिल्में मेनस्ट्रीम फिल्मों की तरह बिजनैस करेंगी. 3 करोड़ रुपए की लागत वाली इस फिल्म ने 10 करोड़ रुपए कमा लिए, इस से अधिक और क्या चाहिए.’’

अच्छी कमाई के बावजूद उन्हें मेनस्ट्रीम कलाकारों की तरह स्टारडम क्यों नहीं मिला? इस पर उन का जवाब यों है, ‘‘‘मसान’ जैसी फिल्मों से स्टारडम नहीं मिलता. सिर्फ अच्छे कलाकार के रूप में पहचान बनती है. यह फिल्म पूरी दुनिया में चर्चित हुई. पूरी दुनिया में लोगों ने मेरे अभिनय की तारीफ की. ये यादगार फिल्में होती हैं. हर कलाकार के कैरियर में कुछ यादगार फिल्में होनी चाहिए. लोगों को ‘मसान’ हमेशा याद रहेगी.’’ कई कलाकार पूरी जिंदगी सिर्फ अच्छे कलाकार होने का टैग लगा कर जीते रहते हैं, उन्हें स्टारडम कभी नहीं मिल पाता? ऐसी स्थिति में क्या होता है? इस पर वे कहती हैं, ‘‘इस के लिए खुद कलाकार कम दोषी नहीं हैं. देखिए, मेरा अपना कोई स्टारडम नहीं है लेकिन जब मैं किसी अवार्ड समारोह में जाती हूं तो मैं किसी स्टार कलाकार से कम तैयार हो कर नहीं जाती. मैं खुद को ग्लैमरस अंदाज में ही पेश करती हूं. मैं देहाती किरदार निभाती हूं, इस के माने यह नहीं है कि मैं निजी जीवन में भी देहाती रहूं. ‘गैंग्स औफ वासेपुर’ के समय मैं सलवारकमीज पहन कर घूमती थी, तब कोई मुझ से अंगरेजी में बात करने को तैयार नहीं होता था. सो, अब मैं ने स्ट्रैटजी बना ली है कि अब मैं अपनेआप को स्टार्स की तरह ही पेश करूंगी.’’

फिल्म ‘सरबजीत’ में आप ने सरबजीत की पत्नी सुखप्रीत का रियल लाइफ किरदार निभाया, तो वहीं फिल्म ‘कैबरे’ में एक काल्पनिक किरदार निभाया. आप के लिए किस किरदार को निभाना आसान रहा? इस पर रिचा बताती हैं, ‘‘मैं जिस किरदार के साथ जुड़ जाती हूं उसे निभाना मेरे लिए आसान हो जाता है. सरबजीत की पत्नी सुखप्रीत के साथ मैं इमोशनली जुड़ गई थी. इसलिए इस किरदार को निभाना मेरे लिए बहुत आसान रहा. हां, रीयल लाइफ किरदारों के साथ न्याय करना बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है. रीयल लाइफ किरदारों को निभाते समय कलाकार के लिए बंदिश होती है कि वह उस दायरे से बाहर जा कर काम नहीं कर सकता. ‘सरबजीत’ में सरबजीत और उस की बहन दलजीत से लोग इतना ज्यादा परिचित हैं कि इन किरदारों को निभाने वाले कलाकारों के लिए बंदिश रही हैं. पर मेरे लिए बंदिश नहीं रही क्योंकि मैं ने जिस सुखप्रीत के किरदार को निभाया है उस से लोग परिचित नहीं हैं. सुखप्रीत एक मासूम महिला का किरदार है. पहली बार मैं ने एक मासूम महिला का किरदार निभाया है.’’

मीरा नायर की इंटरनैशनल फिल्म के बाद रिचा अब फ्रैंच निर्देशक की इंटरनैशनल फिल्म ‘लव सोनिया’ कर रही हैं. इस पर रिचा बताती हैं कि ‘लव सोनिया’ इंडोअमेरिकन फिल्म है, जिस का निर्माण ‘लाइफ औफ पाई’ जैसी फिल्म के निर्माता डेविड ओमार्क कर रहे हैं. फिल्म के निर्देशक तबरेज नूरानी ने उन्हें ट्विटर पर संदेश दिया. हमारी बातचीत हुई. फिल्म की कहानी ह्यूमन ट्रैफिकिंग पर है. उन्हें कहानी व किरदार पसंद आए तो उन्होंने हामी भर दी. हम इस की शूटिंग कुछ दिन मुंबई में कर रहे हैं. उस के बाद हौंगकौंग, फिर लास एंजिल्स में करेंगे.

फिल्मों के अलावा रिचा को लेखन में भी दिलचस्पी हैं. लेखन के साथ सोशल सर्विस में भी काफी सक्रिय रहने वाली रिचा बताती हैं, ‘‘लिखना तो चलता रहता है. इन दिनों मैं एक समाजसेवा के कार्य में व्यस्त हूं. वास्तव में ह्यूमन ट्रैफिकिंग पर आधारित फिल्म ‘लव सोनिया’ की कहानी पढ़ कर मैं बहुत प्रभावित हुई, तो उसी पर मैं कुछ काम कर रही हूं. कुछ लड़कियों को फिर से उन के पैरों पर खड़ा करने के लिए कुछ काम करने जा रही हूं. मैं ने एक जगह किराए पर ली है, जहां इन्हें रखा हुआ है. इन के खर्च के लिए चंदा इकट्ठा करने वाली हूं. हाल ही में एक लेख भी लिखा था, जिस में इस बात का जिक्र था कि फिल्मों में औरतों को ले कर गलत बातें क्यों कही जाती हैं. फिल्म इंडस्ट्री के लोग भले कोशिश करें कि मेरा दिमाग बंद हो जाए, पर मैं अपना दिमाग बंद नहीं होने दूंगी. मैं कुछ न कुछ रचनात्मक काम करती रहूंगी. कुछ न कुछ लिखती रहूंगी.’’

ह्यूमन ट्रैफिकिंग में पकड़ी गई लड़कियों के जीवन उद्धार के कार्यक्रम पर विस्तार से रोशनी डालते हुए वे कहती हैं, ‘‘आज की तारीख में भारत में गुलामी नहीं रही. मगर सैक्स गुलामी यानी ‘सैक्स स्लेवरी’ बढ़ गई है. हमें पता भी नहीं कि यह किस हद तक है. एक अकेला इंसान इसे रोक नहीं सकता. दुखद स्थिति यह है कि इस अवैध कृत्य में राजनेता व सरकार भी जुड़ी हुई हैं. इस से भी बड़ा आश्चर्य यह है कि यह सारा खेल नाबालिग लड़के व लड़कियों से शुरू होता है. हाल ही में एक एनजीओ ने कुछ ऐसी ही पीडि़तों को छुड़ाया. इस में 2 लड़के 10 साल से कम उम्र के और 3 लड़कियां 12-13 साल की हैं. जब हम ने इन से बातचीत की तो पता चला कि कुछ लोग दूरदराज के गांव में जा कर नाबालिग लड़केलड़कियों के मांबाप को बहलाफुसला कर, उन के बच्चों को शहर में अच्छी शिक्षा दिलाने का वादा कर के या गांव के मजबूर मातापिता को धन का लालच दे कर कहते हैं कि वे अपने बच्चों को बेच दें. फिर इन नाबालिगों को ला कर अलगअलग स्तर पर बेचा जाता है. जैसेजैसे इन की उम्र बढ़ती है, वैसेवैसे इन की कीमत बढ़ती है.

‘‘मैं कुछ लोगों से मिली हूं. उन की कहानियां सुन कर मेरा दिल दहल गया. मेरी समझ में नहीं आता कि लोग इतना घिनौना काम कैसे करने लगे हैं, वह भी छोटे बच्चों के साथ. एक बच्ची ने बताया कि वह अपनी मां के साथ जा रही थी, रेलवे स्टेशन पर पानी पीने के लिए उतरी और किसी ने उसे उठा लिया. फिर उस का गैंगरेप हुआ. हर दिन उस को टौर्चर किया गया. 2 साल तक उसे पिंजरे में बंद कर के रखा गया. फिर सैक्स गुलामी में डाल दिया गया. उस के हाथपांव में सिगरेट से घाव किए गए हैं. कुछ लड़कियां तो मुझे ऐसी मिलीं जिन्हें नशे की आदत हो गई है. ‘‘एक एनजीओ ने उन लड़केलड़कियों को सैक्स रैकेट से निकाला है. वे पढ़ीलिखी नहीं हैं. उन में कोई कौशल नहीं है. आराम नगर में कुछ बंगले हैं, जिन में से एक बंगला हम किराए पर ले कर उन्हें वहां रख रहे हैं. हमारी कोशिश है कि पहले हम उन के 2 साल के किराए व खाने का पैसा इकट्ठा करें. मैं ने अपनी एक दोस्त से बात की है, जो कि बौलीवुड डांसर हैं, वह उन्हें डांस सिखाएगी.

एक लड़की असम की है. लोगों ने उस के साथ गलत किया. फिर वह किसी तरह बच कर अपने गांव पहुंची, तो उस के मातापिता ने कहा कि उस ने उन का नाम खराब कर दिया. बेचारी जब हमें मिली तो बहुत बुरी हालत में थी. हम ने उसे सहारा दिया. अब वह हेयरस्टाइलिस्ट बन गई है. इस मकसद के लिए मैं एक छोटी सी फिल्म भी फिल्माने वाली हूं. मैं यह बात प्रचारित नहीं करना चाहती. मैं ने अपनी तरफ से जो चंदा होना चाहिए, उस का 10वां हिस्सा डाल दिया. यदि हमें चंदा नहीं मिला तो भी मैं उसे अपनी तरफ से पूरा करने की कोशिश करूंगी.’’ हर कोई वीमेन एंपावरमैंट की बातें कर रहा है. बौलीवुड में महिलाओं की स्थिति क्या है? इस सवाल पर रिचा का नजरिया कुछ ऐसा है, ‘‘सच में कहा जाए तो बौलीवुड में महिलाएं ही काम कर रही हैं. बड़ोंबड़ों को महिलाएं ही संभाल रही हैं फिर चाहे वह यशराज फिल्म्स हो, रेशमा शेट्टी हों, गौरी श्ंिदे हों या फरहा खान या एकता कपूर हों. कुछ दिन में लोग कहेंगे कि बौलीवुड में महिलाओं की स्थिति पुरुषों के मुकाबले ज्यादा बेहतर है.

‘‘वास्तव में किसी भी क्षेत्र में महिलाओं को उन का हक मिलता नहीं है. पर बौलीवुड में धीरेधीरे मिलने लगा है. कम से कम बौलीवुड में परदे के पीछे तो महिलाएं हावी हैं. एकता कपूर ने अपना खुद का एंपायर खड़ा कर रखा है. बौलीवुड में तमाम महिलाएं काफी सशक्त हैं. वे मेहनत से काम कर रही हैं. मुझे लगता है कि आने वाले समय में बौलीवुड में महिलाएं ही हावी दिखेंगी.’’

अगर बौलीवुड में महिलाएं तरक्की कर रही हैं तो बौलीवुड में हीरो और हीरोइन की पारिश्रमिक राशि में बहुत बड़ा अंतर क्यों है? इस पर उन का मानना है, ‘‘भारत में यह कोई मुद्दा नहीं है. कम से कम भारत में पारिश्रमिक राशि को लिंगभेद के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए. हम बचपन से देखते आ रहे हैं कि 4-5 हीरो चल रहे हैं, तो स्वाभाविक तौर पर वे अधिक पैसों की मांग करेंगे. ये पुरुष कलाकार, निर्माता और बौक्स औफिस पर उसी अनुपात में पैसा भी कमा कर देते हैं. अभी बौलीवुड में ऐसी स्थिति नहीं आई है कि कोई हीरोइन अपने बल पर किसी फिल्म को हिट करा सके. जिस दिन मैं दावा करने लगूंगी कि मेरी फिल्म को 10 करोड़ रुपए की ओपनिंग मिलेगी, उस दिन लोग मुझे भी मुंहमांगी कीमत देंगे. जब मैं इस मुकाम पर पहुंच जाऊंगी तो मैं खुद भी किसी फिल्म को 10 लाख रुपए में नहीं करूंगी. यहां पारिश्रमिक राशि इस आधार पर तय होती है कि कौन कितना कमा कर दे रहा है? हां, रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण के कैरियर एकसाथ शुरू हुए. ऐसे में इन दोनों की पारिश्रमिक राशि एकजैसी होनी चाहिए यानी कि एक दरजे के कलाकार की पारिश्रमिक राशि एकजैसी होनी चाहिए. अब यदि मैं कहूं कि मुझे उतनी ही पारिश्रमिक राशि मिलनी चाहिए, जितनी शाहरूख खान को मिल रही है, तो लोग मुझे फिल्म इंडस्ट्री से बाहर का रास्ता जरूर दिखा देंगे.

बतौर अभिनेत्री, रिचा औफबीट फिल्मों से मिली कामयाबी को मुख्यधारा के सिनेमा में भुनाने के लिए हर तरह के सिनेमा में सक्रिय होना चाहती हैं लेकिन कमर्शियल सिनेमा में अभी भी उन की गिनती सोलो हीरोइन के तौर पर नहीं होती. जाहिर है कि उन के सफर की राह अभी कई संघर्षों से गुजरेगी.