सरिता विशेष

फिल्म ‘दिल चाहता है’ से निर्देशन के क्षेत्र में उतरने वाले फरहान अख्तर सिनेमा जगत से जुड़े दूसरे क्षेत्रों में भी धीरेधीरे कदम बढ़ाते रहे. उन की गिनती आज मशहूर फिल्म निर्माता, निर्देशक, लेखक व अभिनेता के रूप में होती है. इन दिनों वे फिल्म ‘भाग मिल्खा भाग’ में मिल्खा सिंह का किरदार निभा कर चर्चा में हैं. हाल ही में शांतिस्वरूप त्रिपाठी ने उन से मुलाकात की. पेश हैं मुख्य अंश :

फिल्म ‘भाग मिल्खा भाग’ करने से पहले आप मिल्खा सिंह से कितना वाकिफ थे?

सच कहूं तो उन्हें बहुत ज्यादा नहीं जानता था. मुझे यह पता था कि मिल्खा सिंह बहुत बड़े ऐथलीट हैं और उन्होंने तमाम रिकौर्ड बनाए हैं. लेकिन मुझे यह नहीं पता था कि उन्होंने 80 रेसों में भाग लिया और 77 में जीत हासिल की. उन की जिंदगी में क्याक्या हुआ, इस के बारे में भी मुझे जानकारी नहीं थी.

यह कैसी फिल्म है?

यह फिल्म एक ऐसे इंसान के जीवन पर आधारित है जो समाज के लिए प्रेरणादायक है. मेरा मानना है कि समयसमय पर देश की युवा पीढ़ी को जगाने के लिए इस तरह की प्रेरणादायक कहानियों पर फिल्में बनाई जानी चाहिए.

‘भाग मिल्खा भाग’ में अभिनय करने से आप के जीवन या आप की सोच में क्या बदलाव आया?

मिल्खाजी ने देश को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान दिलवाया है. इंसानी तौर पर उन्होंने जो कुछ भी अपनी जिंदगी में सहा है, वह हमारे लिए प्रेरणादायक है. उन के प्रति मेरे मन में आदर बहुत ज्यादा बढ़ गया है.

मिल्खा सिंह से आप की पहली मुलाकात कब और कहां हुई?

फिल्म की स्क्रिप्ट के आधार पर इस फिल्म का हिस्सा बनने के लिए मेरी सहमति देने के बाद मैं सिनेमाई परदे पर मिल्खा सिंह जैसा दिखने के लिए टे्रनिंग ले रहा था. हमारी ‘दौड़ने’ की टे्रनिंग मुंबई के प्रियदर्शनी पार्क में चल रही थी, जहां पर 400 मीटर का एक ट्रैक है. एक दिन जब मैं टे्रनिंग ले रहा था, उसी दौरान फिल्म के निर्देशक राकेश ओम प्रकाश मेहरा के साथ मिल्खा सिंहजी वहां पहुंचे. तभी उन से मुलाकात हुई.

किसी जीवंत लीजैंड का किरदार निभाना तलवार की धार पर चलना होता है. इस बात का कितना दबाव था?

मुझे कभी तनाव नहीं रहा. सिर्फ जिम्मेदारी का एहसास था. अब जिम्मेदारी से आप दब सकते हैं या उस जिम्मेदारी से प्रेरित हो सकते हैं. मैं इस जिम्मेदारी से दबने के बजाय पे्ररित होता गया.

मिल्खा सिंह का किरदार निभाने से पहले कोई टे्रनिंग ली?

मिल्खा सिंह की स्टाइल आम ऐथलीट से बहुत अलग रही है तो उस स्टाइल को पकड़ने के लिए हमारे लिए टे्रनिंग लेनी बहुत जरूरी थी. उन की खासीयत थी कि भागते समय उन का एक हाथ थोड़ा आगे जाता था. शूटिंग से पहले 6 माह तक हर दिन, रविवार को छोड़ कर सुबह और शाम 4-4 घंटे की टे्रनिंग होती थी. पूरे डेढ़ साल तक मैं ने एक समर्पित ऐथलीट की जिंदगी जी है. इस के अलावा संवाद अदायगी की भी टे्रनिंग होती थी.

तो क्या आप को पंजाबी भी सीखनी पड़ी?

फिल्म का फ्लेवर पंजाबी है पर भाषा ज्यादातर हिंदी या उर्दू ही है. आप को जान कर हैरानी होगी कि मिल्खा सिंह बचपन में अपने खास दोस्त सम्प्रीत के साथ मदरसे में पढ़ा करते थे. इसलिए उन की उर्दू व हिंदी की जबान बहुत साफ है. वे उर्दू में लिखते भी थे. लेकिन पिछले 50 साल से वे चंडीगढ़ में रह रहे हैं, इसलिए अब उन की भाषा में पंजाबी ऐक्सेंट आ गया है.

आप ने आर्मी बैकग्राउंड पर एक फिल्म ‘लक्ष्य’ बनाई थी. अब फिल्म ‘भाग मिल्खा भाग’ के लिए जब आप आर्मी कैंप के पास हुसैनीवाला बौर्डर गए, उस वक्त आप की कौन सी यादें ताजा हुईं?

हमें अच्छी तरह याद है कि जब हम फिरोजपुर पहुंचे और हुसैनीवाला बौर्डर के लिए गए, आर्मी वालों को पता था कि हम वहां शूटिंग करने वाले हैं. उन लोगों ने हमें वहां शाम को फ्लैग सेरेमनी के लिए बुलाया था. शाम को फ्लैग सेरेमनी के वक्त दोनों देशों के सैनिक अपनेअपने देश के झंडे नीचे करते हैं और देशभक्ति के गीत बजाते हैं. मुझे बहुत अच्छा लगा जब उन्होंने हमारी फिल्म ‘लक्ष्य’ का गाना बजाया. वहां पहुंच कर मेरे रोंगटे खड़े हो गए.

आप खुद भी एक निर्देशक हैं. ऐसे में जब आप सैट पर पहुंचते थे तो क्या अपने भीतर के निर्देशक को घर पर छोड़ कर आते थे?

यह बात आप भी समझते हैं कि ऐसा हो नहीं सकता था. आखिर इंसान तो एक ही है. एक ही इंसान में दोनों चीजें हैं पर एक निर्देशक होने की वजह से मुझे पता है फिल्म एक निर्देशक का विजन होती है. मैं निर्देशक के विजन की कद्र करता हूं.

हर ऐथलीट के साथ कुछ न कुछ राजनीति या समस्याएं वगैरह भी होती रहती हैं?

हां, हर किसी की जिंदगी में बहुत बड़ा स्ट्रगल होता है. हम सभी को पता है कि एक ऐथलीट को दूसरे खिलाडि़यों के मुकाबले बहुत कम अहमियत दी जाती है. इस वजह से तमाम मातापिता अपने बच्चों को स्पोर्ट्स के प्रति बढ़ावा नहीं देते. मैं कुछ नहीं कर सकता पर मैं यह जरूर चाहूंगा कि फिल्म ‘भाग मिल्खा भाग’ देख कर लोग इंस्पायर हों और खेल मंत्रालय के कानों पर भी जूं रेंगे.

आप एक एनजीओ मर्द (मैन अगेंस्ट रेप ऐंड डिस्क्रिमिनेशन) के साथ जुड़े हुए हैं. क्या इस के साथ जो काम शुरू किया था वह बंद कर दिया?

यह मेरा ‘लाइफ टाइम कमिटमैंट’ है. यह कभी बंद नहीं होगा. इस वक्त यह सोशल मीडिया पर बहुत ऐक्टिव है. इस का बहुत अच्छा रिस्पौंस मिल रहा है.