बौलीवुड में आम तौर पर देखा गया है कि संगीतकार परिवार से जुड़ी संताने संगीत से जुड़ती हैं. और स्टार का बेटा कलाकार बनता है. मगर सीमा सेानिक अलीमचंद उनमें से हैं, जिन्होंने अपने पिता सोनिक ओमी की तरह संगीत के क्षेत्र में कदम नही रखा. बल्कि वह बौलीवुड से जुड़ी हस्तियों पर किताबें लिख रही हैं. उन्होंने सौ साल के फिल्मी संगीत पर शोध कार्य करके तेरह खंड की वीडियो सीडी बनायी है. वह रजनीकांत की जीवनी लिख चुकी हैं. इन दिनों वह दारा सिंह की जीवनी को लेकर चर्चा में हैं. सीमा सोनिक अलीमचंद ने दारा सिंह पर ‘‘डी दारा सिंह’’ नामक किताब लिखी है, जिसका लोकार्पण दस नवंबर को अक्षय कुमार के हाथों मुंबई में होगा.

हाल ही में सीमा अलीम से मुलाकात हुई. तब उनसे हुई बातचीत इस प्रकार रही….

आपकी पृष्ठभूमि क्या है?

– मेरे घर पर बचपन से ही संगीत का माहौल रहा है. मेरे पिता सोनिक ओमी संगीतकार थे. ‘दिल ने फिर याद किया’, ‘महुआ’, ‘धर्मा’ सहित कई फिल्मों में संगीत दिया था. मैंने ‘बिग 92 एफएम’ में चार वर्ष तक उद्घोषक के रूप में काम किया. वहीं पर मेरे दिमाग में आया और मैंने ‘‘भारतीय फिल्म संगीत के सौ साल’’ पर शोधपूर्ण किताब लिखी, पर बाद में यह किताब 13 भागों में सीडी के रूप में आयी. इसमें मूक सिनेमा से सौ साल पूरे होने तक के संगीत के पूरे सफर को लिखा है. इसमें पूरे सिनेमा का इतिहास, संगीतकारों का जो युग था, मूक युग, टॉकीज ईरा, स्वतंत्रता का ईरा, गजल से लेकर मदन मोहन आज तक के संगीतकारों के बारे लिखा. इसे सारेगामा एचएमवी ने निकाला. यह बहुत ही जानकारी परक 13 भाग की वीडियो सीडी है. इसमें 75 गाने भी हैं. इसमें लता मंगेशकर, मनोज कुमार के इंटरव्यू भी किए हैं. ‘‘हंड्रेड ईअर आफ फिल्म म्यूजिक’’ इसका नाम है.

इसके बाद मैंने रजनीकांत पर किताब लिखी. इसका नाम ‘‘द वारियर विद इन’’ है. यह किताब अंग्रेजी भाषा में है. इस किताब के लिए मेरी रजनीकांत से बात नहीं हो पायी, मगर रजनीकांत के बड़े भाई से मैने मुलाकात की थी. रजनीकांत पर शोध करते हुए मैंने पाया कि वह बहुत धार्मिक इंसान हैं. वह हर वर्ष ऋषिकेश जाकर वहां एक बाबा हैं, उनसे मिलते हैं. इसमें मैंने रजनीकांत की धार्मिक जिंदगी और फिल्मी जिंदगी को उभारा है. इसके कवर पेज पर रजनीकांत के दोनों रूप पेश किए थे. हेमा मालिनी व फिल्म ‘‘चालबाज’’ के निर्देशक पंकज पाराशर से भी मुझे रजनीकांत के बारे में कुछ जानकारी मिली थी. अब मेरी नई किताब दारा सिंह पर ‘डी दारा सिंह’ आ रही है.

आपकी परवरिश संगीत के माहौल में हुई, पर आपने संगीत की बजाय लेखन को महत्व दिया?

– हमारे परिवार में लड़कियों को काम करने नहीं दिया जाता था. इसलिए संगीत की तरफ रूझान नहीं हो पाया. पर पिता जी के देहांत के बाद मैंने इस क्षेत्र में काम करना शुरू  किया.

दारा सिंह की लिखी हुई आत्मकथा हरियाणा के स्कूलों में पढ़ाई जाती है. ऐसे में आपने उन पर किताब लिखने का निर्णय क्यों किया?

– पंजाब में दारा सिंह के गांव के पास मेरी मां के माता पिता यानी कि मेरे नाना नानी, मामा मामी का घर है. मैं वहां गयी थी. तो मेरे दिमाग में आया कि दारा सिंह पर किताब लिखी जानी चाहिए. चंडीगढ़ में दारा सिंह के छोटे बेटे अमृत मिले. उनके घर जाकर मैने उनसे लंबा चौड़ा इंटरव्यू रिकार्ड किया. फिर दारा सिंह की दूसरी पत्नी से मुंबई में मुलाकात की, उस वक्त वह जिंदा थी. उन्होंने ढेर सारी बातें बतायी. मेरी किताब पूरी होने के बाद मार्च 2016 में उनका देहांत हुआ. उन्होंने मुझे पंजाब के दिनों को लेकर बहुत कुछ बताया. फिर दारा सिंह के बेटे बिंदू दारा सिंह ने भी हमारी काफी मदद की. बिंदू के मामाजी के अलावा फिल्म अभिनेत्री मुमताज से भी मैंने लंबी बात की. इसके अलावा मुझे दारा सिंह द्वारा खुद लिखी गयी उनकी आत्मकथा वाली छोटी सी किताब मिली, जो कि हरियाणा में स्कूल में पढ़ायी जाती है. इस किताब से मुझे दारा सिंह की रूह पता चली.

दारा सिंह की किताब में आपने सकारात्मक बातों को महत्व दिया है या?

– मेरी किताब में सब कुछ सकारात्मक ही है. दारा सिंह के गांव के लोग उन्हे पूजते हैं. वह दारा सिंह को साधु व भगवान मानते हैं. उनके गांव में मुझे पता चला कि दारा सिंह की पहली शादी नौ वर्ष की उम्र में हुई थी. जिससे उनका एक बेटा वर्धमान है, जो कि वहीं गांव में रहता है, उसकी 70 साल की उम्र है. बिंदू व अमृत तो दारा सिंह की दूसरी पत्नी की संतान हैं. लोग कहते हैं कि दारा सिंह ने कभी किसी को गाली नहीं दी. उनकी सबसे बड़ी गाली हुआ करती थी-‘उल्लू का पट्ठा’. हां! मुझे लगा कि गांव की सम्पत्ति को लेकर कुछ विवाद है. सच नहीं जानती.

दारा सिंह जवानी में तो बहुत हैंडसम थे. लड़कियां उनकी दीवानी थी. भारत ही नहीं विदेश में भी लड़कियां उनके पीछे भागती थी. ऐसा स्वाभाविक है. वह मशहूर कुश्तीबाज और अभिनेता थे.

आपने जिन लोगों से बात की, उनमें से किसने क्या खास बात बतायी?

– मुमताज जी ने दारा सिंह के साथ कई फिल्में की हैं. उन्होंने दारा सिंह की एक इंसान के रूप में तारीफ की, मगर उन्होंने कहा कि दारा सिंह, दिलीप कुमार नहीं थे. उनकी भाषा में पंजाबियत थी. अभिनय नहीं कर पाते थे. इसीलिए वह स्टंट फिल्में ही ज्यादा करते थे. फरहा खान की मां मेनका ने बताया कि एक वक्त वह था जब दिवाली के दिन दारा सिंह के घर के बाहर तक निर्माताओं की लाइन लगी रहती थी. तो एक दिन वह भी था, जब एक दिवाली कोई निर्माता उनके घर नहीं पहुंचा था. अमिताभ बच्चन ने किताब के कवर पेज के लिए पैराग्राफ लिखा है.

किताब का नाम ‘डी दारा सिह’ क्यों?

– डी दारा सिंह रंधावा उनका पैदाइशी नाम है. पर 19 साल की उम्र में जब वह पहली बार मद्रास गए तो वहां लोग उनका नाम उच्चारित नही कर पा रहे थे, तब उन्होने इसे छोटा कर दारा सिंह कर दिया था. इसीलिए किताब का नाम ‘डी दारा सिंह’ है. वैसे बिंदू चाहते थे कि किताब का नाम ‘दारा सिंह’ रखा जाए, पर मुझे लगा कि ‘डी दारा सिंह’ ज्यादा ठीक रहेगा.

जब किसी की जीवनी लिखते समय उसके परिवार के सदस्य जुड़ जाएं, तो कितनी स्वतंत्रता रहती है?

– जब परिवार के सदस्य जुड़ जाते हैं, तो लेखक के तौर पर हमारी स्वतंत्रता बाधित होती है. मैंने सुना था कि जब वह कुश्ती लड़ते थे, उस वक्त मैच फिक्स हुआ करते थे. मगर दारा सिंह के बहनोई रतन जी ने इस बात से इंकार किया. मैंने किताब में एक सशक्त इंसान की उनकी तस्वीर पेश की है. 

आपके पिता भी दारा सिंह के साथ काम कर चुके हैं?

– जी हां! दारा सिंह ने दो फिल्मों का निर्माण किया था, जिसका संगीत मेरे पिता ने दिया था. लेकिन अब मेरे पिता इस दुनिया में नहीं हैं, इसलिए उनसे इस किताब पर मदद नही मिली.