सरिता विशेष

30 वर्षीय प्रियंका खुराना दिल्ली की पलीबढ़ी हैं. कोलकाता से एमबीए की पढ़ाई की है. फिलहाल जापान की कंपनी में ऐग्जीक्यूटिव डायरैक्टर हैं. 2007 में शादी के बंधन में बंधने वाली प्रियंका 4 साल के बेटे की मां हैं. 2015 में मिसेज इंडिया का खिताब, तो 2016 में मिसेज अर्थ का खिताब अपने नाम किया.

अपने निजी जीवन की भूमिका को निभाते हुए प्रियंका ने किस तरह प्रोफैशनल लाइफ में भी सफलता पाई उन्हीं से जानते हैं:

ब्यूटी कौंटैस्ट में हिस्सा लेने का खयाल मन में कब आया?

जब मैं 16 साल की थी तब मौडल बनना चाहती थी. दिमाग में ब्यूटी कौंटैस्ट में हिस्सा लेने का भी खयाल था. लेकिन पढ़ाई में अच्छी थी, इसलिए पेरैंट्स ने भी पढ़ाई पर ध्यान देने को कहा. उस के बाद शादी हो गई तो यह खयाल मन से निकल गया. बेटे के जन्म के बाद फिर एक बार जेहन में मौडलिंग का खयाल आया, जिस की वजह मेरा भाई और बेटा था. दरअसल, मेरे भाई को अचानक फोटोग्राफी का शौक चढ़ा और वह फ्री की मौडल चाहता था, तो मैं बन गई. शुरुआत में लगा कि अब क्या ये सब करना सही होगा? इसी बीच मेरा ध्यान अपने बेटे पर गया. इतनी छोटी उम्र में भी हर चीज बड़ी उत्सुकता से करता, बिना उस का अंजाम जाने. तब मुझे लगा क्यों न एक बार मैं भी खुद को मौका दूं. अत: मैं ने कोशिश की तो सफलता मिल गई.

घर और औफिस के काम के साथ फैशन वर्ल्ड में अपनी इमेज को कैसे मैनेज करती हैं?

घर में पत्नी, बहू और मां की भूमिका, औफिस में ऐग्जीक्यूटिव डायरैक्टर और फैशन वर्ल्ड में बतौर मौडल अपनी भूमिका निभाना मेरे लिए बहुत मुश्किल काम नहीं है. जब आप के पास बहुत ज्यादा काम आता है तब आप के अंदर काम करने की क्षमता भी बढ़ जाती है. दूसरी बात मैं जो भी काम करती हूं शतप्रतिशत उसी पर ध्यान केंद्रित करती हूं.

बच्चे की परवरिश करते वक्त किस बात का विशेष ध्यान रखती हैं?

मुझे अपने बेटे को किसी चीज का सौल्यूशन नहीं बताना है, बल्कि उसे ऐसा काबिल बनाना है कि वह खुद सौल्यूशन ढूंढ़ सके. आज बच्चे का इंटैलीजैंट होने से ज्यादा जरूरी इमोशनली स्ट्रौंग होना और हर समस्या का समाधान खुद निकालना है.

अपनी मां की कौन सी खूबी अपने अंदर चाहती हैं?

मेरी मम्मी गणित की टीचर हैं, इसलिए वे सारा काम मैथेडिकल तरीके से करती हैं. वे काफी और्गेनाइज्ड हैं. उन के हर काम में प्रोसैस होता है. उस वक्त मुझे ये चीजें बकवास लगती थीं, लेकिन अब लगता है कि काश यह क्वालिटी मुझ में भी होती तो मेरे लिए इतने सारे कामों को मैनेज करना आसान हो जाता.

परिवार को क्वालिटी टाइम देने में यकीन रखती हैं या फिर क्वांटिटी टाइम में?

पूरा दिन काम में निकल जाता है, लेकिन जैसे ही शाम होती है मैं उसे परिवार के नाम कर देती हूं. शाम अपने बेटे के साथ बिताती हूं. शनिवार और रविवार को परिवार के साथ फिल्म देखना, घूमने जाना पसंद करती हूं.

जो महिलाएं मां बनने के बाद प्रोफैशन को अलविदा कह देती हैं उन्हें क्या सलाह देना चाहेंगी?

हर इनसान यह बात अच्छी तरह जानता है कि उस के लिए क्या सही है. फिर भी मैं कहूंगी कि मां बनने के बाद पूरा 1 साल ईमानदारी से बच्चे को दें. उस के बाद अपने सपनों और ख्वाहिशों को भी पूरा करें. जरूरी नहीं कि आप उन्हें पूरा ही करें, उस राह पर चलें. ऐसा करने से आप को खुशी होगी.

अपनी सफलता के पीछे किसे देखती हैं?

सफलता उस बुके की तरह है, जो कई रंगबिरंगे फूलों से बनता है. मेरी सफलता के पीछे कई लोग हैं. उन में मेरा परिवार, पति, मेरा बेटा, ससुराल वाले, औफिस के लोग सभी हैं, जिन्होंने हमेशा मुझे सपोर्ट किया और आगे बढ़ने का मौका दिया.